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Saturday, January 14, 2012

खंडित आदर्श

Saturday, 14 January 2012 16:58

अलका सिंह 
जनसत्ता 14 जनवरी, 2012 : कुछ समय पहले जब पेट्रोल की कीमतों में यों कहें कि आग लगी, तब देश के शीर्ष नेताओं का बयान आया कि 'कीमतों पर हमारा नियंत्रण नहीं, यह बाहर से तय होता है।' उसके बाद एक दिलचस्प खबर पढ़ी- 'अमेरिकी फाउंडेशन के बल पर चुस्त होते सांसद।' संसद की गतिविधियों को समझने, सवाल पूछने, भाषण तैयार करने में युवा पेशेवरों की टीम सांसदों की मदद करती है। इन्हें 'लैंप फेलो' कहते हैं। ऐसे छियालीस सांसद हैं जिनकी मदद के लिए छियालीस युवा पेशेवरों की टीम काम कर रही है। संस्था यह भी हिसाब रखती है कि किस सांसद ने सदन में कितनी बार 'सक्रिय' हस्तक्षेप किया। लेकिन इस तरह का हस्तक्षेप तो तब होगा, जब सदन सामान्य तरीके से काम करे। आम आदमी का जब संदर्भ आता है तो कुछ लोग मजाक में अब 'आम' की जगह 'गुठली' कह देते हैं! तो आम आदमी अपना निर्णायक मत प्रकट करने के लिए घंटों कतार में खड़ा कातर भाव से अपनी बारी की प्रतीक्षा करता है। एक उम्मीद के साथ हर पांच साल पर लोकतंत्र के महापर्व में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेता है। उसके मन में आज भी यह भावना बलवती है कि उसके दिन बदलेंगे। लेकिन आशा जब निराशा बन कर घनीभूत होने लगती है तो उसका अंतरमन चीत्कार उठत्ोा है।
यह जान कर दुख होता है कि जिनके हाथों में हमने देश की बागडोर दी है, उनकी कमान किसी और के हाथ है। हालांकि यह तय है कि देश की समस्याओं का समाधान यहीं से निकलना है। लेकिन आज हो कुछ और रहा है। हर छोटी-बड़ी समस्या सामने आने पर हल के लिए हम दूसरों का मुंह ताकते हैं। विदेशी डिग्रियों से स्वदेश को समझने की कोशिश करते हैं। विदेशी पैसों से आंदोलन की जमीन उपजाऊ बनाते हैं। लाख समझने के बाद भी यह बात गले नहीं उतरती कि बाहरी ताकतें हमारा भला किस तरह सोचेंगी बिना अपने फायदे के। कभी जंतर मंतर को 'तहरीर चौक' बनाने की कोशिश की जाती है तो कभी जन-भावनाओं को दूह कर अपना 'खजाना' भरने का भरसक प्रयास किया जाता है। कुछ कर्मयोगी पहाड़ों से सिर टकराते


हुए मर जाते हैं, वहीं चंद सभ्य नागरिक समाज के लोग गीली जमीन खोद कर फरहाद होने का दम भरते हैं। बाहर का पैसा, बाहर का आंदोलन, लेकिन लोग अपने, जमीन अपनी।
लोगों का उबलता गुस्सा अपना और इस गुस्से का तमाचा लोकतंत्र पर। दूसरी ओर, बढ़-चढ़ कर बार-बार लगातार उन दृश्यों को दिखाना। शायद यही मीडिया के 'स्वनियंत्रित' होने का अच्छा उदाहरण हो! अगर मीडिया का यही काम रह गया है तो उसे फिर से सोचना होगा। जब हाथ-पैर चलाने की भाषा को मान्यता मिल जाती है तो हम किस सभ्य समाज की बात करते हैं। अगर हमारे हिसाब से यह सही है, तब फिर क्या हम वहां खड़े होना चाहते हैं, जहां अपना-अपना गुस्सा जो जहां, जैसे चाहे वहां निकाल ले, वह चाहे कोई प्रतिनिधि हो या अधिवक्ता? सवाल है कि इससे आगे क्या? आखिर हम कहां जाने की तैयारी में लगे हैं। पढ़ाई पर जहां पैसे का बाट रखा जाए, संस्कारों पर जब सेक्स भारी पड़ने लगे, अपनी कमाई जब खालिस अपने लिए हो, तो बात-बात पर गुस्सा आना स्वाभाविक ही है। लेकिन जब नागरिक समाज उस गुस्से का अपने अनुकूल इस्तेमाल करने के हर संभव प्रयास में लग जाए तो समझ लीजिए किसी भी पाल का तिरपाल हमें नहीं बचा पाएगा।
इसके बरक्स जो मुश्किल है वह छोटी नहीं है। क्या हमारे प्रतिनिधि अपनी जवाबदेही और जिम्मेदारी समझ रहे हैं? सच तो यह है कि वे जहां ले जा रहे हैं, देश वहीं जा रहा है। ऐसी दिशा और दशा में गलत को सही कहने वालों की कतार लंबी हो जाती है। स्वाभाविक है कि लोगों को गुस्सा जल्दी आता है। लेकिन यह भी सच है कि खौलते पानी में अपना अक्स नहीं देखा जा सकता। फिर जनमानस को खौला कर हम किस तरह का खेल जीतने की कोशिश कर रहे हैं? सोच-समझ कर फैसले करने के लिए वक्त ठहरा नहीं रहेगा। संवेदी सूचकांक तो गिर कर उठ जाता है, लेकिन नैतिकता ऐसी चीज है जो गिरती है तो उठने में कई पीढ़ियां लग जाती हैं। यह 'ग्रोथ रेट' हमें कहां ले जा रहा है, यह वाकई सोचने का विषय है। खंडित आदर्श कभी पूजनीय नहीं हो सकते।

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