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Saturday, December 10, 2016

समझ लीजिये कि आपका ईश्वर कितना भारी चार सौ बीस है! अगले छह महीने तो क्या, भविष्य में कभी नकद लेन देन की संभावना कोई नहीं है ! यह नरसंहार अर्थव्यवस्था पर नस्ली कारपरोरेट एकाधिकार की साजिश है। सत्ता वर्ग डिजिटल है तो डिजिटल इंडिया में बढ़त भी उन्हीं की है और मुनाफा वसूली के साथ साथ मुक्तबाजार का सारा कारोबार उन्हीं के दखल में है। 160 बैंक पीएसपी बनेंगे डिजिटल तो सात लाख करोड़ से ज्यादा क

समझ लीजिये कि आपका ईश्वर कितना भारी चार सौ बीस है!



अगले छह महीने तो क्या, भविष्य में कभी नकद लेन देन की संभावना कोई नहीं है !

यह नरसंहार अर्थव्यवस्था पर नस्ली कारपरोरेट एकाधिकार की साजिश है।

सत्ता वर्ग डिजिटल है तो डिजिटल इंडिया में बढ़त भी उन्हीं की है और मुनाफा वसूली के साथ साथ मुक्तबाजार का सारा कारोबार उन्हीं के दखल में है।

160 बैंक पीएसपी बनेंगे डिजिटल तो सात लाख करोड़ से ज्यादा करेंसी चलन में कतई नहीं होंगी ,डिजिटल इंडिया के रणनीतिकारों का एक्शन प्लान यही है और इसी वजह से बाकायदा सुनियोजित तरीके से बैंकों को दिवालिया बना दिया गया है।

नोट वापस ले लिये गये हैं लेकिन नोट वापस करने की कोई योजना नहीं है।न नोट जरुरत के मुताबिक छापे जा रहे हैं।न कभी फिर छापे जाएंगे।

पलाश विश्वास

तीन दिन बैंक बंद होने पर बहुत शोर होने लगा है।बैंक लगातार खुले हों तो भी नकदी मिलने वाली नहीं है।जैसे एटीएम बंजर हैं वैसे बैंक भी बंजर बना दिये गये हैं।बैंकों के अफसर और कर्मचारी एक बहुत बड़ी साजिश के शिकार हो रहे हैं।उनका इस्तेमाल बैंकों को दिवालिया बनाकर डिजिटल बहाने सारे लेनदेन के निजीकरण कारपोरेट वर्चस्व के लिए हो रहा है।यह नस्ली नरसंहार है।

अगले मार्च तक 160 बैंकों के डीजीटल लेनदेन के आधारकेंद्र पीएसपी बनाये जाने की तैयारी है और सुप्रीम कोर्ट की यह खुली अवमानना है कि सरकार 10 से 15 दिनों में नकदी सुलभ करने कोई इंतजाम करने जा रही है।यह सरासर धोखाधड़ी है।

आम जनता के हाथ में नकदी कतई न रहे,पूरी कवायद इसीके लिए है ताकि गुलामी मुकम्मल स्थाई बंदोबस्त हो और राज मनुस्मृति का।मुकम्मल हिंदू राष्ट्र।

ताकि खेती और कारोबार,उत्पादन और सेवाओं,उपभोक्ता वस्तुओं के बाजार पर पूरीतरह कारपोरेट निंयत्रण हो।

सारे नागरिक चूहों में तब्दील हैं और हैमलिन का वह जादूगर ईश्वर है जो नागरिक चूहों को इस देश की तमाम पवित्र नदियों में उनकी आस्था के मुताबिक विसर्जित करने जा रहा है।

सात खून माफ है। सारे नरसंहार माफ हैं। वह ईश्वर है।

पेटीएम जिओ आदि नकदी लेनदेन का निजी बंदोबस्त बैंकों के जरिये बैंकिंग को खत्म करने के लिए हो रहा है,यह सीधी सी बात अफसरों और कर्मचारियों की समझ में नहीं आ रही है तो राजनीतिक समीकरण की भाषा में अभ्यस्त राजनीति को क्या समझ में आने वाली है,जिसके लिए मौका के मुताबिक मुद्दे रोज बदल रहे हैं और वे मौसम मुर्गा के माफिक झूठे मौसम की बांग लगा रहे हैं।

भारत को अमेरिका ने अपना रणनीतिक पार्टनर कानून बना लिया है और यह मामला नजरअंदाज हो गया है।निजीकरण विनिवेश और एकाधिकार के लिए वाया नोटबंदी जो डिजिटल चक्रव्यूह तैयार किया है नरसंहार विशेषज्ञों ने,उसे सिर्फ संसद में शोर मचाकर बदलने की किसी खुशफहमी में वे जाहिर है कि कतई नहीं है।

वे जानबूझकर नौटंकी कर रहे हैं और कालाधन है तो सबसे ज्यादा इन्ही रंगबिरंगी पार्टियों के सिपाहसालारों का है और पकड़े जाने वाले हर नये पुराने नोट के साथ साफ राजनीतिक पहचान वैसे ही जुड़ी है जैसे आजाद भारत में हुए हर सौदे,घोटाले,भ्रष्टाचार के साथ सत्ता और राजनीति नत्थी  हैं।

राजनेताओं की जान आफत में है और वे अपनी अपनी जान बचा रहे हैं।

पर्दे की आड़ में नरसंहार के सौदे तय हो रहे हैं।

नकदी का संकट कृत्तिम है ताकि अर्थव्यवस्था को कैशलैस बनाया जा सके।

यह डिजिटल इंडिया का फंडा है।इसी वजह से बाजार में दशकों से चलन में रहे तमाम हाईवैल्यु नोट को रद्द करके आम जनता से क्रयशक्ति छीन ली गयी है और इस नोटबंदी कवायद का कालाधन से कोई मतलब नहीं है।

हम आगाह करना चाहते हैं कि सारी कवायद संसदीय सर्वदलीय सहमति से हो रही है।

सात लाख करोड़ से ज्यादा करेंसी चलन में कतई नहीं होंगी ,डिजिटल इंडिया के रणनीतिकारों का एक्शन प्लान यही है और इसी वजह से बाकायदा सुनियोजित तरीके से बैंकों को दिवालिया बना दिया गया है।नोट वापस ले लिये गये हैं लेकिन नोट वापस करने की कोई योजना नहीं है।

न नोट जरुरत के मुताबिक छापे जा रहे हैं।न छापे जाएंगे।

सत्ता वर्ग डिजिटल है तो डिजिटल इंडिया में बढ़त भी उन्हीं की है और मुनाफा वसूली के साथ साथ मुक्तबाजार का सारा कारोबार उन्हीं के दखल में है।

यह बेलगाम नरसंहार अर्थव्यवस्था पर नस्ली एकाधिकार की साजिश है।

यह सारा खेल निराधार आधार के बूते किया जा रहा है और नोटबंदी का विरोध करने वाली राजनीति ने आधार योजना का किसी भी स्तर पर विरोध नहीं किया है।सारा केवाईसी आधार के जरिये है और नई तकनीक का इस्तेमाल भी इसी आधार मार्फत होना है।जिसके तहत बैंको को भी डिजिटल कवायद में जबरन शामिल किया जा रहा है और बैंकों के जरिये पेटीएम कारोबार का एकाधिकार वर्चस्व स्थापित हो रहा है।लेनदेन डिजिटल है लेकिन इस लेनदेन की सुरक्षा की कोई गारंटी नहीं है।

नोटबंदी से पहले जो एटीेएम डेबिट क्रेडिट कार्ड के पासवर्ड चुराये गये,उसका गेटवे आधार नंबर है और अब सारा कारोबार आधार नंबर के मार्फत करने का मतलब बेहद खतरनाक है।इस डिजिटल अर्थतंत्र में रंगभेदी वर्चस्व कायम करने का स्थाई बंदोबस्त है और इसे लागू करने के लिए ही कालाधन निकालने का लक्ष्य बताया गया है जो दरअसल कालाधन पर सत्ता वर्ग का एकाधिकार का चाकचौबंद इंतजाम है।

हर लेनदेन के साथ आधार नत्थी हो जाने का मतलब हर लेनदेन के साथ नागरिकों के बारे में सारी जानकारी लीक और हैक होना है और उस जानकारी को कौन कैसे इस्तेमाल करेगा,यह हम नहीं जानते।

मसलन जनधन योजना के तहत जो खाते करोडो़ं के तादाद में खोले गये,सिर्फ डाक मार्फत चेकबुक न पहुंचने के काऱण उन खातों का पासबुक और चेकबुक बैंक कर्मचारियों के दखल में हैं,जिनका नोटबंदी संकट में कालाधन सफेद बनाने के लिए इस्तेमाल हो रहा है।

तो समझ लीजिये कि आधार जानकारियां सार्वजनिक हो जाने पर नागरिकों की जानमाल गोपनीयता की क्या गारंटी होगी।

इसे खेल की तकनीक,योजना और आधार आथेंसिटी का मामला राजनेताओं को कितना समझ में आ रहा है ,कहना मुश्किल है।लेकिन नोटबंदी के खिलाफ शोरशराबे से कुछ हासिल नहीं होना है,यह तय है।

अगले छह महीने तो क्या भविष्य में कभी नकद लेन देन की संभावना कोई नहीं है तो डिजिटल दुनिया के बाहर के लोगों के लिए क्रयशक्ति शून्य है और इसका सीधा मतलब यह है कि रोजमर्रे की जिंदगी में उन्हें दाने दाने को मोहताज होना पड़ेगा।

