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Thursday, April 30, 2015

जनता परिवार से परेशान संघ परिवार

जनता परिवार से परेशान संघ परिवार


जनता परिवार में छह दलों समाजवादी पार्टी, जेडीयू, आरजेडी, जेडीएस, आईएनएलडी और समाजवादी जनता पार्टी के विलय का एलान हो गया है। मुलायम सिंह यादव के घर पर शरद यादव, नीतीश कुमार, लालू प्रसाद यादव, एचडी देवेगौड़ा, अभय चौटाला सहित अन्य नेताओं की बैठक हुई, जिसके बाद जनता परिवार के विलय की घोषणा करते हुए शरद यादव ने कहा कि मुलायम सिंह यादव नए दल के अध्यक्ष होंगे। पार्टी के नाम और चुनाव चिन्ह की घोषणा बाद में की जाएगी।

यह नया राजनीतिक घटनाक्रम ऐसे समय में सामने आया है, जब कुछ ही महीने बाद बिहार विधानसभा का चुनाव है, जबकि 2017 में उत्तर प्रदेश विधानसभा का चुनाव होना है। दोनों ही राज्यों में जनता परिवार मोदी जी की भारतीय जनता पार्टीके लिए मुसीबत बनने जा रहा है। जम्मू-कश्मीर से मोदी के रथ को लगाम लगाने का जो सिलसिला शुरू हुआ वह यूपी-बिहार में भी दोहराया जाता दिखाई दे रहा है। उप्र और बिहार में हुए उपचुनावों में भाजपा को इसी जनता परिवार ने जबर्दस्त पटखनी दी थी। यही कारण है कि भाजपा इस विलय का जहां मजाक उड़ा रही है, वहीं उसके माथे पर पसीना साफ देखा जा सकता है।

विलय के बाद जहां आरजेडी अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव ने हममें से किसी के मन में कोई अहंकार नहीं है। वहीं बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कहा कि नया दल देश की राजनीति को नई दिशा देगा। तो जनता परिवार विलय पर मुलायम सिंह यादव का कहना है कि, हम अपने स्तर पर आपकी समस्याओं का समाधान करेंगे, चाहे सरकार करे या न करे। यह एका मजबूत रहेगा और जनता की भावनाओं का ख्याल रखेगा। जनता परिवार विलय पर मुलायम सिंह यादव ने मीडिया को संबोधित करते हुए कहा कि, जनता की मांग थी कि हम एक हो जाएं।

बीजेपी ने जनता परिवार के विलय पर चुटकी लेते हुए कहा है कि एक म्यान में तीन-चार तलवार कैसे रह सकती हैं। तो केंद्रीय मंत्री और लोक जनशक्ति पार्टी (एलजेपी) सुप्रीमो रामविलास पासवान ने जनता परिवार के छह दलों के विलय पर कटाक्ष करते हुए कहा कि अगर सौ लंगड़े मिल जाएं, तो भी वे पहलवान नहीं बन सकते हैं।

भाजपा और उसके सहयोगी दलों की यह प्रतिक्रियाएं, दर असल उसकी बेचैनी को ही प्रदर्षित कर रही हैं। और अगर भाजपा परेशान नहीं है तो उसे कोई प्रतिक्रिया देने की आवश्यकता ही नहीं थी। जनता परिवार के विलय पर भाजपा की परेशानी को समझा जा सकता है। दरअसल मोदी सरकार का राज्यसभा में अल्पमत है, जिसके कारण उसके पूंजीपतियों को फायदा पहुंचाने वाले और देश की बहुमूल्य संपदा की खुली लूट की छूट देने वाले विधेयक राज्यसभा में अटक जाते हैं। इससे निजात पाने का उसके पास एक ही रास्ता बचता है कि वह बिहार, बंगाल और उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्यों में सत्ता में आए और राज्यसभा में अपना बहुमत बनाए। तभी भाजपा उन पूंजीपतियों की खुले हाथ से सेवा कर पाएगी, जिन्होंने उसे चुनाव में आर्तिक सहयोग दिया था और मीडिया के सहयोग से मोदी लहर पैदा की थी। यह जनता परिवार दरअसल भाजपा के इस एजेंडे में बाधक बन सकता है। हालांकि जनता परिवार के लोगों का अतीत भी इस संबंध में दागदार रहा है और उन्होंने भी न केवल एनडीए और यूपीए दोनों सरकारों में पूंजीपतियों के एजेंडे कभी खुलकर और कभी लुके-छिपे लागू करवाए हैं बल्कि परोक्ष-अपरोक्ष रूप से भाजपा का समर्थन भी किया है। नीतीश और शरद यादव तो बाकायदा लगभग दो दशक तक भाजपा के सहयोगी रहे हैं, चौटाला और देवेगौड़ा के पुत्र भी भाजपा के सहयोगी रहे हैं। हां लालू प्रसाद यादव और मुलायम सिंह यादव कभी भी भाजपा के सहयोगी नहीं रहे। लेकिन फिलहाल जो परिस्थितियां बन रही हैं उनमें शायद इन लोहिया और जयप्रकाश के चेलों को यह आभास हो गया है कि अगर एकजुट न हुए तो हमेशा के लिए खत्म हो जाएंगे। यही कारण है कि विलय करने वाले सभी दलों ने अपने अहम को किनारे रखकर यह कदम उठाया है। इस विलय के पीछे की असल मंशा को मीडिया से कहे गए मुलायम सिंह के शब्दों से समझा जा सकता है कि एक नया काम बताइए जो इस नई सरकार ने किया हो। बड़े बड़े वायदे किए, लेकिन कर कुछ नहीं पाए। यह पहली सरकार है जिसने विपक्षी दलों की राय नहीं ली।

हालांकि मुलायम सिंह यादव को इस विलय की आवश्यकता नहीं थी, क्योंकि उत्तर प्रदेश में न तो नीतीश या लालू अथवा चौटाला या देवेगौड़ा का कोई वजूद है न असर लेकिन बिहार के संदर्भ में यह विलय काफी महत्वपूर्ण है। फिर भी अगर मुलायम सिंह इस विलय पर तैयार हुए हैं तो गंभीरता को समझा जा सकता है, जबकि शेष सभी नेताओं ने वो चाहे लालू हों या नीतीश शरद या देवेगौड़ा, सभी ने मुलायम सिंह यादव को अतीत में जबर्दस्त व्यक्तिगत नुकसान पहुंचाए हैं।

