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Friday, June 7, 2013

गंगा से परवीन शाकिर, पाकिस्तानी शायर

गंगा से

जुग बीते
दजला से इक भटकी हुई लहरganga-near-uttarkashi
जब तेरे पवित्र चश्मों को छूने आई तो
तेरी ममता ने फैला दीं अपनी बाहें
और तेरे हरे किनारों पर तब
आम और कटहल के दरख्तों से घिरे हुए
खपरैलों वाले घरों के आँगन में
किलकारियाँ गूँजीं
मेरे पुरुखों की खेती शादाब हुई
और शगुन के तेल ने
दिए की लौ को ऊँचा किया
फिर देखते-देखते
पीले फूलों और सुनहरे दियों की जोत
तेरे फूलों वाले पुल की
कोख से होती हुई
मेहरान तक पहुँच गई
मैं उसी जोत की नन्हीं किरण
फूलों का थाल लिए
तेरे कदमों में फिर आ बैठी हूँ
और अब तुझसे
बस एक दिए की तालिब हूँ
यूँ अंत समय तक तेरी जवानी हँसती रहे
लेकिन ये शादाब हँसी
कभी तेरे किनारों के लब से
इतनी न छलक जाएParveen-Shakir
कि मेरी बस्तियाँ डूबने लग जाएँ
गंगा प्यारी
मेरी रुपहली रावी
और भूरे मेहरान की मुट्ठी में
मेरी माँ की जान छुपी है
मेरी माँ की जान न लेना
मुझसे मेरा मान न लेना
ओ गंगा प्यारी !

परवीन शाकिर, पाकिस्तानी शायर

http://www.nainitalsamachar.in/ganga-a-poem-by-parveen-shakir/

ईको सेंसिटिव जोन के रूप में एक नया अभिशाप

ईको सेंसिटिव जोन के रूप में एक नया अभिशाप

eco-sensitive-zoneइस समय राज्य में इको सेन्सिटिव जोन का मुद्दा सबसे चर्चित है। एक ओर बिनसर, राजाजी, कार्बेट, मसूरी और केदारनाथ सहित लगभग सभी संरक्षित क्षेत्रों के लोग फरवरी माह से प्रदर्शन, घेराव और ज्ञापन के माध्यम से इसके विरोध में आन्दोलनरत हैं वहीं अब सरकार भी इसके विरोध में खड़ी दिखायी दे रही है। जबकि उत्तरकाशी में कुछ सामाजिक कार्यकर्ता व अपने आपको जन आन्दोलन मानने वाला गंगा आह्नान भी इको सेन्सिटिव जोन के पक्ष में पैरवी कर रहा है।

वन्य जीव संरक्षण अधिनियम के अन्तर्गत गठित भारतीय वन्य जीव परिषद की 2002 की बैठक मे वन्य जीव संरक्षण रणनीति 2002 स्वीकृत की गयी थी और इसके तहत प्रत्येक राज्य सरकार को पार्क और सैन्चुरी के 10 किमी. के क्षेत्र को इको सेन्सिटिव जोन घोषित करना था। राज्य सरकारों द्वारा इस योजना का विरोध इस आधार पर किया गया कि इससे पार्क के बाहर की बसासत में विकास की गतिविधियाँ बाधित हो जायेंगी। वर्ष 2005 की बोर्ड बैठक मे तय किया गया कि इको सेन्सिटिव जोन इलाके की पारिस्थितियों के अनूकूल निर्मित किया जाये अर्थात 10 किमी. की शर्त मे शिथिलता राज्य सरकारें दे सकती थी।

वर्ष 2004 मे गोआ फाउण्डेशन द्वारा इस सम्बध में सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की गयी थी जिसके अनुपालन में सुप्रीम कोर्ट द्वारा वन एवं पर्यावरण मंत्रालय को निदेर्शित किया गया था कि वह चार सप्ताह के भीतर राज्य सरकारों से इको सेन्सिटिव जोन के प्रस्ताव प्राप्त करे। 2010 में पुनः सुप्रीम कोर्ट द्वारा ओखला वर्ड सैन्चुरी के भीतर निर्माण के सम्बन्ध में दायर याचिका में इस मामले में निर्देश दिये गये जिसके पश्चात वन एवं पर्यावरण मंत्रालय द्वारा प्रणवसेन की अध्यक्षता में एक कमेटी का गठन किया गया। इस कमेटी की सिफारिशों के आधार पर इको सेन्सिटिव जोन में तीन तरह की गतिविधियाँ चिन्हित की गयी। 1. प्रतिबंधित 2. शर्तो के साथ अनुमन्य 3. बिना शर्तो के साथ अनुमन्य।

