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Sunday, May 4, 2014

प्रसंग : मोदी और दलित

प्रसंग : मोदी और दलित

Sunday, 04 May 2014 14:50

तुलसीराम 

जनसत्ता 4 मई, 2014 : सैमुअल हंटिगटन अपनी पुस्तक 'क्लैश ऑफ सिविलाइजेशंस' के शुरू में ही एक फासीवादी उपन्यास से लिए गए उदाहरण के माध्यम से कहते हैं- 'दुश्मन से अवश्य लड़ो। अगर तुम्हारे पास दुश्मन नहीं है तो दुश्मन निर्मित करो।' मोदी का 'परिवार' इसी दर्शन पर सन 1925 की विजयदशमी से लेकर आज तक अमल करता आ रहा है। इस दर्शन की विशेषता है, अपने ही देशवासियों के एक बड़े हिस्से को दुश्मन घोषित करके उससे लड़ना। ऐसे दुश्मनों में सारे अल्पसंख्यक और दलित-आदिवासी शामिल हैं।

मोदी परिवार का दलित विरोध भारतीय संविधान के विरोध से शुरू होता है। सन 1950 से ही वे इसे विदेशी संविधान कहते आ रहे हैं, क्योंकि इसमें आरक्षण की व्यवस्था है। इसीलिए राजग के शासनकाल में इसे बदलने की कोशिश की गई थी। इतना ही नहीं, मोदी परिवार के ही अरुण शौरी ने झूठ का पुलिंदा लिख कर डॉ आंबेडकर को देशद्रोही सिद्ध करने का अभियान चलाया था। उसी दौर में मोदी के विश्व हिंदू परिषद ने हरियाणा के जींद जिले के ग्रामीण इलाकों में वर्ण-व्यवस्था लागू करने का हिंसक अभियान भी चलाया, जिसके चलते सार्वजनिक मार्गों पर दलितों के चलने पर रोक लगा दी गई थी। समाजशास्त्री एआर देसाई ने बहुत पहले कहा था कि गुजरात के अनेक गांवों में 'अपार्थायड सिस्टम' (भेदभावमूलक पार्थक्य व्यवस्था) लागू है, जहां दलितों को मुख्य रास्तों पर चलने नहीं दिया जाता। 

गुजरात के मुख्यमंत्री बनने से पहले मोदी विश्व हिंदू परिषद की राजनीति में लगे हुए थे। यह संगठन त्रिशूल दीक्षा के माध्यम से अल्पसंख्यकों और दलितों के बीच सामाजिक आतंक स्थापित कर चुका था। अनेक जगहों पर दलितों द्वारा बौद्ध धर्म ग्रहण को जबरन रोका जा रहा था। मोदी ने सत्ता में आते ही एक धर्मांतरण विरोधी कानून बनवा दिया। बौद्ध धर्म खांटी भारतीय है, लेकिन वे इसे इस्लाम और ईसाई धर्म की श्रेणी में रखते हैं। बड़ौदा के पास एक गांव में दलित युवती ने एक मुसलमान से प्रेम विवाह कर लिया था। मोदी समर्थकों ने उस बस्ती पर हमला करके सारे दलितों को वहां से भगा दिया। सैकड़ों दलित वडोदरा की सड़कों पर कई महीने सोते रहे। यह मोदी शासन के शुरुआती दिनों की बात है। 

इस संदर्भ में एक रोचक तथ्य यह है कि विश्व हिंदू परिषद के कार्यकर्ता हमेशा जिला न्यायालयों पर निगरानी रखते हैं और कहीं भी हिंदू-मुसलिम के बीच विवाह की सूचना नोटिस बोर्ड पर देखते ही वे तुरंत उसका पता नोट कर अपने दस्ते के साथ ऐसे गैर-मुसलिम परिवारों पर हमला बोल देते हैं। गुजरात में ऐसी घटनाएं तेजी से फैल गई थीं। ऐसी घटनाओं में दलितों पर सबसे ज्यादा अत्याचार किया जाता रहा है। 

मोदी के सत्ता में आने के बाद गुजरात में छुआछूत और दलितों पर किए जा रहे अत्याचार की शिकायतें कभी भी वहां के थानों में दर्ज नहीं हो पातीं। इस संदर्भ में यह तथ्य विचारणीय है। जब आडवाणी भारत के गृहमंत्री थे, उन्होंने सामाजिक सद्भाव का रोचक फार्मूला गढ़ा। दलित अत्याचार विरोधी कानून के तहत देश के अनेक हिस्सों में हजारों मुकदमे दर्ज थे। आडवाणी के फार्मूले के अनुसार ऐसे अत्याचार के मुकदमों से 'सामाजिक सद्भाव' खतरे में पड़ गया था। इसलिए आडवाणी के निर्देश पर भाजपा शासित राज्यों ने सारे मुकदमे वापस ले लिए। ऐसे मुकदमों में सैकड़ों हत्या और बलात्कार से जुड़े हुए थे। इस फार्मूले पर मोदी हमेशा खरा उतरते हैं। 

सन 2000 में नई शताब्दी के आगमन के स्वागत में गुजरात के डांग क्षेत्र में मोदी की विश्व हिंदू परिषद ईसाई धर्म में कथित धर्मांतरण के बहाने दलित-आदिवासियों पर लगातार हमला करती रही। बाद में यही फार्मूला ओडिशा के कंधमाल में भी अपनाया गया था। सन 2002 में गोधरा दंगों के दौरान अमदाबाद जैसे शहरों में दलितों की झुग्गी बस्तियों को जला दिया गया, क्योंकि ये बस्तियां शहर के प्रधान क्षेत्रों में थीं। तत्कालीन अखबारों ने खबर छापी कि ऐसे स्थलों को मोदी सरकार ने विश्व हिंदू परिषद से जुड़े भू-माफिया ठेकेदारों को हाउसिंग कॉलोनियां विकसित करने के लिए दे दिया। 

नरसिंह राव ने स्कूलों के मध्याह्न भोजन की एक क्रांतिकारी योजना चलाई थी, जिसके तहत यह प्रावधान किया गया था कि ऐसा भोजन दलित महिलाएं पकाएंगी। इसके दो प्रमुख उद्देश्य थे। एक तो यह कि भोजन के बहाने गरीब बच्चे, विशेष रूप से दलित बच्चे स्कूल जाने लगेंगे। दूसरा था सामाजिक सुधार का कि जब दलित महिलाओं द्वारा पकाया खाना सभी बच्चे खाएंगे तो इससे छुआछूत जैसी समस्याओं से मुक्ति मिल सकेगी। लेकिन गोधरा दंगों के बाद विश्व हिंदू परिषद से जुड़े लोगों ने गुजरात भर में अभियान चलाया कि सवर्ण बच्चे दलित बच्चों के साथ दलितों द्वारा पकाए भोजन को नहीं खा सकते, क्योंकि इससे हिंदू धर्म भ्रष्ट हो जाएगा। 

