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Sunday, April 15, 2012

कैसे कैसे विशेषज्ञ

कैसे कैसे विशेषज्ञ

Sunday, 15 April 2012 15:23

श्यौराज सिंह बेचैन 
जनसत्ता 15 अप्रैल, 2012: पिछले एक दशक में दलित साहित्य पर शोध-अध्ययनों की आवश्यकता काफी बढ़ी है। अनेक दलितों-गैर-दलितों ने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग और अन्य संस्थाओं से परियोजना कार्य लिए हैं और गोष्ठियां आयोजित की हैं। शोध परियोजनाओं का चलन अच्छा है। इसमें नीतिगत रूप से कुछ भी बुरा नहीं है। इसके जरिए शोधपत्र आधारित कई अच्छी पुस्तकें तैयार हो जाती हैं, होनी ही चाहिए। पर देखा गया है कि कई लोगों ने इसमें अपेक्षित ईमानदारी नहीं बरती। परियोजना कार्य को मंजूरी देने वाले कथित विशेषज्ञ भी इस साहित्य को समझे बगैर ही विषयों को स्वीकृति देने न देने के लिए अधिकृत हैं। उनके पास विषय की विशेषज्ञता या कोई उच्च स्तरीय उपाधि होना तो दूर, सिवाय पूर्वग्रहों के प्राथमिक जानकारी तक नहीं है। पर वे साधिकार दलित साहित्य का मूल्यांकन करते हैं। 
दूसरे ऐसे लोग हैं, जिन्होंने परियोजनाएं तो ले ली हैं, पर दलित साहित्य की जरूरी किताबें तक नहीं पढ़ी हैं, मौलिक शोध नहीं किए, बल्कि एक आसान रास्ता निकाला। जिन सवालों के जवाब उन्हें खुद तलाशने और जिन समस्याओं के समाधान देने थे, उनके लिए चालीस-पचास सवाल लिख कर हर दलित लेखक के पास भेज दिए। फिर जवाब मंगा कर निश्चिंत बैठ गए। दलितों में लिखने-पढ़ने की भूख बढ़ी है, सो वे एक पंक्ति के सवाल पर कई पंक्तियों का जवाब लिख बैठे। प्रत्याशी को 'हल्दी लगी ना फिटकरी रंग चोखा' आया। घर बैठे आ पहुंचीं ढेरों सूचनाएं। उन्हें हेर-फेर कर द्विज खाचों में ढाल कर उन्होंने पत्र-पत्रिकाओं में अपने नाम से प्रस्तुत करना शुरू कर दिया। लिखना बुरा नहीं है, पर न किसी सूचना-स्रोत का जिक्र होता है और न पुस्तकों के संदर्भ! यह साहित्यिक अपराध है। इसके चलते दलित साहित्य के मूल्यांकन को लेकर पूरी अंधेरगर्दी कायम है। 
एक उदाहरण इधर का भी दिया जा सकता है। 'उपन्यासों में दलित कोण' (जनसत्ता, 26 फरवरी) शीर्षक से चंद्रभान यादव की टिप्पणी प्रकाशित हुई। पढ़ने पर पता चला कि यादव जी भी इसी तरह के नए दलित साहित्य विशेषज्ञ हो गए हैं। यह दूसरी बार जनसत्ता में दलित साहित्य पर उनका लेख छपा है। पूर्व प्रकाशित (जनसत्ता, 30 जनवरी, 2011) लेख में उन्होंने गलतबयानी की थी। इस बार पहले से अधिक भ्रम फैलाए हैं। लेख पढ़ कर उसी दिन मैंने उनसे फोन पर पूछा था कि 'क्या आपने 'बंधन मुक्त', 'अमर ज्योति', 'पहला खत' आदि दलित उपन्यास देखे हैं?' उनका जवाब था कि 'बिल्कुल सर, मैंने इस विषय पर रिसर्च की है।'
'तो ये कब छपे हैं?' यादव जी ने बताया, 'ये सभी 1990 के बाद के हैं। इसीलिए ये सब 'छप्पर' के बाद के ठहरते हैं।' मैंने पूछा, 'क्या मंडल से पहले कुछ नहीं है।' और मैं समझ गया कि विशेषज्ञ महोदय ने दलित साहित्य की कोई किताब नहीं पढ़ी है। मैं हैरत में पड़ गया कि ये लोग दलित साहित्य की विशेषज्ञता के नाम पर कैसे-कैसे ढोंग रच रहे हैं? इसलिए कि चंद्रभान यादव के लेख में वर्णित ये सभी कृतियां, बल्कि 'मानव की परख' सहित उपन्यास हमारे संग्रह में मौजूद हैं। चंद्रभान जी ने तो इतना भी कष्ट नहीं किया कि 2010 में अनामिका प्रकाशन से आई रजत रानी 'मीनू' की शोध पुस्तक 'हिंदी दलित कथा साहित्य: अवधारणा और विधाएं' ही देख ली होती तो उन्हें दलित साहित्य की सभी विधाओं का क्रमवार इतिहास मिल गया होता और वे उपन्यासों की अंतर्वस्तु की झलक भी पा गए होते। कम से कम 1954 के उपन्यास को 1990 के बाद के नहीं कह पाते। तिथियों-प्रकाशनों की गलत बयानी करने से बच जाते।