जनता परिवार के विलय पर बीजेपी की टिप्पणियों पर पलटवार करते हुए बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कहना कि छह पार्टियों का एक साथ आना बीजेपी के लिए 'विनाशकारी' साबित होगा, लफ्पाजी नहीं है। नीतीश के वक्तव्य से सहमत हुआ जा सकता है कि, बीजेपी को यह पता नहीं है कि वह जिस विलय का मजाक उड़ा रही है, वह उनके लिए विनाशकारी साबित होगा। वास्तव में, उनके नेता मजाक नहीं उड़ा रहे हैं, वे विलय के चलते अपने अवचेतन मस्तिष्क में मौजूद भय का प्रदर्शन कर रहे हैं।

दरअसल जनता परिवार उन पिछड़ी जातियों का प्रतिनिधित्व करता है जिनका उत्तर प्रदेश, बिहार, हरियाणा में बोलबाला है। आजादी के बाद से पिछड़ी जातियां इन समाजवादी धारा के दलों के साथ एकजुट रही हैं। "अजगर" यानी अहीर-जाट-गूजर-राजपूत का समीकरण गैर-कांग्रेसवाद का आधार स्तंभ रहा है। विगत लोकसभा चुनाव में भाजपा ने नरेंद्र मोदी को अपना चेहरा बनाकर इन पिछड़ी जातियों में सेंध लगाने में सफलता पाई थी, लेकिन बहुत जल्द ही पिछड़ी जातियों को भाजपा की असलियत समझ आने लगी है। भाजपा की इस जनता परिवार से असल परेशानी का सबब यही है कि इस परिवार के विलय के बाद अकेले यादव और कुर्मी ही एकजुट हो गए तो अल्पसंख्यक मतों के साथ मिलकर यह भाजपा को यूपी और बिहार दोनों राज्यों में धूल चटा देंगे। यही कारण है कि भाजपा अपनी परेशानी का इजहार इस विलय का मजाक उड़ाकर कर रही है तो दूसरी ओर उसके दो सहारे रह गए हैं एक- असदउद्दीन ओवैसी की एमआईएम और दूसरे अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी। भाजपा इन दोनों दलों को प्रमोट करके इस जनता परिवार का नुकसान करके अपनी बढ़त बनाने का जुगत बना रही है। लोकसभा चुनाव में भी अरविंद केजरीवाल ने भाजपा की अप्रत्यक्ष मदद की थी और महाराष्ट्र के नतीजे बताते हैं कि वहां भी भगवा झंडा फहरवाने में ओवैसी की एमआईएम की महत्वपूर्ण भूमिका रही। हाल ही में महाराष्ट्र में भाजपा-शिवसेना ने ओवैसी को आगे करके कांग्रेस के नारायण राणे जैसे मजबूत नेता को हरवा दिया।

भाजपा की परेशानी यह भी है कि उसने जिस तरह से सीबीआई के जरिए ममता बनर्जी को साधा, उसका वह तरीका अब इन जनता परिवार के नेताओं को साधने में कामयाब नहीं हो सकता। यदि ये अलग-अलग होते तो सीबीआई के सहारे सबको नियंत्रित किया जा सकता था, लेकिन एकजुट होने पर अब सीबीआई का इस्तेमाल करना थोड़ा मुश्किल हो जाएगा। पासवान का कहना ठीक है कि सौ लंगड़े मिल जाएं, तो भी वे पहलवान नहीं बन सकते हैं, लेकिन मुश्किल यह है कि छह पहलवानों के मिलने पर सीबीआई भी लंगड़ी हो सकती है।

अमलेन्दु उपाध्याय

 

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About The Author

अमलेन्दु उपाध्याय लेखक वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक हैं। हस्तक्षेप.कॉम के संपादक हैं।

नेपाल-मलबे के ढेर में से इंसानी अंग दिखते हैं तो मजबूत कलेजे वाले का भी दिल काँप जाता है

नेपाल-मलबे के ढेर में से इंसानी अंग दिखते हैं तो मजबूत कलेजे वाले का भी दिल काँप जाता है


नई दिल्ली। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के आव्हान पर समाजवादी पार्टी के युवा कार्यकर्ताओं की एक टोली राहत सामग्री लेकर नेपाल पहुंच गई है। इस दल में युवा नेता अजीत प्रताप सिंह भी शामिल हैं, जो ग्राउंड जीरो से लगातार अपडेट कर रहे हैं। अजीत प्रताप सिंह फ्रांस में भले-खासे फ्रोफेशनल थे, नौकरी छोड़कर अखिलेश यादव के सिपाही बन गए। काठमांडू से अजीत प्रताप सिंह की पाती-

जब हम इंडिया मे थे तो फेसबुक पर RIP लिखना या We are with Nepal लिखना बहुत आसान लग रहा था।

लेकिन जब यहां आकर देखा तो ढहे हुये मकान, बाहर निकलने के लिये बस स्टेशन पर लगी लंबी लाइनें, राहत सामग्री की गाड़ियों को ताकते बच्चे, सीमित संसाधनों के बीच लगातार राहत कार्य में लगी देशी विदेशी संस्थायें और सबसे दुखद कि इन मलबों के बीच में अपनो को ढूंढती आसुओं भरी बेबस आंखें।

जब गिरे हुये मलबे के ढेर में से इंसानी अंग दिखते हैं तो मजबूत से मजबूत कलेजे वाले का भी दिल काँप जाता है।

आज सबसे पहले बस अड्डे पर गये जहां सोनौली एआरएम परशुराम पांडे के मुस्तैदी से ड्यूटी करने के बावजूद यूपी बिहार और आन्ध्र प्रदेश के लोगों का हुजूम था, जिसे हमारे नेता सुनील सिंह यादव और उदयवीर जी ने अपनी सूझ-बूझ से निपटाया।

काठमांडू से आठ किलोमीटर दूर बसा हुआ खूबसूरत कस्बा साकू पूरी तरह तबाह हो गया था, तीस के आस-पास मौतें हुई थीं और लगभग इतने ही लापता थे, रोती हुई औरतों और बच्चों के आंसू कलेजे को हिला देते थे।