इस अभियान का परिणाम यह हुआ कि मोदी सरकार ने मध्याह्न भोजन की योजना को तहस-नहस कर दिया। मगर किसी-किसी स्कूल में यह योजना लागू है भी तो वहां सवर्ण बच्चों के लिए गैर-दलितों द्वारा अलग भोजन पकाया जाता है। दलितों को अलग जगह पर खिलाया जाता है। स्मरण रहे कि मोदी दलित बच्चों को मानसिक रूप से विकलांग घोषित करके उनके लिए नीली पैंट पहनने का फार्मूला घोषित कर चुके हैं। नीली पैंट इसलिए कि उन्हें देखते ही सवर्ण बच्चे तुरंत पहचान लेंगे और उनके साथ घुल-मिल नहीं पाएंगे। ऐसा 'अपार्थायड सिस्टम' पूरे गुजरात के स्कूलों में लागू है। मोदी एक किताब में लिख चुके हैं कि ईश्वर ने दलितों को सबकी सेवा के लिए भेजा है। इसलिए दलितों को दूसरों की सेवा में ही संतुष्टि मिलती है।

इतना ही नहीं, जब 2003 में गुजरात में विनाशकारी भूकम्प आया तो लाखों लोग बेघर हो गए। बड़ी संख्या में दलित जाड़े के दिनों में सड़क पर रात बिताने को मजबूर हो गए, क्योंकि राहत शिविरों में मोदी के समर्थकों ने दलितों के प्रवेश पर रोक लगा दी थी। उन्हें राहत सामग्री भी नहीं दी जाती थी। उस समय 'इंडियन एक्सप्रेस' ने अनेक खाली तंबुओं के चित्र छापे थे, जिनमें दलितों का प्रवेश वर्जित कर दिया गया था। यह सब कुछ मोदी के नेतृत्व में हो रहा था। 

इस समय मोदी के चलते ही गुजरात में छुआछूत का बोलबाला है। मोदी सरकार ने दलित आरक्षण की नीति को तहस-नहस कर दिया। सारी नौकरियां संघ से जुड़े लोगों को दी जा रही हैं। 'इंडियन एक्सप्रेस' के ही अनुसार गोधरा कांड के बाद गुजरात के अनेक गांवों में सरकारी खर्चे पर विश्व हिंदू परिषद के कार्यकर्ताओं को इसलिए नियुक्त किया गया है, ताकि वे मोदी सरकार को सूचना दे सकें कि वहां कौन देशद्रोही है! इस तरह बड़े व्यवस्थित ढंग से मोदी ने अपने कार्यकर्ताओं के माध्यम से गांव-गांव, शहर-दर-शहर दलित विरोधी आतंक का वातावरण कायम कर दिया है। ऐसा ही अल्पसंख्यकों के साथ किया गया है। 

गुजरात में सत्ता संभालने के बाद मोदी ने सर्वाधिक नुकसान स्कूली पाठ्यक्रमों का२ किया। वहां वर्ण-व्यवथा के समर्थन में शिक्षा दी जाती है, जिसके कारण मासूम बच्चों में जातिवाद के साथ ही सांप्रदायिकता का विष बोया जा रहा है। पाठ्यक्रमों में फासीवादियों का ही गुणगान किया जाता है। गोधरा कांड के बाद जब डरबन में संयुक्त राष्ट्र संघ के तत्त्वाधान में रंगभेद, जातिभेद आदि के विरुद्ध एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन संपन्न हुआ तो विश्व हिंदू परिषद के उपाध्यक्ष आचार्य गिरिराज किशोर ने गुजरात की धरती से ही अपने बयान में कहा- 'भारत की वर्ण-व्यवस्था के बारे में किसी भी तरह की बहस हमारे धार्मिक अधिकारों का उल्लंघन है।' यह वही समय था जब राजस्थान हाईकोर्ट के अवकाशप्राप्त न्यायाधीश गुम्मनमल लोढ़ा ने विश्व हिंदू परिषद के मंच का इस्तेमाल करते हुए 'आरक्षण विरोधी मोर्चा' खोल कर दलित आरक्षण के विरोध में अभियान चलाया था। इसके पहले 1987 में सिर्फ एक दलित छात्र का दाखिला अमदाबाद मेडिकल कॉलेज में हुआ था। उसके विरुद्ध पूरे एक साल तक दलित बस्तियों पर हिंदुत्ववादी हमला बोलते रहे। ऐसे मोदी के गुजरात को हिंदुत्व की प्रयोगशाला कहा जा रहा है। 

उपर्युक्त विशेषताओं के चलते मोदी को आरएसएस ने प्रधानमंत्री पद के लिए चुना है। यही उनका गुजरात मॉडल है, जिसे वे पूरे भारत में लागू करना चाहते हैं। दुनिया भर के फासीवादियों का तंत्र हमेशा मिथ्या प्रचार पर केंद्रित रहता है। मोदी उसके जीते-जागते प्रतीक बन चुके हैं। वे हर जगह नब्बे डिग्री के कोण पर झुक कर सबको सलाम ठोंक रहे हैं। बनारस में वे पर्चा भरने गए तो डॉ आंबेडकर की मूर्ति को ढूंढ़ कर उस पर माला चढ़ाई, ताकि दलितों को गुमराह किया जा सके। संघ परिवार मोदी प्रचार के दौरान आंबेडकर को मुसलिम विरोधी के रूप में पेश कर रहा है, ताकि दलितों का भी ध्रुवीकरण सांप्रदायिक आधार पर हो सके। इस संदर्भ में महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ में, जहां मोदी का हेलीकॉप्टर उतरा, उसके पास ही गांधी की मूर्ति थी, लेकिन माला चढ़ाना तो दूर, उसकी तरफ उन्होंने देखा तक नहीं। मोदी के इस व्यवहार से भी पता चलता है कि आखिर गांधी की हत्या किसने की होगी। 

इन चुनावों के शुरू होने के बाद मोदी का चुनाव घोषणा-पत्र आया, जिसमें सारे विश्वासघाती एजेंडे आवरण की भाषा में लिखे हुए हैं। सारा मीडिया कह रहा था कि इस घोषणा-पत्र पर पूरी छाप मोदी की है। इसमें दो बड़ी घातक शब्दावली का इस्तेमाल किया गया है। एक है 'टोकनिज्म', दूसरा है, 'इक्वल अपॉर्चुनिटी', यानी सबको समान अवसर। सुनने में यह बहुत अच्छा लगता है। 'समान अवसर' का इस्तेमाल सारी दुनया में शोषित-पीड़ित जनता के पक्ष में किया जाता है, लेकिन मोदी का संघ परिवार तर्क देता है कि दलितों के आरक्षण से सवर्णों के साथ अन्याय होता है। इसलिए आरक्षण समाप्त करके सबको एक समझा जाए। यही है मोदी के घोषणा-पत्र का असली दलित विरोधी चेहरा और समान अवसर की अवधारणा। 

इसका व्यावहारिक रूप यह है कि दलितों को वापस मध्ययुग की बर्बरता में फिर से झोंक दिया जाए। अनेक मोदी समर्थक इस चुनाव में सार्वजनिक रूप से आरक्षण समाप्त करने की मांग उठा चुके हैं, लेकिन मोदी उस पर बिल्कुल चुप हैं। इसलिए मोदी और संघ परिवार का दलित विरोध किसी से छिपा नहीं है।