यह खुल्लमखुल्ला नरसंहार है और अंजाम भुखमरी है।सत्तावर्ग को भूख नहीं लगती।

बहरहाल नोटबंदी के बाद सरकार जिस तरह डिजिटल पेमेंट को बढ़ावा दे रही है, उसका असर दिखने भी लगा है। पिछले 1 महीने में ही डिजिटल पेमेंट में कई गुना का उछाल आया है और इसका सबसे ज्यादा फायदा ई-वॉलेट कंपनियों को हो रहा है।

गौरतलब है कि पेटीेएम और जिओ ने खुलकर प्रधानमंत्री की छवि अपना कारोबार बढ़ाने के लिए किया है और उनके माडलिंग से इन कंपनियों के पौं बारह हैं।

जाहिर है कि नोटबंदी के बाद एटीएम और बैंकों के बाहर की कतारें आम हो चली हैं। बैंकों और एटीएम से लाशें निकल रही है।नकदी नहीं निकलरही हैं। इसका सीधा फायदा पेटीएम को हो रहा है क्योंकि लोग डिजिटिल पेमेंट पर जोर दे रहे हैं।

गौरतलब है कि नोटबंदी के बाद 1 महीने में डिजिटल पेमेंट 6 गुना तक बढ़ गया है।कालाधन पर खामोशी बरत कर देश के सबसे बड़े कारपोरेट वकील ने बाहैसियत संघी वित्तमंत्री कालाधन पर जो बहुप्रचारित बयान जारी किया है उसका कोई संबंध काला धन से नहीं है।न उन्होंने नोटबंदी  मुहिम में निकल कालाधन का कोई ब्यौरा दिया है।उनने ग्यारह सूत्री सरकारी निर्णय की जो जानकारी दी है ,उसका एजडा हिंदुत्व का नस्ली नरसंहार यानी डिजिटल डिवाइड है जिसके मुताबिक डिजिटल बनाने के लिए अपनी खासमखास कंपनियों के कारोबार के लिए बढा़वा देना है।

इसी के तहत सरकारी आंकड़ों के मुताबिक इस दौरान रुपे कार्ड से लेनदेन 500 फीसदी से ज्यादा बढ़ा है। वहीं ई-वॉलेट से पेमेंट भी करीब 3 गुना हो गया है। इस दौरान यूपीआई से 15 करोड़ रुपये की लेनदेन हुआ जो 1 महीने पहले 2 करोड़ रुपये से भी कम था। वहीं यूएसएसडी से लेनदेन भी तेजी से बढ़ रहा है। प्वाइंट ऑफ सेल यानी पीओएस से शॉपिंग के लिए पेमेंट में भी 40 फीसदी से ज्यादा की बढ़ोतरी हुई है। जानकारों का मानना है कि आगे डिजिटल पेमेंट की रफ्तार और बढ़ेगी।

हालांकि सबी जानकार डिजिटल पेमेंट में सुरक्षा के खतरों को बहुत बड़ी बाधा मानते हैं। लेकिन सरकार और कंपनियों को आम जनता की जानमाल की कोई परवाह नहीं है और उनका का कहना है कि डिजिटल पेमेंट पूरी तरह सुरक्षित हैं। अगर थोड़े बहुत खतरे हैं तो उन्हें सुलझा लिया जाएगा।उन थोड़े बहुत खतरे से आगाह भी जनता को आगाह नहीं किया जा रहा है तो समझ लीजिये कि आपका ईश्वर कितना बारी चार सौ बीस है।

नोटबंदी के बाद सरकार भी डिजिटल पेमेंट को जमकर बढ़ावा दे रही है और अगर ज्यादा से ज्यादा लोग इसे अपनाते हैं तो इकोनॉमी को फायदा होगा।



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Friday, December 9, 2016

ডিজিটালে কোন কোন কম্পানীর লাভ? ডিজিটালে সাধারণ মানুষ বাঁচবেন ত? ছ মাসেও পরিস্থিতির উন্নতি না হলে,সারা দেশে বাংলার দুর্ভিক্ষ ফিরে আসবে। নোট বাতিল সিদ্ধান্ত কিন্ত বাংলার গৈরিকীকরণ অভিযানেরই অঙ্গ।বাংলার জননেত্রী মুখ্যমন্ত্রী মমতা ব্যানার্জির কোনো হিতৈষী সত্যি সত্যি আছে কিনা আমি জানি না। তিনিই আমাদের নেত্রী এবং রাজ্যের মুখ্যমন্ত্রী।অন্ধ বামবিরোধী ভোটব্যান্কের রাজনীতিতে �

ডিজিটালে কোন কোন কম্পানীর লাভ?

ডিজিটালে সাধারণ মানুষ বাঁচবেন ত?

ছ মাসেও পরিস্থিতির  উন্নতি না হলে,সারা দেশে বাংলার দুর্ভিক্ষ ফিরে আসবে।

নোট বাতিল সিদ্ধান্ত কিন্ত বাংলার গৈরিকীকরণ অভিযানেরই অঙ্গ।বাংলার জননেত্রী মুখ্যমন্ত্রী মমতা ব্যানার্জির কোনো হিতৈষী সত্যি সত্যি আছে কিনা আমি জানি না।

তিনিই আমাদের নেত্রী এবং রাজ্যের মুখ্যমন্ত্রীঅন্ধ বামবিরোধী ভোটব্যান্কের রাজনীতিতে বামপন্থী আন্দোলনের ঐতিহ্য ধুয়ে মুছে ফেলার রাজনৈতিক ফসল তুলতে গিয়ে সেই জমি আন্দোলনের সময় থেকেই তিনি যেভাবে বাংলা কে দক্ষিণপন্থী হিন্দুত্বকরণ ও আড়াআড়ি ধর্মীয় মেরুকরমের রণকৌশল সেই জমি আন্দোলনের সময় থেকে গ্রহণ করেছেন,এই মুহুর্তে বাংলার অর্থব্যবস্থা ও সমাজ ব্যবস্থার পক্ষে তা আত্মঘাতী

করপোরেট হিল্দুত্ব এজেন্ডার বিরুদ্ধে তাঁর মোদি হটাও জিহাদে মানুষের কতটা সমর্থন?


পলাশ বিশ্বাস


নোট বাতিল নিযে ভারতীয অর্থব্যবস্থার চুড়ান্ত নৈরাজ্য নিযে আমি নিযমিত হিন্দিতে লিখছি।কখনো কখনো ইংরেজিতে.আমি মোবাইলে লিখি না,তাই এফবি তে তত্ক্ষণাত্ কোনো মন্তব্য করা আমার পক্ষে সম্ভব নয়।বাংলা আমার মাতৃভাষা,যদিও বাংলায় আমি লেখক বা সাংবাদিক হিসেবে কোনো প্রতিষ্ঠিত মানুষ নইআমি আপনাদেরই মত একজন অতি সাধারণ নাগরিকমাত্রগত পয়তাল্লিশ বছর যাবত আমি ইংরেজি এবং হিন্দিতে জনগণের হয়ে কথা বলতে লিখতে অভ্যস্তকোনোদিন বাণিজ্যিক লেখা লিখতে পারিনি

আজ জিরো ইনকাম স্টেটসেও আমার পক্ষে করপোরেট স্বার্থে লেখা সম্ভব নযতাই প্রিন্ট ও ইলেক্রোনিক মীডিয়ায অনুপস্থিত আমার মত নন সেলেব্রিটি মানুষের পক্ষে সাধারণ পাঠককে সম্বোধিত করা এক্কেবারেই অসম্ভবঅন্যদিকে আমার সর্বভারতীয় একটি পাঠকশ্রেণী এই পয়তাল্লিশ বছরে তৈরি হয়েছে.যাদের প্রতি আমি রিয়েল টাইমে যাবতীয় তথ্যও বিশ্লেষণ প্রস্তুত করতে দায়বদ্ধ

আমি মাঝে মাঝে প্রাসঙ্গিক বিষয়ে বাংলায় অবশ্য লিখি,কিন্তু আমি এখন লিখতে পারছি না ,তাই আপনাদের কাছে করজোড়ে ক্ষমাপ্রার্থী

নোট বাতিল সিদ্ধান্ত কিন্ত বাংলার গৈরিকীকরণ অভিযানেরই অঙ্গবাংলার জননেত্রী মুখ্যমন্ত্রী মমতা ব্যানার্জির কোনো হিতৈষী সত্যি সত্যি আছে কিনা আমি জানি না

তিনিই আমাদের নেত্রী এবং রাজ্যের মুখ্যমন্ত্রীঅন্ধ বামবিরোধী ভোটব্যান্কের রাজনীতিতে বামপন্থী আন্দোলনের ঐতিহ্য ধুয়ে মুছে ফেলার রাজনৈতিক ফসল তুলতে গিয়ে সেই জমি আন্দোলনের সময় থেকেই তিনি যেবাবে বাংলা কে দক্ষিণপন্থী হিন্দুত্বকরণ ও আড়াআড়ি ধর্মীয় মেরুকরমের রণকৌশল সেই জমি আন্দোলনের সময় থেকে গ্রহণ করেছেন,এই মুহুর্তে বাংলার অর্থব্যবস্থা ও সমাজব্যবস্থার পক্ষে তা আত্মঘাতী

