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Friday, June 7, 2013

नक्सल प्रभावित इलाकों के लिए ‘रोशनी’, 50 हजार युवकों को प्रशिक्षण दिया जाएगा

नक्सल प्रभावित इलाकों के लिए 'रोशनी', 50 हजार युवकों को प्रशिक्षण दिया जाएगा

Friday, 07 June 2013 17:26

नयी दिल्ली। नक्सल प्रभावित इलाके के युवकों तक पहुंच बनाने के प्रयास के तहत केंद्र ने बुरी तरह से नक्सल प्रभावित 24 जिलों में आज कौशल विकास योजना की शुरुआत की। इस योजना के तहत 50 हजार ग्रामीण पुरुषों एवं महिलाओं को लक्ष्य बनाया गया है जिनमें अधिकतर आदिवासी होंगे ।
कार्यक्रम ''रोशनी'' की शुरुआत करते हुए ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश ने कहा कि योजना में कम से कम 50 फीसदी महिलाएं होंगी और कमजोर आदिवासी समूहों को प्राथमिकता के आधार पर इसमें शामिल किया जाएगा ।
मंत्री ने कहा कि 'रोशनी' उन युवकों को ''नयी राह'' दिखाएगा जो माओवादियों के जाल में फंसते हैं । 

नौ राज्यों के नक्सल प्रभावित 24 जिले के 50 हजार युवकों को तीन वर्ष में कुशल बनाकर उन्हें नौकर दिलाई जाएगी ।
वामपंथ प्रभावित झारखंड के पश्चिम सिंहभूम और छत्तीसगढ़ के सुकमा में इसी तरह के चलाए जा रहे कार्यक्रम से नया कार्यक्रम शुरू करने का सबक लिया गया है । इसी तरह जम्मू...कश्मीर के युवकों की जरूरतों और आकांक्षाओं की पूर्ति के लिए हिमायत कार्यक्रम शुरू किया गया है ।
योजना को निजी एवं सार्वजनिक क्षेत्र के प्रशिक्षण सहयोगियों एवं गैर सरकारी संगठनों के माध्यम लागू किया जाएगा ।
भाषा

राज्य अवधारणा विरोधी शासनादेश

राज्य अवधारणा विरोधी शासनादेश

चन्द्रशेखर करगेती

uttarakhand-state-movementहाल ही में राज्य सरकार द्वारा मूल निवास और जाति प्रमाण पत्र के सम्बन्ध में जारी शासनादेश भविष्य के लिए खतरनाक है। यह शासनादेश ऐसे समय आया जब राज्य में यह बहस जोरों पर है कि आखिर राज्य किसके लिए बना ? शासनादेश में मूल और स्थायी निवास को एक मानते हुए इसकी कट ऑफ डेट 1985 मानी है, जबकि पूरे देश में यह 1950 है। उल्लेखनीय है कि पृथक राज्य निर्माण की आग को नवयुवकों द्वारा तब और तेज किया था, जब तत्कालीन उत्तर प्रदेश सरकार ने यहाँ 27 प्रतिशत ओबीसी आरक्षण लागू करने का शासनादेश जारी किया। उस समय मसला नवयुवकों के हितों का अधिक था और ओबीसी आरक्षण का मसला उत्तर प्रदेश में रहते न सुलझने की आशंका के कारण ही पृथक उत्तराखंड राज्य आंदोलन तीब्र हुआ। यह शासनादेश भी भविष्य के लिए फिर वही स्थितियाँ राज्य में पैदा कर रहा है।

राज्य पुनर्गठन के बाद मूल, स्थायी और जाति प्रमाण-पत्र का विवाद उत्तराखंड राज्य के अलावा हर उस राज्य के सामने आया, जो अपने पूर्ववर्ती राज्यों से अलग कर बनाए गए थे। लेकिन बाकी राज्यों की सरकारों ने बाहर के राज्यों से आए लोगों के वोट के लालच में इसे राजनीतिक मुद्दा बनाने के बजाय उच्चतर कानूनी संस्थाओं द्वारा उपलब्ध कराए गए प्रावधानों एवं समय-समय पर इस सम्बन्ध में देश की सर्वोच्च न्यायपालिका द्वारा दिए गए न्यायिक निर्णयों की रोशनी में अविवादित एवं स्थायी रूप से हल कर लिया। जबकि उत्तराखंड की सत्ता एवं विपक्ष में बैठे राजनेता इसे वोट-बैंक और मैदानी क्षेत्रवाद का मुद्दा बनाकर अपने फायदे के लिए चुनावों में इस्तेमाल करते रहे। राज्य के उच्च न्यायालय की एकल पीठ में लचर पैरवी के परिणामस्वरूप मन माफिक निर्णय आ जाने पर इस संवेदनशील तथा भावना से जुड़े मुद्दे पर नीति बनाते समय वे उत्तराखंड राज्य निर्माण की उस मूल अवधारणा को ही भूल गए जिसके लिए यहाँ का हर वर्ग आन्दोलित रहा। ऐसे में राजनेताओं की मंशा पर सवाल उठना लाजमी है कि जब उच्च न्यायालय की एकल पीठ का यह निर्णय अंतिम नहीं था, तो इसके खिलाफ डबल बेंच में और फिर उच्चतम न्यायालय में चुनौती क्यों नहीं दी गई? राजनीतिज्ञों द्वारा राज्य निर्माण की भावना के साथ खिलवाड़ का यह कोई पहला मामला नहीं है, इससे पूर्व भी सर्वोच्च न्यायालय में मुजफ्फरनगर कांड के दोषियों को सजा दिलाने के मामले में भी सरकार में बैठे नेताओं और राज्य मशीनरी की भूमिका संदिग्ध रही और मुजफ्फरनगर कांड के दोषी सजा पाने से बच गए।

देश में सबसे पहले मूल निवास और जाति प्रमाण पत्र का मामला सन् 1977 में महाराष्ट्र में उठ चुका था। महाराष्ट्र सरकार ने केंद्र सरकार के दिशा-निर्देशों के अनुसार एक आदेश जारी किया था, जिसमें कहा गया कि सन 1950 में जो व्यक्ति महाराष्ट्र का स्थायी निवासी था, वही राज्य का मूल निवासी है। महाराष्ट्र व भारत सरकार के इस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई। इस पर उच्चतम न्यायालय की संवैधानिक पीठ ने मूल निवास व स्थायी निवास के मामले में जो निर्णय दिया, वह अंतिम और सभी राज्यों के लिए बाध्यकारी है। उच्चतम न्यायालय ने कहा कि राष्ट्रपति के दिनांक 8 अगस्त और 6 सितंबर 1950 को जारी नोटिफिकेशन के अनुसार उस तिथि को जो व्यक्ति जिस राज्य का स्थायी निवासी था, वह उसी राज्य का मूल निवासी है। किसी भी व्यक्ति को जाति प्रमाण पत्र उसी राज्य से जारी होगा, जिसमें उसके साथ सामाजिक अन्याय हुआ है। उच्चतम न्यायालय ने अपने विभिन्न निर्णयों में यह भी स्पष्ट किया है कि रोजगार, व्यापार या अन्य किसी प्रयोजन के लिए यदि कोई व्यक्ति किसी अन्य राज्य या क्षेत्र में रहता है तो उसे उस क्षेत्र का मूल निवासी नहीं माना जा सकता। उत्तराखंड के साथ ही अस्तित्व में आए झारखंड और छत्तीसगढ़ में मूल निवास का मामला उच्चतम न्यायालय के निर्णयों के अनुसार बिना किसी फिजूल विवाद के हल कर लिया गया।