लेकिन सबसे आश्चर्यजनक तथ्य यह है कि दलित पार्टियां मोदी के खतरे से एकदम अनभिज्ञ हैं। उलटे वे लगातार मोदी का हाथ मजबूत करने में व्यस्त हैं। आज मायावती जगह-जगह बोल रही हैं कि मोदी की सत्ता का आना खतरनाक है, क्योंकि वे आरक्षण खत्म कर देंगे और समाज सांप्रदायिकता के आधार पर बंट जाएगा। ऐसा सुन कर बहुत अच्छा लगता है। लेकिन यह सर्वविदित है कि 1995 तक कोई भी पार्टी भाजपा को छूने के लिए तैयार नहीं थी। यहां तक कि उस समय तक लोहियावादी समाजवादियों के अनेक धड़े भी भाजपा को नहीं छूना चाहते थे। लेकिन ज्यों ही 1996 में मायावती भाजपा के सहयोग से मुख्यमंत्री बनीं तो भाजपा के समर्थन में दर्जनों पार्टियों की लाइन लग गई। एक तरह से मायावती ने भाजपा के समर्थन का बंद दरवाजा एक धक्के में खोल दिया और तीन-तीन बार उसके साथ सरकार चलाई। मायावती की भूमिका संघ परिवार की सामाजिक और राजनीतिक शक्ति में बेतहाशा वृद्धि का कारण बनी। 

मायावती संघ और ब्राह्मणों के नजदीक तो अवश्य गर्इं, लेकिन 1995 में मुलायम-बसपा की सरकार को गिरा कर दलित-पिछड़ों की एकता को उन्होंने एकदम भंग कर दिया। इतना ही नहीं, 2004 के चुनावों में मायावती मोदी के समर्थन में प्रचार करने गुजरात चली गर्इं। दलित राजनीति की मूर्खता की यह चरम सीमा थी। अगर मायावती संघ के साथ कभी नहीं जातीं और सेक्युलर दायरे में रही होतीं तो देवगौड़ा के बदले 1996 में कांशीराम या मायावती में से कोई भी एक भारत का प्रधानमंत्री बन सकता था। लेकिन सत्ता के तात्कालिक लालच ने पूरी दलित राजनीति को जातिवादी और सांप्रदायिक राजनीति में बदल दिया। इससे जातिवादी सत्ता की भी होड़ मच गई। दलित नेताओं को यह बात एकदम समझ में नहीं आती है कि दलित हमेशा जातिवाद के कारण ही हाशिये पर रहे। इसलिए जातिवाद से छेड़छाड़ करना कभी भी दलितों के हित में नहीं है। 

अब जरा अन्य दलित मसीहाओं पर गौर किया जाए। दलित राजनीति के तीन 'राम' हैं। एक हैं रामराज (उदित राज), दूसरे रामदास अठावले और तीसरे रामविलास पासवान। ये तीनों गले में भगवा साफा लपेट कर मोदी को प्रधानमंत्री बनाने पर उतारू हैं। हकीकत यही है कि ये तीनों 'राम', 'रामराज' लाने के लिए दिन-रात एक किए हुए हैं। रामराज ने भारत को बौद्ध बनाने के अभियान से अपनी राजनीति शुरू की थी। मगर कुशीनगर और श्रावस्ती होते हुए उन्होंने अयोध्या आकर अपना बसेरा बना लिया। जिस प्रकार मुसलमानों के खिलाफ जब बोलना होता है तो भाजपा नकवी-हुसैन की जोड़ी को आगे कर देती है। अब जब दलितों के खिलाफ बोलना होता है तो रामराज हाजिर हो जाते हैं। इसका उदाहरण उस समय मिला, जब रामदेव ने दलितों के घर राहुल द्वारा हनीमून मनाने वाला बयान दिया, जिसके बाद देशभर के दलितों ने विरोध करना शुरू कर दिया। इसलिए बड़ी बेशर्मी से रामराज रामदेव के समर्थन में आ गए।

उधर रामदास अठावले, जो अपने को डॉ आंबेडकर का उत्तराधिकारी से जरा कम नहीं समझते, वे शिवसेना के झंडे तले मोदी के प्रचार में जुटे हुए हैं। उनकी असली समस्या यह थी कि वे मनमोहन सरकार में मंत्री बनना चाहते थे, लेकिन विफल रहे। इसलिए उन्होंने भगवा परिधान ओढ़ने में ही अपनी भलाई समझी। तीसरे नेता रामविलास पासवान पहले भी वाजपेयी के मंत्रिमंडल में रह चुके हैं। हकीकत यह है कि 1989 से अब तक वीपी सिंह, देवगौड़ा, गुजराल, वाजपेयी और मनमोहन सिंह, सबके मंत्रिमंडल में रामविलास पासवान केंद्रीय मंत्री रह चुके हैं। गोधरा दंगे के बाद उन्होंने राजग छोड़ा था। लेकिन मनमोहन सिंह के दूसरे कार्यकाल में मंत्री न बन पाने के कारण वे फिर मोदी की हवा में उड़ने लगे। अब हर मंच से मोदी का प्रचार कर रहे हैं। 

इस समय सारे दलित नेता दलित वोटों की भगवा मार्केंटिंग कर रहे हैं। ये नेता जान-बूझ कर दलितों को सांप्रदायिकता की आग में झोंक रहे हैं। इतना ही नहीं, वे वर्ण-व्यवस्थावादियों के हाथ भी मजबूत कर रहे हैं। ऐसी परिस्थिति में यह जिम्मेदारी दलित समाज की है कि वे सारी दलित पार्टियों को भंग करने का अभियान चलाएं और उसके बदले जाति व्यवस्था विरोधी आंदोलनों की शुरुआत करें। अन्यथा इन नेताओं के चलते दलित हमेशा के लिए जातिवाद के शिकार बन जाएंगे।


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Saturday, May 3, 2014

नमोमय देश यकीनन हिंदू राष्ट्र नहीं होगा वह विशुद्ध अंबानी राज होगा !

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 होगा !

फिर फिर हम अपने कातिल चुन रहे हैं कत्ल होने के लिए

जो होना था, हो चुका… तीर कमान से निकल चुका है, निशाना बिंधने ही वाला है।

अब तो भइये,आगे की सोचो।

हम मेहनतकश जगवालों से जब अपना हिस्सा मांगेंगे

एक खेत नहींएक गांव नहीं हम पूरी दुनिया मांगेंगे. 

 पलाश विश्वास


ग्रोवर साहेब, घूमते रहें देश दुनिया और अपने दादा राजीव नयन बहुगुणा की तस्वीरें शानदार निकालते रहें, लेकिन हम तो आपके संकल्प के मुताबिक,एक खेत नहीं, एक गांव नहीं हम पूरी दुनिया मांगेंगे…और कुछ भी नहीं।

अपने अग्रज मोहन क्षोत्रिय ने एकदम सही लिखा हैः

फ़ैज़ ही नहीं, दुनिया भर के न जाने कितने कवि याद आ रहे हैं, आज के दिन।

सच तो यह है कि अगर सचमुच देशी-विदेशी पूंजी के गठजोड़ के चलते किसान अपनी जमीन और किसानी से पूरीतरह बेदखल हो गये तो छोटा-मझोला, सीमांत गरीब किसान तो मिट ही जायेगा। …. गांव, किसान, खेती और खेत मजदूर की हिफाजत से ही भारत के कृषि क्षेत्र की हिफाजत की जा सकती है।…… आज भी यहां की जनसभाओं में मेहनतकशों के पक्षधर फैज का गीत गाते हैं

हम मेहनतकश जगवालों से जब अपना हिस्सा मांगेंगे

एक खेत नहीं, एक गांव नहीं हम पूरी दुनिया मांगेंगे.