রাজনৈতিক ভাবেও বামপন্থীদের সরিয়ে ব্যাপক গৈরিকীকরণের হাইওয়ে ধরে কালো টাকার দক্ষিণপন্থী হিন্দুত্ব রাজনীতি তাঁর প্রবল গণ সমর্থনকেও বিপর্যস্ত করে তুলেছে,এবং তিনি ও তাঁর সমর্থকরা এটা একেবারেই বুঝতে পারছেন না,এটা বাঙালি ও বাংলার পক্ষে অশণিসংকেত,আমি মনে করি

দিল্লী,পাটনা বা লাখনৌ হয়ত বা সারা দেশে মোদী হটাও জিহাদের পরিবর্তে বাংলার ধর্ম নিরপেক্ষ ও প্রগতিশীল গণতান্ত্রিক পরিবেশকে রক্ষা করার জন্য তৃণমূল স্তরে যে রাজনৈতিক সংগঠন এবং অর্থনৈতিক রাজনৈতিক অভিযানের প্রয়োজন,তেমন কোনো দিশা মাননীয়া মমতা ব্যানার্জির তৃণমূল কংগ্রেস বা বামপন্থী দলের কারও নেই

সবচাইতে বেদনাদায়ক প্রসঙ্গ হল রাজনৈতিক শ্লোগান ছাড়া এই অইর্থনৈতিক বিপর্যয়ের সঠিক বিশ্লেষণ জনসমক্ষে আসছে না,খবরের কাগজ বা টিভি দেখে মানুষের যাবতীয় ধ্যান ধারণা চুড়ান্ত ভাবে রাজনৈতিক

এই নোট বাতিলের সিদ্ধান্তের কোনো অর্থশাস্ত্রীয় ভিত্তি নেইমুক্ত বাজারের প্রবক্তা মাননীয় অমর্ত্য সেন থেকে অভিরুপ সরকার পর্যন্ত প্রতিষ্ঠিত সব অর্থবিদরাই খোলাখুলি বলছেনযত নোট বাতিল হয়েছিল তার সবগুলিই আবার ব্যান্কে ফেরত এসেছে

কালো টাকার হদিশ কিন্ত এখনো মেলেনি এবং এখন সবাই ডিজিটাল ইন্ডিয়ার ধুয়ো তুলছেনকোন কোন কম্পানীর লাভ হবে এই ডিজিটালে,বুঝে নিতে হবে।কালো টাকার কথা প্রধানমন্ত্রী বেমালূম ভুলে গেছেন।

এত কাল যাবত ছাপানো নোটের বদলে সমসংখ্যক বা অন্ততঃ কাজ চালানোর মত নোট ছাপানোর মত পরিকাঠামো রিজার্ভ ব্যান্কের নেইকালো টাকার হদিশ কিন্ত এখনো মেলেনি এবং এখন সবাই ডিজিটাল ইন্ডিয়ার ধুয়ো তুলছেনকোন কোন কম্পানীর লাভ হবে এই ডিজিটালে,বুঝে নিতে হবে।কালো টাকার কথা প্রধানমন্ত্রী বেমালূম ভুলে গেছেন।

ছ মাস ছ বছরে ও বাজারে নগদের জোগান বাড়ার সম্ভাবনা শেষউপরন্তু ডিজিটাল ইন্ডিযার লক্ষ্যে অবিচল করপোরেট ফিস্ক্যাল পোলিটিক্যাল পরিকল্পনা অনুযায়ী নগদ টাকার কৃত্তিম অভাব তৈরি করা হল

মোদ্দা কথা হল,সাধারণ মানুষকে ক্রয়ক্ষমতা থেকে বন্চিত করে তাঁর সবরকম আর্থিক সুযোগ সুবিধা,স্বাধীনতা,ক্ষমতা,উত্পাদন,জীবিকা,উদ্যম থেকে তাঁদের বন্চিত করা হলএটিএম বা ব্যান্কের লাইনে যারা মারা যাচ্ছেন আমরা সকলেই তাঁদের চর্ম চক্ষুতে দেখতে পারছি।কিন্তু সাধারণ কোটি কোটি মানুষের অকাল মৃত্যুর ভয়াল ভবিষ্যত আমরা প্রত্যক্ষ দেখতে পারছি না

গতকালই ডিজিটাল ইন্ডিয়ার লক্ষ্যে যে এগারো দফা ইনসেন্টিভ ঘোষণা করা হল,তাঁর কোনো হিসেব আমাদের হাতে নেইআখেরে এই জডিজিটাল লেনদনের চার দেওয়ালে আমাদের হাতে শেষ পর্যন্ত কতটা ক্রয়ক্ষমতা থাকছে,এবং এই সোয়াইপ মেশিনগুলো কারা সাপ্লাই করবেন,তাঁদের কমিশন কত,ছাড় বাবদ কত পাব আর পরিসেবা বাবত কত দিতে হবে।

ফেসবুক করা,এসএমএস করা আর ডিজিটাল লেনদেন এক কথা নয়আধার নাম্বার দিয়ে যে ডিজিটাল লেনদেনের ব্যবস্থা করা হচ্ছে,তাতে জান মালের নিরাপত্তার কোনো ব্যবস্থা ব্যান্কিংএর মত থাকছে না।

প্রযুক্তিগত ত্রুটিতে কার্ড যেকোনো পয়েন্টে হ্যাক হতে পারে যেমনটা এটিএম বা ক্রেডিট কার্ডের ক্ষেতেরে হযেছিলব্যান্ক সেক্ষেত্রে ক্ষতিপূরণ দেবে কিন্তি নন ব্যান্কিং সংস্থা আদৌ কি ক্ষতিপূরণ দিতে দায়বদ্ধ,এমন কোনো প্রশ্ন করপোরেট সাংবাদিকরা করেন নি।

কত কালো টাকা উদ্ধার হল?

কত নোট ছাপা হল?

আদানি টাটা রিলাযেন্স বিলিয় বিলিযন পৌন্ড বা ডলারে বিজনেস করছেন সারা পৃথীবীব্যাপী,তাঁদের লেনদেনের ক্ষেত্রে কোনো বাধ্যবাধকতা থাকছে না,অথছ একটি দুহাজারটাকার নোট নিতে গিয়ে মানুষকে বেঘোরে প্রাণ হারাতে হচ্ছে ব্যান্কে টাকা থাকা সত্বেও?

নোট বদলের আগে সারা দেশে ব্যাপক যে টাকা জমা পড়েছে,সে সম্পর্কে তথ্য কোথায়?

বিজেপি মাফিয়া্ জনার্দন পুজারির পাঁচশো কোটির বিয়ের টাকা নোটবন্দিতে খরচ হল অথছ সাধারণ মানুষ নিজের বাড়িতে বিয়ে বাবদ টাকা পাচ্ছেন না?

বাংলায় তিন কোটি বিজেপির একাউন্টে জমার জন্য কি পদক্ষেপ হল?

প্রত্যেক রাজ্যে নোটবন্দীর ঠিক আগে বিজেপি দপ্তরের জন্য কোথা থেকে টাকা এল?

বিজয় মাল্য ছাড়া আর কাকে কাকে কোটি কোটি টাকার ঋণ মাফ করা হল?

নোটবন্দীর আগে নূতন আইন তৈরি করে কাদের লক্ষ লক্ষ কোটি টাকা বিদেশে পাচার করা হল?

চা বাগানের কত শ্রমিককে তাঁদের পাওনা মিটিয়ে দেওয়া হল?

নোট বাতিলের ফলে কত মানুষের চাকরি নট হল,কত উত্পাদন সংস্থার ঝাঁপ বন্ধ হল?

পেটিএম,বিগ বাজার,জিও ইত্যাদিকে ব্যান্কের বদলে ট্রান্জেকশনের অধিকারে কার কতটা লাভ?

পেটিএম ও জিওর বিজ্ঞাপনে কেন প্রধানমন্ত্রী ছবি?

নূতন নোটে কেন প্রধানমন্ত্রীর ভাষণ?

একহাজারি,পাঁচশো টাকা বাতিল করে যে দুহাজারী মহার্ঘ নোট জারি করা হল,সেই নোটেই দেশে সর্বত্র বিজেপি নেতারা কালো টাকা জমা করে ফেলিছেন ইতিমধ্যে এবং ধরাও পড়ছেন সারা দেশে,এটা কেমন করে হল?