अधिवास संबंधी एक अन्य वाद नैना सैनी बनाम उत्तराखंड राज्य (एआईआर-2010,उत्त.-36) में उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने सन 2010 में प्रदीप जैन बनाम भारतीय संघ (एआईआर-1984, एससी-1420) में दिए उच्चतम न्यायालय के निर्णय को ही प्रतिध्वनित किया था। उच्चतम न्यायालय ने अपने निर्णय में स्पष्ट कहा था कि देश में एक ही अधिवास की व्यवस्था है जो है भारत का अधिवास! यही बात उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने नैना सैनी मामले में दोहराई।

जबकि उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने दिनांक 17 अगस्त 2012 को मूल निवास के संदर्भ में जो फैसला सुनाया उसमें दलील दी कि 9 नवंबर 2000 यानि राज्य गठन के दिन जो भी व्यक्ति उत्तराखंड की सीमा में रह रहा था, उसे यहाँ का मूल निवासी माना जायेगा। राज्य सरकार ने बिना आगे अपील किये उस निर्णय को ज्यों का त्यों स्वीकार कर लिया। आम जनता उच्च न्यायालय और राज्य सरकार के फैसले से हतप्रभ है कि जब देश की सर्वोच्च अदालत इस संदर्भ में पहले ही व्यवस्था कर चुकी है, तो फिर राज्य सरकर ने उस पूर्ववर्ती न्यायिक व्यवस्था को ज्यों का त्यों स्वीकार क्यों नहीं किया और उच्च न्यायालय की एकल पीठ के निर्णय के खिलाफ अपील क्यों नहीं की?

सर्वोच्च न्यायालय ने जाति प्रमाण पत्र के मामले पर अपने निर्णयों में साफ-साफ कहा है कि यदि कोई व्यक्ति रोजागर और अन्य कार्यों हेतु अपने मूल राज्य से अन्य राज्य में जाता है, तो उसे उस राज्य का जाति प्रमाण पत्र नहीं मिलेगा जिस राज्य में वह रोजगार हेतु गया है, उसे उसी राज्य से जाति प्रमाण पत्र मिलेगा जिस राज्य का वह मूल निवासी है। सर्वोच्च न्यायालय ने यह व्यवस्था राष्ट्रपति के नोटिफिकेशन के तहत ही दी थी जिसके अनुसार 10 अगस्त व 6 सितंबर 1950 को जो व्यक्ति जिस राज्य का स्थायी निवासी था उसे उसी राज्य में मूल निवास प्रमाण पत्र मिलेगा। यदि कोई व्यक्ति राष्ट्रपति के नोटिफिकेशन की तिथि पर अस्थाई रोजगार या अध्ययन के लिए किसी अन्य राज्य में गया हो तो भी उसे अपने मूल राज्य में ही जाति प्रमाण पत्र मिलेगा। ऐसे में मूल निवास के मसले पर राज्य सरकार का उच्च न्यायालय के फैसले को ज्यों का त्यों स्वीकार कर लेना और उस पर शासनादेश जारी कर देना संवैधानिक प्रावधानों के खिलाफ है।

छत्तीसगढ़ और झारखंड राज्यों का गठन भी अन्य राज्यों से अलग कर किया गया था, लेकिन इन राज्यों में मूल निवास और जाति प्रमाण पत्र दिये जाने का प्रावधान सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों पर ही आधारित है। झारखंड में उन्हीं व्यक्तियों को मूल निवास प्रमाण पत्र निर्गत किये जाते हैं जो पीढि़यों से वर्तमान झारखंड राज्य क्षेत्र के निवासी थे। छत्तीसगढ़ में जाति प्रमाण पत्र उन्हीं लोगों को दिये जाते हैं जिनके पूर्वज 10 अगस्त व 6 सितंबर 1950 को छत्तीसगढ़ राज्य में सम्मिलित क्षेत्र के मूल निवासी थे।

महाराष्ट्र राज्य के गठन 1 मई 1960 के बाद मूल निवास का मुद्दा गरमाया था। यहाँ भी दूसरे राज्यों से आये लोगों ने जाति प्रमाणपत्र दिये जाने की मांग की। ऐसी स्थिति में महाराष्ट्र सरकार ने भारत सरकार से इस संदर्भ में कानूनी राय मांगी, जिस पर भारत सरकार ने सभी राज्यों को राष्ट्रपति के नोटिफिकेशन की तिथि 10 अगस्त व 6 सितंबर 1950 का परिपत्र जारी किया। भारत सरकार के दिशा-निर्देशन के बाद महाराष्ट्र सरकार ने 12 फरवरी 1981 को एक सर्कुलर जारी किया जिसमें स्पष्ट किया गया था कि राज्य में उन्हीं व्यक्तियों को अनुसूचित जाति, जनजाति के प्रमाण पत्र मिलेंगे जो 10 अगस्त व 6 सितंबर 1950 को राज्य के स्थाई निवासी थे। यह भी स्पष्ट किया था कि जो व्यक्ति 1950 में राज्य की भौगोलिक सीमा में जहाँ निवास करते थे वहीं जाति प्रमाण पत्र पाने के हकदार होंगे।

ऐसा भी नहीं था कि उत्तराखंड में जाति प्रमाण पत्र के सम्बन्ध में ऐसे नियम नहीं हैं। उत्तराखंड राज्य पुनर्गठन अधिनियम 2000 की धारा 24 एवं 25 तथा इसी अधिनियम की पाँचवीं और छठी अनुसूची तथा उच्चतम न्यायालय की संविधान पीठ के निर्णय में जो व्यवस्था की गयी है उसके आलोक में उत्तराखंड में उसी व्यक्ति को जाति प्रमाण पत्र मिल सकता है जो 10 अगस्त व 6 सितंबर 1950 को वर्तमान उत्तराखंड राज्य की सीमा में स्थाई निवास कर रहा था। उच्च न्यायालय की एकल पीठ के निर्णय में यह तथ्य विरोधाभाषी है कि जब प्रदेश में मूल निवास का प्रावधान उत्तराखंड राज्य पुनर्गठन अधिनियम में है तो फिर राज्य सरकार मूल निवास की कट ऑफ डेट राज्य गठन को क्यों मान रही है, उसके द्वारा एकल पीठ के निर्णय को चुनौती क्यों नहीं दी गयी ?

