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Thursday, May 16, 2013

Why are secular-democratic and left forces of India silent on “Shahbag Movement’’

Why are secular-democratic and left forces of India silent on "Shahbag Movement''


A Brief Report of NSI Organised Public Meeting on "Shahbagh Movement: A beacon of hope for South Asia" in Delhi

Public Meeting on "Shahbagh Movement  Organised by NSIWelcoming the Shahbagh movement of Bangladesh- initiated by youth bloggers wherein hundreds and thousands of people have hit the streets of Dhaka, demanding strict punitive action against war criminals and their organisations, namely Jamaat-e-Islami — and how they are trying the reinvigorate the four basic principles of its formation namely democracy, secularism, socialism and nationalism, Mr Sumit Chakravarty, editor of 'Mainstream' underlined its historic significance for our times.

Chakravarty was speaking at a seminar on 'Shahbagh Movement: A Beacon of Hope for South Asia' organised by New Socialist Initiative, here in Delhi on the 14 Th May at Gandhi Peace Foundation.

According to Chakravarty clearly, at a time when the rest of South Asia is witnessing the rise of communal mobilizations, Bangladesh's Shahbagh Movement stands apart as a unique and ground-breaking venture, for it has demanded that secular principles and ethos alone should guide and govern all politics. Thus, this movement is qualitatively and politically far more mature than, say, movements which arose from the womb of Tahrir square of Cairo.

A background note circulated by New Socialist Initiative, which is a newly emergent platform of the left, which recently had organised its founding conference in Delhi, for the seminar narrated how it is important not only to understand the significance of Shahbagh movement but also to understand why secular-democratic and left forces of India have till now maintained a studied silence on this historical movement

Speaking on the occasion, famous author and activist Noor Zaheer said we should not limit ourselves to comprehend the struggle at the level of trial of war criminals only. In fact, the youth who has been joined by great masses of the people have understood that what lies in future for them if they do not fight fundamentalist forces who are trying to impose a very bigoted view in running of the government. People have become conscious that if the religious extremist forces are not dealt with then future of women and future of minorities would be quite bleak.

Special Correspondent of 'Dawn' Javed Naqvi said that we are getting garbled messages from Shahbagh. He added that this sudden worldwide interest in Jamaat-e-Islami should also be explored and one should also look at the possibility of legitimate grounds of problematic people/organisations. Underlining the impact of economic policies peddled by the likes of IMF/World Bank, he appealed to the audience to explore the stand of Jamaat-e-Islami on IMF and that of Awami League on the same issue.

feminist activist Kalyani Menon Sen, who had been recently to Bangladesh and was direct witness to the goings on in Dhaka narrated her experience of the events and explained how the movement emerged when people felt that the war crimes tribunal is not giving exemplary punishment to war criminals who at the time of the liberation struggle/war of the then East Pakistan (now Bangladesh)—colluded with the Pakistan army and committed untold acts of atrocities on the general public.

The seminar started with a sad note due to the news of Asghar Ali Engineer's demise and the house observed one minute of silence to remember the deceased.

Bonojit Hussain, of New Socialist Initiative, conducted the seminar and gave a vote of thanks at its conclusion.

आस्था और विश्वास को कट्टरता तक पहुँचने के पहले ही कुचल देना चाहिये

आस्था और विश्वास को कट्टरता तक पहुँचने के पहले ही कुचल देना चाहिये

रचना पाण्डेय

 

भारत के संविधान में राष्ट्र को एक धर्मनिरपेक्ष गणतन्त्र घोषित किया गया है। इसमें स्पष्ट कहा गया है कि राज्य और राजनीति को सभी प्रकार के धार्मिक विश्वासों से दूर रहना चाहिये। व्यक्ति समाज की वास्तविक इकाई है परन्तु आज हम जिस राजनैतिक परिवेश में जी रहे हैं वहाँ आम आदमी और उसके सवालों से कोई भी पार्टी सरोकार नहीं रखती। आज व्यक्ति हाशिए पर है। दुर्भाग्यवश देश की राजनीति प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से धर्म को वोट बैंक की राजनीति के रूप में इस्तेमाल कर रही है। इससे देश में समाज के बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक समुदाय के बीच की खाई चौड़ी हो गयी है, जिसे पाटना लगभग नामुमकिन है और जो खतरनाक साबित हो रही है। सभी मुद्दों पर धार्मिक रंग चढ़ा कर देखा जाने लगा है। नेताओं ने धर्म को अपना हथियार बना रखा है। धर्म की आड़ में ही जातिवादी भेद-भाव, आरक्षण, आतंकवाद, नकसलवाद आदि के मसले उभरते हैं। इतिहास गवाह है कि अब तक देश में जितने भी दंगे-फसाद हुये हैं वे साम्प्रदायिक रहे हैं, चाहे सन् 1947 का भारत –पाक विभाजन की त्रासदी हो, चाहे सन् 1984 के सिख विरोधी दंगे हों, चाहे कश्मीर का मुद्दा हो, चाहे बाबरी मस्जिद विध्वंस हो या गुजरात का गोधरा काण्ड या नरोदा पाटिया काण्ड हो, मुम्बई बम धमाका हो, तसलीमा नसरीन या सलमान रश्दी का मामला हो या फिर हाल ही का सम्प्रदाय विशेष द्वारा राष्ट्र गीत के बहिष्कार का मामला हो, सभी के द्वारा देश का माहौल खराब किये जाने की मंशा ही रही है।