हमें उन मित्रों से सख्त तल्ख शिकायत है जो चुनावी जंग में कूद पड़े हैं और अपना मोर्चा फ्रिज कर चुके हैं। अविनाश बाबू वाराणसी में आसन जमाये हुए हैं, "मोहल्ला" सुनसान है। यशवंत फिर भी ठीक ठाक है, जहां भी हों, "भड़ास" निकाल रहा है।

"रविवार" का अता पता नहीं, पुरातन मित्र आलोक पुतुल का भी नहीं। फुटेला की कोई खबर ही नहीं है।

और तो और, अपने अभिषेक जैसे तेज तर्रार युवा साथी वाराणसी में ही खप रहे हैं तो साहिल भी।

कुल मिलाकर अमलेन्दु और रियाज अपने मोर्चे पर जमे हुए हैं, अभिनव सत्यनारायण चीम की गोलंदाजी भी जारी है।

लेकिन बाकी सारे लोग अमर्त्य सेन हैं या भगवा अर्थशास्त्री भगवती।

देश के स्थाई बंदोबस्त में तब्दीली किये बिना महज जनादेश के भरोसे हैं इस देश की बहिष्कृत जनता और उनके पक्षधर तमाम तुर्रम खां।

लेकिन फिर फिर हम अपने कातिल चुन रहे हैं कत्ल होने के लिए।

अर्थशास्त्री भगवती ने बहुमत की औकात बता दी है और साफ-साफ बता दिया है कि लोग मनमोहनी जादू के कायल होते रहे लेकिन नरसिम्हा राव की अल्पमत सरकार ने देश का ढांचा ही बदलकर रख दिया।

अल्पमत सरकारें गुल खिलाने को माली काफी हैं और इसी तरह चलेगा गुलशन का कारोबार क्योंकि इस संसदीय प्रणाली में आर्थिक एजेंडा पर सर्वकालीन सर्वदलीय सहमति का स्थाई बंदोबस्त हो गया है।

जो होना था,हो चुका। तीर कमान से निकल चुका है। निशाना बिंधने ही वाला है। अब तो भइये, आगे की सोचो।

गौर करें कि अंग्रेजी मीडिया भाषायी मीडिया की तरह अस्मिताओं के समीकरण सर्वे पेड न्यूज अभियान मध्ये अगली सरकार की प्राथिमिकताओं के एजंडे और मनमोहनी नीतिगत विकलांकता को मुख्यमुद्दा बनाये हुए है। पिछले दो साल से और दूसरे चरण के आर्थिक सुधारों को सर्वोच्च वरीयता दे रखी है, जिस पर भाषायी मीडिया और सोशल मीडिया में नमोलहरिया वाद विवाद के अलावा किसी को न सूचना है और न परवाह।

हाल में टाइम्स आफ इंडिया ने अमर्त्यसेन और भगवती दो परस्परविरोधी लेकिन नख से शिख तक मुक्तबाजारी अर्थशास्त्रियों के इंडरव्यू साथ-साथ छाप कर हंगामा बरपा दिया।

नागपुर के एक अलक विश्वास ने बांग्ला में मेरे आलेखों के जवाब में सीधे पूछ लिया कि इस बारे में मेरी राय क्या है।

मैंने इस पर 2003 में नागरिकता संशोधन कानून विरोधी बामसेफ के सम्मेलन में दिये अपने वक्तव्य की यूट्यूब लिंक डाल दिया। तो बहस चल पड़ी कि हम किस बामसेफ की बात कर रहे हैं। जबकि हम और देश भर के हमारे साथियों ने अस्मिता टैग राजनीति आंदोलन से 2011 के अंत से नाता तोड़ लिया है और हममें से कोई इस वक्त बामसेफ और किसी अस्मितावादी संगठन और आंदोलन में नहीं है। अब सिर्फ हंगामा खड़ा करना हमारा मकसद नहीं है,हालात बदलने चाहिए।

यह बहस इतनी तेज चली कि हारकर मुझे अंग्रेजी में लिखना पड़ा कि अमेरिकी नागरिक अमर्त्य सेन के धर्मनिरपेक्षता बहाल करने के लिए भारत में आकर मतदान का हमारे लिए कोई महत्व नहीं है। भगवती को तो हम भगवा मानते ही हैं और इसलिए उनके खुल्लमखुल्ला एजेंडा पर हमने अलग से कोई मंतव्य नहीं किया।

हमने फिर लिखा है कि हम अरुंधति राय और आनंद तेलतुंबड़े के विश्लेषण से सहमत हैं कि बिना राष्ट्र के चरित्र और वर्णवर्चस्वी नस्ली अस्मिता सर्वस्व तंत्र मंत्र यंत्र और अंध संविधानपरस्ती में बुनियादी बदलाव के, बिना वेस्ट मिनिस्टर शैली की संसदीय प्रणाली के शासक वर्ग के लिए, शासक वर्ग द्वारा और शासक वर्ग के स्थाई बंदोबस्त को सिरे से बदलने की कोई कवायद किये बिना पहचान और अस्मिता सीमबद्ध खंड खंड खंडित हम हर हाल में रंग बरंगे जनादेश मार्फत यथास्थिति या बदतर स्थिति के विक्लप चुनकर बार-बार अपने कातिलों का ही चुनाव कर रहे हैं।

आम जनता के प्रति सत्ता की जवाबदेही,सही अमनोनीत निर्वाचित जनप्रतिनिधित्व, कानून का राज, न्याय, समता और सामाजिक न्याय के साथ संस्थागत कुलीनतंत्र के विरुद्ध सच्चे लोकतंत्र के लक्ष्य के लिए राष्ट्रव्यापी जनांदोलन के सिवाय इस जायनवादी कारपोरेट आर्थिक राजनीतिक सामाजिक सांस्कृतिक आधिपात्यवादी जायनवादी संस्थागत महाविनाश से बचने का कोई दूसरा जुगाड़ नहीं है।

वोट तो हमारे लूट लिये गये हैं। अब पछताय का होत है जब चिड़िया चुग गयो खेत।

हम जो नंगे थे मतदान प्रक्रिया शुरु होने से पहले, अब भी उतने ही नंगे हैं।

हम जो मारे जा रहे थे, अब भी बेमौत मारे जायेंगे।

मरने से पहले कमसकम अपने कातिल को पहचानने की हिम्मत तो कीजै।

अभी कुछ दिनों पहले इन्हीं डा. अमर्त्य सेन ने जयपुर साहित्योत्सव में देशवासियों के संदेश दिया कि ज्ञान विज्ञान की भाषा संस्कृत है लिहाजा संस्कृत को भारतीय शिक्षा के लिए अनिवार्य बनाया जाना चाहिए।

इस पर तब हमने लिखा था अंगेर्जी में कि पूरे दक्षिण पूर्व एशिया में फिलीपींस से लेकर कंबोडिया तक और तमिलनाडु में तमिल बोली जाती है, तो तमिल को क्यों नहीं अनिवार्य बना दिया जाये। क्यों नहीं गोंड, जो मध्यभारत में सर्वत्र बोली जाने वाली आदिवासियों की भाषा है।