सन् 1961 में भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति ने पुनः नोटिफिकेशन के द्वारा यह स्पष्ट किया था कि देश के सभी राज्यों में रह रहे लोगों को उस राज्य का मूल निवासी तभी माना जाएगा, जब वह 1951 से उस राज्य में रह रहे होंगे। उसी के आधार पर उनके लिए आरक्षण व अन्य योजनाएं भी चलाई जाएं। उत्तराखंड राज्य बनने से पहले संयुक्त उत्तर प्रदेश में पर्वतीय इलाकों के लोगों को आर्थिक रूप से कमजोर एवं सुविधाविहीन क्षेत्र होने के कारण आरक्षण की सुविधा प्रदान की गई थी, जिसे समय-समय पर विभिन्न न्यायालयों ने भी उचित माना था। आरक्षण की यह व्यवस्था कुमाऊँ में रानीबाग से ऊपर व गढ़वाल में मुनिकीरेती से ऊपर के पहाड़ी क्षेत्रों में लागू होती थी। इसी आधार पर उत्तर प्रदेश में इस क्षेत्र के लोगों के लिए इंजीनियरिंग व मेडिकल की कक्षाओं में कुछ प्रतिशत सीटें रिक्त छोड़ी जाती थीं।

उत्तराखंड राज्य बनने के बाद तराई के जनपदों में बाहरी लोगों ने अपने आप को उद्योग-धंधे लगाकर यहीं मजबूत कर लिया और सरकार का वर्तमान रवैया भी उन्हीं को अधिक फायदा पहुँचा रहा है। आज प्रदेश के तराई के इलाकों में जितने भी बडे़ उद्योग-धंधे हैं या जो लग रहें हैं अधिकांश पर बाहरी राज्य के लोगों का मालिकाना हक है। ऐसे में राज्य सरकार अगर भविष्य में इन सभी लोगों को यहाँ का मूल निवासी मान ले तो राज्य के पर्वतीय जिलों के अस्तित्व पर संकट छा जाएगा। बात नौकरी और व्यवसाय से इतर भी करें तो राज्य में सबसे बड़ा संकट खेती की जमीनों पर है। सरकारी आंकड़ों के हिसाब से राज्य में पिछले ग्यारह सालों में लगभग 53 हजार हेक्टेयर (राज्य गठन से लेकर मार्च-2011 तक) जमीन खत्म हो चुकी है। गैर सरकारी आंकड़ों पर गौर किया जाय तो यह स्थिति और भी भयावह है। यह स्थिति तब है जब बाहरी लोगों के राज्य में जमीन की खरीद-फरोख्त पर रोक लगी है और राज्य में हाल ही में खरीदी गयी अधिकांश जमीन बाहर से आये लोगों की है। अगर इन्हें मूल निवास और जाति प्रमाण पत्र बना देने के नियमों में ढील दी जाती है तो राज्य का मूल निवासी होने के नाते उन्हें यह अधिकार स्वतः ही मिल जाते हैं कि वे रोक लगी भूमि से अधिक भूमि निर्बाध रूप से इस राज्य में खरीद सकते हैं, जो आने वाले समय में और बड़ा संकट खडा करेगा। इस व्यवस्था के अस्तित्व में आने से राज्य के अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लोग अधिक प्रभावित होंगे क्योंकि अन्य राज्यों से आये लोग ही इस व्यवस्था से अधिक लाभ अर्जन करेंगे। वे अपने मूल राज्य से भी प्रमाण-पत्र प्राप्त करेंगे और उत्तराखंड से भी, जहाँ अवसर ज्यादा होंगे वे दोनो में से उस राज्य के अवसरों को अधिक भुनायेंगे, जो सीधा इस राज्य के मूल अनुसूचित एवं अनुसूचित जनजाति के लोगों के हितों पर कानूनी डाका है।

जाति प्रमाण पत्र और मूल निवास का मामला अंतिम रूप से निर्णित नहीं हुआ है बल्कि उच्च न्यायालय की डबल बेंच में लंबित हैं। ऐसे में न्यायालय का अंतिम फैसला आने से पूर्व सरकार का जल्दीबाजी में इस संबंध में शासनादेश जारी करना किसी बड़े राजनैतिक स्वार्थ का स्पष्ट संकेत है। सरकार की इस नीति से भविष्य में राज्य का सामाजिक ताना-बाना तो प्रभावित होगा ही अलग राज्य की अवधारणा भी समाप्त हो जायेगी। सरकार और विपक्ष में बैठे राजनेताओं के इस कुटिल गठजोड़ के कुपरिणाम आने वाली पीढ़ी को भुगतने होंगे, जिसके लिए हम सभी को तैयार रहना चाहिए।

मोटेराम का सत्याग्रह: आज भी प्रासंगिक हैं प्रेमचन्द

मोटेराम का सत्याग्रह: आज भी प्रासंगिक हैं प्रेमचन्द

moteram-ka-satyagrahअनुकृति रंगमंडल कानपुर द्वारा सिने अभिनेता स्व. निर्मल पांडे की स्मृति में 4 मई 2013 को शैले हॉल नैनीताल में नाटक 'मोटेराम का सत्याग्रह' का मंचन किया गया। नाटक की प्रस्तुति से पहले नगरपालिका परिषद नैनीताल के नवनिर्वाचित अध्यक्ष श्यामनारायण व उक्रांद के पूर्व विधायक डॉ. नारायण सिंह जन्तवाल द्वारा दीप प्रज्वलित कर निर्मल को याद किया गया।

प्रसिद्ध कहानीकार मुशी प्रेमचनद्र की इस कहानी का नाट्य रूपान्तरण 90 के दशक में रंगकर्मी सफदर हाशमी द्वारा किया जा रहा था लेकिन उनकी हत्या के बाद प्रसिद्ध रंगकर्मी हबीब तनवीर ने इसे पूरा किया। नाटक भारत में अंग्रेजों के शासनकाल में अफसरों के तौर-तरीकों पर आधारित है। जब वायसराय के आगमन की तैयारी-व्यवस्था से त्रस्त दुकानदार व आमजन हड़ताल की चेतावनी देते हैं तो बौखलाये मजिस्ट्रेट व अफसर मिलकर वायसराय के सामने सब ठीक-ठाक होने की तरकीब तलाशते हैं। तय किया जाता है कि हड़ताल को कुचलने के लिए पं. मोटेराम शास्त्री को सत्याग्रह (भूख हड़ताल) पर बैठाया जाये। रसिक-मिजाज कलक्ट्रेट साहब इस काम में शहर की मशहूर तवायफ चमेलीजान की सेवाएं भी लेते हैं। सड़कें चौड़ी कराने, इमारतों के रंग-रोगन आदि की फिजूलखर्ची में सरकारी धन का दुरुपयोग किया जाता है। इधर खाने-पीने के शौकीन मोटेराम शास्त्री की भूख हड़ताल तुड़वा दी जाती है। रायसाहब की आवभगत की तैयारियों में सरकारी खजाना खाली हो जाने से कर्मचारियों अफसरों को वेतन देने के लिए फूटी कौड़ी भी नहीं बचती।