वहां अग्रजों के कुछ स्थानीय संपर्कों और "दलित आदिवासी सेवा संस्थान" के युवा साथियो के बताने पर एक बहुत ही खूबसूरत, लेकिन उससे भी दुर्गम और उससे भी ज्यादा तबाह "लफसिफेरी" की तरफ बढ़े जो कभी अपनी दुर्गमता की वजह से माओवादियों और उनके नेता प्रचंड का एक सुरक्षित पनाहगार हुआ करता था। आज पूरी तरह बर्बाद था। खुद कंधे पर राहत सामग्री उठाये फिट भर के रास्ते पर चलकर जब युवा साथी ऊपर पहुंचे तो वहॉ के निवासियों की आंखों में भारत के प्रति कृतज्ञता साफ दिख रही थी।

अजीत प्रताप सिंह

काठमांडू से

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नेपाल का आंखों देखा हाल

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नेपाल से ग्राउंड जीरो रिपोर्ट

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नेपाल- हर तरफ तबाही

 

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नेपाल- ग्राउंड जीरो रिपोर्ट

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नेपाल में अखिलेश यादव की लाल सेना

 

 

राष्ट्र संकट में,संकट में मनुष्य और प्रकृति भी सारे झंडे,सारे रंग मई दिवस के मुक्ति महोत्सव पर राष्ट्रीय झंडे में मिला दें और मुकाबला करें इस केसरिया कारपोरेट कयामत का जो भारतीय जनता को गुलामी की जंजीरों में बांधकर भारत माला विदेशी पूंजी के गले में सजाने लगी कि मेहनतकशों,कर दो बाबुलंद ऐलान मई दिवस से फिर आजादी की लड़ाई जारी है पलाश विश्वास

राष्ट्र संकट में,संकट में मनुष्य और प्रकृति भी

सारे झंडे,सारे रंग मई दिवस के मुक्ति महोत्सव पर राष्ट्रीय झंडे में मिला दें और मुकाबला करें इस केसरिया कारपोरेट कयामत का

जो भारतीय जनता को गुलामी की जंजीरों में बांधकर भारत माला विदेशी पूंजी के गले में सजाने लगी

कि मेहनतकशों,कर दो बाबुलंद ऐलान

मई दिवस से फिर आजादी की लड़ाई जारी है

पलाश विश्वास

Appeal for May Day Celebration in Bengali


हम अंध राष्ट्रवादी नहीं हैं ठीक वैसे ही जैसे हम धर्मोन्मादी फासिस्ट नहीं हैं।लेकिन इस संकट की घड़ी में जब कारपोरेट मुनाफे के लिए बाकायदा संसदीय सहमति से वोटबैंक साधने की शर्त पूरी करके कारपोरेट राजनीति संसदीय सहमति से राज्यसभा में अल्पमत केसरिया कारपोरेट सरकार को दो तिहाई बहुमत की अनिवार्यता  के बावजूद संविधान संशोधन तक पास करके मुक्तबाजारी नरमेध राजसूय के तहत पूरे देश को वधस्थल बनाकर विदेशी पूंजी और विदेशी हितों के हवाले सोने की चिड़िया करने खातिर मनुस्मृति कायदे कानून पास कर रही है एक के बाद एक।


हमारे पास राष्ट्र के इस संकट पर राष्ट्रीय झंडा लेकर सड़क पर उतरने के सिवाय कोई और विकल्प अनिवार्य जन जागरण अभियान के जरिये आजादी की लड़ाई शुरु करने का नहीं है।क्योंकि पाखंडी राजनीति कारपोरेट फंडिंग के जरिये चलती है और कारपोरेट जनसंहार के खिलाफ उसे खड़ा नहीं होना है।यह लड़ाई आखिरकार आम जनता को ही अपनी आजादी के लिए सत्ता वर्ग के खिलाफ लड़नी है।


हम अंध राष्ट्रवादी नहीं हैं ठीक वैसे ही जैसे हम धर्मोन्मादी फासिस्ट नहीं हैं।लेकिन इस संकट की घड़ी में जब निरंकुश बेदखली अभियान जारी है।बाबासाहेब को ईश्वर बनाकर उनके संविधान की हत्या हो रही है रोज रोज और ब्रिटिश राज में बाहैसियत श्रमिक कानून जो पास कराये बाबासाहेब ने वे सारे एक मुश्त खत्म कर दिये गये संसदीय सहमति से।विदेशी निवेशकों को 6.4 बिलियन कर छूट,कारपोरेट टैक्स में कटौती ,कारपोरेट कर्ज और उनपर पिछला सारा कर्ज माफ और किसी की भी नौकरी स्थाई नहीं।डिजिटल इंडिया के आईटी सेक्टर में रोजाना हजारों युवाओं को रोजगार से बाहर करने के लिए पिंक स्लिप दिया जा रहा है।


देश बेचो का इतना पुख्ता इंतजाम है कि मेकिंग इन अब देशी विदेशी पूंजी की बहार के मध्य देश व्यापी सलवा जुड़ुम है या देश बेचो विशेष सैन्य अधिकार कानून है।जनता के मुद्दों पर कहीं जन सुनवाई किसी भी स्तर पर नहीं है।न लोकतंत्र हैं और न कानून का राज।मेहनतकश जनता को बंधुआ मजदूर बनाकर बहुराष्ट्रीय पूंजी के लिए सबसे सस्ता श्रम बाजार बनाया जा रहा है इस देश को,जहां मेहनतकश तबके को न रोजगार और न आजीविका का अधिकार है।


संगठित क्षेत्रों में भुखमरी के हालात पैदा किये जा रहे हैं।न स्थाई नौकरियां हैं,न नियुक्तियां है,भाड़े के मजदूर बन गये हैं हमारे बच्चे,जिनकी नौकरियां कभी भी खत्म की जा सकती है।


हमारी जमीन हमसे छिन सकती है।हमारे चारों ओर आपदाओं ने हमें घेर रखा है।


जल जंगल जमीन प्रकृति और पर्यावरण की नियामतों से बेदखल करने के लिए दुनियाभर के हथियारों का जखीरा है यह मुक्त बाजार और हमारे पास लड़ने के लिए राष्ट्रीय झंडा के अलावा कुछ भी नहीं है।