खासकर जब उत्तर भारतीय भाषाओं और अंग्रेजी में भी सातवी सदी में सम्राट शशांक के अवसान से लेकर ग्यारहवीं सदी तक बौद्धमयभारत के चर्यापद उत्कर्ष समय को तमयुग बतौर अंधेरे में रख दिया गया है।

जबकि तमिल भाषा में कम से कम सात हजार साल तक की अविराम इतिहासधारा अव्याहत है।

कम से कम जो देशभक्ति के नाम पर बाकी धर्मोन्माद विरोधी बहुसंख्य को राष्ट्रद्रोही बताने में एक सेकंड का समय नहीं लगाते, उनका तो परम कर्तव्य बनता है कि वे तमिल अवश्य सीखें। आप तमिल सीखेंगे तो क्या तमिलभाषी हिंदी नहीं सीखेंगे, सोचिये।

फिर समरसता की बात करने वालों को आदिवासियों की भाषा, बोली पहचान और संस्कृति से इतना परहेज क्यों होना चाहिए।

गोंड को सीखने की भी तो प्राथमिकता या कमसकम इच्छाशक्ति होनी चाहिए।तभी न दंडकारण्य और गोंडवाना की धड़कनों को हम समझ सकेंगे, जिसे माओवादी कहकर हम दो सेकंड में खारिज कर देते हैं।

हकीकत तो लेकिन यही है कि अमर्त्य बाबू का केसरिया विरोध और भगवा अर्थशास्त्री भगवती के नमोमय अर्थशास्त्र में कोई बुनियादी अंतर नहीं है।

पूरी अर्थशास्त्री जमात की जड़ें अमेरिकी जायनवादी ग्लोबल युद्धक व्यवस्था में हैं,वे जब भी हगते मूतते पादते हैं, तो रोबोटिक्स जरिये वे अमेरिका नियंत्रित ही होते हैं। वे किसी न किसी रूप में वैश्वक नियंता संस्थानों से संबद्ध हैं।

जो इतने बड़े विशेषज्ञ भी नहीं है तो उनके तार देशी विदेशी पूंजी के टाइम बस से जुड़े हैं और उनका समयबद्ध धमाका समय समय पर होता रहता है।

कोई बुनियादी फर्क इन अर्थशास्त्रियों और अमेरिकी रेटिंग संस्थानों के वक्तव्य में होना असंभव है सिवाय इसके कि कारपोरेट जिम्मेदारी और दस साल तक देश भर में जल जंगल जमीन नागरिकता मानवाधिकार से बेदखली के जनसंहारी अश्वमेध अभियान चलाने वाले मनमोहनी कारपोरेट जमावड़े की सामाजिक सुरक्षा और जनअधिकार के पाखंड बतर्ज समरस अर्थशास्त्र की तरह समता,सामाजिक न्याय और अंत्योदय की अवधारणाओं का उद्दात्त उद्घोष  जैसे महापाखंडी फर्जीवाड़े शारदा पोंजी कांडी वास्तव के सिवाय।

दोनों मुक्त बाजार के सबसे बड़े प्रवक्ता हैं। जैसे कांग्रेस वैसे भाजपा, उसी तर्ज पर जैसे अमर्त्य वैसे ही भगवती। तो बाकी लोग भी कमोबेश वहीं।

उनका भारतीय आम जनता, उनकी रोजमर्रे की जिंदगी में सिर्फ सांस भर लेने की जद्दोजहद से इस महामहिम महिमामंचित कुलीन संप्रदाय का न कोई सरोकार है और न हो सकता है।

पिछले तेइस साल में राजनेताओं के कंधों पर बंदूक चलाकर इन कारपोरेट अनिर्वाचित विशेषज्ञ असंवैधानिक निलेकणि तत्वों ने ही अविराम होलिया रंगबिरंगी मारक चांदमारी की है और आगे की भी पुरकश तैयारी है।

हमें आप गोली मार सकते हैं, लेकिन सच यही है कि धर्मनिरपेक्षता का किस्सा अपने आप में बहुत बड़ा पाखंड है और मौकापरस्ती भी। जब चाहे तब नकद सुविधा वाला एटीएम है यह जिसे राम नाम के पासवर्ड साथ निकासी वास्ते खुल्लमखुल्ला रामविलासी इस्तेमाल किया जा सकता है।

धर्मनिरपेक्षता का जाप करने वाले महज धर्मोन्माद के खिलाफ जिहाद का ऐलान करते हुए दूसरे नरम धर्मोन्मादी जनसंहारी का विकल्प चुनने के लिए आम जनता को प्रेरित करते हैं बस इतना ही।

बंगाल में इस धर्मोन्माद विरोधी राजनीति का खेल हम लोग निरंतर देख रहे हैं अविराम।

सच्चर कमिटी की रपट ने इसका खुलासा कर दिया है।

पूर्व आईपीएस अफसर नजरुल इस्लाम और हाल में माकपा से बहिष्कृत किसान नेता रज्जाक मोल्ला ने सिलसिलेवार ढंग से बता दिया है कि कैसे यह फर्जीवाड़ा बहुसंख्य को जीवनधारा राष्ट्रधारा से काटने का अचूक राम वाण है।

उनसे भी पहले जयपुर साहित्योत्सव में ही आशीष नंदी ने साफ-साफ कह दिया कि बंगाल में सौ साल से व्यवस्था में किसी भी स्तर पर अनुसूचितों और पिछड़ों को कोई प्रतिनिधित्व हासिल नहीं किया और इसीलिए बाकी देश के मुकाबले बंगाल में भ्रष्टाचार कम है।

बहुजनों को भ्रष्ट बताने पर तो लोग उबल गये, लेकिन इस बुनियादी मसले पर कोई बहस ही नहीं हो सकी कि पिछले सौ साल में सत्ता वर्ग ने बंगाल में बहुजनों का क्या हाल किया।

बाबासाहेब ने ते फिरभी बता दिया कि कांग्रेस और गांधी ने अछूतों के साथ क्या हश्र किया।

लेकिन उनके नाम से रंग बिरंगे इंद्रधनुषी बुतपरस्त दुकाने खोले लोगों की इतनी काबिलियत भी नहीं कि इस ग्लोबीकरण में बहुजनों बहिष्कृतों सर्वस्वहाराओं मेहनतकशों का क्या हाल हुआ, उसका अंदाजा भी लगा सके और उनमें से जो ज्यादा शातिर हैं, वे सब कुछ हमस सबसे बेहतर जानते हुए सत्ता वर्ग के खूनी खेल में शामिल हैं।

वे तमाम लोग ग्लबीकरण के मसीहा हैं और नमोमयदेश के कल्कि अवतार के शिखंडी भी।

अभी अभी बंगाल में तीसरे दफा के मतदान से पहले श्रीरामपुर में संस्थागत संघी महाविनाश के कल्कि अवतार ने 1947 के भारत विभाजन के बाद आये तमाम लोगों को बांग्लादेशी बताकर उन्हें 16 मई के बाद भारत से खदेड़ने का जो ऐलान किया, उसके खिलाफ धर्मनिरपेक्ष मोर्चे पर सिरे से सन्नाटा है।

क्या यह धर्मोन्मादी राष्ट्रवाद या भाषाई सांप्रदायिकता का खुला इजहार नहीं है कि हम भारत विभाजन और मौजूदा सत्ता वर्ग को साजिशन सत्ता स्थानातंरण के स्थाई बंदोबस्त के बलि पश्चिम पाकिस्तान से आये शरणार्थियों को तो भारत की नागरिकता दिलाने के लिए एढ़ी-चोटी का जोर लगाते हैं, कश्मीरी पडितों को घर वापसी के लिए धारा 370 के खिलाफ जिहाद का ऐलान भी करते हैंलेकिन पूर्वी बंगाल से आये मुसलमानों की तो खैर छोड़ दीजियेहिंदू दंगापीड़ित शरणार्थियों को बांग्लादेशी घुसपैठिया बताने से पहले अपने हिंदुत्व को कसौटी पर कसते नहीं हैं ?