ब्रिटिश हुकुमत के दौरान अफसरों की जैसी कार्यशैली वर्तमान में भी मौजूद है। केन्द्र व प्रदेश सरकारें व उनके अफसर आज भी अपने अधिकारों का दुरपयोग करते हैं। राजनीतिक दलों की आपसी खींचतान व भ्रष्ट नेताओं से सारा देश त्रस्त है। नाटक के जरिये यह संदेश देने की कोशिश की गई है कि जनता द्वारा विभिन्न करों के रूप में दिये गये सरकारी खजाने को जनहित में खर्च किया जाये न कि सत्ता में बैठे नेता-अफसर इसका बेजा इस्तेमाल करें। लोकतंत्र में यह लूट उचित नहीं है। सरकारी धन का दुरपयोग बन्द होना चाहिए।

नाटक के गीत-संगीत उत्तर प्रदेश की नाट्यशैली नौटंकी पर आधारित है। परम्परागत वाद्ययंत्रों में नक्कारा, नाल व हारमानियम का इस्तेमाल किया गया था। लेकिन नक्कारा के तेज स्वरों में कभी सूत्रधार व अन्य पात्रों की आवाज दब जा रही थी। कभी रंगकर्म के लिए विख्यात नैनीताल नगर को पिछले चार-पाँच वर्षों से हो रहा दर्शकों का अकाल इस नाटक में भी रहा। इस बार तो नगर के बहुत सारे रंग कर्मी भी हॉल में मौजूद नहीं थे। शायद यही कारण रहा हो कि नाटक भी अपना वह प्रभाव नहीं छोड़ पाया जिसकी उससे अपेक्षा थी। बावजूद इसके उपस्थित गणमान्य दर्शकों ने कानपुर से आई इस रंग मंडली की खूब हौसला-अफजाई की। कलाकारों का अभिनय कमोबेश ठीक-ठाक रहा। नाटक की परिकल्पना व निर्देशन किया था डॉ. ओमेन्द्र कुमार ने और संचालन वरिष्ठ रंगकर्मी मिथिलेश पांडे ने किया।

http://www.nainitalsamachar.in/moteram-ka-satyagrah-at-nainital/

क्या यह करिश्मा बना रहेगा राजीव लोचन साह

क्या यह करिश्मा बना रहेगा

nainital-municipalityहाल ही में प्रदेश में सम्पन्न निकाय चुनावों में यदि नैनीताल नगरपालिका के चुनाव का उदाहरण लिया जाये तो चुनावी लोकतंत्र से एक उम्मीद बँधती है, हालाँकि यह एक अधूरी तस्वीर है।

नैनीताल नगरपालिका में श्याम नारायण मास्साब ने अध्यक्ष पद पर कब्जा किया। मास्साब उन्हें इसलिये कहते हैं कि वे जूनियर हाईस्कूल के अध्यापक पद से सेवानिवृत्त हुए थे। वे उत्तराखंड क्रांति दल के प्रत्याशी थे, मगर उक्रांद की मदद उन्हें इतनी ही मिल पायी कि नारायण सिंह जन्तवाल, सुरेश डालाकोटी और प्रकाश पांडे जैसे इस दल के वरिष्ठ नेताओं का चुनाव लड़ने में मार्गदर्शन मिला और एक अस्तव्यस्त पार्टी संगठन के गिने-चुने कार्यकर्ता। मगर भाजपा और कांग्रेस जैसे साधनसम्पन्न दलों के प्रत्याशियों को पटखनी देने के लिये इतना ही पर्याप्त नहीं था। जनता को एक साफ-सुथरा प्रत्याशी चाहिये था और वह उन्हें श्यामनारायण में दिखाई दिया। नैनीताल नगरपालिका का अध्यक्ष पद अनुसूचित जाति के लिये आरक्षित था। रिजर्वेशन को लेकर अब भी हमारे समाज में कई तरह के पूर्वाग्रह देखने को मिलते हैं। फिर चुनावों में ऐसे ही लोग सफल होते हैं, जिनके पास अपनी काली-सफेद कमाई के साथ पीछे से तथाकथित राष्ट्रीय पार्टियों का भी अच्छा-खासा पैसा लगा हो। भाड़े के कार्यकर्ता लगाकर प्रचार किया जाता है और जलूस निकाले जाते हैं, पैसा बाँटा जाता है, शराब पिलाई जाती है और अखबारों को विज्ञापन या खबर छपवाने के पैसे दिये जाते हैं। बड़ी पार्टियों ने इस बार भी यह सब किया। उनके उम्मीदवार थोड़ा भी विश्वसनीय होते तो शायद ये टोटके काम आ जाते। मगर एक पार्टी का प्रत्याशी निहायत अजनबी और संदिग्ध किस्म का था तो दूसरा पूर्व में पालिकाध्यक्ष रह चुकने के बावजूद विवादास्पद।

इनकी तुलना में श्यामनारायण अध्यापक जैसे सम्मानजनक पेशे में अत्यन्त ईमानदारी से जिन्दगी गुजार कर आये थे। लोगों ने उन्हें और भाजपा-कांग्रेस के प्रत्याशियों को तौला तो तुरन्त फर्क पहचान लिया। उत्तराखंड क्रांति दल के नेताओं ने इतना किया कि अपने टूटे-बिखरे संगठन के माध्यम से श्यामनारायण मास्साब का नाम यथाशक्ति मतदाताओं तक पहुँचा दिया। इसके बाद तो मास्साब के दर्जनों स्वयंभू कार्यकर्ता स्वतः तैयार हो गये। चुनाव में उनकी ओर से न कोई पोस्टर लगा और न गगनभेदी नारे लगाते हुए कोई जलूस निकला। पर्चे अवश्य बँटे। दो-चार दिन एक गाड़ी भी माईक लगा कर दौड़ी। मगर जिस तरह आजकल चुनावों में पानी की तरह पैसा बहाया जाता है, वैसा कुछ नहीं हुआ। नारायण सिंह जन्तवाल दावा करते हैं कि उन्होंने इस चुनाव के लिये चन्दा कर बत्तीस हजार रुपये जुटाये थे और उसमें से भी सात हजार रुपये बच गये। यहाँ यह बता देना प्रासंगिक होगा कि इस चुनाव में दूसरे नंबर पर भी कांग्रेस-भाजपा का नहीं, बल्कि एक निर्दलीय नवयुवक दीपक कुमार 'भोलू' रहा। भोलू के पास भी उसकी सबसे बड़ी पूँजी उसका विनम्र और मृदु स्वभाव ही है। मगर उसकी उम्र कम होना मतदाताओं में उतना विश्वास नहीं भर पाया।

नैनीताल जैसा अन्यत्र अनेक स्थानों में भी हुआ होगा। क्योंकि इस बार के चुनाव में पूरे प्रदेश में चुने गये 690 वार्ड मेंबरों में से 368 निर्दलीय थे। 69 निकाय अध्यक्षों में 22 पर निर्दलीय जीते।