नेपाल में हम तक काठमाडू से खबरें आ रही है।ग्राउंडजीरों का हाल जानने के लिए आनंदस्वरुप वर्मा,अभिषेक श्रीवास्तव और अमलेंदु की अगुवाई में एक टीम नेपाल को जा रही है जबकि वहां पहुंच चुके इमरान इदरीस का आंखों देखा हाल ह लगा रहे हैं।

गौरतलब है कि उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के आव्हान पर समाजवादी पार्टी के युवा कार्यकर्ताओं की एक टोली राहत सामग्री लेकर नेपाल पहुंच गई है। इस दल में युवा नेता इमरान इदरीस भी शामिल हैं, जो ग्राउंड जीरो से लगातार अपडेट कर रहे हैं।


नेपाल में संचार नेटवर्क तहस नहस है और वहां का प्रमुक अखबार कांतिपुर समाचार भी अपडेट नहीं हो पा रहा है।हम कांतिपुर रेडियों से अपडेट ले रहे हैं।गुरखाली हिंदीभाषियों के लिए खासकर उत्तराखंड,सिक्किम और बंगाल के गोरखा इलाकों के लिए अभूझ नहीं है।मराठी और गुजराती की तरह लिपि देवनागरी है.एकबार पढना शुरु करें तो आपको हकीकत समझ में आने लगेगा।


हम भाषाओं की दीवारों को गिराने की मुहिम चला रहे हैं तो सारे माध्यम हमारे लिए जनसचार माध्यम हैं और सारी कलाओं और विधायों के बारे में हमारी एकमात्र कसौटी उसकी जनपक्षधरता है।बाकी कालजयी शस्त्रीय साहित्य कला से हमारा कुछ लेना देना नहीं है।


काठमांडु से बाहर हमारे जो मित्र नेपाल भर में है,वे कितने सकुशलहैं,हम बता नहीं सकते।उनसे हमारा संपर्क नहीं हो पा रहा है।मीडिया सिर्फ काठमांडु और पर्यचन स्तल में तब्दील एवरेस्ट तक फोकस कर रहा है।वैसे ही जैसे केदार जलसुनामी के बाद बाकी हिमालय को हाशिये पर रखकर केदार घाटी का युद्धक कवरेज होता रहा है।हूबहू नेपाल में इस वक्त वही पीपली लाइव है।


नेपाल में राहत और बचाव की राजनीति और राजनय का प्रचार खूब है लेकिन नेपाल ही नहीं,उत्तराखंड,सिक्किम और बंगाल के साथ साथ तिब्बत में मची तबाही की ओर किसी का ध्यान नहीं है।बाकी नेपाल की सिसकियां,कराहें किसी को सुनायी नहीं पड़ रही है,वे भी हमारे डूब में समाहित हैं।यह डूब आखिरकार यह महादेश मुक्तबाजार है।


बिहार और यूपी के मैदानी इलाकों में मरनेवालों की संख्या गिनते हुुए हम भूल रहे हैं कि भारत माला के जरिये यह कारपोरेट केसरिया सरकार सीमा सुरक्षा के नाम पर बिल्डर माफिया के हवाले करने जा रहा है देश के सबसे संवेदनशील इलाके ताकि वहां फिर टिहरी बांध और ब्रह्मपुत्र बांध जैसे परमाणु बम लगा दिये जाये भूकंप और आपदाओं के नये सिलसिले के लिए।


हम सुनामी,बाढ़,दुष्काल,भुखमरी,समुद्री तूफान की यादें साल गुजकरते न गुजरते भुला देने केअभ्यस्त हैं और केदार जलसुनामी में मरे लापता स्वजनों की स्मृतियां भी भुला चुके हैं।


काठमांडु की दिल दहलाने वाली तस्वीरे भी बहुत जल्दी परदे से उतर जाने वाली हैं और नया,और बड़ा भूकंप बिना आवाज मौत की तरह कभी न कभी हमें मोक्ष दिलाने वाला है क्योंकि इस सीमेंट के जंगल में भूकंप रोधक नया बिजनस शुरु होने के बावजूद इस बहुमंजिली सीमेंट की सभ्यता में नैसर्गिक कुछ भी बचा नहीं है।


अर्थशास्त्री और मीडिया जनसंहार के मोर्चे पर गोलबंद हैं और विध्वंसक एटमी पूंजीवादी विकास से प्रकृति और मनुष्य के सर्वनाश के इस जनसंहरी राजसूय के पुरोहित नये पुरोहित बन गये हैं भूगर्भ शास्त्री विशेषज्ञवृंद भी जो हजारों करोड़ साल का भूगर्भीय इतिहास तो बता रहे हैं,लेकिन हिमालय के उत्तुंग शिखरों और समुंदर की गहराइयों में,हवाओं पानियों में इस कायनात को तबाह करने के चाकचौबंद इंतजाम के तहत लगे परमाणु बमों और न्यूक्लियर रिएक्टरों के जनसंहारी कारपोरेट केसरिया फासिस्ट युद्धतंत्र के विकास के नाम विनाश आयोजन पर सिरे से सन्नाटा बुनते चले जा रहे हैं।


निजीकरण को विनिवेश के बाद अब पीपीपी माडल कहा जा रहा है।बैंकों के पढ़े लिखे महाप्रबंधक सत्र के अफसरान तक को मालूम नहीं है कि बाबासाहेब की वजह से बने रिजर्व बैंक के सारे अधिकार सेबी को स्थानांतरित हैं और रिजर्व बैंक के सभी स्ताइस विभागों का प्रबंधन कारपोरेट लोगों के हाथों में है।


बैंक कानून बदलने के बाद भूमि अधिग्रहण कानून,खनन अधिनियम,वनाधिकार कानून समेत  तमाम कायदे कानून बदलकर करीब दो हजार कानूनों को खत्म करने की कवायद करके बिजनेस फ्रेंडली सरकार जो केसरिया कारपोरेट कयामत ला रही है,उससे किसान और मजदूर ही तबाह नहीं होंगे,संगठित क्षेत्रों के मलाईदार लोगों की भी शामत आने वाली है।मसलन सरकारी सारे बैंकों को होल्डिंग कंपनी बनाने की तैयारी है।


दस पंद्रह साल पहले एअर इंडिया के जो अफसरान कर्मचारी हमें सुनने को तैयार नहीं है,थोड़ा उनका हाल जान लीजिये।एफडीआई विनिवेश राज में किसी सेक्टर में कोई कर्मचारी और बड़का तोप अफसर उतना ही सकुसल है,जितने बंधुआ मजदूर में तब्दील देश की बाकी आबादी।मेहनतकशो के सात लामबंद हुए बिना उनकी भी शामत बस अब आने ही वाली है।