रचना पाण्डेय, लेखिका कोलकाता विश्वविद्यालय में शोधार्थी हैं।, Rachana Pandey

रचना पाण्डेय, लेखिका कोलकाता विश्वविद्यालय में शोधार्थी हैं।

धर्म वो नहीं जो घृणा कराता है और लड़ाता है। नैतिकता से हटकर की जाने वाली राजनीति अनिष्टकारी है। धर्म जब कट्टरता में तब्दील होता है तो वह हमेशा ही विनाश लाता है। आतंकवाद के विध्वंसकारी रूप के पीछे भी साम्प्रदायिक तत्व ही हैं। धर्म का वास्तविक अर्थ प्रेम, सद्भावना, समन्वय है जो व्यक्ति और राष्ट्र को एक सूत्र में बाँध कर रखता है। देश की राजनीति लोगों में अलगाव और घृणा का प्रचार कर रही है जिससे कि राजनीतिक दलों का उल्लू सीधा होता रहे। विकास और सुविधाओं से ध्यान हटाने के लिये राजनीतिक दल धर्म की राजनीति का सहारा लेते हैं, आम जनता को मूर्ख बनाते हैं। नेता जानते हैं कि भारतीय अपने धर्म को लेकर अत्यधिक भावुक होते हैं और यही वह मुद्दा है जिसके आधार पर फूट डालकर राज किया जा सकता है। आज के सन्दर्भ में उत्तर प्रदेश की राजनीति विशुद्ध जातिवादी दाँव-पेंच के भँवर में फँस चुकी है, पहले वोट के लिए दलितों को रिझाया गया और जब वे उनके चँगुल में फँस गये तब अब समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी दोनों ब्राम्ह्णो को रिझाने में लगे हैं। यहाँ तक कि दलितों के समर्थन में आगे आये दलित नेताओं ने आंबेडकर की नीतियों से हटाकर दलितों को केवल वोट बैंक में तब्दील कर दिया।

मुद्दा चाहे जो भी हो, देशहित को अनदेखी कर कोई समझौता नहीं किया जाना चाहिये। लोगों को धर्म के नाम पर अपनी दाल गलाने वालों के खिलाफ खुलकर सामने आना होगा। आम आदमी को अपने अधिकारों और दायित्वों के प्रति जागरूक होने की आवश्यकता है। धर्म, सत्य, अहिंसा और नैतिकता का पाठ पढ़ाता है और इसे इसी रूप में इसे  अपनाना चाहिये। धर्म को सही अर्थ में न समझने की भूल करने वाले ही घृणा का बीज बोकर अधर्म की राजनीति करते हैं। आस्था और विश्वास को कट्टरता और कूटनीति तक पहुँचने के पहले ही कुचल देना चाहिये।

http://hastakshep.com/bol-ki-lab-azad-hain-tere/2013/05/16/faith-and-trust-must-be-crushed-before-reaching-fanatical#.UZTjOaKBlA0

अयोध्या कर्मस्थली थी इंजीनियर की

अयोध्या कर्मस्थली थी इंजीनियर की


डॉ. असगर अली इंजीनियर के निधन पर शोक सभा

आफाक उल्लाह

 