लेकिन ऐसा करिश्मा अभी नगरपालिका और ग्राम पंचायतों जैसी तृणमूल स्तर की संस्थाओं में ही हो सकता है। जैसे-जैसे चुनाव क्षेत्र का आकार बढ़ता जाता है, पैसे का महत्व भी बढ़ता जाता है। श्यामनारायण जैसे किसी व्यक्ति के लिये विधानसभा या लोकसभा का चुनाव जीतना आज की स्थिति में संभव नहीं है। इन चुनावों में जनता के लिये यही विकल्प बचता है कि दो बुरे लोगों में से एक कम बुरे को चुन ले या उस पार्टी को नीचा दिखा कर अपना गुस्सा शान्त कर ले, जो अभी तक सत्ता में बैठी हुई है। अतः यह 'श्यामनारायण फैक्टर' फिलहाल राजनीति में एक अपवाद ही है, नियम नहीं। जो बहुत अच्छा-अच्छा सा नैनीताल के मतदाताओं को अपने चयन पर या यह खबर पढ़ कर देश-प्रदेश के जागरूक पाठकों को महसूस हो रहा होगा, वह बहुत दिन तक बना रहने वाला नहीं है। जिस तरह से हमारी नगरपालिकायें अभी अपंग हैं, उसमें श्यामनारायण जैसे लोगों के लिये यही बचता है कि कुछ समय तक पूरी ईमानदारी से कोशिश करें, उसके बाद या तो हाथ पर हाथ रख कर बैठ जायें या फिर 'जै रामजी' कह कर शान्ति से अपने रिटायरमेंट के बचे-खुचे दिन काटने के लिये घर वापस लौट आयें। क्योंकि कोई खुद्दार और ईमानदार व्यक्ति इतने भर से तो संतुष्ट नहीं हो सकता कि वह विश्व बैंक या एशिया डेवलपमेंट बैंक द्वारा उदारतापूर्वक दिये जा रहे और सरकार द्वारा लपक कर पकड़ लिये जा रहे कर्जों का एक हिस्सा बाबू लोगों को खिला-पिला कर अपनी नगरपालिका के लिये ले आये। नगरों को सजाना-सँवारना तो दूर की बात, फिलहाल तो एक पालिकाध्यक्ष के लिये यही उपलब्धि मानी जाती है कि उसने अपने कार्यकाल में सफाईकर्मियों को समय पर तनख्वाह बाँट दी थी। 73वें-74वें संविधान संशोधन के अनुरूप जब तक पंचायती राज कानून बना कर भागीदारीमूलक लोकतंत्र नहीं स्थापित होता, ऐसे शहरी निकायों या ग्राम पंचायतों का होना न होना बराबर हैं।

http://www.nainitalsamachar.in/will-this-kind-of-election-win-would-be-repeated/

गंगा से परवीन शाकिर, पाकिस्तानी शायर

गंगा से

जुग बीते
दजला से इक भटकी हुई लहरganga-near-uttarkashi
जब तेरे पवित्र चश्मों को छूने आई तो
तेरी ममता ने फैला दीं अपनी बाहें
और तेरे हरे किनारों पर तब
आम और कटहल के दरख्तों से घिरे हुए
खपरैलों वाले घरों के आँगन में
किलकारियाँ गूँजीं
मेरे पुरुखों की खेती शादाब हुई
और शगुन के तेल ने
दिए की लौ को ऊँचा किया
फिर देखते-देखते
पीले फूलों और सुनहरे दियों की जोत
तेरे फूलों वाले पुल की
कोख से होती हुई
मेहरान तक पहुँच गई
मैं उसी जोत की नन्हीं किरण
फूलों का थाल लिए
तेरे कदमों में फिर आ बैठी हूँ
और अब तुझसे
बस एक दिए की तालिब हूँ
यूँ अंत समय तक तेरी जवानी हँसती रहे
लेकिन ये शादाब हँसी
कभी तेरे किनारों के लब से
इतनी न छलक जाएParveen-Shakir
कि मेरी बस्तियाँ डूबने लग जाएँ
गंगा प्यारी
मेरी रुपहली रावी
और भूरे मेहरान की मुट्ठी में
मेरी माँ की जान छुपी है
मेरी माँ की जान न लेना
मुझसे मेरा मान न लेना
ओ गंगा प्यारी !

परवीन शाकिर, पाकिस्तानी शायर

http://www.nainitalsamachar.in/ganga-a-poem-by-parveen-shakir/

ईको सेंसिटिव जोन के रूप में एक नया अभिशाप

ईको सेंसिटिव जोन के रूप में एक नया अभिशाप

eco-sensitive-zoneइस समय राज्य में इको सेन्सिटिव जोन का मुद्दा सबसे चर्चित है। एक ओर बिनसर, राजाजी, कार्बेट, मसूरी और केदारनाथ सहित लगभग सभी संरक्षित क्षेत्रों के लोग फरवरी माह से प्रदर्शन, घेराव और ज्ञापन के माध्यम से इसके विरोध में आन्दोलनरत हैं वहीं अब सरकार भी इसके विरोध में खड़ी दिखायी दे रही है। जबकि उत्तरकाशी में कुछ सामाजिक कार्यकर्ता व अपने आपको जन आन्दोलन मानने वाला गंगा आह्नान भी इको सेन्सिटिव जोन के पक्ष में पैरवी कर रहा है।

वन्य जीव संरक्षण अधिनियम के अन्तर्गत गठित भारतीय वन्य जीव परिषद की 2002 की बैठक मे वन्य जीव संरक्षण रणनीति 2002 स्वीकृत की गयी थी और इसके तहत प्रत्येक राज्य सरकार को पार्क और सैन्चुरी के 10 किमी. के क्षेत्र को इको सेन्सिटिव जोन घोषित करना था। राज्य सरकारों द्वारा इस योजना का विरोध इस आधार पर किया गया कि इससे पार्क के बाहर की बसासत में विकास की गतिविधियाँ बाधित हो जायेंगी। वर्ष 2005 की बोर्ड बैठक मे तय किया गया कि इको सेन्सिटिव जोन इलाके की पारिस्थितियों के अनूकूल निर्मित किया जाये अर्थात 10 किमी. की शर्त मे शिथिलता राज्य सरकारें दे सकती थी।

वर्ष 2004 मे गोआ फाउण्डेशन द्वारा इस सम्बध में सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की गयी थी जिसके अनुपालन में सुप्रीम कोर्ट द्वारा वन एवं पर्यावरण मंत्रालय को निदेर्शित किया गया था कि वह चार सप्ताह के भीतर राज्य सरकारों से इको सेन्सिटिव जोन के प्रस्ताव प्राप्त करे। 2010 में पुनः सुप्रीम कोर्ट द्वारा ओखला वर्ड सैन्चुरी के भीतर निर्माण के सम्बन्ध में दायर याचिका में इस मामले में निर्देश दिये गये जिसके पश्चात वन एवं पर्यावरण मंत्रालय द्वारा प्रणवसेन की अध्यक्षता में एक कमेटी का गठन किया गया। इस कमेटी की सिफारिशों के आधार पर इको सेन्सिटिव जोन में तीन तरह की गतिविधियाँ चिन्हित की गयी। 1. प्रतिबंधित 2. शर्तो के साथ अनुमन्य 3. बिना शर्तो के साथ अनुमन्य।

प्रतिबंधित क्षेत्र के लिये एक महायोजना निर्मित किये जाने का भी प्राविधान किया गया जिसमें वन्य जीव वार्डन, एक पर्यावरणविद, स्थानीय स्वशासन से एक व्यक्ति और राजस्व विभाग से एक अधिकारी को मिलकर इस योजना का निर्माण करने के लिये निर्देशित किया गया। महायोजना में क्षेत्र में चलने वाली समस्त गतिविधियों को उपरोक्त तीन भागों मे बाँटना था और भविष्य में इको सेन्सिटिव जोन घोषित किये गये क्षेत्र का संचालन इसी आधार पर किया जाना था।