प्रतिबंधित क्षेत्र के लिये एक महायोजना निर्मित किये जाने का भी प्राविधान किया गया जिसमें वन्य जीव वार्डन, एक पर्यावरणविद, स्थानीय स्वशासन से एक व्यक्ति और राजस्व विभाग से एक अधिकारी को मिलकर इस योजना का निर्माण करने के लिये निर्देशित किया गया। महायोजना में क्षेत्र में चलने वाली समस्त गतिविधियों को उपरोक्त तीन भागों मे बाँटना था और भविष्य में इको सेन्सिटिव जोन घोषित किये गये क्षेत्र का संचालन इसी आधार पर किया जाना था।

पर्यावरण संरक्षण अधिनियम 1986 केन्द्र सरकार को यह शक्ति देता है कि वह किसी भी क्षेत्र की पारिस्थिति को बनाये रखने के लिये उसे पारिस्थितिक संवेदनशील क्षेत्र घोषित कर सके। इसी शक्ति का प्रयोग करते हुए गोमुख से उत्तरकाशी तक भागीरथी नदी के लगभग 100 किमी. लम्बे 41,179.59 वर्ग किमी. के सम्पूर्ण जल संभरण क्षेत्र को इको सेन्सिटिव जोन घोषित करा जा चुका है। अगले दो वर्षों के भीतर इस क्षेत्र के लिये राज्य सरकार को एक महायोजना बनानी होगी जो कि स्थानीय जनता विशेषकर महिलाओं के परामर्श तथा सरकारी विभागों की भागीदारी और भारत सरकार के वन एवं पर्यावरण मंत्रालय के अनुमोदन के पश्चात लागू होगी। इस योजना में क्या-क्या प्राविधान किये गये हैं, उन्हें समझना जरूरी है।

इस योजना में बंजर क्षेत्र की बहाली, जल निकायों के संरक्षण, भूमिगत जल प्रबंधन सहित पर्यावरण के अन्य पहलुओं पर भी ध्यान दिया जायेगा। नदियों के किनारे किसी तरह के निर्माण पर प्रतिबंध होगा। साथ ही ग्रामीण बस्तियों समेत वन, कृषि, हरित क्षेत्र, बागान, झील आदि को भी चिन्हित किया जायेगा। होटल, रिसॉर्ट के निर्माण में परम्पराओं का ध्यान रखा जायेगा। विकास की कोई भी योजना पारिस्थिति के अनूकूल होने पर ही लागू होगी, पैदल मार्गो को प्रोत्साहित किया जायेगा। कृषि भूमि के भू-उपयोग को प्रोत्साहित किया जायेगा। आवास के लिये कृषि भूमि के भू-उपयोग में बदलाव राज्य सरकार की सिफारिश और केन्द्र सरकार की अनुमति के बाद ही किया जा सकेगा। साथ ही 5000 से अधिक जनसंख्या वाले क्षेत्रों में क्षेत्र विकास योजना बनानी होगी। हरित क्षेत्र जैसे कि वन या कृषि क्षेत्र को किसी दूसरे उपयोग में नहीं लाया जा सकेगा। 20 डिग्री से अधिक तीव्र पहाड़ी ढलान वाले क्षेत्र में किसी भी विकास कार्य की अनुमति नहीं होगी। ऐसे क्षेत्रों से भू-कटाव को रोकने के लिये विशेष प्रयास किये जायेंगे। पर्यटन क्रिया-कलापों के लिये भी पर्यटन विभाग द्वारा पर्यटन महायोजना बनानी होगी। जिसमें क्षेत्र की धारक क्षमता का ध्यान रखना होगा। निर्माण सहित सभी पर्यटन गतिविधियाँ इसी महायोजना में चिन्हित होंगी। आंचलिक महायोजना में शामिल हुए बगैर 5 किमी. से अधिक कच्ची पर पक्की सड़कों का निर्माण नहीं हो पायेगा। वर्तमान सड़कों के चौड़ीकरण को भी महायोजना में शामिल करना होगा। सड़क के कटान के कारण होने वाले प्रारम्भिक क्षति का उपचार किया जायेगा तथा मलवे के निस्तारण की ब्यवस्था की जायेगी। प्राकृतिक और मानव निर्मित दोनों ही प्राकृतिक स्थलों के नजदीक निर्माण कार्यो पर रोक लगायी जायेगी।