এমন কোনো বেয়াডা় প্রশ্নের মুখোমুখি জেটলিকে হতে হয়নি।

ইতিমধ্যে এচটিএফসি ও এসবিআই ব্যান্কের চেয়ারম্যানরাও নোট বাতিলের যৌক্তিকতা নিয়ে সরব হয়েছেন।রিজার্ভ ব্যান্কও দায় ঝেড়ে ঝাড়া হাত পা।

জেটলি নিজে প্রধানমন্ত্রীর চওড়া কাঁধে সব দায়িত্ব পাঠিয়ে দিয়ে খালাস।

যারা ডিজিটাল লেনদেনের ব্যবস্থা করতে পারবেন না,এমন কোটি কোটি হাটে বাজারের মানুষকে একচেটিয়া করপোরেট আগ্রাসনের সামনে ফেলে দেওয়া হল।

বাজারে তাঁদের ফিরে আসার কোনো সম্ভাবনা নেই।

রোজগার সৃজন ত হচ্ছেই না,চা বাগান কল কারখানার শ্রমিক থেকে অসংগঠিত সেক্টারের শর্মজীবী মানুষ বা সবচেযে বেশি গ্রামীণ ক্ষেত মজূরদের বাড়িতে হাঁড়ি কি ভাবে চলবে,কেউ বলতে পারছেন না।

সারা দেশে মাত্র দু কোটি মানূষের নিযমিত বেতন বা পেনশন,তাঁরাই বেতন বা পেনশন পাচ্ছেন না।

তাহলে বাকি 128 কোটি মানুষের মধ্যে কত মানুষ আছেন যারা ডিজিটাল ইন্ডিয়ায় বেঁচে বর্তে থাকতে পারবেন,এই প্রশ্ন কেউ করছেন না।

ইতিমধ্যে জিডিপি কমতে শুরু করেছে.যা মন্দার সংকেত।

ইতিমধ্যে উত্পাদন দু পার্সেন্ট কমেছে।

ইতিমধ্যে ভারতের বাইরে বিলিয়ন বিলিয়ন ডলারের,পৌন্ডের ভারতীয় কম্পানী আদানী,টাটা,রিলায়েন্সের অবাধ ব্যবসা সত্বেও ভারতে বিনিয়োগ মাইনাসে।

কৃষি ক্ষেত্রে বিকাশ দর আগেই শুন্য ছিল,একন এই একমাসেই কৃষিতে শতকরা সত্তর পার্সেন্ট লোকসান হযে গেছে।

রবি ফসলের চাস বাধিত।খরিফ বিক্রী হচ্ছে না।

কত লক্ষ চাষি এবছর আত্মহত্যা করতে বাধ্য হবেন,সে সম্পর্কে রাজনৈতিক নেতাদের কোনো ধারণা নেই।

ইতিমধ্যে পান্জাবে গমের দাম প্রায় এক হাজার টাকা কুন্টলে বেড়ে গেছে।

সারা দেশে খুচরো আটা তেল চাল ডালের মাচের মাংসের দাম বেড়েই চলেছে।

শীতের সব্জি বাজারেও রেহাই নেই।

ছ মাসেও পরিস্থিতির  উন্নতি না হলে,সারা দেশে বাংলার দুর্ভিক্ষ ফিরে আসবে।



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Thursday, December 8, 2016

#सलामतरहेअपनाकालाधनकेसरिया #जनगणमनपेटीएमकैशलैसजिओबिगबाजारओलाबैंकिंगधोडाला #ThanksHDFCChiefParikhtostandforIndianBankingSystems पलाश विश्वास



#सलामतरहेअपनाकालाधनकेसरिया

#जनगणमनपेटीएमकैशलैसजिओबिगबाजारओलाबैंकिंगधोडाला

#ThanksHDFCChiefParikhtostandforIndianBankingSystems

पलाश विश्वास

एचडीएफसी बैंक के चेयरमैन दीपक पारेख ने नोटबंदी की तीखी आलोचना कर दी है तो भारतीय स्टेट बैंक की चेयरमैन ने बैंकिग के हक के खिलाफ मुद्रा प्रबंधन की रिजर्व बैंक की नीति के खिलाफ मुंह खोल दिया है।देश भर के बैंक कर्मचारी और अफसर नोटबंदी के महीनेभर बाद तक लगातार काम करते रहने,आम जनता की सेवा में लगे रहने के बाद,करीब पंद्रह लाख करोड़ पुराने नोट जमा करके बदले में सिर्फ तीन लाख करोड़ नये नोट के दम पर भारतीय बैंकिग को जिंदा रखने की हरसंभव कोशिश करके अब हारने और थकने लगे हैं और बहुत जल्द वे हड़ताल पर जाने वाले हैं।कैशलैस इंडिया में अब आम जनता को कुछ दिनों तक नकदी देने का काम करेंगी पीटीएम, जिओ,बिगबाजार और ओला जैसी नानबैंकिंग सेवाएं।अगर बैंक कर्मी सचमुच हड़ताल पर चले गये और वह हड़ताल हफ्तेभर तक चली,तो कैसलैस सावन के अंधों को दिन में तारे नजर आने लगेंगे।

नोट बंदी के बाद इसी बीच टाटा समूह ने ब्रिटेन में एक अरब पौंड का निवेश कर दिया है तो अडानी समूह को आस्ट्रेलिया में करीब आठ अरब डालर का खदान खजाना मिल गया है और खुदरा बाजार समेत संचार और ऊर्जा,इंफ्रास्ट्रक्चर और रियल्टी,रक्षा से लेकर बैंकिंग सेक्टर में रिलायंस समूह जिओ जिओ है।बाकी आम जनता दाने दाने को मोहताज है।नौकरीजीवी पेंशनभोगी दो करोड़ बैंकों की लाइन लगाकर पैसा घर चलाने के लिए लेने खातिर बैंकों और एटीएम पर दम तोड़ने लगे हैं।विशेषज्ञों के मुताबिक कृषि क्षेत्र में नुकसान सत्तर फीसद से ज्यादा है और अनाज का भारी संकट आगे बंगाल की भुखमरी है।मंदी की छाया अलग गहराने लगी है।उत्पादन दर अभी से दो फीसद गिर गया है और विकास दर हवा हवाई है।शेयर बाजार में बड़े खिलाड़ियों की दिवाली और दिवालिया तमाम निवेशक।कल कारखाने ,कामधंधे , हाट बाजार,खेती बंद।

सिर्फ काला धन अब केसरिया है।

जनार्दन रेड्डी के उड़ाये  पांच सौ करोड़ में से ड्राइवर के सुइसाइड नोट में सौ करोड़ काला केसरियाधन सफेद है और बाकी कसिकिस के सुईसाइड नोट में सफेद हुआ है ,मालूम नहीं है।दो हजार के नये नोट ने केसरिया तंत्र कालाधन का खड़ा कर दिया है।नोटबंदी से ऐन पहले बंगाल भाजपा के खाते में तीन करोड़ और हर राज्य में जमीन खरीद,नोटबंदी से पहले नये नोट के साथ केसरिया सेल्फी सुनामी के बाद बंगाल में भाजपा के नेता के पास 33 करोड़ केसरिया नये नोट बरामद तो बंगलूर में 40 करोड़ के नये नोट हासिल।

आम जनता के लिए नकदी वाले एटीएम तक फर्राटा दौड़ है और नकद पुरस्कार दो हजार का इकलौता नोट।

केसरिया एकाधिकार कंपनियों का विदेशों में निवेश अरबों पौंड और डालर में।

देश में निवेश दर शून्य से नीचे।

उत्पादन दर में गिरावट।

विकास दर में गिरावट।

कृषि विकास दर शून्य से नीचे।

सुनहले दिन केसरिया केसरिया।

#सलामतरहेअपनाकालाधनकेसरिया

#जनगणमनपेटीएमकैशलैसजिओबिगबाजारओलाबैंकिंगधोडाला

तमिलनाडु में अम्मा के अवसान के बाद शोकसंतप्त कमसकम सत्तर लोगों के मरने की खबर है।

हमारे हिंदू धर्म के मुताबिक तैतीस करोड़ देवदेवियों का संसार प्राचीन काल से है।

उनके परिवार नियोजन का रहस्य हम जानते नहीं हैं।

2016 में भी वे उतने ही हैं।

लेकिन अवतारों की संख्या उनसे कहीं ज्यादा है,इसमें कोई शक शुबह की गुंजाइश नहीं है।बाबाबाबियों की संख्या उनसे हजार गुणा ज्यादा है।

फिल्मस्टार और राजनेता भी ईश्वर न हो तो किसी देव देवी से कम नहीं है।

अम्मा ने तो फिरभी बहुत कुछ किया है।

आम जनता को दो रुपये किलो चावल,एक रुपये में भरपेट भोजन,राशनकार्ड पर टीवी,छात्र छात्राओं को मुफ्त लैपटाप, महिलाओं को साड़ी और विवाह पर कन्या को मंगल सूत्र।

इन तमाम योजनाओं से लाभान्वित लोगों का शोक जायज है।अम्मा में उनकी अटल आस्था का भी वाजिब कारण है।

इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि वे अपने पीछे चल अचल संपत्ति दो सौ करोड़ के करीब छोड़ गयी हैं या उनका राजनीतिक उत्तराधिकार और उनकी संपत्ति की मिल्कियत किसे मिलने वाली है।

इसके विपरीत तैंतीस करोड़ देव देवी,इतने ही करोड़ अवतार,उनसे हजार गुणा बाबा बाबियों का यह हुजूम सिरे से मुफ्त खोर हैं और इनका सारा काला कारोबार आस्था का मामला है।

धर्मस्थलों में देश की कुल संपत्ति से दस बीस गुणा संपत्ति है,जो सारा का सारा कालाधन केसरिया है।जिसका कोई हिसाब किताब नहीं है।वह सारा केसरिया कालाधन विशुद्ध आयुर्वेदिक है।जहां कानून का हाथ पहुंच जाये तो काट दिया जाये।जहां आयकर छापा नहीं पड़ सकता।उन्हीं धर्मस्थलों के महंत अब हमारे जनप्रतिनिधि हैं।जो अस्पृश्यता के धुरंधर प्रवक्ता हैं।यही उनका आध्यात्म है।