और तो और भारत के अभिन्न हिस्सा पश्चिम बंगाल के बांग्लाभाषी लोगों को भारत के दूसरे राज्यों में बांग्लादेशी तो कहते ही हैं, आदिवासियों के साथ-साथ बेशकीमती जल जमीन जंगल से आदिवासियों की तरह उन्हें कारपोरेट हित में बेदखल करने के सैन्य राष्ट्र के अभियान को राष्ट्रहित मानते हैं, सोचिये।

नागरिकता संशोधन विधेयक और आधार प्रकल्प का मकसद ही अबाध बेदखली अभियान है, आदिवासी भूगोल में जितना,उससे महानगरों, औद्योगिक इलाकों और शहरी कस्बाई की बेशकीमती इलाकों में, हम इस अर्थशास्त्र को समझ ही नहीं रहे हैं।

इसीलिए जब हमसे अमर्त्य और भगवती के ताजा युगल इंटरव्यू पर राय मांगी गयी तो हमने अपने नागरिकता संशोधनी विरोध संक्रांत यूट्यूब पर उपलब्ध वक्तव्य का लिंक जारी कर दिया। आधार पर तो हम निरंतर बोल लिख रहे ही हैं।

कश्मीर के तेजतर्रार युवा वकील अशोक बसोत्तरा का कहना है कि लोग देश की बात करते हैं लेकिन अपने घर और मोहल्ले सा बाहर नहीं निकल पाते और न उनकी दृष्टि में देश का समूचा नक्शा होता है।

बसोत्तरा का कहना है कि वे दरअसल हर वक्त खंड खंड देश की बात कर रहे होते हैं और उनका आचरण देश को खंड खंड बनाने का शाश्वत एजंडा ही है।

गौर करें कि बसोत्तरा कोई अलगाववादी कश्मीरी नहीं है, कुल परिचय से वे भी नरेंद्र मोदी और बाबा रामदेव, अमर्त्यसेन और आशीष नंदी की तरह विशुद्ध शूद्र है जिसे अब ओबीसी कहा जाता है।

हैरतअंगेज बात तो यह है कि विभाजन के बाद लगातार शरणार्थियों को वोट बैंक बनाये रखकर बंगाल में 35 साल तक और अब भी त्रिपुरा में राज करने वाले वामपंथियों ने नरेंद्र मोदी के इस राष्ट्रविरोधी वक्तव्य का नाममात्र प्रतिवाद तक नहीं किया।

ठीक उसी तरह जैसे बंगाल केरल और त्रिपुरा तीन तीन राज्यों में वाम शासन के वक्त अपनी सत्ता बनाये रखने के लिए वे मनमोहिनी अश्वमेध अभियान के परम पुरोहित बनकर देशभर में वाम आंदोलन को पलीता लगाते रहे।

फिर यह खेल भी हमारे आत्मघाती वामपंथी मित्रों को समझ में नहीं आ रहा है कि ममता अब किसी भी हाल में नमोलहर में शामिल नहीं है और अगले विधानसभा चुनावों के मद्देनजर बंगाल के शक्तिशाली मुस्लिम वोट बैंक के मद्देनजर केसरिया खेमे से उनका गठबंधन नहीं होने वाला है, केंद्र की कांग्रेसी सरकार बंगाली कांग्रेसी नेताओं के ममताविरोध को हाशिये पर रखकर चुनावों में ममता के पक्ष में एकतरफा मतदान के हालात बनाने में लगी है सर्जिकल अभ्यस्तता, कुशलता और गोपनीयता के साथ।

नरेंद्र मोदी के बांग्लादेशी वक्तव्य और उसकी प्रतिक्रिया में ममता के खुले जिहाद के बाद हुए बंगाल में तीसरे चरण के मतदान के दौरान अदृश्य इशारे के तहत केंद्रीय वाहिनियों को मतदान केंद्रों से दूर रखा और उनकी अनुपस्थिति में बीरभूम में दो बजे तक सारा खेल खत्म तो हावड़ा में तो कहीं कहीं ग्यारह बजे तक शत प्रतिशत तक मतदान हो गया।

समझने वाली बात है कि ऐन चुनाव वक्त शारदा फर्जीवाड़े की बासी कढ़ी में उबाल लाकर ममता को घेरा है केंद्रीय एजंसियों ने। जैसे अतीत में लालू मुलायम शिबू जयललिता करुणाकरण इत्यादि क्षत्रपों को कांग्रेस पक्षे लामबंद कारणे घेरने का राजकरण आम है।

पोंजी स्कीम जब सारी अर्थव्वस्था है जब सारे लोग छिनाल पूंजी के हमबस्तिर हैं तो सैकडों की तादाद में जारी पोंजी कंपनियों के खिलाफ क्या कार्रवाई हो सकती है।सीबीआई सीबीआई गुहार मस्त मस्ती है। कांग्रेस सरकारों के तमाम घोटालों में सीबीआई का नतीजा क्या निकला, यह भी देखें।

फिर निजी कंपनियों को बैंकिंग लाइसेंस देकर सहारा को हाशिये करने वाली सत्ता अबतक की सबसे बड़ी पोंजी स्कीम इस जनादेश के तुरंत बाद चालू करने वाली है।

जान माल जमा पूंजी पीएफ पेंशन बीमा सबकुछ बाजार में झोंकने वाले वित्तीयबंदोबस्त के ईडी जांच के भरोसे बाकी मुद्दे छोड़ ममता को घेरने की कवायद में अपना बाकी बचा जनाधार भी माकपाइयों और वामदलों ने गवां दिया।

गौर करें कि बंगाल के मोर्चे पर तोपंदाजी अब ममता और मोदी के मध्य है। जो ममता केंद्र में सत्ता दखल करने के लिए अन्ना ब्रिगेड में शामिल होकर तीन तीन बार चरण स्पर्श कर रही थीं, वे धर्मनिरपेक्ष भाषा में कांग्रेस के साथ लामबंद हो गयी हैं और इसका नकद भुगतान भी कांग्रेसी सत्ता ने एकतरफा तीसरे चरण के मतदान के जरिये कर दिया है।

वामपंथी बिना किसी राजनीतिक कवायद के केंद्रीय एजंसी चुनाव आयोग से न्याय की गुहार करते हुए लाल पीले हुए जा रहे हैं। अब ज्योति बसु को प्रधानमंत्री बनने से रोकने वाले बंगाली मार्क्सवाद पर क्या आखिर कहा जा सकता है।

बंगाल में अगले दो चरणों में बभी विपक्ष के संघबद्ध गुहार के बावजूद चुनाव आयोग केंद्र सत्ता के इशारे के बिना ऐसा ही तटस्थ भूमिका अदा करके बंगाल में ममता को अधिकतम सीटें दिलाने की कोशिश करेगा।