गौमुख से उत्तरकाशी तक भागीरथी नदी और सभी उपनदियों पर नये जल विद्युत संयंत्रों के निर्माण पूर्व जल संयंत्रों का विस्तार पर रोक/सूक्ष्म या लघु जल विद्युत परियोजना जिससे स्थानीय समाज की ऊर्जा की जरूरतें पूरी हो सकें ग्रामसभा की अनुमति के पश्चात निर्मित की जा सकती हंै। साथ ही नदी के जल को औद्योगिक प्रयोजनों के लिये उपयोग नहीं किया जा सकता है। वास्तविक निवासियों के आवश्यक घरेलू उपयोग को छोड़कर किसी भी प्रकार के खनिज के खनन पर रोक। 20 डिग्री से अधिक ढलान पर स्थानीय जरूरतों पर भी रोक। पेड़ों की वाणिज्यिक कटाई तथा काष्ठ आधारित उद्योगों पर रोक होगी। ग्राम सभा की अनुमति के पश्चात ही जलाने के लिये लकड़ी एक़त्र करी जा सकती है। प्रदूषणकारी उद्योगों पर रोक तथा बगैर शोधन के मल .और जल के औद्योगिक बहाव पर रोक, प्लास्टिक के थैलों पर रोक।

इको सेन्सिटिव जोन में निम्न गतिविधियों को विनियमित किया जायेगा- केवल भूमि के वास्तविक मालिक द्वारा ही भूमिगत जल का उपयोग कृषि और वास्तविक घरेलू जरूरतों के लिये किया जा सकता है। भूमिगत जल की बिक्री नहीं की जा सकती। कृषि समेत जल के सभी प्रदूषण रोकने होंगे। सभी प्रकार की भूमि पर जिसमें कृषि भूमि भी शामिल है, पेड़ों की कटाई पर पूर्णतया रोक होगी और यदि आवश्यक हो तो वन भूमि पर जिलाधिकारी तथा अन्य भूमि पर राज्य सरकार द्वारा बनाये गये नियमों के पश्चात ही अनुमति मिल सकती है। रक्षा स्थापनों और राष्ट्रीय सुरक्षा से सम्बन्धित ढाँचागत विकास, चीड़ पेड़ों का रोपण, विशेष प्रजातियों का रोपण, होटल रिसाॅर्ट निर्माण, विद्युत केवल, कृषि प्रणाली में तीव्र परिवर्तन, साइनबोर्ड और होल्डिंग ये सभी गतिविधियाँ विनियमित की जायेंगी। ध्वनि, वायु, सीवर आदि के लिये लागू नियम-कानूनों का पालन और वर्तमान में जारी जल विद्युत परियोजनाओं को पर्यावरणीय नियमों का पालन एवं सोशियल आॅडिट कराना होगा। यातायात सहित गंगोत्री और गौमुख के बीच पर्वतारोहण को विनियमित किया जायेगा।

इको सेन्सिटिव जोन में निम्न गतिविधियाँ प्रोत्साहित की जायेंगी-

वर्षा जल एकत्रीकरण, जैविक खेती, हरित प्रोद्योगिकी, भ्रमण पर्यटन, सूक्ष्म जल परियोजनायें और उर्जा सहित स्थानीय जैव संसाधनों पर आधारित उद्योग। इन नियमों को लागू करने के लिये एक मानिटरिंगं कमेटी का गठन किया जायेगा जिसमें गैर सरकारी संगठनों के दो प्रतिनिधियों समेत दस सदस्य हांेगे और इसका अध्यक्ष प्रबंधकीय या प्रशासकीय अनुभव वाला ब्यक्ति होगा। मानिटरिंग कमेटी वन एवं पर्यावरण मंत्रालय के निर्देशों के तहत कार्य करेगी। उत्तराखण्ड की सरकारें इसके लगभग 24 प्रतिशत भू-भूभाग को पहले ही प्रतिबंधित की श्रेणी मे ला चुकी है। इसका अर्थ है कि इस क्षेत्र में किसी भी प्रकार की विकास या स्थानीय निवासियों के अधिकारों से जुड़ी हुई गतिविधियाँ प्रतिबंधित रहेंगी।

इस क्रम में उत्तरकाशी का विश्लेषण दिलचस्प होगा। उत्तरकाशी का कुल क्षेत्रफल 7,95,100 हैक्टेयर है। इसमें से 3,34,700 हैक्टेयर को पूर्व में ही संरक्षित क्षेत्र घोषित किया जा चुका है। वर्तमान इको सेन्सिटिव जोन का क्षेत्रफल 4,17,959 है। इसमें गंगोत्री और गोविन्द पशु बिहार का कुछ क्षेत्र भी शामिल है। अनुमान्तः कुल भू-भाग का 80 प्रतिशत से अधिक क्षेत्र संरक्षण के दायरे में आ चुका है। जबकि कृषि भूमि 27,714 हैक्टेयर जो लगभग 3.5 प्रतिशत है। इन आँकड़ों की तुलना यदि हरिद्वार से की जाये तो वहाँ का क्षेत्रफल 2,33,506 हैक्टेयर है जबकि कृषि भूमि 1,24,486 हैक्टेयर यानी आधे से अधिक क्षेत्रफल में खेती की जा रही है।