आम जनता को कंगाल बनाये रखने की रघुकुल परंपरा मनुस्मृति है।यही रामराज्य और स्वराज दोनों हैं।अखंड जमींदारी और अखंड रियासत सही सलामत।केसरिया कालाधन सही सलामत।बाकी जनता का कत्लेआम अश्वमेध जारी रहे और बार बार देश का बंटवारा होता रहे।यही वैदिकी संस्कृति है।राम की सौगंध है।

नोटबंदी से वही मनुस्मृति फिर बहाल हुई है और भारतीय संविधान और लोकतंत्र का रफा दफा हो गया है।

रिजर्व बैंक के पास नोटों का कोई लेखा जोखा नहीं है और सारे नये नोटों का केसरिया कायाकल्प है।राजकाज बिजनेस में तब्दील है।राजनीति बेनामी संपत्ति है।रिजर्व बैंक को मालूम नहींं है किसे कितने नोट मिल रहे हैं और तमाम नये नोट केसरिया कैसे बनते जा रहे हैं और केसरिया हाथों में ही वे घूम क्यों रहे हैं।सत्ता नाभिनाल से जुड़ी तमाम गैर बैंकिंग संस्थाओं को आम जनता को गला काटने का हक और बैंकिंग दिवालिया।डिजिटल बहार।

कालाधन का अता पता नहीं।कालाधन कहां है,कोई जवाब नहीं।स्विस बैंक खाताधारकों का क्या हुआ,कोई पता नहीं।माल्या के अलावा हजारों हजार करोड़ कर्ज माफी किन्हें मिली,नामालूम। कानून बनाकर किनके कालधन लाखों करोड़ विदेश भेज दिये गये,मालूम नहीं।लाखों करोड़ का टैक्स माफ किनके लिए।लाखों करोड़ का कमिशन किन्हें मिला मालूम नहीं।आम जनता को रातोंरात कंगाल बना दिया गया और उनके लोग अरबों पौंड,अरबों डालर का सौदा कारोबार कर रहे हैं।बाकी सारा कारोबार बंद है।

अरबों पौंड,अरबों डालर का विदेश में निवेश पर नोटबंदी का कोई असर नहीं है।देश में निवेश शून्य से भी नीचे हैं।यह गजब की डिजिटल अर्थव्यवस्था है जिसकी सारी मलाई विदेशियों के लिए हैं या विदेशी कंपनियों के साझेदारों के लिए है।यह अजब गजब स्वराज का रामराज्य है।ग्लोबल हिंदुत्व सही मायने में यही है। उनका केसरिया कालाधन सात समुंदर पार।उनका सारा कर्ज माफ।किसानों की खेती चौपट कर दी।किसान लाखों की तादाद में खुदकशी कर रहे थे,मेहनतकश लाखों मारे जा रहे थे,दलित ,विधर्मी और आदिवासी लाखों मारे जा रहे थे और अब करोड़ों की तादाद में मारे जाएंगे।यही हिंदू राष्ट्र है।यही हिंदू ग्लोब है।

किसी सभ्य देश में बैंक के पैसा देने से इंकार की वजह से सौ लोगों के मारे जाने का इतिहास नहीं है।न जाने कितने और मरेंगे तो हम शोक मनायेंगे।दो मिनट का मौन उन शहीदों के नाम रखेंगे।या फिर खुद शहादत में शामिल हो जायेंगे। न जाने कितने बच सकेंगे,जो आखिरकार चीख सकेंगे और न जाने किस किसकी खाल और रीढ़ बची रहेगी,किसका सर सही सलामत रहेगा कि फिर सर उठाकर रीढ़ सीधी करके इस अन्याय के अंध आस्था कारोबार के अंधा युग का इस महाभारत में विरोध करने की हालत में होंगे।

यह महाजनी सभ्यता दऱअसल आस्था का कारोबार है।

इसीलिए कारपोरेट नरसंहारी एजंडा भी हिंदुत्व का एजंडा है।

आम जनता अब इसी आस्था की बलि हंस हंसकर हो रहे हैं।

यही नहीं,एक दूसरे का गला काट रहे हैं।

बनिया पार्टी ने बनिया समुदाय को कंगाल बना दिया है।

सत्ता समीकरण ओबीसी है।

सत्ता का चेहरा ओबीसी है।

सत्ता के क्षत्रप और सिपाहसालार ओबीसी है।

आधी आबादी ओबीसी है।

जिनमें ज्यादातर किसान हैं।

बाकी छोटे मोटे कामधंधे में लगे लोग।

ओबीसी तमाम लोग कंगाल हैं।

ओबीसी की गिनती अबतक नहीं हुई।

ओबीसी के हकहकूक बहाल भी नहीं हुए।

ओबीसी को आरक्षण देने के मंडल प्रावधान के खिलाफ मंडल के बदले कमंडल आया और हिंदुत्व के इस उन्माद की जमीन आरक्षण विरोध है।

उसी हिंदुत्व एजंडा के सारे कारिंदे ओबीसी।

जिस मनुस्मृति की वजह से दलितों पर हजारों साल से अत्याचार जारी है, उसी मनुस्मृति बहाल करने वाले दलितों के ईश्वर अवतार बाबा बाबी हैं।

अर्थव्यवस्था सपेरों,मदारियों और बाजीगरों के हवाले हैं।

फिजां कयामत है।

लोग अपनी अपनी आस्था के लिए खुदकशी करेंगे।

लोग अपनी अपनी आस्था के लिए दंगा मारपीट कत्लेआम करेंगे,जान दे देंगे।लेकिन लोगों को संविधान या कानून की परवाह नहीं है।

मनुस्मृति शासन बहाल ऱखने के लिए दलित ओबीसी बहुजन हिंदुत्व एजंडे के कारपोरेट सैन्यतंत्र  की पैदल फौजें हैं।

इसीलिए निर्विरोध सलवाजुड़ुम।

इसीलिए निर्विरोध बलात्कार सुनामी।

इसीलिए निर्विरोध बच्चों की तस्करी।

इसीलिए निर्विरोध दलितों पर अत्याचार।

इसीलिए निर्विरोध स्त्री उत्पीड़न।

इसीलिए निर्विरोध निजीकरण।

इसीलिए निर्विरोध विनिवेश।

इसीलिए निर्विरोध बेदखली।

इसीलिए निर्विरोध बेरोजगार।

इसीलिए निर्विरोध सैन्य तंत्र।सैन्य शासन।

इसीलिए निर्विरोध फासिज्म कारोबार।राजकाज फासिज्म।

इसीलिए सामूहिक नसबंदी डिजिटल बहार निर्विरोध।

इसीलिए मैनफोर्स के हवाले देश का वर्तमान भविष्य और अतीत।

इसीलिए बिना उत्पादन के सिर्फ कमीशन खोरी का काला केसरिया मुक्तबाजार है।

इसीलिए इस देश का ट नहीं हो सकता।


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Wednesday, December 7, 2016

बाबाओं और बाबियों का देश सपेरों,मदारियों और बाजीगरों के हवाले अर्थव्यवस्था राजनीति में नागनाथ और आम जनता भेड़ धंसान लोकतंत्र दिवास्वप्न नागरिकता अभिमन्यु का चक्रव्यूह विवेक धृतराष्ट्र पितृसत्ता गांधारी पलाश विश्वास


बाबाओं और बाबियों का देश

सपेरों,मदारियों और बाजीगरों के हवाले अर्थव्यवस्था

राजनीति में नागनाथ

और आम जनता भेड़ धंसान

लोकतंत्र दिवास्वप्न

नागरिकता अभिमन्यु का चक्रव्यूह

विवेक धृतराष्ट्र

पितृसत्ता गांधारी

पलाश विश्वास

सबसे पहले हम अपने पाठकों और इस देश की आम जनता से माफी चाहते हैं।मौजूदा आपातकालीन हालात में हालात अघोषित सेंसरशिप है और बाकायदा सोशल मडिया की नाकेबंदी है।जो लिंक हम शेयर कर रहे हैं,अव्वल तो वह आप तक पहुंच ही नहीं रहा है और पहुंच भी रहा है तो खुल नहीं रहा है।जिन प्लेटफार्म के जरिये हम आप तक पहुंचते हैं,वहां भी हमारे लिए सारे दरवाजे और खिड़कियां बंद हैं।

नोटबंदी लागू होने के साथ साथ आम जनता ही नहीं,प्रतिबद्ध पढ़े लिखे एक बड़े तबके को भी यकबयक उम्मीद हो गयी कि देश में पहलीबार कालाधन निकालने का चाकचौबंद इंतजाम हो गया है।उनके पुराने स्टेटस इसके गवाह है।बहुत जल्दी उन्हें अपने अनुभवों से मालूम पड़ गया कि ऐसा कुछ होने नहीं जा रहा है।ऐसे तमाम पढ़े लिखे लोग तीर तरकश संभालकर मैदान में डट गये हैं और चांदमारी पर उतर आये हैं।उन्हें यह समझ में नहीं आ रहा है कि बाकी आम जनता उनकी तरह न पढ़े लिखे हैं और न काबिल और समझदार हैं।जो अब भी भक्तिमार्ग पर अडिग हैं।तो उनके ईश्वर के खिलाफ गोलाबारी का मोर्चा खुल गया है।ईश्वर के खिलाफ अनास्था आम आस्थावान जनता को सिरे से नापसंद हैं और वे किसी दलील पर गौर करने की मानसिकता में नहीं होते।ऐसे हालात में हकीकत की पूरी पड़ताल के बिना,लोगों से संवाद किये बिना हालात का मुकाबला असंभव है।