डॉ. असगर अली इंजीनियर के निधन पर शोक सभा  अयोध्या (फैजाबाद)। सर्वधर्म सद्भाव केन्द्र,  सर्जुकुंज, दुरही कुआ, अयोध्या में अयोध्या की आवाज़ और अवध पीपुल्स फोरम के सयुक्त तत्वाधान में प्रगतिशील सामाजिक चिन्तक एव वैकल्पिक नॉबेल पुरुस्कार (राईट लिविलीहुड) से सम्मानित डॉ. असगर अली इंजीनियर के निधन पर शोक सभा का आयोजन किया गया। शोक सभा में युगल किशोर शरण शास्त्री ने इंजीनियर साहब को याद करते हुये कहा कि उनके द्वारा अयोध्या को साझी विरासत का केन्द्र के रूप में पूरे विश्व में पहचान मिलनी चाहिये, क्यों कि यहाँ सभी धर्मों से सम्बंधित स्मारक और धरोहर मौजूद हैं। यदि अयोध्या की साझी विरासत पहचान मजबूत होती है तो साम्प्रदायिक शक्तियों के हौसले पूरे देश में पस्त होंगे। उन्होंने बताया कि 2002 में इंजीनियर साहब ने पहली बार सामाजिक कार्यकर्ताओं के साथ अयोध्या में बैठक की थी। उसके बाद से लगातार वो अयोध्या-फैजाबाद में कई बार यहाँ आकर संघर्ष में हम लोगों की सरपरस्ती करते थे।

साकेत महाविद्यालय के डॉ. अनिल सिंह ने कहा कि उनकी आत्मकथा "लिविंग फेथ" को पढ़ने से ज्ञात होता है कि हिन्दुस्तान-पाकिस्तान के बँटवारे ने उनके जीवन में काफी असर डाला, जिससे उनको सामाजिक दिशा में काम करने की प्रेरणा मिली। अपने संघर्ष के प्रारम्भिक दिनों में असगर साहब मार्क्सवादी विचारधारा से उसकी नास्तिकता के कारण परहेज़ करते थे, किन्तु बाद में मार्क्सवादी विचारधारा ने उनका दिल जीत लिया क्योंकि उनको मार्क्सवादी और इस्लामिक मूल्यों में समानता नज़र आने लगी थी। उन्हें महसूस होता था कि मार्क्सवादी होने के लिये नास्तिक होना ज़रूरी नहीं है। 2008 में साकेत कॉलेज अयोध्या में उन्होंने साम्प्रदायिक और साझी विरासत पर एक हफ्ते की कार्यशाला का आयोजन किया जो काफी सफल रहा था और अयोध्या और आस-पास के जिलों के लोगों को उनके सानिध्य का अवसर मिला था। उनके चले जाने से धर्मनिरपेक्ष और लोकतान्त्रिक मूल्यों के लिये काम करने वाले लोगों ने पूरे देश में अपना अभिभावक खो दिया है। शोक की इस घड़ी में हम उनके बेटे और परिवार के साथ हैं।

अब्दुल लतीफ़ ने कहा कि इंजीनियर साहब अपने व्यापक सामाजिक सरोकारों, धार्मिक सुधार पर जोर देने की प्रवृत्ति और साम्प्रदायिकता के खिलाफ अथक संघर्ष ने उनको दाउदी बोहरा समुदाय के नेता से एक अखिल भारतीय व्यक्तित्व प्रदान किया।

आफाक ने कहा कि धार्मिक यथास्थितिवाद और महिलाओं की स्थिति में सुधारों के प्रति प्रगतिशील नज़रिये के कराण उनके ऊपर कई बार व्यक्तिगत हमले भी हुये। फिर भी वो अपनी सोच पर अटल रहे।

इरम सिद्दीकी ने कहा कि हमने डॉ. इंजीनियर के साथ लखनऊ, वाराणसी, भोपाल में आधा दर्जन कार्यशालाओं में उनके साथ भागेदारी की। हमने हमेशा यही पाया कि महिलाओं के प्रति उनके नजरिये में दकियानूसी नहीं थी बल्कि वो महिलाओं के प्रति लोकतान्त्रिक और प्रगतिशील विचार रखते थे।

शोक सभा में दिनेश सिंह, आजिज़ उल्लाह, डॉ. महादेव प्रसाद मौर्या, गुफरान सिद्दीकी, संजय मिश्र, आलोक निगम, भंते राठ्पला, रामानंद मौर्या,  विनय श्रीवास्तव, मो. इमरान, आदि लोगों ने अपने विचार व्यक्त किये। शोक सभा के अन्त में दो मिनट का मौन रखते हुये श्रद्दांजलि अर्पित की गयी।

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गीतिका मर गई, मिरासी मगर जिंदा हैं !

गीतिका मर गई, मिरासी मगर जिंदा हैं !

जगमोहन फुटेला


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गोपाल कांडा के हाथ में हाथ हैवाह संजय अरोड़ा की क्या बात है!