बंगाल में जो मोदी बनाम ममता ध्रुवीकरण हो गया, उससे वामपंथी किनारे हो गये मोदी के खिलाफ हैरतअंगेज चुप्पी बरतकर ममता बनर्जी पर व्यक्तिगत आक्रमण तेज करते हुए।

 इससे हिंदू शरणार्थी वोट भाजपा को स्थानांतरित हो गये तो खंडित मुस्लिम वोट बैंक एकजुट होकर ममता के हक में लामबंद हो गया।

जाहिरा तौर पर वामपंथियों ने न सिर्फ अपने पांव में कुल्हाड़ी मारने की ऐतिहासिक भूलों की निरंतरता जारी रखी है, बल्कि केंद्र में नई सरकार बनाने की प्रक्रिया से जाने अनजाने खुद को अलग कर लिया है।

नमोमय देश यकीनन हिंदू राष्ट्र नहीं होगा।

वह विशुद्ध अंबानी राज होगा।

भगवती ने साफ साफ कहा है कि अल्पमत सरकार के लिए आर्थिक सुधार लागू करने में कोई अड़चन नहीं है।

अपने इंटरव्यू में अबाध पूंजी प्रवाह जारी रखने  पर देते हुए खुदरा कारोबार तक में प्रत्यक्ष विदेशी पूंजी निवेश की वकालत उन्होंने की है।

संघी आर्थिक एजंडा की बात हम पहले ही कर चुके हैं।

अगर मोदी रुक गये, और ममता, मुलायम, मायावती, नीतीश, लालू, नवीन, महंत, जगन, जयललिता,शरद पवार जैसे शक्तिशाली क्षत्रप एक साथ मिलकर नया विकल्प देते हैं चुनाव के बाद, तब हो सकता है कि कांग्रेस नीत या कांग्रेस नियंत्रित सरकार बनने से धर्मनिरपेक्ष खेमे की जय जयकार हो जाये।

हमारे हिसाब से ऐसे हालात में भी नतीजा मोदी सरकार बनने से अलग कुछ नहीं होगा।

कांग्रेस की सरकार बने या फिर मोदी की या तीसरे विकल्प की या त्रिपुरा जैसे दो सीटों वाले राज्य के माकपाई मुख्यमंत्री माणिक सरकार की, हमें फर्क कुछ नहीं पड़ने वाला है।

भगवती जो कह रहे हैं, वह सो टक्का सच है।

बरोबर।बरोबर।

जैसे अल्पमत सरकारों ने एक के बाद एक जनविरोधी कानून बनाकर बाकायदा भारतीयजनगण के खिलाफ युद्धघोषणा कर दी है, इन परिस्थियों में कोई भिन्न परिप्रेक्ष्य 16 मई के बाद होगा नहीं, ईवीएम से निकला कारपोरेट जनादेश का चरित्र कुछ भी है।

नगण्य नोटा के इस्तेमाल के बावजूद लोकगणराज्य के वध महोत्सव का आईपीएल थमने वाला नहीं है।

About The Author

पलाश विश्वास। लेखक वरिष्ठ पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता एवं आंदोलनकर्मी हैं । आजीवन संघर्षरत रहना और दुर्बलतम की आवाज बनना ही पलाश विश्वास का परिचय है। हिंदी में पत्रकारिता करते हैं, अंग्रेजी के लोकप्रिय ब्लॉगर हैं। "अमेरिका से सावधान "उपन्यास के लेखक। अमर उजाला समेत कई अखबारों से होते हुए अब जनसत्ता कोलकाता में ठिकाना।

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कविता कृष्‍णपल्‍लवी

एक बार फिर पुरानी कहानी दुहरायी गयी। चुन्‍दुर दलित हत्‍याकाण्‍ड के सभी आरोपी उच्‍च न्‍यायालय से सुबूतों के अभाव में बेदाग़ बरी हो गये। भारतीय न्‍याय व्‍यवस्‍था उत्‍पी‍ड़ि‍तों के साथ जो अन्‍याय करती आयी है, उनमें एक और मामला जुड़ गया। जहाँ पूरी सामाजिक-राजनीतिक व्‍यवस्‍था शोषित-उत्‍पीड़ि‍त मेहनतकशों, भूमिहीनों, दलितों (पूरे देश में दलित आबादी का बहुलांश शहरी-देहाती मज़दूर या ग़रीब किसान है) और स्त्रियों को बेरहमी से कुचल रही हो, वहाँ न्‍यायपालिका से समाज के दबंग, शक्तिशाली लोगों के खिलाफ इंसाफ की उम्‍मीद पालना व्‍यर्थ है। दबे-कुचले लोगों को इंसाफ कचहरियों से नहीं मिलता, बल्कि लड़कर लेना होता है। उत्‍पीड़न के आतंक के सहारे समाज में अपनी हैसियत बनाये रखने वाले लोगों के दिलों में जबतक संगठित जन शक्ति का आतंक नहीं पैदा किया जाता, तबतक किसी भी प्रकार की सामाजिक बर्बरता पर लगाम नहीं लगाया जा सकता।