पर्यावरण संरक्षण अधिनियम 1986 केन्द्र सरकार को यह शक्ति देता है कि वह किसी भी क्षेत्र की पारिस्थिति को बनाये रखने के लिये उसे पारिस्थितिक संवेदनशील क्षेत्र घोषित कर सके। इसी शक्ति का प्रयोग करते हुए गोमुख से उत्तरकाशी तक भागीरथी नदी के लगभग 100 किमी. लम्बे 41,179.59 वर्ग किमी. के सम्पूर्ण जल संभरण क्षेत्र को इको सेन्सिटिव जोन घोषित करा जा चुका है। अगले दो वर्षों के भीतर इस क्षेत्र के लिये राज्य सरकार को एक महायोजना बनानी होगी जो कि स्थानीय जनता विशेषकर महिलाओं के परामर्श तथा सरकारी विभागों की भागीदारी और भारत सरकार के वन एवं पर्यावरण मंत्रालय के अनुमोदन के पश्चात लागू होगी। इस योजना में क्या-क्या प्राविधान किये गये हैं, उन्हें समझना जरूरी है।

इस योजना में बंजर क्षेत्र की बहाली, जल निकायों के संरक्षण, भूमिगत जल प्रबंधन सहित पर्यावरण के अन्य पहलुओं पर भी ध्यान दिया जायेगा। नदियों के किनारे किसी तरह के निर्माण पर प्रतिबंध होगा। साथ ही ग्रामीण बस्तियों समेत वन, कृषि, हरित क्षेत्र, बागान, झील आदि को भी चिन्हित किया जायेगा। होटल, रिसॉर्ट के निर्माण में परम्पराओं का ध्यान रखा जायेगा। विकास की कोई भी योजना पारिस्थिति के अनूकूल होने पर ही लागू होगी, पैदल मार्गो को प्रोत्साहित किया जायेगा। कृषि भूमि के भू-उपयोग को प्रोत्साहित किया जायेगा। आवास के लिये कृषि भूमि के भू-उपयोग में बदलाव राज्य सरकार की सिफारिश और केन्द्र सरकार की अनुमति के बाद ही किया जा सकेगा। साथ ही 5000 से अधिक जनसंख्या वाले क्षेत्रों में क्षेत्र विकास योजना बनानी होगी। हरित क्षेत्र जैसे कि वन या कृषि क्षेत्र को किसी दूसरे उपयोग में नहीं लाया जा सकेगा। 20 डिग्री से अधिक तीव्र पहाड़ी ढलान वाले क्षेत्र में किसी भी विकास कार्य की अनुमति नहीं होगी। ऐसे क्षेत्रों से भू-कटाव को रोकने के लिये विशेष प्रयास किये जायेंगे। पर्यटन क्रिया-कलापों के लिये भी पर्यटन विभाग द्वारा पर्यटन महायोजना बनानी होगी। जिसमें क्षेत्र की धारक क्षमता का ध्यान रखना होगा। निर्माण सहित सभी पर्यटन गतिविधियाँ इसी महायोजना में चिन्हित होंगी। आंचलिक महायोजना में शामिल हुए बगैर 5 किमी. से अधिक कच्ची पर पक्की सड़कों का निर्माण नहीं हो पायेगा। वर्तमान सड़कों के चौड़ीकरण को भी महायोजना में शामिल करना होगा। सड़क के कटान के कारण होने वाले प्रारम्भिक क्षति का उपचार किया जायेगा तथा मलवे के निस्तारण की ब्यवस्था की जायेगी। प्राकृतिक और मानव निर्मित दोनों ही प्राकृतिक स्थलों के नजदीक निर्माण कार्यो पर रोक लगायी जायेगी।

गौमुख से उत्तरकाशी तक भागीरथी नदी और सभी उपनदियों पर नये जल विद्युत संयंत्रों के निर्माण पूर्व जल संयंत्रों का विस्तार पर रोक/सूक्ष्म या लघु जल विद्युत परियोजना जिससे स्थानीय समाज की ऊर्जा की जरूरतें पूरी हो सकें ग्रामसभा की अनुमति के पश्चात निर्मित की जा सकती हंै। साथ ही नदी के जल को औद्योगिक प्रयोजनों के लिये उपयोग नहीं किया जा सकता है। वास्तविक निवासियों के आवश्यक घरेलू उपयोग को छोड़कर किसी भी प्रकार के खनिज के खनन पर रोक। 20 डिग्री से अधिक ढलान पर स्थानीय जरूरतों पर भी रोक। पेड़ों की वाणिज्यिक कटाई तथा काष्ठ आधारित उद्योगों पर रोक होगी। ग्राम सभा की अनुमति के पश्चात ही जलाने के लिये लकड़ी एक़त्र करी जा सकती है। प्रदूषणकारी उद्योगों पर रोक तथा बगैर शोधन के मल .और जल के औद्योगिक बहाव पर रोक, प्लास्टिक के थैलों पर रोक।

इको सेन्सिटिव जोन में निम्न गतिविधियों को विनियमित किया जायेगा- केवल भूमि के वास्तविक मालिक द्वारा ही भूमिगत जल का उपयोग कृषि और वास्तविक घरेलू जरूरतों के लिये किया जा सकता है। भूमिगत जल की बिक्री नहीं की जा सकती। कृषि समेत जल के सभी प्रदूषण रोकने होंगे। सभी प्रकार की भूमि पर जिसमें कृषि भूमि भी शामिल है, पेड़ों की कटाई पर पूर्णतया रोक होगी और यदि आवश्यक हो तो वन भूमि पर जिलाधिकारी तथा अन्य भूमि पर राज्य सरकार द्वारा बनाये गये नियमों के पश्चात ही अनुमति मिल सकती है। रक्षा स्थापनों और राष्ट्रीय सुरक्षा से सम्बन्धित ढाँचागत विकास, चीड़ पेड़ों का रोपण, विशेष प्रजातियों का रोपण, होटल रिसाॅर्ट निर्माण, विद्युत केवल, कृषि प्रणाली में तीव्र परिवर्तन, साइनबोर्ड और होल्डिंग ये सभी गतिविधियाँ विनियमित की जायेंगी। ध्वनि, वायु, सीवर आदि के लिये लागू नियम-कानूनों का पालन और वर्तमान में जारी जल विद्युत परियोजनाओं को पर्यावरणीय नियमों का पालन एवं सोशियल आॅडिट कराना होगा। यातायात सहित गंगोत्री और गौमुख के बीच पर्वतारोहण को विनियमित किया जायेगा।