रेलवे के कर्मचारियों को मालूम ही नहीं है कि पीपीपी विकास और आधुनिकीकरण के बहाने सारे के सारे बुलेटउन्हीके सीने में दागकर रेलवे का निःशब्द निजीकरण हो गया।


संपूर्ण निजीकरण के इस कारपोरेट केसरिया एजंडा में मारे जाएंगे वे बनिया सकल,खुदरा कारोबारी जिनकी हड्डियां और खून का कार्निवाल आईपीएल ईटेलिंग महमहा रहा है।अरबों जालर की विदेशी कंपनियों के मुकाबले बिजनेस और इंडस्ट्री एकाधिकारवादी बड़े औद्योगिक घरानों के अलावा किसी माई के लाल के लिए असंभव है और टैक्स होलीडे उन्हीं के लिए।आपके यहां तो छापे ही छापे।


महिलाओं के लिए समांती मध्ययुग की दस्तक है।हिंदूकोड बिल के विरोधी सत्ता में है जो बलात्कार को अपराध नहीं मानते,धर्म और संस्कृति मानते हैं मनुस्मृति के मुताबिक।मनुस्मृति के मुताबिक हर स्त्री शूद्र और यौनदासी है।हमने इस पर अंग्रेजी में विस्तार से लिखा है।कृपया हमारी माताें,बहनें जो अंग्रेजी जानकर,पेशेवर जिंदगी में महिला सशक्तीकरण की खुसफहमी हैं,वे गौर करें की यह फासीवाद कैसे बलात्कार संस्कृति का ही पर्याय है।


महानगरों की सेहत के लिए गांवों से लेकर घाटियों तक,किसानों मजदूरों से लेकर स्त्रियों,युवाओं,बच्चों और कारोबारियों और पढ़े लिखे कर्मचारियों तक को बलि चढ़ाया जा रहा है जबकि जनपक्षधर बंधुआ मजदूरों में तब्दील मीडिया के चूजा सप्लायक चूजा शौकीन तबके से अलग ईमानदार लोगों की उंगलियां काट ली गयी हैं और उनकी जुबान पर तालाबंद है।


यह अघोषित आपातकाल है और हम सभी लोग मनुस्मृति गैस चैंबर में सांस सांस के लिये मर मर कर जी रहे हैं।


तो मेहनकश तबके को अस्मिताओं के राजनीतिक तिलिस्म से बाहर निकालने के लिए,पूरे देश के देशभक्त जनगण को देश बचाने की मुहिम में शामिल करके देश बेचो केसरिया कारपोरेट माफिया राष्ट्रद्रोही गिरोह के साथ सड़क पर मोर्चा जमाने के लिए उनके पारमाणविक युद्ध तंत्र के खिलाफ भारत के राष्ट्रीय झंडे को अपना हथियार बनाने के अलावा हमारे पास कोई विकल्प है ही नहीं।


हाथ कंगन को आरसी क्या,पढ़े लिखे को फारसी क्या,कृपया गौर करेंः


सेज अभियान अब स्मार्टसिटी अभियान है।इकोनामिक्स टाइम्स की इस रपट पर गौर करें ते समझ लीजियेगा ,किसके फायदे के लिए किसकी गरदनें दो दो इंच छोटी कर दी जा रही है और फिर भी कहा जा रहा है,दो बालिश्त और कम।

Apr 30 2015 : The Economic Times (Kolkata)

A Smart Boost for D-St







Investors perturbed over falling Sensex and Nifty may get some solace by focussing on another number likely to be of even greater interest in the coming months and years. This is the combined market cap of cos in cement, construction, consumer electronics, housing finance & cement. At `8.64 lakh crore, the combined value of these cos is about ten times the combined net profit of the Nifty for the year ended March 2015. And the reason why this is interesting should be obvious from the decision taken by the cabinet on Wednesday to clear a massive project to build smart cities.Analysts and fund managers believe that spending boost by govts & local bodies will benefit cos in these six sectors leading, in turn, to higher sales and earnings. Valuations of some of these stocks have become cheap in the recent ongoing stock market slide. Rajesh Mascarenhas brings you some stocks identified by brokerages as among the major beneficiaries of the smart cities programme.







http://epaperbeta.timesofindia.com/index.aspx?eid=31817&dt=20150430


झन् झन् धेरै शव फेला पर्दै महाभूकम्पबाट मारिनेको संख्या ५ हजार ३ सय १० पुगेको छ ।

झन् झन् धेरै शव फेला पर्दै


महाभूकम्पबाट मारिनेको संख्या ५ 


हजार ३ सय १० 


पुगेको छ ।

पाँच दिन अघिको महाभूकम्पबाट मारिनेको संख्या ५ हजार ३ सय १० पुगेको छ । बुधबार मात्रै विभिन्न प्रभावित स्थानका खण्डहरबाट ९ सय शव निकालिए ।  तीमध्ये राजधानीका विभिन्न स्थानबाट  ४४ शब फेला परेका हुन । 

सशस्त्र प्रहरी बलले राजधानीका १६ स्थानबाट २८ जनाको शब फेला पारेको जनाएको छ । यस्तै नेपाली सेनाले भारत, चीन र पोल्याण्डको उद्धार तथा खोजी समहुसंग मिलेर १६ शब राजधानीमै फेला पारेको हो ।

 प्रहरी महानिरीक्षक उपेन्द्रकान्त अर्यालले सुरक्षा निकायबीच समन्वय र सक्रियताले मृतकहरुको शब फेला परेको बताए। 

'उपत्यका भित्र र बाहिर नै उद्धार गर्न नसकिएका प्रसस्त स्थानहरु छन्,त्यहा खोजी गर्न समय लाग्छ,' अर्यालले भने ।