प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मडिया में पक्ष विपक्ष के सत्तापक्ष के हितों के मुताबिक बहुत कुछ छप रहा है।कुल किस्सा आधा सच और आधा झूठ का फसाना है।आम जनता के लिए क्या सच है,कितना सच और कितना झूठ है,झूठ क्या है,यह सुर्खियों की चीखों से पता करना एकदम असंभव है।सोशल मीडिया पर संवाद का रास्ता खुल सकता था और वहां भी अघोषित सेंसरशिप है।

हम सिरे से असहाय हैं।हमारा कहा लिखा कुछ भी आप तक नहीं पहुंच पा रहा है।करीब 45 साल से जिन अखबारों में हम लगातार लिखते रहे हैं,वहां सारे लोग बदल गये हैं और जो लोग अब वहां मौजूद हैं,उनमें अब भी ढेरों लोग हमारे पुराने दोस्त हैं।लेकिन उनमें से कोई हमें छापने का जोखिम उठाने को तैयार नहीं है। क्योंकि पत्रकारिता अब मिशन नहीं है,बिजनेस है,जिसे सत्ता का संरक्षण और समर्थन की सबसे ज्यादा परवाह है।जनता का पक्ष उनकी कोई वरीयता है ही नहीं क्योंकि उन्हें सिर्फ अपने कारोबारी हितों की चिंता है और वे बेहद डरे हुए हैं।ऐसे हालात में पैनल चैनल पर हमें कहीं से बुलावा आना भी असंभव है।बाकी सोशल मीडिया पर हम रोजाना रोजनामचा वर्षों से लिख रहे हैं,जो आप तक पहुंच नहीं रहा है।हम शर्मिंदा हैं।

हमारे इलाके में जबसे मैं नौकरी के सिलसिले में बंगाल में आया हूं,1991 से लेकर वाममोर्चा के सत्ता से बेदखल होने से पहले तक बुजुर्ग और जवान कामरेड घर घर आते जाते थे।इनमें सबसे बुजुर्ग दो कामरेड माणिक जोड़ के नाम से मशहूर थे।वाममोर्चा के सत्ता से बेदखल होने के बाद थोड़े समय के अंतराल में दोनों दिवंगत हो गये।

कामरेड सुभाष चक्रवर्ती के जीवित रहने तक जिले भर में कैडरों का हुजूम जहां तहां दिखता रहता था।तमाम मुद्दों और समस्याओं पर आम जनता से निरंतर संवाद और इसके लिए तैयारी में उनकी दिनचर्या चलती थी।

कामरेड ज्योति बसु के अवसान के बाद बंगाल में कोई कामरेड बचा है या नहीं,मालूम नहीं पड़ता।

पूरे बंगाल में अब संघी सक्रिय हैं।अभी अभी बंगाल में नवजात बच्चों की अस्पतालों और नर्सिंग होम से व्यापक पैमाने पर तस्करी के मामले खुल रहे हैं,जिसमें प्रदेश भाजपा के संघी अध्यक्ष के खासमखास विधाननगर नगर निगम में भाजपाई उन्मीदवार एक चिकित्सक बतौर सरगना पकड़े गये हैं।

नोटबंदी से एक दिन पहले बंगाल भाजपा के खाते में करोड रुपये जमा होने का किस्सा सामने आया तो आसनसोल इलाके में पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा उम्मीदवार और आसनसोल के सांसद केंद्रीय मंत्री बाबुल सुप्रिय के खासमखास कोलकाता के पास विधाननगर में कोयला मापिया के साथ 33 करोड़ के ताजा नोट के साथ पकड़े गये हैं।

कालाधन नये नोट में तब्दील होकर फिर अर्थव्यवस्था में खुलकर आ रहा है और एक हजार के बदले दो हजार के नोट जारी करके कायदा कानून बदलकर इसका चाकचौबंद इंतजाम हो रहा है तो कैशलैस फंडा अलग है।

दीदी ने मोदी के खिलाफ जिहाद का ऐलान कर दिया है और बंगाल में दीदी के सारे समर्थक केसरिया हो गये हैं।वे धुर दक्षिणपंथी हैं और कट्टर वामविरोधी हैं जो बंगाल में हाल में हुए चुनावों में दीदी मोदी गठबंधन को जिताने के लिए जमीन आसमान एक कर रहे थे।ये तमाम लोग अब भी मोदी और दीदी का समर्थन कर रहे हैं और दीदी के जिहाद को राजनीतिक नौटंकी मान रहे हैं।

दीदी के समर्थक बहुत ज्यादा हैं,लेकिन उनमें से कोई कार्यकर्ता नहीं है और वे अपने अपने धंधे सिंडिकेट में मशगुल हैं।आम जनता के लिए उनके फरमान तो जारी होते हैं लेकिन आम जनता से किसी का कोई संवाद नहीं है।

सारी राजनीति अखबारों और टीवी के सहारे चल रही है।

वाम नेता भी वातानुकूलित हो गये हैं और उनके बयान सीधे अखबारों,टीवी और सोशल मीडिया से जारी होते रहते हैं।

राजनीति पत्रकारिता में सीमाबद्ध हो गयी है और सारे पत्रकार राजनेता या कार्यकर्ता बन गये हैं।पत्रकारिता से अलग राजनीति का अता पता नहीं है और न ही राजनीति और सत्ता से अलग पत्रकारिता का कोई वजूद है।

ऐसे माहौल में जिले के एक बड़े कामरेड से  आज धोबी की दुकान पर मुलाकात हो गयी,जिनसे नब्वे के दशक में और 2011 तक हमारी घंटों बातचीत होती रहती थी।वे ट्रेड यूनियन आंदोलन में भी खासे सक्रिय हुआ करते थे।

कामरेड सुभाष चक्रवर्ती के खेमे में उनकी साख बहुत थी।उनसे राह चलते दुआ नमस्कार एक मोहल्ले में रहने के कारण अक्सर हो जाती थी।लेकिन बड़े दिनों के बाद उनसे आमना सामना हुआ तो हम उम्मीद कर रहे थे कि वे बातचीत भी करेंगे।वे प्राइवेट सेक्टर में नौकरी करते थे और राजनीतिक सक्रियता में उनकी नौकरी कभी आड़े नहीं आयी।उनने पहले ही मौके पर वीआरएस ले लिया था।

उनने कोई बात नहीं की तो मैंने पूछ लिया,क्या आप बैंक में थे।जाहिर है कि वे नाराज हुए और जवाब में कह दिया कि इतने दिनों से आपको यह भी नहीं मालूम।उनका सवाल था कि आप लिखते कैसे हैं।

इस पर मैंने पूछ ही लिया,नोटबंदी के बारे में कुछ बताइये।

वे बोले, मीडिया कुछ भी कह रहा है और आप लोगों को कुछ भी मालूम नहीं है।

मैंने कहा,आप कुछ बताइये।

जबाव में बुजुर्ग कामरेड ने कहा कि मुझे किसीसे कुछ लेना देना नहीं है।

गांव हो या शहर,आम जनता और परिचितों से कामरेड इस तरह कन्नी काट रहे हैं,जिन्हें अर्थव्यवस्था के बारे में भी जानकारी होती है।

यह सीधे तौर पर राजनीति का ही अवसान है,वामपंथ का तो नामोनिशां है नहीं।

बिना राजनीतिक कार्यक्रम और संगठन के इस आर्थिक अराजकता का मुकाबला असंभव है जबकि आम जनता को सपेरों,मदारियों और बाजीगरों के करतब से सावन ही सावन दिखा रहा है।

बाबाओं और बाबियों का देश

सपेरों,मदारियों और बाजीगरों के हवाले अर्थव्यवस्था

राजनीति में नागनाथ

और आम जनता भेड़ धंसान

लोकतंत्र दिवास्वप्न

नागरिकता अभिमन्यु का चक्रव्यूह

विवेक धृतराष्ट्र

पितृसत्ता गांधारी


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Tuesday, December 6, 2016

तो अब हम क्या करें? बाबासाहेब डा.भीमराव अंबेडकरी की राजनीति और विरासत के हिंदुत्वकरण के बाद ओबीसी कार्ड और द्रविड़ आंदोलन के केसरियाकरण से हमारे पास वैकल्पिक कोई राजनीति नहीं है क्योंकि वामपंथ की अब कोई साख नहीं है। अर्थव्यवस्था के लिए सबसे बड़ा खतरा अब भुखमरी,बेरोजगारी और मंदी का है तो बैंकिंग ही खत्म हो जाने का अंदेशा है।बैंको को दिवालिया कर देने के बाद मुद्रा की साख खत्म हो जा

तो अब हम क्या करें?