जिस तेजी से पर्वतीय क्षेत्र में भूमि को संरक्षित क्षेत्र मे बदला जा रहा है, भविष्य में यहाँ जीवन-यापन का आधार आखिर क्या होगा? संरक्षित क्षेत्र चाहे वह अस्कोट हो या बिनसर, राजाजी हो या केदारनाथ सभी जगह लोग अपने अधिकारों को लेकर संघर्षरत हैं परन्तु इन क्षेत्रों में अधिकारों की बहाली के बजाय इको सेन्सिटिव जोन के नाम पर संरक्षित क्षेत्र बढ़ाने की कवायद जारी है।

उत्तरकाशी में इको सेन्सिटिव जोन के लिये बनी योजना एक नजर में बेहद आकर्षक और पर्यावरण के हितैषी के रूप मे दिखायी देती है परन्तु इसके भीतर स्थानीय निवासियों के लिये कई अवरोध भी छुपे हुए हैं। योजना वन एवं कृषि भूमि में किसी भी बदलाव को प्रतिबंधित करती है। अर्थात कृषि के अतिरिक्त अन्य किसी विकास की सम्भावनाओं के द्वार बन्द और कृषि में भी सिर्फ परम्परागत तरीकों का ही पालन करना होगा। किसी बड़े बदलाव या तकनीकी के माध्यम से कृषि मे परिवर्तन प्रतिबंधित किया गया है। उर्वरक और कीटनाशकों का उपयोग भी प्रतिबंधित होगा। पहले से ही वन अधिनियम 1980 की मार झेल रही सड़कों के दायरे में अब 5 किमी. से अधिक की कच्ची-पक्की सभी सड़कें आयेंगी, पूर्व में निर्मित सड़कों के चौड़ीकरण के लिये भी अनुमति लेनी होगी। पेड़ों की कटाई और काष्ठ उद्योगों को भी यह योजना प्रतिबंधित करती है तो नये निर्माण भी शर्तो के साथ ही किये जा सकते है। अर्थात नियम-कानूनों के जाल में उलझी हुई आम जनता को और नये नियमों में बाँधने की पूरी तैयारी कर ली गयी है। पर सिक्के के दूसरे पहलू के रूप में आम जनता के परम्परागत अधिकारों पर यह योजना बिल्कुल खामोश है। गंगा आह्नान द्वारा इस योजना के ड्राफ्ट पर परम्परागत अधिकारों पर दिये गये सुझाव को नकार दिया गया।

योजना में बड़े बाँधों और जल विद्युत परियोजनाओं पर रोक, व्यवसायिक खनन पर रोक भी अत्यन्त आवश्यकीय है। गंगा की धारा अविरल रहनी चाहिये इस पर भी किसी को एतराज नहीं होगा। टिहरी बाँध के समय से ही उत्तराखण्ड की जनता इन सबका विरोध करती रही है। राज्य बनने के बाद चला नदी बचाओ आन्दोलन इसका प्रमाण है। पर इतने प्रतिबंधों के बाद लोग इको सैन्सेटिव जोन के भीतर जीवन-यापन कर पायेंगे यह एक यक्ष-प्रश्न है। जिन जंगलों पर इनका जीवन-यापन टिका हुआ है उनसे उन्हें दूर कर दिया जाये और दूसरी ओर विकास के भी सभी द्वार बन्द कर दिये जायें तो पलायन के अतिरिक्त क्या कोई और रास्ता बचता है?