कथाकार जयप्रकाश कर्दम का 'छप्पर' दलित साहित्य का महत्त्वपूर्ण उपन्यास है, पर उसका प्रकाशन 1994 है, 1954 नहीं। यानी दो पीढ़ियों का अंतराल है। धर्मवीर का उपन्यास 'पहला खत' 1991 में आ चुका था। डीपी वरुण का उपन्यास 'अमरज्योति' 1982 में आया था। रामजीलाल सहायक, जो उत्तर प्रदेश सरकार में शिक्षा मंत्री भी रहे, का उपन्यास 'बंधन मुक्त' भी 1954 में छपा था। 
चंद्रभान यादव दलित साहित्य के बारे में पहले ही काफी गुमराह कर चुके हैं। उपन्यासों के क्रम में काफी दिन गुमनाम रहा देवीदयाल सैन का उपन्यास 'मानव की परख' भी खोजा गया। इस उपन्यास का प्रकाशन आत्माराम एंड संस दिल्ली ने 1954 में किया था। प्रस्तावना उस समय के डाक-तार मंत्री बाबू जगजीवन राम ने लिखी थी। महत्त्वपूर्ण इसलिए कि जिस 'हरिजन से दलित' अवधारणा को लेकर आज के गांधीवादी हिंदू पत्रकार नई खोज की तरह पुस्तक संपादित करते हैं, देवीदयाल सेन के यहां यह धारणा 1954 में मौजूद थी। 
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की परियोजनाओं और विश्वविद्यालयों में दलित साहित्य के अध्ययन की बढ़ती आवश्यकताओं ने विरोधियों को भी समर्थक बनने पर मजबूर किया है। कुछ समय पूर्व मुरादाबाद के केजीके कॉलेज में आंबेडकर पीठ की ओर से बाबा साहब आंबेडकर की पत्रकारिता विषय पर मेरा एक व्याख्यान कराया गया था, उसमें मैंने अपने शोध प्रबंध 'हिंदी दलित पत्रकारिता पर पत्रकार आंबेडकर का प्रभाव' की सहायता से कुछ अचर्चित घटनाएं उद्धृत की थीं। अगले सप्ताह मैंने देखा कि वे सारी सूचनाएं चंद्रभान यादव के लेख में अंकित हैं। पर कहीं भी स्रोत का हवाला नहीं है। 
'दलित साहित्य की लूट है, लूट सके तो लूट' वाली कहावत की तरह कई नए स्थापनाकार पैदा हुए हैं। दूध में पानी मिलाने वाले मिलावटखोर और दवा में जहर मिलाने वाले   डॉक्टरों के गिरोह सक्रिय हो गए हैं।
ऐसे गैर-दलित हिमायती की हिमायत दलित साहित्य के लिए उसी तरह होती है जिस तरह श्रीकृष्ण के लिए पूतना मौसी का दूध।

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