बाबासाहेब डा.भीमराव अंबेडकरी की राजनीति और विरासत के हिंदुत्वकरण के बाद ओबीसी कार्ड और द्रविड़ आंदोलन के केसरियाकरण से हमारे पास वैकल्पिक कोई राजनीति नहीं है क्योंकि वामपंथ की अब कोई साख नहीं है।

अर्थव्यवस्था के लिए सबसे बड़ा खतरा अब भुखमरी,बेरोजगारी और मंदी का है तो बैंकिंग ही खत्म हो जाने का अंदेशा है।बैंको को दिवालिया कर देने के बाद मुद्रा की साख खत्म हो जाने से जो आर्थिक अराजकता की स्थिति बन रही है,वह कालेधन की अर्थव्यवस्था से ज्यादा खतरनाक है।

पलाश विश्वास

हमने व्यापक पैमाने पर समाज के विभिन्न तबकों के लोगों से बात की है तो पता चला है कि गांवों और शहरों में नोटबंदी के खिलाफ अभी कोई माहौल बना नहीं है तो कालाधन वापसी की किसीको कोई उम्मीद भी नहीं है।लोग रातोंरात कैशलैस अर्थव्यवस्था के पक्ष में हो गये हैंं और उन्हें उम्मीद है कि सुनहले दिन अब आने ही वाले हैं।मोदी ने अमीरों के खिलाफ गरीबों को भड़काने का काम बखूब कर दिया है और अपने संपन्न पड़ोसियों के मुकाबले बहुसंख्य जनता को नोटबंदी में खूब मजा आ रहा है और उन्हें आने वाले खतरों के बारे में कोई अंदाजा नहीं है।आगे वे मोदी के नये करतबों और आम बजट में राहत का इंतजार कर रहे हैं।कालाधन के अलावा उन्हें बेनामी संपत्ति भी जब्त हो जाने की उम्मीद है।उन्हें समझाने और अर्थतंत्र के शिकंजे में फंसी उनकी रोजमर्रे के हकीकत का खुलासा करने का हमारा कोई माध्यम नहीं है और न कोई राजनीति ऐसी है जो आम जनता के हक हकूक के बारे में सच उन्हें बताने की किसी योजना पर चल रहा है।

हम यही बताने की कोशिश कर रहे है कि हिंदुओं के ध्रूवीकरण की राजनीति विपक्ष के अंध हिंदुत्व विरोध से जितना तेज हुआ है,उसी तरह अंध मोदी विरोध से भी कोई वैकल्पिक राजनीति तब तक नहीं बनती जब तक सच बताने और समजानेका हमारा कोई सुनियोजित कार्यक्रम और माध्यम न हो।हिंदुत्व के फर्जी एजंडा का पर्दाफाश करने की कोई जमीनी कवायद हम कर नहीं पाये हैं।तो संसदीय हंगामा से हम फासिज्म के राजकाज पर किसीभी तरह का अंकुश नहीं लगा सकते हैं। रोज नये नये सत्यानाशी फरमान जारी हो रहे हैं,जिनका असल मतलब और मकसद बताने और समझने का कोई नेटवर्क हमारे पास नहीं है।

मसलन बंगाल में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने मोदी के खिलाफ नोटबंदी के बाद पुराने नोट फिर बहाल करने की मांग लेकर जिहाद छेड़ दिया है और वे दिल्ली,लखनऊ और पटना घूमकर नया राजनीतिक समीकरण बनाने के फिराक में हैंं।प्रबल जनसर्तन होने के बावजूद उनकी इस मुहिम को आम जनता का समर्थन कतई नहीं है और वे मोदी के करिश्मे से अपने दिन फिरने का इंतजार कर रहे हैं और जो गरीब लोग हैं,वे छप्पर फाड़ सुनहले दिनों का इंतजार कर रहे हैं।वामपंथियों काकोईजनाधार बचा नहीं है तो दीदी का कोई जनाधार भी दिख नहीं रहा है।इसके विपरीत भूमिगत सारे संघी सतह पर आ गये हैं और मोदी की छवि सामने रखकर वे बंगाल का तेजी से केसरियाकरण कर रहे हैं।

नोटबंदी क्रांति के बारे में हमें पहले दिन से ही खुशफहमी नहीं रही है।हमने शुरुआत में ही लिखा हैनई विश्वव्यवस्था  में नागपुर तेलअबीब और वाशिंगटन गठभंधन के आधार पर अमेरिका के राष्ट्रपति पद पर ग्लोबल हिंदुत्व के उम्मीदवार घनघोर रंगभेदी डोनाल्ड ट्रंप के ताजपोशी से पहले भारत में आर्थिक आपातकाल लागू हो गया है।

अब जो हालात बन रहे हैं,वे बेहद खतरनाक हैं।बेहद खतरनाक इसलिए हैं कि हमारे पास वैकल्पिक कोई राजनीति नहीं है।आज बाबासाहेब डा.भीमराव बोधिसत्व का परिनिर्वाण दिवस है।देशभर में परिनिर्वाण दिवस की धूम लगी रही।तो दूसरी ओर,तमिलनाडु में तीन दशकों से द्रमुक राजनीति की धुरी बनी हुई अम्मा का अवसान हो गया।वामपंथ के भारतीय परिप्रेक्ष्य में हाशिये पर चले जाने के बाद अंबेडकरी और द्रमुक आंदोलन के दिशाहीन हो जाने से वैकल्पिक राजनीति अब विश्वविद्यालयी छात्रो के जयभीम कामरेड तक सीमाबद्ध हो गयी है।

हमने पिछले दिनों ओबीसी कार्ड के नये राजनीतिक समीकरण पर जो लिखा है,उससे देस में सबसे बड़ी आजादी के पढ़े लिखे लोग नाराज हो सकते हैंं।लेकिन सच यही है कि ओबीसी कार्ड के जरिये संघ परिवार ने पहले सत्ता दखल किया और हिंदुत्व के एजंडे के साथ राजकाज शुरु हुआ।अब वही हिंदुत्व कार्ड प्रधानमंत्री की अस्मिता राजनीति के तहत कारपोरेट एजंडा में तब्दील हुआ जा रहा है।इससे संघ परिवार का दूर दूर का कोई संबंध नहीं है।

भले ही राममंदिर आंदोलन और हिंदुत्व का एजंडा हाशिये पर है लेकिन संघ परिवार का यह ओबीसी समर्थित कारपोरेट एजंडा असहिष्णुता की रंगभेदी राजनीति से कही ज्यादा खतरनाक है।देश की सबसे बड़ी आबादी को यह बात समझ में नहीं आ रही है तो देश में अर्थव्यवस्था और उत्पादन प्रणाली के एकाधिकार देशी विदेशी के  कब्जे में चले जाने पर होने वाली नरसंहारी आपदाओं के बारे में हम किसे समझायें।

आज अम्मा को द्रमुक राजनीति के ब्राह्मणवाद विरोध और नास्तिकता के दर्शन के मुताबिक दफनाया गया है।हम भारतीय राजनीति में मातृसत्ता का समर्थन करते हैं।हम महिलाओं के राजनीतिक नेतृत्व का ही नहीं,जीवन में हर क्षेत्र में उनके नेतृत्व के पक्ष में हैं।जाति के आधार पर आधी आबादी ओबीसी के कार्ड के जरिये केसरिया है तो लिंग के आधार पर आधी आबादी ब्राह्मणवादी पितृसत्ता के कब्जे में हैं।विकास का तंत्र जनपदों के सीमांत व्यक्ति तक पहुंचाने,आम जनता की बुनियादी जरुरतों और सेवाओं की सबसे ज्यादा परवाह करने और सीधे जनता से संवाद और जनसुनवाई के लिए अम्मा जयललिता की स्त्री अस्मिता निर्णायक रही है और उनकी राजनीति सीधे रसोई से शुरु होती है,इसमें भी हमें कोई शक नहीं है।

ममता बनर्जी की राजनीति से सिरे से असहमत होने के बावजूद एक आजाद जनप्रतिबद्ध स्त्री के बतौर उनकी राजनीति का हम शुरु से समर्थन करते रहे हैं तो श्रीमती गांधी से लेकर सुषमा स्वराज और बहन मायावती की राजनीतिक भूमिका को हम सामाजिक बदलाव की दिशा में सकारात्मक मानते हैं और इसी सिलसिले में करीब पंद्रह साल से आमरण अनशन करने वाली मणिपुर की लौैहमानवी इरोम शर्मिला के संसदीय राजनीति में लड़ने के फैसले का हम विरोध नहीं करते।क्योंकि समता,न्याय औरसहिष्णुता के लिए पितृसत्ता का टूटना सबसे ज्यादा जरुरी है।

जयललिता ने अयंगर ब्राह्मण होते हुए,जन्मजात कनन्ड़ भाषी होते हुए अपने सिनेमाई करिश्मा से तमिल अनार्य द्रविड़ आम जनता के साथ जो तादात्म्य कायम किया और जिस तरह वे द्रविड़ राजनीति का तीन दशकों से चेहरा बनी रही,वह हैरतअंगेज और अभूतपूर्व है और हम उनके निधन को तमिलनाडु में मातृसत्ता का अवसान मानते हैं।इसके बावजूद सच यह है कि अम्मा का अंतिम संस्कार वैदिकी रीति रिवाज के मुताबिक हुआ तो फर्क सिर्फ इतना है कि उन्हें चिताग्नि में समर्पित करने के बजाय दफनाया गया है।यह रामास्वामी पेरियार के आत्मसम्मान और अनास्था आंदोलन के विपररीत द्रविड़ आंदोलन का केसरियाकरण है।

बाबासाहेब डा.भीमराव अंबेडकरी की राजनीति और विरासत के हिंदुत्वकरण के बाद ओबीसी कार्ड और द्रविड़ आंदोलन के केसरियाकरण से हमारे पास वैकल्पिक कोई राजनीति नहीं है क्योंकि वामपंथ की अब कोई साख नहीं है।

तो अब हम क्या करें?