चाहे बथानी टोला हो, लक्ष्‍मणपुर बाथे हो, मियांपुर हो, मिर्चपुर हो, करमचेदु हो या चुन्‍दुर हो, सभी जगह जिन दलितों की हत्‍याएँ हुईं और उत्‍पीड़न हुआ, वे ग़रीब मेहनतकश थे और इन अत्‍याचारों को अंजाम देने वाले सवर्ण या मध्‍य जातियों (हिन्‍दू जाति व्‍यवस्‍था में शूद्र माने जाने वाले) के पूँजीवादी भूस्‍वामी और कुलक थे। गाँवों में यही पूँजीवादी व्‍यवस्‍था के प्रमुख अवलम्‍ब हैं, सभी पूँजीवादी पार्टियों में इस वर्ग की शक्तिशाली 'दबाव-लाबियाँ' काम करती हैं और देश की अधिकांश क्षेत्रीय पार्टियों का मुख्‍य सामाजिक आधार प्राय: पिछड़ी/मध्‍य जातियों के इन्‍हीं खुशहाल मध्‍यम और धनी मालिक किसानों में है। ग्रामीण दलित आबादी (जो ज्‍यादातर ग्रामीण सर्वहारा और अर्द्धसर्वहारा हैं) के सुव्‍यवस्थित उत्‍पीड़न की निरंतरता के पीछे जो वर्गीय अन्‍तर्वस्‍तु मौजूद है, उसे समझना बहुत ज़रूरी है। यह पुराने सामंती उत्‍पीड़न से भिन्‍न परिघटना है। यह एक नयी पूँजीवादी परिघटना है। आज के जिन सवर्ण पूँजीवादी भूस्‍वामियों के पूर्वज सामंती भूस्‍वामी थे, केवल वही गाँव के ग़रीब दलितों पर अत्‍याचार नहीं करते। उनसे अधिक बड़े पैमाने पर (शूद्र मानी जाने वाली) मध्‍य जातियों के वे धनी और खुशहाल मालिक  किसान आज दलित ग़रीबों का उत्‍पीड़न करते हैं जो सामन्‍ती भूमि संबंधों के ज़माने में काश्‍तकार और रैयत के रूप में खुद हीसामंती उत्‍पीड़न के शिकार थे। (ज्‍यादातर) सवर्ण सामंतों के आर्थिक शोषण के साथ ही जातिगत आधार पर उत्‍पीड़न के विरुद्ध भी वे आवाज उठाते रहते थे। प्राय:, कई इलाकों में, सवर्ण वर्चस्‍व के विरुद्ध दलित जातियों के साथ इन शूद्र जातियों/किसान जातियों/मध्‍य जातियों की एकता भी बनती थी। लेकिन काश्‍तकारों के मालिक किसान बनने और भूमि सम्‍बन्‍धों के बदलने के साथ ही जातियों की सामाजिक स्थिति में बदलाव आये । मध्‍य जातियों के उच्‍च मध्‍यम और धनी किसान अब अपने खेतों में उन्‍हीं दलित मज़दूरों की श्रमशक्ति खरीदकर बाजार के लिए उत्‍पादन करने लगे थे, जो पहले सामंतों की ज़मीन पर बेगारी करते थे या बेहद छोटे काश्‍तकार हुआ करते थे। मध्‍य जातियों के मालिक किसानों की आर्थिक स्थिति में परिवर्तन के साथ सामाजिक स्थिति में भी परिवर्तन हुआ। जाति व्‍यवस्‍था के पदसोपानक्रम में अपने को सवर्णों के समकक्ष दर्शाने के लिए तरह-तरह के नये सामाजिक आचार और 'एसर्शन' की प्रक्रिया शुरू हुई, जिसे समाजशास्‍त्री 'संस्‍कृताइजेशन' का नाम  देते हैं। आर्थिक धरातल पर जो नया अन्‍तरविरोध जन्‍मा था, उसी के अनुरूप सामाजिक धरातल पर भी मध्‍य जातियों के साथ दलित जातियों के अन्‍तरविरोध तीखे हो गये। अपनी आर्थिक ताकत के हिसाब से मध्‍य जातियों के कुलक गाँवों में पूँजीवादी राजनीति के मुख्‍य आधार बन गये। राष्‍ट्रीय स्‍तर की बुर्ज़ुआ पार्टियों में उनके दबाव समूह अस्तित्‍व में आये और क्षेत्रीय पार्टियों पर उनका दबदबा कायम हुआ। बिहार और उत्‍तर-प्रदेश के कुर्मी, कोइरी, यादव, सैंथवार, लोध और जाट, आंध्र  के रेड्डी और कम्‍मा, कर्नाटक के लिंगायत और वोक्‍कालिंगा, हरियाणा के जाट, यादव, गुज्‍जर, पंजाब के जाट, तमिलनाडु के थेवर और वान्नियार, गुजरात के पटेल, महाराष्‍ट्र के मराठा आदि ऐसी मध्‍य जातियाँ हैं, जिनसे कुलकों-पूँजीवादी फार्मरों का नया वर्ग मुख्‍यत: संघटित हुआ। इन जातियों के जो ग़रीब और निम्‍न मध्‍यम किसान हैं, वे भी वर्गीय चेतना के अभाव और आर्थिक प्रश्‍नों पर वर्ग संघर्ष की अनुपस्थिति के चलते जातिगत ध्रुवीकरण के शिकार हो जाते हैं और ग़रीब दलितों के विरुद्ध सजा‍तीय धनी मालिक किसानों के साथ खड़े हो जाते हैं। बुर्जुआ संसदीय राजनीति इस ध्रुवीकरण का भरपूर लाभ उठाती है, और फिर अपनी पारी में इस स्थिति को मजबूत बनाने का भी काम करती है।

जाहिर है कि दलित उत्‍पीड़न की इस वर्गीय अन्‍तर्वस्‍तु को समझकर ही, इसके विरुद्ध संघर्ष की सही रणनीति तय की जा सकती है और वर्गीय लामबंदी की राह की जातिगत ध्रुवीकरण जनित बाधाओं को तोड़ा जा सकता है, अन्‍यथा मंचों पर चढ़कर मनु और ब्राह्मणवाद के विरुद्ध आग उगलकर फिर अपने अध्‍ययन कक्षों में घुस जाने का काम तो बुद्धिजीवी अगियाबैताल बातबहादुर करते ही रहते हैं। आज दलित प्रश्‍न पर जितने सेमिनार, शोध-अध्‍ययन आदि होते हैं, उतना शायद किसी और प्रश्‍न पर नहीं, पर ठोस व्‍यावहारिक कार्यकारी नतीजों तक पहुँचने का कोई ईमानदार प्रयास नहीं दीखता। बुनियादी सवाल  यह है कि गै़र दलित जातियों के ग़रीब तबकों के जातिगत पूर्वाग्रहों-संस्‍कारों और मिथ्‍याचेतना को तोड़कर उन्‍हें दलित मेहनतकश आबादी के साथ कैसे खड़ा किया जाये। जाति आधार पर संगठित होकर दलित उत्‍पीड़न का कारगर प्रतिकार नहीं कर सकता। दलित उत्‍पीड़न के प्रश्‍न को समाज के सभी उत्‍पीड़ि‍तों का प्रश्‍न कैसे बनाया जाये, यही यक्ष प्रश्‍न है।

आन्‍ध्र प्रदेश में सत्‍ता में जब जिस मध्‍य जाति के कुलकों और क्षेत्रीय पूँजीपतियों की दख़ल ज्‍यादा रही, तब उस जाति के लोगों ने दलितों का अधिक उत्‍पीड़न किया, क्‍योंकि उन्‍हें परोक्ष सरकारी संरक्षण का पूरा भरोसा रहता था। 1991 में चुन्‍दुर (गुण्‍टुर जिला) में रेड्डियों ने आठ दलितों की हत्‍या तब की थी, जब राज्‍य में जनार्दन रेड्डी की सरकार थी। जब एन.टी.रामाराव सत्‍ता में थे तो उनके दामाद के गाँव करमचेदु में कम्‍मा धनी किसानों ने छ: दलितों की बेरहमी से हत्‍या कर दी थी। सत्‍यनारायण ज‍ब प्रदेश कांग्रेस के अध्‍यक्ष थे तो बोत्‍सा वासुदेव नायडू के नेतृत्‍व में तूर्पु कापुओं के तलवारों और कुल्‍हाड़ों से लैस गिरोह ने श्रीकाकुलम जिले के लक्ष्‍मीपेट गाँव में कई दलितों की हत्‍या की थी और कई को निर्मम यंत्रणा का शिकार बनाया था।

जातिगत उत्‍पीड़न के राजनीतिक समर्थन का प्रतिकार करने के लिए दलित ग़रीब प्राय: इस या उस दलित बुर्जुआ पार्टी या नेता की ओर देखते हैं, जो पिछले 60-65 वर्षों के दौरान हमेशा ही पूँजी के टुकड़खोर चाकर और ठग साबित होते रहे हैं। इसलिए बुनियादी सवाल यह हैं कि दलित मेहनतकशों की भारी आबादी दलित राजनेताओं और दलित कुलीन मध्‍यवर्ग की भितरघाती मदारी जमातों के मोहपाश से मुक्‍त होकर उस पूँजीवादी व्‍यवस्‍था को ध्‍वस्‍त करने वाली क्रान्तिकारी राजनीति के परचम को कब और कैसे उठायेगी, जो जातिगत उत्‍पीड़न  का आधार है!