इको सेन्सिटिव जोन में निम्न गतिविधियाँ प्रोत्साहित की जायेंगी-

वर्षा जल एकत्रीकरण, जैविक खेती, हरित प्रोद्योगिकी, भ्रमण पर्यटन, सूक्ष्म जल परियोजनायें और उर्जा सहित स्थानीय जैव संसाधनों पर आधारित उद्योग। इन नियमों को लागू करने के लिये एक मानिटरिंगं कमेटी का गठन किया जायेगा जिसमें गैर सरकारी संगठनों के दो प्रतिनिधियों समेत दस सदस्य हांेगे और इसका अध्यक्ष प्रबंधकीय या प्रशासकीय अनुभव वाला ब्यक्ति होगा। मानिटरिंग कमेटी वन एवं पर्यावरण मंत्रालय के निर्देशों के तहत कार्य करेगी। उत्तराखण्ड की सरकारें इसके लगभग 24 प्रतिशत भू-भूभाग को पहले ही प्रतिबंधित की श्रेणी मे ला चुकी है। इसका अर्थ है कि इस क्षेत्र में किसी भी प्रकार की विकास या स्थानीय निवासियों के अधिकारों से जुड़ी हुई गतिविधियाँ प्रतिबंधित रहेंगी।

इस क्रम में उत्तरकाशी का विश्लेषण दिलचस्प होगा। उत्तरकाशी का कुल क्षेत्रफल 7,95,100 हैक्टेयर है। इसमें से 3,34,700 हैक्टेयर को पूर्व में ही संरक्षित क्षेत्र घोषित किया जा चुका है। वर्तमान इको सेन्सिटिव जोन का क्षेत्रफल 4,17,959 है। इसमें गंगोत्री और गोविन्द पशु बिहार का कुछ क्षेत्र भी शामिल है। अनुमान्तः कुल भू-भाग का 80 प्रतिशत से अधिक क्षेत्र संरक्षण के दायरे में आ चुका है। जबकि कृषि भूमि 27,714 हैक्टेयर जो लगभग 3.5 प्रतिशत है। इन आँकड़ों की तुलना यदि हरिद्वार से की जाये तो वहाँ का क्षेत्रफल 2,33,506 हैक्टेयर है जबकि कृषि भूमि 1,24,486 हैक्टेयर यानी आधे से अधिक क्षेत्रफल में खेती की जा रही है।

जिस तेजी से पर्वतीय क्षेत्र में भूमि को संरक्षित क्षेत्र मे बदला जा रहा है, भविष्य में यहाँ जीवन-यापन का आधार आखिर क्या होगा? संरक्षित क्षेत्र चाहे वह अस्कोट हो या बिनसर, राजाजी हो या केदारनाथ सभी जगह लोग अपने अधिकारों को लेकर संघर्षरत हैं परन्तु इन क्षेत्रों में अधिकारों की बहाली के बजाय इको सेन्सिटिव जोन के नाम पर संरक्षित क्षेत्र बढ़ाने की कवायद जारी है।

उत्तरकाशी में इको सेन्सिटिव जोन के लिये बनी योजना एक नजर में बेहद आकर्षक और पर्यावरण के हितैषी के रूप मे दिखायी देती है परन्तु इसके भीतर स्थानीय निवासियों के लिये कई अवरोध भी छुपे हुए हैं। योजना वन एवं कृषि भूमि में किसी भी बदलाव को प्रतिबंधित करती है। अर्थात कृषि के अतिरिक्त अन्य किसी विकास की सम्भावनाओं के द्वार बन्द और कृषि में भी सिर्फ परम्परागत तरीकों का ही पालन करना होगा। किसी बड़े बदलाव या तकनीकी के माध्यम से कृषि मे परिवर्तन प्रतिबंधित किया गया है। उर्वरक और कीटनाशकों का उपयोग भी प्रतिबंधित होगा। पहले से ही वन अधिनियम 1980 की मार झेल रही सड़कों के दायरे में अब 5 किमी. से अधिक की कच्ची-पक्की सभी सड़कें आयेंगी, पूर्व में निर्मित सड़कों के चौड़ीकरण के लिये भी अनुमति लेनी होगी। पेड़ों की कटाई और काष्ठ उद्योगों को भी यह योजना प्रतिबंधित करती है तो नये निर्माण भी शर्तो के साथ ही किये जा सकते है। अर्थात नियम-कानूनों के जाल में उलझी हुई आम जनता को और नये नियमों में बाँधने की पूरी तैयारी कर ली गयी है। पर सिक्के के दूसरे पहलू के रूप में आम जनता के परम्परागत अधिकारों पर यह योजना बिल्कुल खामोश है। गंगा आह्नान द्वारा इस योजना के ड्राफ्ट पर परम्परागत अधिकारों पर दिये गये सुझाव को नकार दिया गया।

योजना में बड़े बाँधों और जल विद्युत परियोजनाओं पर रोक, व्यवसायिक खनन पर रोक भी अत्यन्त आवश्यकीय है। गंगा की धारा अविरल रहनी चाहिये इस पर भी किसी को एतराज नहीं होगा। टिहरी बाँध के समय से ही उत्तराखण्ड की जनता इन सबका विरोध करती रही है। राज्य बनने के बाद चला नदी बचाओ आन्दोलन इसका प्रमाण है। पर इतने प्रतिबंधों के बाद लोग इको सैन्सेटिव जोन के भीतर जीवन-यापन कर पायेंगे यह एक यक्ष-प्रश्न है। जिन जंगलों पर इनका जीवन-यापन टिका हुआ है उनसे उन्हें दूर कर दिया जाये और दूसरी ओर विकास के भी सभी द्वार बन्द कर दिये जायें तो पलायन के अतिरिक्त क्या कोई और रास्ता बचता है?

मुख्यमंत्री ने जितनी सक्रियता उत्तरकाशी को इको सेन्सिटिव जोन से हटाने के लिये दिखायी है उतनी ही सक्रियता से वे अन्य प्रतिबंधित क्षेत्रों में लागू होने वाले इको सेन्सिटिव जोन के पक्ष मे क्यों नहीं उतरे ? क्या यह सारी कवायद जल विद्युत परियोजना चला रही कम्पनियों के हित में की जा रही है। अगर उन्हें वास्तव में लोगों की चिन्ता होती तो वे केन्द्र द्वारा पारित वन अधिकार कानून को राज्य में लागू करते जो लोगों के अधिकारों और जीवन-यापन की ब्यापक सम्भावनाओं के द्वार खोलता है। इसी तरह कार्बेट पार्क के दो किमी. के इलाके में जमीनों के क्रय-विक्रय पर लगाई गयी रोक भी इसी सरकार की देन है। पवलगढ़ और नन्धौर को प्रतिबंधित क्षेत्र भी इसी सरकार के द्वारा किया गया है। वन्य जीव संरक्षण अधिनियम में स्पष्ट प्रावधान होने के बावजूद गोविन्द पशु बिहार हो या बिनसर सभी प्रतिबंधित क्षेत्रों में समर्थ लोगों द्वारा कानून को धता बताकर जमीनों की खरीद-फरोख्त और निर्माण कार्य जारी है जबकि स्थानीय निवासी अपने घरों की छतों को भी ठीक नहीं करा सकते। कानूनन परम्परागत हक बहाल होने के बावजूद बिनसर के लोग 25 वर्षों के लम्बे संघर्ष के बाद सिर्फ तीन गाँवों में टिम्बर का हक प्राप्त कर पाये, अन्य संरक्षित क्षेत्रों में तो यह हक समाप्त ही हो चुका है। इको सेन्सिटिव जोन में भी यही कहानी दोहरायी जायेगी कि समर्थ लोगों पर कोई रोक नहीं होगी और आम जनता कानूनों के शिकन्जे में पिसेगी।