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उद्धारभन्दा प्रचार बढी

उद्धारभन्दा प्रचार बढी


काठमाडौं, वैशाख १६ - भुकम्पपीडित नेपालीको खोज, उद्धार र राहतको लागि सबैभन्दा ठूलो उद्धार टोली पठाएको छ, दक्षिणी छिमेकी भारतले । भारतीय प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदीले शनिबार भुकम्प गएको एक घण्टाभित्रै आपतकालीन बैठक राखेर तत्काल उद्धारका लागि ४ वटा नेसनल डिजास्टर रेस्पोन्स फोर्स (एनडीआरएफ) टोली नेपाल पठाउने निर्णय गरेका थिए । त्यसयता मंगलबारसम्म हेलिकप्टर, आवश्यक सामाग्रीसहित एक हजारभन्दा बढीको संख्यामा भारतीय उद्धारकर्ता नेपाल आइसकेका छन् । तर जुन रुपमा खोजी तथा उद्धार हुनुपर्ने हो, त्यो हुन नसेको नेपाली सैनिक स्रोतले बतायो । भारतीय टोलीले जुन परिमाणमा उद्धार कार्य गरेको छ, त्योभन्दा बढी प्रचारबाजी गरेकोमा नेपाली पक्ष पनि असन्तुष्ट बनेको छ । उच्च सैनिक स्रोतका अनुसार दुई साताअघि सगरमाथा आरोहणमा आएका आफ्नो ३९ जनाको सैन्य टोलीको उद्धारका लागि पनि भारतीय पक्षको चासो चुलिएको हो । त्यसैले उसले ठूलो संख्यामा फौज तथा ६ वटा एमआई–१७ हेलिकप्टर तत्कालै पठायो । यसअघि नेपाली सेनासंग सयुक्त रुपमा सगरमाथा आरोहण गर्थे भारतीय सैनिकले, यसपटक उनीहरु 'नागरिक' को हैसियतमा आरोहणका लागि आएका थिए । तीमध्ये कतिपय सम्पर्कबाहिर रहेकाले उद्धारका लागि आएको ६ मध्ये ३ हेलिकप्टर उनीहरुकै खोजीमा सगरमाथा आधार शिविरतर्फ उडाइएको छ। भारतीय पक्ष सगरमाथा आहोरणमा गएका आफ्ना सैनिकबारे खासै बोल्न चाहेन । के आरोहणमा गएका सैनिक सम्पर्कविहीन रहेका हुन् भनेर पटकपटक जिज्ञासा राखेपछि नेपालस्थित दूतावासका प्रवक्ता अभय कुमारले छोटो प्रतिक्रिया दिादै भने, 'जानकारी गराईएअनुसार उनीहरु सुरक्षित छन् ।' आफ्ना सैनिकको उद्धारमा बढी ध्यान केन्द्रित गर्दा भारतीय टोलीले आफ्नो क्षमता र बन्दोबस्तीअनुरुप अपेक्षाकृत काम गर्न नसकेको नेपाली पक्षको बुझाई छ ।   भुकम्पपीडितको उद्धारका क्रममा पनि भारतीय सेनाले आफ्ना सन्चारमाध्यमका प्रतिनिधि बढी बोक्दा क्षमताअनुसार प्रभावकारी रुपमा काम गर्न सकेको छैन । भुकम्पको समाचार संकलनका लागि विभिन्न भारतीय सन्चारमाध्यमबाट करिव डेढ सय सन्चारकर्मी काठमाडौं आएका छन् । उनीहरु भारतीय हेलिकप्टर चढेर विभिन्न जिल्लामा पुगी प्रत्यक्ष प्रशारण गर्ने, फुटेज र समाचार संकलन गर्ने गरिरहेका छन् । स्रोतका अनुसार प्रत्येक हेलिकप्टरमा ६/७ जनासम्म भारतीय सन्चारकर्मी समाचार संकलनका लागि उड्ने गरेका छन् । 'बोकेर लगेका सन्चारकर्मीलाई समाचार संकलनका लागि केही समय दिनुपर्ने हुादा उडान संख्या नै कम हुने गरेको छ,' स्रोतले भन्यो, 'अर्कोतर्फ आधा जति सिट सन्चारकर्मीले ओगट्ने भएकाले कम संख्यामा मात्र घाइतेको उद्धार भइरहेको छ ।'  त्यहीकारण नेपाली सेनाले ४ वटा हेलिकप्टरबाट सोमबार ६५६ जनाको उद्धार गर्दा भारतीय सेनाको ३ हेलिकप्टरले जम्मा ११८ जनाको मात्र उद्धार गर्योर । मंगलबार पनि भारतीय सेनाको हेलिकप्टरले ३२ जनाको मात्र उद्धार गरेको सैनिक जनसम्पर्क निर्देशनालयको विज्ञप्तीमा उल्लेख छ । कति संख्यामा भारतीय सैनिक आए भन्ने तथ्यांक पनि सरकारसंग छैन । अन्तर्राष्ट्रिय विमानस्थलस्रोतका अनुसार हवाई मार्गबाट मात्रै एक हजारभन्दा बढी भारतीय सैनिक काठमाडौं ओर्लिएका छन् । सडकमार्गबाट पनि ५ वटा ट्रक र ४ वटा बोलेरो जिपमा करिव सय जना भारतीय सैनिक भित्रिएका छन् । 'कति जना,कसरी आयौ भनेर उनीहरुलाई कसले सोध्ने ?' एक सुरक्षा अधिकृतले भने । सैनिक प्रवक्ता सहायकरथी जगदीशचन्द्र पोखरेलले भने ६५० को संख्यामा मात्र भारतीय सैनिक आएको तथ्यांक आफूहरुसंग रहेको बताए । विमानस्थल सुरक्षास्रोतले त त्योभन्दा धेरै आएको बताएको छ त भन्ने प्रश्नको उत्तरमा उनले भने, 'कुनै टोलीलाई प्रतिस्थापन गर्न आएको हो कि ?' विमानस्थल सुरक्षास्रोतका अनुसार भारतीय सेनाको विशेष विमानले शनिबारबाटै हरेक दिन ४ वटा उडान भर्ने गरेको छ । ती विमानले उताबाट आउादा सन्चारकर्मी र यताबाट फर्किदा नेपालस्थित भारतीय नागरिकलाई लाने गरेको छ । भारतीय सन्चारमाध्यमले नेपालको भुकम्पबारे व्यापक कभरज गरिरहेका छन् । ती कभरेजमा भारतले मात्र खोजी, उद्धार र राहतको सबै जिम्मेवारी बहन गरेको प्रस्तुति दिने गरिएको छ । 'नेपालके दर्दमे भारत बना हमदर्द' जस्ता विशेष कार्यक्रम तथा समाचार सामाग्री बनाइने गरेको छ ।   यता भुकम्पको चौथो दिन मंगलबारसम्म भारतका साथै चीन, पाकिस्तान, इजरायल, टर्की, नेदरल्याण्ड, श्रीलंका, रुस, बंगलादेश, स्पेन, पोल्याण्ड, सिंगापुर, थाइल्याण्ड, अमेरिका, जापान, मलेसिया, कतारसहितका २० भन्दा बढी मुलुकबाट ४ हजारभन्दा बढी उद्धारकर्ता र राहत सामाग्री आएका छन । तर उचित समन्वय र प्रभावकारी परिचालन हुन सकेको छैन । कतिपय टोली उपत्यका र आसपासमात्र सीमित छन् । त्यसैले भुकम्पबाट अति प्रभावित सिन्धुपाल्चोक, गोरखा, धादिङ, रसुवा, दोलखाका विकट बस्तीमा उद्धार टोली र राहत सामाग्री पुग्न सकेको छैन । प्रहरी उच्चस्रोतका अनुसार आन्तरिक समन्वय पनि ठोस् रुपमा हुन सकेको छैन । विदेशी सम्मिलित उद्धार टोलीलाई सघाउन जाादा सेनाले फकाईदिने गरेको प्रहरी र सशस्त्र प्रहरीको गुनासो छ । तर सैनिक प्रवक्ता पोखरेलले भने प्रक्रियाका कारण सुरुमा विदेशी उद्धारकर्तासंगको समन्वयमा केही समस्या देखिए पनि हाल त्यो पूर्णरुपमा समाधान भएको बताए । आन्तरिक समन्वयको हकमा उनले भने, 'स्थानीय तहमा बुझाईको फरकले एकाध स्थानमा केही समस्या देखिएको होला, अधिकांश स्थानमा त्यस्तो छैन ।' - See more at: http://www.radiokantipur.org/kantipur-diary/15052/%E0%A4%89%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%A7%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%AD%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A4%BE-%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%9A%E0%A4%BE%E0%A4%B0-%E0%A4%AC%E0%A4%A2%E0%A5%80/#sthash.VDlI5gPi.dpuf