मुख्यमंत्री ने जितनी सक्रियता उत्तरकाशी को इको सेन्सिटिव जोन से हटाने के लिये दिखायी है उतनी ही सक्रियता से वे अन्य प्रतिबंधित क्षेत्रों में लागू होने वाले इको सेन्सिटिव जोन के पक्ष मे क्यों नहीं उतरे ? क्या यह सारी कवायद जल विद्युत परियोजना चला रही कम्पनियों के हित में की जा रही है। अगर उन्हें वास्तव में लोगों की चिन्ता होती तो वे केन्द्र द्वारा पारित वन अधिकार कानून को राज्य में लागू करते जो लोगों के अधिकारों और जीवन-यापन की ब्यापक सम्भावनाओं के द्वार खोलता है। इसी तरह कार्बेट पार्क के दो किमी. के इलाके में जमीनों के क्रय-विक्रय पर लगाई गयी रोक भी इसी सरकार की देन है। पवलगढ़ और नन्धौर को प्रतिबंधित क्षेत्र भी इसी सरकार के द्वारा किया गया है। वन्य जीव संरक्षण अधिनियम में स्पष्ट प्रावधान होने के बावजूद गोविन्द पशु बिहार हो या बिनसर सभी प्रतिबंधित क्षेत्रों में समर्थ लोगों द्वारा कानून को धता बताकर जमीनों की खरीद-फरोख्त और निर्माण कार्य जारी है जबकि स्थानीय निवासी अपने घरों की छतों को भी ठीक नहीं करा सकते। कानूनन परम्परागत हक बहाल होने के बावजूद बिनसर के लोग 25 वर्षों के लम्बे संघर्ष के बाद सिर्फ तीन गाँवों में टिम्बर का हक प्राप्त कर पाये, अन्य संरक्षित क्षेत्रों में तो यह हक समाप्त ही हो चुका है। इको सेन्सिटिव जोन में भी यही कहानी दोहरायी जायेगी कि समर्थ लोगों पर कोई रोक नहीं होगी और आम जनता कानूनों के शिकन्जे में पिसेगी।

राज्य की जनता के साथ अगर यह सरकार वास्तव में न्याय करना चाहती है तो उसे केन्द्र सरकार और सुप्रीम कोर्ट के सामने लोगों के अधिकारों की पैरवी करनी होगी तथा यह सवाल पूछना होगा कि पहले से ही राष्ट्रीय औसत से पाँच गुना अधिक संरक्षित क्षेत्र वाले राज्य में और कितना क्षेत्र संरक्षित किया जायेगा, इसकी कोई सीमा तो तय की ही जानी चाहिये। राज्य में लागू वृक्ष संरक्षण अधिनियम जैसे कानूनों को रद्द करना होगा तथा वन पंचायतों को वन अधिकार कानून के दायरे में लाते हए वन-वासियों के अधिकारों को लागू करना होगा। 1000 मीटर से ऊपर हरे वृक्षों के कटान पर रोक के आदेश को चीड़ के सम्बन्ध मे शिथिल करवाना होगा। यदि यह सब नहीं होता है तो संरक्षित क्षेत्र के लोगों के पास पलायन के अतिरिक्त अन्य कोई रास्ता नहीं होगा।

http://www.nainitalsamachar.in/eco-sensitive-zone-and-problems-of-villagers/

जन्म दिवस पर हेमवती नंदन बहुगुणा की याद

जन्म दिवस पर हेमवती नंदन बहुगुणा की याद

Hemwati-Nandan-Bahugunaउत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री हेमवती नंदन बहुगुणा के 95वें जन्म दिवस पर क्षेत्र के कई स्थानों पर लोगो ने उन्हें श्रद्धासुमन अर्पित किये। गुप्तकाशी के ह्यूण गाँव में भी स्व. बहुगुणा को ग्रामीणों ने उनके चित्र पर माल्यार्पण कर याद किया। श्री बहुगुणा के बचपन की पढ़ाई प्रा.वि. गुप्तकाशी में ही हुई थी।

25 अप्रैल 1919 में तत्कालीन पौड़ी जिले के बुधाणी गाँव में श्री बहुगुणा का जन्म हुआ था। गुप्तकाशी में प्राथमिक शिक्षा प्राप्त करके डीएवी कॉलेज देहरादून से हाईस्कूल की परीक्षा उत्तीर्ण की थी। वर्ष 1936 से 1942 तक विद्यार्थी आंदोलन का सफल नेतृत्व किया। विद्यार्थी काल से ही श्री बहुगुणा स्व0 लाल बहादुर शास्त्री के सम्पर्क में रहे। वर्ष 1942 में अंग्रेजो भारत छोड़ो की ख्याति से बहुगुणा घर-घर में प्रसिद्ध हो गये। अंग्रेजों की चूलें हिलाने वाले श्री बहुगुणा पर अंग्रेजों द्वारा जिंदा या मुर्दा पकड़ने पर पाँच हजार का ईनाम रखा गया था, लेकिन उन्होंने भूमिगत रहते ही अंग्रेजों को अपने हौसले तथा वीरता का परिचय दे दिया। उनके जज्बे को देखते हुए उन्हें इलाहाबाद विश्वविद्यालय यूनियन का प्रथम डिटेक्टर चुना गया। 1 फरवरी 1943 को उन्हें दिल्ली में जामा मस्जिद के निकट गिरफ्तार कर जेल भेजा गया, लेकिन 1945 में जेल से छूटते ही श्री बहुगुणा ने देश के कई नामी-गिरामी आंदोलनकारियों के साथ रहकर अंग्रेजों की ईट से ईट बजा दी।