अर्थव्यवस्था के लिए सबसे बड़ा खतरा अब भुखमरी,बेरोजगारी और मंदी का है तो बैंकिंग ही खत्म हो जाने का अंदेशा है।बैंको को दिवालिया कर देने के बाद मुद्रा की साख खत्म हो जाने से जो आर्थिक अराजकता की स्थिति बन रही है,वह कालेधन की अर्थव्यवस्था से ज्यादा खतरनाक है।


Saturday, December 3, 2016

नोटबंदी का यह कारपोरेट कार्यक्रम संघ परिवार का मृत्यु संगीत है। #CitizenshipsuspendedtoenhanceAbsolutePowerofRacistFascismMakinginMilitaryState खींच मेरा फोटो खींच! पेटीएम के बाद जिओ के विज्ञापनों में भी प्रधानमंत्री! पलाश विश्वास


नोटबंदी का यह कारपोरेट कार्यक्रम संघ परिवार का मृत्यु संगीत है।
#CitizenshipsuspendedtoenhanceAbsolutePowerofRacistFascismMakinginMilitaryState
खींच मेरा फोटो खींच!
पेटीएम के बाद जिओ के विज्ञापनों में भी प्रधानमंत्री!
पलाश विश्वास
#CitizenshipsuspendedtoenhanceAbsolutePowerofRacistFascismMakinginMilitaryState
खींच मेरा फोटो खींच!
पेटीएम के बाद जिओ के विज्ञापनों में भी प्रधानमंत्री!अब बिना इजाजत जिओ के विज्ञापन में प्रधानमंत्री की तस्वीर चस्पां करने के लिए मुकेश अंबानी को भारी घाटा उठाना पड़ेगा क्योंकि भारत सरकार इस गुनाह के लिए रिलायंस पर भारी जुर्माना सिर्फ पांच सौ(दोबारा पढ़ें,सिर्फ पांच सौ) का लगाने जा रही है।आयकर खत्म करके ट्रांजैक्शन टैक्स लगाकर अरबपतियों और करोड़पतियों को मेहनतकश जनता के बराबर खडा़ करनेवालों की समाजवादी क्रांति की समता,समरसता और सामाजिक न्याय का यह जलवा है तो आधार पहचान के जरिये लेन देन के तहत कारपोरेट एकाधिकार कायम करने के साथ बहुजनों का सफाया करने के लिए उनके कारपोरेट महोत्सव के अश्वमेध यज्ञ का हिंदुत्व एजंडा भी कैशलैस सोसाइटी है और नोटबंदी अभियान राममंदिर आंदोलन की निरंतरता है।
जाहिर है कि कारपोरेट सुपरमाडल बने प्रधानमंत्री पर अब संघ परिवार का नियंत्रण भी नहीं है!
ग्लोबल हिंदुत्व के महानायक डोनाल्ड ट्रंप राष्ट्रपति चुने जाने के बाद अमेरिकी लोकतंत्र की परंपरा के मुताबिक अपने को ढालने की कोशिश हैरतअंगेज तरीके से कर रहे हैं।वैसे भी अमेरिका में राजकाज,कायदा कानून,राजनय,संधि समझौता से लेकर कानून व्यवस्था के मामले में अमेरिकी राष्ट्रपति के सर्वेसर्वा सर्वशकितमान स्टेटस के बावजूद तानाशाही तौर तरीके अपनाने की मनमानी नहीं है और राष्ट्रपति प्रणाली होने के बावजूद अमेरिकी सरकार को कदम दर कदम संसदीय अनुमति की जरुरत होती है।
इसके विपरीत हमारे यहां संसदीय प्रणाली होने के बावजूद संसद की सहमति के बिना राजकाज,कायदा कानून,राजनय,संधि समझौता से लेकर कानून व्यवस्था के मामले में कैबिनेट की सांकेतिक अनुमति से ही जन प्रतिनिधियों को अंधेरे में रखकर बिना किसी संवैधानिक विशेषाधिकार के प्रधानमंत्री को फासिस्ट तौर तरीके अपनाने से रोकने की कोई लोकतांत्रिक तौर तरीका नहीं है।मनमोहन सिंह ने भारत अमेरिका परमाणु संधि पर दस्तखत कर दिया था बिना संसदीयअनुमति या सहमति के और वामपंथी अनास्था के बावजूद न सिर्फ उनकी सरकार गिरने से बची, अगला चुनाव जीतकर उनने वह समझौता बखूब लागू भी कर दिया जनमत,आम जनता या संसदीय अनुमति के बिना।जबकि इस संधि पर संसद की मुहर लगाकर बाकायदा समझौते को कानून बनाने में अमेरिकी राष्ट्रपति जार्ज बुश की हालत पतली हो गयी थी।
यही वजह है कि नस्ली दिलोदिमाग के होने के बावजूद अमेरिकी प्रेसीडेंट इलेकट को सिर्फ अमेरिकी का प्रेसीडेंट ही बने रहना है।डोनाल्ड ट्रंप अरबपति होने के बावजूद तमाम दूसरे पद और हैसियत छोड़ने को मजबूर हैं।
दूसरी ओर,अपने प्रधानमंत्री पर कोई अंकुश किसी तरफ से नहीं है।गुजरात के मुख्यमंत्री बतौर वे जो कुछ कर रहे थे,अब भी वही कर रहे हैं।देश का प्रधानमंत्री होने के बावजूद संसदीय अनुमति से नहीं संघ परिवार के एजंडा और दिशानिर्देश के तहत संघ मुख्यालय से वह फासिज्म का राजकाज चला रहे हैं।अब तो लगता है कि संघ परिवार का भी उनपर कोई अंकुश नहीं है।
ओबीसी कार्ड खेलकर बहुसंख्य जनता का वोट हासिल करने के लिए जाति व्यवस्था और अस्मिता राजनीति के तहत भारत की सत्ता दखल करने में संघ परिवार को कामयाबी जरुर मिल गयी है,लेकिन संघी और भाजपाई भूल गये कि ब्राह्मण नेताओं जैसे अटल बिहारी वाजपेयी या मुरलीमनोहर जोशी और अटलबिहारी वाजपेयी को नियंत्रण करने में उन्हें जो कामयाबी मिलती रही है,उसकी सबसे बड़ी वजह ब्राह्मण भारत की जनसंख्या के हिसाब से तीन फीसद भी नहीं है।
लालकृष्ण आडवाणी सिंधी हैं और सिंधियों की जनसंख्या ब्राह्मणों की जनसंख्या के बराबर भी नहीं है।
इसके विपरीत ओबीसी की जनसंख्या पचास फीसद से ज्यादा है और संघ परिवार की पैदल सेना में ओबीसी सभी स्तरों पर काबिज हैं।सारे ओबीसी क्षत्रप राज्यों के मुख्यमंत्री हैं।
अब मोदी ओबीसी कार्ड संघ परिवार के खिलाफ खेल रहे हैं।
उनका ब्रह्मास्त्र उन्हींके खिलाफ दाग रहे हैं।
लालू नीतीश नोटबंदी के हक में हैं।
मुलायम अखिलेश लगभग खामोश हैं।
यूपी बिहार सध गया तो नागपुर की परवाह क्यों करें।
संघ परिवार के ताबूत पर कीलें अब ठुकने ही वाली हैं।
हिंदुत्व का राममंदिर एजंडा पहले शौचालय में खप गया।
राममंदिर के बदले शौचालय तो हिंदुत्व का एजंडा अब नोटबंदी है।
मोदी इस ओबीसी समीकरण के तहत संघ परिवार की परवाह किये बिना निरंकुश राजकाज चला सकते हैं और हिंदुत्व का बैंड बाजा बजा सकते हैं तो ब्राह्मणों की खाट भी खड़ी कर सकते हैं।
पहले भी डां.मनमोहन सिंह को बचाने में पंजाब के अकाली उनका साथ संघ परिवार से नाभि नाल के संबंध के बावजूद सक्रिय थे और अकालियों ने ही अनास्था प्रस्ताव से मनमोहन को बचाया।
उन्हीं मनमोहन के कंधे पर सवार ओबीसी कारपोरेट अब मोदी राज में हर क्षेत्र में हिंदुत्व,शुद्धता और आयुर्वेद के ब्रांड के साथ तमाम कारपोरेट ब्रांड पर हावी है।
उनका सारा कारोबार आयकर और नोटबंदी के दायरे से बाहर है और वे ही नोटबंदी के सबसे बड़े प्रवक्ता हैं।
जाति व्यवस्था बहाल रखने के लिए,मनुस्मृति अनुशासन लागू करने के लिए यह कारपोरेट राज हिंदुत्व का एजंडा है।
इसीलिए ओबीसी कार्ड बेहिचक खेल दिया संघ परिवार ने तो इसी ओबीसी कार्ड की ताकत और कारपोरेट समर्थन से मोदी अब आम जनता के लिए जो सबसे खतरनाक है,सो है,संघ परिवार के लिए भस्मासुर हैं अभूतपूर्व जिन्हें संघ परिवार ने भगवान विष्णु की तरह सर्व शक्तिमान बना दिया और आखिरकार वे पेटीएम और जिओ के सुपरमाडल निकले।
नोटबंदी का यह कारपोरेट कार्यक्रम संघ परिवार का मृत्यु संगीत है।
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