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Wednesday, January 18, 2012

मनोरंजन की परिभाषा कब मन के रंजन यानी बहलाव, आनंद से परिवर्तित होकर अश्लीलता की सीमा में प्रवेश कर गयी, इसका पता वृहत्तर भारतीय समाज को पता ही नहींचला।

मनोरंजन की परिभाषा कब मन के रंजन यानी बहलाव, आनंद से परिवर्तित होकर अश्लीलता की सीमा में प्रवेश कर गयी, इसका पता वृहत्तर भारतीय समाज को पता ही नहींचला।

उपसंहार: लोकप्रिय और लोकमान्य 

सर्वमित्रा सुरजन 

मनोरंजन की परिभाषा कब मन के रंजन यानी बहलाव, आनंद से परिवर्तित होकर अश्लीलता की सीमा में प्रवेश कर गयी, इसका पता वृहत्तर भारतीय समाज को पता ही नहींचला। पाश्चात्य और प्राच्य की दो नावों पर पैर रखते-रखते अब हम पूरी तरह भटक चुके हैं। बचा है तो सिर्फ अतिरेक, जिसमें या तो संस्कृति के नाम पर कट्टरता थोपी जा रही है या खुलेपन के नाम पर अश्लीलता। दृश्य माध्यम, विशेषकर आज के प्रचलित धारावाहिकों और तथाकथित रियलिटी शो में जिस तरह की सामग्री परोसी जा रही है, उसमें शालीनता को ताक पर रखकर टीआरपी बढ़ाने का प्रचलन हो गया है। जो जितनी फूहड़ता दिखला सकता है, वो उतना लोकप्रिय होगा। कसौटी अब लोकमान्य होने की नहींहै, लोकप्रिय होने की है। बदनाम हुए तो क्या हुआ, नाम तो हुआ, सारा कारोबार इसी तर्ज पर चल रहा है।
पिछले दिनों कलर्स टीवी पर दिखाए जाने वाले बिग बास और एनडीटीवी इमेजिन पर आने वाले राखी का इंसाफ नामक शो में प्रसारित की जाने वाली सामग्री पर काफी बवाल खड़ा हुआ। इन कार्यक्रमों का समय बदला गया कि ये प्राइम टाइम यानी रात 9 बजे दिखाए जाने लायक नहींहैं, क्योंकि इसका गलत प्रभाव बच्चों, किशोरों पर पड़ सकता है। सीधे शब्दों में कहें तो ये कार्यक्रम केवल वयस्कों के देखने लायक हैं। बिग बास ने अपने नाम को सार्थक करते हुए प्रसारण समय में बदलाव के निर्देश पर स्टे ले लिया और पूर्ववत 9 बजे ही प्रसारित हो रहा है, जबकि राखी का इंसाफ 11 बजे प्रसारित होने लगा। लेकिन इससे क्या फर्क पड़ता है। दो कार्यक्रमों के समय बदलने से टीआरपी बढ़ाने वालों की नीयत नहींबदली जा सकती। फूहड़ता, अश्लीलता पर कहां-कहां रोक लगाई जाए और कितने कार्यक्रमों का वक्त बदला जाए। केवल बिग बास और राखी का इंसाफ ही नहीं, कामेडी के नाम पर जितने कार्यक्रम, प्रतियोगिताएं चैनलों पर प्रसारित हो रहे हैं, उन्हें भी घर के सारे सदस्य एक साथ नहींदेख सकते। स्त्री जाति की गरिमा को जो जितना गिरा सकता है, वो उतनी अच्छी कामेडी कर सकता है, पैमाना कुछ ऐसा ही बन गया है। टीवी के कार्यक्रमों के साथ-साथ विज्ञापनों में भी इसी गिरावट का दौर चल रहा है। गोरेपन की क्रीम, टैल्कम पावडर, खुशबूदार स्प्रे, तेल, शैम्पू, साबुन, टूथपेस्ट, वाशिंग पावडर, खाद्य तेल, बिस्किट, चाकलेट, काफी, चाय, मोबाइल फोन, टीवी, कार, जूते, चप्पल, सर्दी-गर्मी के कपड़े, किसी भी सामान का विज्ञापन नारी की मर्यादा को गिराए बिना, मानो बन ही नहींसकता। इनमें से किस-किस पर सेंसर की कैैंची चलेगी। अकेले टीवी चैनलों पर नैतिकता में गिरावट का दोष नहींडाला जा सकता। आज की फिल्में भी इससे अछूती नहींहैं। कहानी चाहे जो हो, शीर्षक भी फूहड़ता से नहींबच सके हैं और आयटम गीत तो मानो अश्लीलता का पर्याय बन गए हैं। हम फलां कार्यक्रम नहींदेखते, हमारे घर तो बच्चों के टीवी देखने का समय तय है, आजकल की फिल्में देखने लायक नहींहै, इसलिए हम नहींदेखते। ऐसा कहकर हम संस्कारों, नैतिकता में आयी गिरावट से खुद को थोड़ी देर के लिए तो बचा सकते हैं, पर इस समाज से बचाकर खुद को कहां ले जाएंगे, जिसमें मूल्यों का ऐसा पतन हो रहा है। शुतुरमुर्ग रेत में सिर घुसा ले तो आंधी रुक नहींजाती है। मनोरंजन मखौल उड़ाने, फूहड़ता फैलाने का साधन न बने, इसकी सुनिश्चितता करना आज के समय की कठिन चुनौती है। इस चुनौती से पार लगेंगे, तभी मिलेगा असली मनोरंजन, लोकप्रिय और लोकमान्य भी। 
0 सर्वमित्रा सुरजन

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