वर्ष 1952 से लगातार उ.प्र. कांग्रेस कमेटी के सदस्य रहे। वर्ष 1963 से 1969 तक उ.प्र. कांग्रेस महासचिव के पद पर शोभित रहे। वर्ष 1957 में संसदीय सचिव 1958  में उ.प्र. सरकार में श्रम और उद्योग विभाग के उपमंत्री रहे। वर्ष 1967 में आम चुनाव के पश्चात उ.प्र. सरकार में आम सभा गठन होने के बाद श्री बहुगुणा को अखिल भारतीय कांग्रेस का महामंत्री चुना गया। वर्ष 1971 में केन्द्र में संचार मंत्री तथा नवम्बर में ही कांग्रेस विधायक दल के नेता चुने गये। 8 नवम्बर 1973 को श्री बहुगुणा ने उ.प्र. में मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा और कई विशिष्ट पदों पर आसीन होकर देशवासियों की सेवा की।

उनके बाल्यकाल में तब केदारघाटी में महज गुप्तकाशी में प्राथमिक विद्यालय हुआ करता था। इसी विद्यालय में श्री बहुगुणा ने तीन वर्ष तक अध्ययन किया। उनके अध्यापक रहे ह्यूण निवासी स्व. श्री परमानंद द्वारा उ.प्र. से श्रम भगवान के नाम से प्रकाशित पत्र में लिखा गया कि माता-पिता अपने से बढ़कर अपने पुत्र को तथा गुरू अपने से बढ़कर अपने शिष्य को देखना चाहता है। आज की परिस्थितियाँ कुछ विषम सी हो गयी हैं। आज मैं यह लिखते हुए महान गौरव का अनुभव कर रहा हूँ कि मुझे एक कुशल प्रशासक, महान राजनीतिज्ञ तथा जन सेवी श्री बहुगुणा के तीन वर्ष तक गुप्तकाशी में अध्यापक बने रहने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है। वर्ष 1926 में उनके पिता रेवती नंद बहुगुणा ने अपने पुत्र हेमवती नंदन को पढ़ाने की बात की। बालक हेमवती का अक्षर ज्ञान नहीं था, अतः मैंने इन्हें सर्वप्रथम अक्षर ज्ञान दिया। उस समय चौथी कक्षा तक ही प्राइमरी की शिक्षा होती थी। वे पढ़ने में बड़े तेज तथा हाजिर-जबाब थे। वे इतने नटखट थे कि कभी कलम तोड़ देते थे, तो कभी कमेड़ा जिससे पाटी में लिखा जाता था, को गिरा देते। मै उन्हें बहुत डाँटता था। पौड़ी से आये गिरधारी ने एक बार मेरा फोटो लेना चाहा, मैं उस समय स्काउट ड्रेस में था। बालक बहुगुणा का चूड़ाकर्म संस्कार भी नहीं हुआ था। अध्यापक परमानंद सेमवाल के पु़त्र आनंद मणि सेमवाल कहते हैं कि कई बार पूज्य पिताजी कहते थे कि बहुगुणा जी पैरों में कम ही चप्पलें पहनते थे। उनकी बुद्धिमता तथा चातुर्यता को देखते हुए लोगों ने उनका नाम शतावधानी रख दिया। अर्थात् ऐसा व्यक्ति जो एक बार में कई लोगो की बातें सुने और सबका सकारात्मक प्रत्युत्तर दे।

http://www.nainitalsamachar.in/95th-birth-anniversary-of-h-n-bahuguna/

Friday, May 31, 2013

हिंदी समय में इस हफ्ते

मित्रवर

पिछले कुछ कई दशकों में बाबर की एक आक्रांता की इकहरी छवि लगातार गढ़ी जाती रही है। वह भारत आक्रमणकारी की हैसियत से आया था इसमें भी शायद ही किसी को संदेह हो। पर वह समय ही दूसरा था जब चीजें आज के अर्थों और तर्कों से नहीं चलती थीं। बहरहाल जो भी हो पर बाबर के व्यक्तित्व में बहुतेरे आयाम समाहित थे जिन्हें बाबर की आत्मकथा बाबरनामा में बखूबी देखा जा सकता है। यहाँ पर देवेंद्रनाथ शर्मा के एकांकी बाबर की ममता में वह एक ममतालु पिता की भूमिका में उपस्थित है जहाँ वह अपने पुत्र हुमायूँ के जीवन की रक्षा के लिए अपना जीवन कुर्बान कर देता है। हिंदीसमय (www.hindisamay.com) पर इस भूले-बिसरे एकांकी को पेश करते हुए हमें विशेष खुशी महसूस हो रही है।