Wednesday, April 29, 2015

Appeal for May Day Celebration in Bengali

Appeal for May Day Celebration in Bengali




नेपाल यसकारण भूकम्पिय जोखिममा

नेपाल यसकारण भूकम्पिय 


जोखिममा



नेपाल 'मेन हिमालयन थ्रस्ट' अन्र्तगत पर्छ । यो थ्रस्टकै कारण नेपाल संधै भूकम्पिय जोखिममा परेको हो । यसले हिमालय क्षेत्रमा ठुल्ठुला भूकम्प ल्याउने गर्छ । ग्लोबल पोजिसनिङ सिस्टम अध्ययन गर्दा के देखिन्छ भने हाम्रो 'हाइयर (उच्च) हिमालय'को अग्रभागदेखि चुरे पहाडसम्मको क्षेत्र ब्लक छ । यसकारण यहाँ धेरै इनर्जी संचित हुन्छ । इन्डियन प्लेट र तिब्बती प्लेट बिचको जब संघात (कोलिजन) हुन्छ, यो संजित इनर्जीमा सिधै असर गर्छ र तलबाट प्लेट माथितिर ठेलिन्छ । यसरी प्लेट माथितिर ठेलिंदा इनर्जी थेग्न नसकेर रिलिज हुन्छ र भूकम्प आउँछ । प्लेट तल नझरी माथि सर्दा हुने भूकम्पलाई थ्रस्ट टाइपको भूकम्प भनिन्छ । विसं १९९० को भूकम्प पनि यस्तै प्रकारको हो । 

जर्मनीको 'स्प्रिङगर' जर्नलले 'माउन्टेन हेजार्ड एण्ड डिजास्टर रिस्क रिडक्शन' अध्ययन छापेको छ, गएको डिसेम्बरमा । यस अन्र्तगत हामीले काठमाडौं आसपास ६ प्वाइन्ट ३ रेक्टर स्केलको भूकम्प गयो भने के हुन्छ ? भनेर अनुसन्धान गरेका थियौं । यसबाट नयाँ तथ्य के पत्ता लाग्यो भने काठमाडौं उपत्यकाको खुमलटार, ठमेल, महाराजगञ्ज, चावहिल, सुन्धारा, नयाँ बानेश्वर, बुङमती, बल्खु, कोटेश्वर क्षेत्रमा सबैभन्दा बढि भूकम्पीय तरंगले असर पैदा गर्छ । यो क्षेत्र अरु क्षेत्रको तुलनामा आठ गुणा बढि तरंगले असर गर्ने देखिन्छ अध्ययन अनुसार । विसं १९९० को महाभूकम्पसित तुलना गरेर हेर्दा पनि यो मिल्न गयो । शनिबारको महाभूकम्प असरको बास्तविक तथ्य त थाहा पाउन बाँकी नै छ, तर मेरो बिचारमा यी क्षेत्रहरु निकै नै बढि प्रभावित भएको हुनुपर्छ । 

'इन्जिनियरिङ सिस्मोलजी' माथि मैले इटलीबाट पोस्ट डक्टरेट गरेको हुँ । त्यो अनुसन्धानको आधारबाट हेर्दा काठमाडौं भ्यालीसँगै वरिपरिको क्षेत्र झन ठुलो भूकम्पिय जोखिममा रहेको देखिन्छ । काठमाडौंको भूकम्पलाई वान डी (डाइमेन्सन) हैन टु डीको आधारमा अध्ययन गर्नुपर्ने हुन्छ । अर्थात यहाँ आउने भूकम्पको दुई आयाम देखिन्छ । भूकम्पको तरंगको शक्ति एकअर्कामा खप्टिएर छेउछाउको पहाडमा गएर ठोक्किन्छ र फेरि फर्किन्छ । यसो हुँदा भूकम्पको ठुलो विनास काठमाडौं आसपासको क्षेत्रमा झन हुन्छ । मेरो अनुमानमा यो भूकम्पले वरिपरिको क्षेत्रमा ठुलो विनास ल्याएको हुनुपर्छ । क्षति विवरण आउनै बाँकी छ । हेरौं । 