राज्य की जनता के साथ अगर यह सरकार वास्तव में न्याय करना चाहती है तो उसे केन्द्र सरकार और सुप्रीम कोर्ट के सामने लोगों के अधिकारों की पैरवी करनी होगी तथा यह सवाल पूछना होगा कि पहले से ही राष्ट्रीय औसत से पाँच गुना अधिक संरक्षित क्षेत्र वाले राज्य में और कितना क्षेत्र संरक्षित किया जायेगा, इसकी कोई सीमा तो तय की ही जानी चाहिये। राज्य में लागू वृक्ष संरक्षण अधिनियम जैसे कानूनों को रद्द करना होगा तथा वन पंचायतों को वन अधिकार कानून के दायरे में लाते हए वन-वासियों के अधिकारों को लागू करना होगा। 1000 मीटर से ऊपर हरे वृक्षों के कटान पर रोक के आदेश को चीड़ के सम्बन्ध मे शिथिल करवाना होगा। यदि यह सब नहीं होता है तो संरक्षित क्षेत्र के लोगों के पास पलायन के अतिरिक्त अन्य कोई रास्ता नहीं होगा।

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जन्म दिवस पर हेमवती नंदन बहुगुणा की याद

जन्म दिवस पर हेमवती नंदन बहुगुणा की याद

Hemwati-Nandan-Bahugunaउत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री हेमवती नंदन बहुगुणा के 95वें जन्म दिवस पर क्षेत्र के कई स्थानों पर लोगो ने उन्हें श्रद्धासुमन अर्पित किये। गुप्तकाशी के ह्यूण गाँव में भी स्व. बहुगुणा को ग्रामीणों ने उनके चित्र पर माल्यार्पण कर याद किया। श्री बहुगुणा के बचपन की पढ़ाई प्रा.वि. गुप्तकाशी में ही हुई थी।

25 अप्रैल 1919 में तत्कालीन पौड़ी जिले के बुधाणी गाँव में श्री बहुगुणा का जन्म हुआ था। गुप्तकाशी में प्राथमिक शिक्षा प्राप्त करके डीएवी कॉलेज देहरादून से हाईस्कूल की परीक्षा उत्तीर्ण की थी। वर्ष 1936 से 1942 तक विद्यार्थी आंदोलन का सफल नेतृत्व किया। विद्यार्थी काल से ही श्री बहुगुणा स्व0 लाल बहादुर शास्त्री के सम्पर्क में रहे। वर्ष 1942 में अंग्रेजो भारत छोड़ो की ख्याति से बहुगुणा घर-घर में प्रसिद्ध हो गये। अंग्रेजों की चूलें हिलाने वाले श्री बहुगुणा पर अंग्रेजों द्वारा जिंदा या मुर्दा पकड़ने पर पाँच हजार का ईनाम रखा गया था, लेकिन उन्होंने भूमिगत रहते ही अंग्रेजों को अपने हौसले तथा वीरता का परिचय दे दिया। उनके जज्बे को देखते हुए उन्हें इलाहाबाद विश्वविद्यालय यूनियन का प्रथम डिटेक्टर चुना गया। 1 फरवरी 1943 को उन्हें दिल्ली में जामा मस्जिद के निकट गिरफ्तार कर जेल भेजा गया, लेकिन 1945 में जेल से छूटते ही श्री बहुगुणा ने देश के कई नामी-गिरामी आंदोलनकारियों के साथ रहकर अंग्रेजों की ईट से ईट बजा दी।

वर्ष 1952 से लगातार उ.प्र. कांग्रेस कमेटी के सदस्य रहे। वर्ष 1963 से 1969 तक उ.प्र. कांग्रेस महासचिव के पद पर शोभित रहे। वर्ष 1957 में संसदीय सचिव 1958  में उ.प्र. सरकार में श्रम और उद्योग विभाग के उपमंत्री रहे। वर्ष 1967 में आम चुनाव के पश्चात उ.प्र. सरकार में आम सभा गठन होने के बाद श्री बहुगुणा को अखिल भारतीय कांग्रेस का महामंत्री चुना गया। वर्ष 1971 में केन्द्र में संचार मंत्री तथा नवम्बर में ही कांग्रेस विधायक दल के नेता चुने गये। 8 नवम्बर 1973 को श्री बहुगुणा ने उ.प्र. में मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा और कई विशिष्ट पदों पर आसीन होकर देशवासियों की सेवा की।

उनके बाल्यकाल में तब केदारघाटी में महज गुप्तकाशी में प्राथमिक विद्यालय हुआ करता था। इसी विद्यालय में श्री बहुगुणा ने तीन वर्ष तक अध्ययन किया। उनके अध्यापक रहे ह्यूण निवासी स्व. श्री परमानंद द्वारा उ.प्र. से श्रम भगवान के नाम से प्रकाशित पत्र में लिखा गया कि माता-पिता अपने से बढ़कर अपने पुत्र को तथा गुरू अपने से बढ़कर अपने शिष्य को देखना चाहता है। आज की परिस्थितियाँ कुछ विषम सी हो गयी हैं। आज मैं यह लिखते हुए महान गौरव का अनुभव कर रहा हूँ कि मुझे एक कुशल प्रशासक, महान राजनीतिज्ञ तथा जन सेवी श्री बहुगुणा के तीन वर्ष तक गुप्तकाशी में अध्यापक बने रहने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है। वर्ष 1926 में उनके पिता रेवती नंद बहुगुणा ने अपने पुत्र हेमवती नंदन को पढ़ाने की बात की। बालक हेमवती का अक्षर ज्ञान नहीं था, अतः मैंने इन्हें सर्वप्रथम अक्षर ज्ञान दिया। उस समय चौथी कक्षा तक ही प्राइमरी की शिक्षा होती थी। वे पढ़ने में बड़े तेज तथा हाजिर-जबाब थे। वे इतने नटखट थे कि कभी कलम तोड़ देते थे, तो कभी कमेड़ा जिससे पाटी में लिखा जाता था, को गिरा देते। मै उन्हें बहुत डाँटता था। पौड़ी से आये गिरधारी ने एक बार मेरा फोटो लेना चाहा, मैं उस समय स्काउट ड्रेस में था। बालक बहुगुणा का चूड़ाकर्म संस्कार भी नहीं हुआ था। अध्यापक परमानंद सेमवाल के पु़त्र आनंद मणि सेमवाल कहते हैं कि कई बार पूज्य पिताजी कहते थे कि बहुगुणा जी पैरों में कम ही चप्पलें पहनते थे। उनकी बुद्धिमता तथा चातुर्यता को देखते हुए लोगों ने उनका नाम शतावधानी रख दिया। अर्थात् ऐसा व्यक्ति जो एक बार में कई लोगो की बातें सुने और सबका सकारात्मक प्रत्युत्तर दे।

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