 

इस बार हम यहाँ हिंदी के तीन विशिष्ट कथाकारों की कहानियाँ प्रस्तुत कर रहे हैं। कहानियाँ हैं भगवती प्रसाद वाजपेयी की कहानी मिठाईवाला, राजा राधिकारमण प्रसाद सिंह की कहानी कानों में कँगना और दूधनाथ सिंह की दो नई कहानियाँ अम्माएँ और सरहपाद का निर्गमन। दूधनाथ जी इन दिनों हमारे विश्वविद्यालय में अतिथि लेखक के रूप में मौजूद हैं और ये दोनों कहानियाँ उन्होंने यहाँ आने के बाद लिखी हैं। हमें यह बताते हुए खुशी हो रही है कि ये कहानियाँ सर्वप्रथम हिंदी समय पर ही प्रकाशित हो रही हैं।

 

जीवन भर तरह तरह की कट्टरताओं से लोहा लेने वाले असगर अली इंजीनियर पिछले दिनों हमारे बीच नहीं रहे। उन्होंने अपने विचारों से कभी समझौता नहीं किया।                     मेरे पिता की विरासत शीर्षक से यहाँ उनका स्मरण कर रहे हैं उनके योग्य सुपुत्र इरफान इंजीनियर। विशेष के अंतर्गत प्रस्तुत हैं वर्जिनिया वूल्फ के कुछ विचार।

 

इस बार यश मालवीय के गीत भी हमारी विशेष प्रस्तुति हैं।

     

हमने आपसे बताया था कि हम अलिफ लैला की कहानियों को नियमित रूप से आपके सामने पेश करते रहेंगे सो पाँच कहानियाँ पेश हैं - किस्सा तीसरे फकीर का,  किस्सा जुबैदा का, किस्सा अमीना का, किस्सा सिंदबाज जहाजी का और सिंदबाद जहाजी की पहली यात्रा

 

हम उम्मीद करते हैं कि हमारा यह प्रयास आपको हमेशा की तरह पसंद आएगा।

 

अगले हफ्ते फिर मिलते हैं।

सादर,

राजकिशोर

संपादक

हिंदी समय     

Friday, May 24, 2013

हिंदीसमय में इस हफ्ते

मित्रवर,

दो स्त्रियों की आत्मकथाओं का अध्ययन करते हुए गरिमा श्रीवास्तव कहती हैं कि  'आमार जीबन' और 'आत्मचरितमु' ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के दो पड़ावों, समाज और स्त्री मन पर पड़े प्रभावों की पड़ताल करने के लिए विशिष्ट पाठ की भूमिका निभा सकते हैं। राससुंदरी ने 1868 में और सत्यवती ने 1934 में अपनी आत्मकथा लिखी। दोनों में लगभग सत्तर वर्ष का अंतराल है। सात दशकों के इस अंतर को भारतीय स्त्री की मनुष्य के रूप में पहचान और अंतर्विरोधों के बावजूद हाशिए की आवाज को केंद्र में ले जाने की पुरजोर कोशिश के रूप में देखा जा सकता है। गरिमा श्रीवास्तव द्वारा अथ सवर्ण स्त्री प्रति-आख्यान शीर्षक से किया गया यह रोचक तुलनात्मक अध्ययन, हमारी दृष्टि में, हिंदी समय (www.hindisamay.com) की एक खास उपलब्धि है।

 

सियारामशरण गुप्त सिर्फ सुकवि ही नहीं, बल्कि श्रेष्ठ गद्यकार भी थे। उनकी बहुचर्चित कहानी काकी हम आपके सामने पेश कर रहे हैं। इस बार की दूसरी कथाकार  इला प्रसाद भी हिंदी कहानी का एक जाना-पहचाना नाम हैं। वे प्रवासियों द्वारा लिखी जा रही कहानियों की सामर्थ्य को भी नए सिरे से रेखांकित करती हैं। यहाँ पेश हैं उनकी  दस कहानियाँ - उस स्त्री का नाम, मेज, बैसाखियाँ, समुद्र : एक प्रेमकथा, हीरो, गुड़िया का ब्याह, तूफान की डायरी, खिड़की, सेल और एक अधूरी प्रेमकथा