 

 

कोई औरत किसी मरे हुए आदमी के हाथ पे लगा खून ले के अगर अपनी मांग में भर ले तो उसे क्या कहेंगेविधवापत्नीकुलच्छिनी यापापिनी कुछ भी.... और पूरे शहरसमाज और मानवता को कलंकित कर के जाने वाले व्यक्ति को चंद टुकड़ों की खातिर जो उसे बचाते,छुपाते या उस की महिमा गाते फिरें तो फिर उसे क्या कहेंगेएक शब्द में कहें तो... संजय अरोड़ा.

 


संजय मेरे लिए वे गोपाल कांडा के कर्मकांडों का गुणगान करने वालों के प्रतीक हो गए हैं. उमेश जोशी से शुरू करते हैं.

 

उमेश जोशी तब भी गोपाल कांडा के चैनल में मुख्य संपादक के रूप में सब तरह से सुख भोग रहे थे जब गीतिका रोग से ग्रसित कांडा 'न मानने' पर उस का दुबई तक पीछा करते घूम रहे थे. तब भी कि जब दिल्ली पुलिस को कांडा की तलाश थी. कौन बेवकूफ मानेगा कि कांडा चैनल की जिस वैन में छुप के दिल्ली की सड़कों पे चलते छुपते फिरे उसका आना जाना जोशी की जानकारी में नहीं था. लेकिन कांडा के रुपयों में इतनी चमक है कि जोशी को किसी जलालत से कोई फर्क नहीं पड़ता. गीतिका भी किसी की बेटी है इस का ख्याल खुद तीन बेटियों वाले जोशी को कभी नहीं आया. कांडा  के अंदर चले जाने के बाद नहीं. सुप्रीम कोर्ट तक से उस की ज़मानत रद्द हो जाने के बाद भी नहीं. जिन के लिए गांधी के चित्र वाले नोट और किसी की इज्ज़त आबरू लूट लेने वाले चरित्र में कोई फर्क नहीं होता वे पत्रकारिता के नाम पर गुलामी और हर तरह की बेगारी करते रहने को अभिशप्त होते हैं.

 

कांडा के राग दरबारियों में दूसरे मिरासी हैं दीपक अरोड़ा. पहले, जिन्हें न या कम पता हो, उन्हें बता दें कि ये मिरासी होते कौन हैं. शायद कभी आप ने प्लास्टिक की पन्नी हाथ में ले के किसी लंबी कमीज़ और ढीली पगड़ी वाले किसी ढपली या डमरू हाथ में लिए बंदे को अपने साथी को घटिया घटिया व्यंगों पर उस के सीने पे वो पन्नी मारते देखा हो. पाकिस्तान के साथ लगते प्रांतों और इलाकों में ऐसे जोड़े आम होते हैं. किसी के भी यहां भी शादी, बेटा या मुंडन हो तो इनको खबर इंटरनेट की स्पीड से भी पहले पंहुच जाती है. बल्कि वे ध्यान रखते हैं कि शादी साल भर पहले हुई तो बच्चा हुआ या होने वाला होग. ऐसे ही बेटा हुए इतना समय हो गया तो अब मुंडन फलां दिन होना चाहिए. ऐसे मिरासियों को पालने की परंपरा भी रही है. रेडियो, टीवी, इंटरनेट और हरियाणा न्यूज़ जैसे चैनल तब कहां थे? राजे रजवाड़े अपने प्रचार के लिए इन्हीं मिरासियों पे निर्भर करते थे. सो, राजे रजवाड़े तो चले गए मगर मिरासी अभी भाई हैं. तो, गोपाल कांडा के दूसरे मिरासी हैं, दीपक अरोड़ा. जिस हिंदुस्तान में अखबारी पत्रकार भी टीवी की विधा में आ के फिट और कामयाब नहीं हो पाए उस टीवी में दीपक अरोड़ा का अनुभव जीरो है. कहने को उन के पास अपने भाई की कृपा से एक अख़बार का दिया हुआ शायद पत्रकार वाला कार्ड भी था. जो जारी हो ही जाता है बहुत से अखबारों में अगर आप ठीक ठाक सा विज्ञापन ला के दे सकने की हालत में हों. बहरहाल, दीपक एक एड एजेंसी-कम-इवेंट कंपनी चलाते थे जब उन की गोपाल कांडा के चैनल में सीओओ जैसे पद पर नियुक्ति हुई. न, किसी मुगालते में न रहिएगा. दीपक कोई सीए, एमबीए या किसी एमएनसी की महा प्रबंधकी छोड़ के आए हुए प्रोफेशनल भी नहीं हैं. उन की सब से बड़ी या कहें कि एकमात्र योग्यता ये है कि वे उन संजय अरोड़ा के छोटे भाई हैं जो सिरसा में काफी संख्या में बिकने वाले अख़बार के सिरसा नरेश हैं. वे अपने आप को ब्यूरो चीफ बताते हैं. हालांकि सारी दुनिया के किसी भी अख़बार या टीवी में संपादक की तरह ब्यूरो चीफ भी होता सिर्फ एक है. फिर भी मान लीजिए कि वे सिरसा के ब्यूरो चीफ हैं. लेकिन ये भी उन के लिए छोटी बात चीज़ है. वे असल में बहुत बड़ी, तोप चीज़ हैं.