यसअघि ६ प्वाइन्ट ३ रेक्टर स्केलको भूकम्प आयो भनेपनि काठमाडौंको त्रिभुवन विमानस्थल ध्वस्त हुन्छ भन्ने अनुमान गरिन्थ्यो । हाम्रो अध्ययनले चाहिँ त्यो देखाएन । केही अघि हामीले नेपाल जिआलजिकल सोसाइटीको इन्टरनेश्नल कंग्रेसमा यससम्बन्धी कार्यपत्र नै प्रस्तुत गरेका थियौं । आजको संयोग कस्तो भने भूकम्पको झट्का महसुस गरिहँदा यही रिसर्चको प्राप्तिहरुबारे लेख्दैथिएँ । छिट्टै यो तयार भएर इन्टरनेश्नल जर्नलमा आउँदैछ ।

भूकम्प गएर पनि अहिले अरु स-साना भूकम्पको महसुस भइरहेको छ नि । प्लेटहरुको मुख्य दरारमा अहिले पनि मुभमेन्ट भइरहेको छ । यो थामिएको छैन । यसकारण साना साना झट्का महसुस भएको हो । 

अबको सावधानी   

अहिले मुलुकभर कोलाहल छ । सबैजना त्रासका विच बाटामा, खाली चौर र चोकमा निस्केका छन् । क्षति विवरण अपडेट हुने क्रम जारी छ । सम्पर्कहरु विच्छेद भएका छन् । जतिबेला भूकम्प आउँछ र संकटमा पर्छौं, त्यतिबेलामात्रै हामी सावधानीका अनेक पक्षबारे बहस थाल्छौं । यो प्रवृत्ति निकै गलत हो । नेपाल अहिले मात्रै हैन, पहिलेदेखि नै भूकम्पिय जोखिम क्षेत्र थियो । यो हामी सबैलाई थाहा छ । तर यहाँ समस्याको निराकरणतिर धेरै काम गर्नुपर्ने देखिन्छ । 

सबैभन्दा पहिले त अव्यवस्थित बस्ती तथा घर निर्माणलाई कडाईका साथ रोख्नुपर्छ । हामीसँग  'भूकम्प प्रतिरोधी भवन निर्माण आचार संहिता' त छ, तर यसको पालन भएको देखिंदैन । घर बनाउँदा नक्शामा भूकम्प प्रतिरोधी बनाएर मात्रै हुन्न । यसको लागि सरकारी निकायले कडा अनुगमन गर्नुपर्छ । कारबाही गर्नुपर्छ । धेरैले नक्शामा मात्रै मिलाएका छन् । अचेल मलाई आफ्नै र्छिदा पनि चिहानतिर छिरिरहेको हो कि भन्ने आभास हुन्छ ।  

अर्को पक्ष गम्भीर चाहिँ के हो भने यो आचारसंहिता नै रिभिजन गर्नुपर्छ । अहिलेको आचार संहिता नेपालको माटो सुहाउँदो छैन । हिमालयमा जाने नेपालको भूकम्पलाई आधार मानि यो आचार संहिता बनाएकै हैन । भवन निर्माण आचार संहिता नगरपालिकामात्रै अनिवार्य गरेर हुन्छ ? जबकी गाउँमा पनि उत्तिकै ठुला-ठुला क्षति भइरहेका छन् । गाउँमा पनि आचार संहितालाई सहज तरिकाले अनिवार्य बनाउनुपर्छ । 

अनि यस्ता घर बनाउनेलाई राज्यको तर्फबाट इन्सेन्टिभ पनि दिनुपर्छ । ट्याक्स छुट दिएर हुन्छ या अरु नै कुनै तवरले । तर उनीहरुलाई प्रोत्साहन चाहिन्छ । सभा सेमिनार मात्रै गरेर केही हुनेवाला छैन । व्यवहारमा जानुपर्यो । अनिमात्रै प्रकोप विरुद्ध लड्ने शक्ति निर्माण हुनसक्छ । चेतना मात्रै भएर हुँदैन । 

चेतना निर्माणमा नेपालमा एनजिओहरुले राम्रै गरेको मान्न सकिन्छ । तर उनीहरु आफै व्यवहारिक छैन । साइन्स एकातिर छ व्यवहार अर्कोतिर । भूकम्पमाथि काम गर्ने ठुला एनजिओहरुमै भूकम्पविदहरु छैनन् । इन्जिनियहरुबाट उनीहरु काम चलाइराखेका छन् । यस्ता इन्जिनियरहरु कि उनीहरुको क्षमताको कुनै परिक्षा नै हुँदैन । जसरी मेडिकल काउन्सिलले डाक्टरको योग्यता जाँच लिन्छ, प्रमाणिकरण गर्छ, इन्जिनियरिङ काउन्सिलले यो गर्नुपर्छ कि पर्दैन ? के इन्जिनियरको चाहिँ योग्यताको प्रमाणिकरण चाहिंदैन ? 

अर्को महत्वपुर्ण पक्ष के हो भने घर बनाउने जमिनको प्रकृतिमा बढि ध्यान दिनुपर्छ । नेपालमा अहिलेसम्म भूकम्पिय तरंगसँग जमिनले कसरी प्रतिक्रिया देखाउँछ भन्ने हिसाबले माटोको अध्ययन भएकै छैन । कपन एरियामै यो देखियो आज । यो महाभूकम्पमा कपन एरियाका धेरैजसो घरहरु भासिएका छन्, भत्केका भने छैन । यो माटोको प्रकृतिको कारण भएको हो । यसको अध्ययन नै हुँदैन हामी कहाँ । यसको लागि माइक्रो स्टडी हुनुपर्छ । 

हामीसँग भु-उपयोग नीति छ तर यसको लागु हुनसकेको छैन । यतातिर पनि ध्यान दिनुपर्छ । अलिकति खाली जमिन देख्यो कि दश फिटको बाटो राखी प्लटिङ गरिहाल्ने लहर चलेको छ । यो निकै गम्भीर विषय हो । जथाभावी हाउजिङ निर्माणले हामीलाई भविष्यमा सही दिशातिर लाँदैन । त्यसकारण भु-उपयोग नीति कार्यान्वयन आवश्यक छ । यी सबै हुन सके- प्राकृतिक घटना त रोक्न सकिंदैन, तर यसबाट हुने क्षति भने धेरै नै कम गर्न सकिन्छ ।

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