 

व्यंग्य है बेढब बनारसी का चिकित्सा का चक्कर और कविताएँ हैं प्रखर युवा कवि रविकांत की।   

 

हमने बताया था कि हम अलिफ लैला की कहानियों को नियमित रूप से आपके सामने पेश करते रहेंगे। इस बार की कहानियाँ हैं - किस्सा तीन राजकुमारों और पाँच सुंदरियों का, मजदूर का संक्षिप्त वृत्तांत, किस्सा पहले फकीर का, किस्सा दूसरे फकीर का, किस्सा भले आदमी और ईर्ष्यालु पुरुष का

 

हम उम्मीद करते हैं कि हमारा यह प्रयास आपको हमेशा की तरह पसंद आएगा।

 

अगले हफ्ते फिर मिलते हैं।

सादर,

राजकिशोर

संपादक

हिंदी समय    

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 














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राजकिशोर
53, इंडियन एक्सप्रेस अपार्टमेंट्स
मयूर कुंज
दिल्ली - 110096
फोन : 09650101266

Friday, May 17, 2013

सुपुर्दे खाक होने लगा आम निवेशकों का हित!

सुपुर्दे खाक होने लगा आम निवेशकों का हित!


एक्सकैलिबर स्टीवेंस विश्वास​


एक दफा फिर सुपुर्दे खाक होने लगा आम निवेशकों का हित!जैसे संचयिता और ओवरलैंड को लोग भूल गये, टीक उसी तरह शारदा फर्जीवाड़े को भी लोग भूलने वाले हैं और इसका पुख्ता इंतजाम हो गया है।जांच पड़ताल ठप है और मीडिया का ध्यान भी अब भटकने लगा है। कोयला घोटाला तक आईपीएल घोटाले के भंडाफोड़ से हाशिये पर चला गया है। सुदीप्त ने जो हलफनामा हाईकोर्ट में जारी किया है, वह संकेत हैं कि उसके बचाव के पक्के इंतजाम हो गया है।


अब सीबीआई जांच पर सुनवाई ५ जून से पहले होने की संभावना नहीं है। छह अप्रैल से लेकर पांच जून, पूरे दो महीने हो जायेंगे। कोई एफआईआर नहीं, कोई संपत्ति जब्त नहीं, महज आरोप प्रत्यारोप, धरना , प्रदर्शन और आत्महत्याओं से आर्थिक अपराधों की जांच होने का कोई नजीर इस देश में नहीं है।


फिर राजनीति भी किसी एक मद्दे पर ठहर नहीं जाती। पंचायत चुनावों की हलचल में जुलाई महीना पार हो जायेगा। फिर बचेगी अदालती ​​कार्रवाई। बाकी कुछ नहीं।


सुदीप्त की सेहत पर इस बीच चिंता जताई है विपक्ष ने। सुदीप्त को कुछ हो गया तो इस मामले का वही हाल होगा जो संचयिता का हुआ।


देवयानी और सुदीप्त की पुलिस हिरासत की अऴधि कितनी दफा और बढ़ायी जायेगी, देवयानी अंततः कब सरकारी गवाह बनेगी, सुदीप्त को असम पुलिस के हवाले किया जायेगा या नहीं, सीबीआई  टीम गुवाहाटी और अगरतला होकर कोलकाता पहुंचेगी या नहीं, इन्हां पहेलियों में उलझकर सुर्खियां बनती बिगड़ती रहेंगी। विशेष जांच टीम को कोई अधिकार नहीं है। केंद्रीय एजंसियों के की जांच वैसे भी राजनीतिप्रेरित होती हैं , जो सीआईडी जांच भी है।


सेबी ने बंगाल सरकार पर आरोप लगाया है कि उसकी सलाह के मुताबिक बंगाल सरकार ने संदिग्ध चिटपंड कंपनियों के खिलाप एफआईआर तक दर्ज नहीं की।


बाकी बचा श्यमल सेन आयोग , उसकी जो रफ्तार है, कई युग लगेंगे शिकायतों को सहेजने में, फिर सुनवाई होगी और जांच का जिम्मा तो उसके मत्थे है ही नहीं।इलाहाबाद उच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश श्यामल कुमार सेन की अध्यक्षता वाले पांच सदस्यीय आयोग ने शारदा ग्रुप चिटफंड घोटाले की जांच शुरू कर दी है। आयोग अपनी रिपोर्ट छह महीने में सौंपेगा।छह महीने बाद तक जनता की याददाश्त बनी रहेगी, कहना मुश्किल है।