 

अख़बार में आप का नामफोटो छपता हो तो शोहरत आप को सिर्फ अपने लेखन या विचारों से नहीं मिलतीटीवी में दिखते रहने कीवजह से भाव तो हिंदुस्तान में वोडाफोन वाले कुत्ते का भी बढ़ गया थासंजय अरोड़ा का भी बढ़ा और उन्हें एक ग़लतफ़हमी भी हो गई.वे मुख्यमंत्री की भेजी कार पे चढ़ गएहरियाणा को चार जोनों में बांट के सरकार ने पत्रकारों की पूछ पड़ताल करने की जिम्मेवारियांसौंपी थीसंजय अरोड़ा धन्य हो गएवे घूम घूम कर पत्रकारों के सहलाते रहेहालांकि इस जलालत में दिल को तसल्ली देने के लिएएक सांत्वना थी कि जाते वे जिस कार पे थे उस पे विभाग की तरफ से जारी होने वाली परमिशन  होने के बावजूद वे लाल बत्ती लगालेते थे.

 

सरकार ने उन्हें काना करना था. कर लिया. ऐसा कुछ था भी नहीं कि जो आईएएस अफसरों और सैकड़ों करोड़ रूपए के बजट से लैस जनसंपर्क महकमा खुद नहीं कर सकता था. कांग्रेस ने उन्हें पता नहीं किस चीज़ की तरह की तरह इस्तेमाल किया और फेंक दिया. बहरहाल, कुछ देर बेरोजगार रहने के बाद उसी अख़बार की सेवा उन्हें फिर मिल गई. लेकिन इस बार रकम और इज्ज़त दोनों कम मिली. संजय अरोड़ा अपने धंधे में लग गए. अपनी असली जात छुपा के उन्होंने अपने आप को अरोड़ा लिखना शुरू कर दिया था. अ-रोड़ा यानी जी किसी की राह में कभी रोड़ा नहीं बनता. संजय ने इस की उस की, राजनीति में हैं तो एक दूसरे के दुश्मनों की भी, सब की तारीफें और चमचागिरी करनी शुरू की. सिर्फ पत्रकार ही होते तो सरकारी ठप्पा लगवाते ही क्यों?

 

ईमान के बाज़ार और कपड़े उतार देने के व्यापार में एक बार किसी को भी कोठे पे 'बिठा' लेने के बाद 'मौसम' की 'चंदा' चुस्की तो किसी के भी साथ लगा लेती है. संजय ने भी 'न' कभी किसी को नहीं की. वे हरेक के तलुवे चाटने लगे. 'मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोई' तो वे हरेक को बताने लगे. नीचे कुछ बानगियां देखिए और देखते समय ध्यान रखें कि ये खबरें नहीं, नेता चालीसा हैं.

 

वो देखने से पहले ये समझ लीजिए कि अरोड़ा बंधू आजकल कांडा के गुनाह बख्शवाने में लगे हैंअब गोबिंद कांडा को ये समझाने मेंकि फिकर मत करोबहुमत फिर किसी का नहीं आनाएमएलए हम तुम्हें बनवा देंगे और गृह मंत्रालय ले के तो मुख्यमंत्री खुद चलके आएगादीपक की नौकरी के नाम पे अच्छी खासी रकम  ही रही हैसुना ये भी है कि पंजाब केसरी के इस्तेमाल का राज़ खुलजाने से कहीं वो नौकरी जाती हो तो गोबिंद कांडा ने एक प्रिंटिंग प्रेस खरीद के तैयार रखी हैगीतिका मर गयी बेशककांडा केमिरासी अभी ज़िंदा हैं.

 

 

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Last Updated (Thursday, 16 May 2013 16:54)

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