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Sunday, August 18, 2013

कोई रास्ता नहीं आम पत्रकार के लिये, आगे कुआँ, पीछे खाई

कोई रास्ता नहीं आम पत्रकार के लिये, आगे कुआँ, पीछे खाई


देश में जितना "आम आदमी" का शोषण,

मीडिया में उतनी ही "आम पत्रकार" की दुर्गति!

अभिरंजन कुमार

अभिरंजन कुमार, लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। आर्यन टीवी के कार्यकारी सम्पादक रहे हैं।

अभिरंजन कुमार, लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। फिलहाल आर्यन टीवी के कार्यकारी सम्पादक हैं।

हम मीडिया वाले समूची दुनिया के शोषण के ख़िलाफ़ तो आवाज़ उठाते हैं, लेकिन अपने ही लोगों पर बड़े से बड़ा पहाड़ टूट जाने पर भी स्थितप्रज्ञ बने रहते हैं। यह दुर्भाग्यपूर्ण और शर्मनाक है।

टीवी 18 समूह में इतनी बड़ी संख्या में पत्रकारों की छँटनी के बाद भी प्रतिरोध के स्वर छिटपुट हैं और वो भी ऐसे, जिनसे कुछ बदलने वाला नहीं है। कई मित्रों से बात हुयी। वे कहते हैं कि अब दूसरा कोई काम करेंगे, लेकिन मीडिया में नहीं रहेंगे।

पहले भी एनडीटीवी समेत कई बड़े चैनलों में छँटनी के कई दौर चले। कहीं से कोई आवाज़ नहीं उठी। वॉयस ऑफ इंडिया जैसे कितने चैनल खुले और बन्द हो गये। कई साथियों का पैसा सम्भवत: अब तक अटका है। ज़्यादातर चैनलों में "स्ट्रिंगरों" का पैसा मार लेना तो फ़ैशन ही बन गया है। दुर्भाग्य यह है कि "स्ट्रिंगरों" के लिये कोई आवाज़ भी नहीं उठाता, जबकि वे मीडिया में सबसे पिछली कतार में खड़े हमारे वे भाई-बंधु हैं, जो देश के कोने-कोने से हमें रिपोर्ट्स लाकर देते हैं और पूँजीपतियों का मीडिया उन्हें प्रति स्टोरी भुगतान करता है। आपको यह जानकर हैरानी होगी कि कई चैनलों में हमारे स्ट्रिंगर भाइयों को एक-एक डेढ़-डेढ़ साल से पैसा नहीं मिला है।

पिछले कुछ साल में कुकुरमुत्ते की तरह उग आये कई चैनल अपने पत्रकारों से दिहाड़ी मज़दूरों से भी घटिया बर्ताव करते हैं। अगर कोई बीमार पड़ जाये, तो उसकी सैलरी काट लेंगे। अगर किसी का एक्सीडेंट हो जाये, तो बिस्तर पर पड़े रहने की अवधि की सैलरी काट लेंगे। यानी जिन दिनों आपको सैलरी की सबसे ज़्यादा ज़रूरत होती है, उन दिनों की सैलरी आपको नहीं मिलेगी। न कोई छुट्टीन पीएफन ग्रेच्युटीन किसी किस्म की सामाजिक-आर्थिक सुरक्षा।

कई पत्रकारों का वेतन मनरेगा मज़दूरों से भी कम है। बिहार में इस वक्त मनरेगा मज़दूर को 162 रुपये प्रतिदिन मिलते हैं, जो 30 दिन के 4860 रुपये बनते हैं, लेकिन सभी चैनलों में आपको 3,000 रुपये महीना पाकर काम करने वाले पत्रकार मिल जायेंगे। इस 3,000 रुपये में भी उतने दिन का वेतन काट लिया जाता है, जितने दिन किसी भी वजह से वे काम नहीं करते हैं।

मज़दूरों का शोषण बहुत है, फिर भी फ्री में काम करने वाला एक भी मज़दूर मैंने आज तक नहीं देखा। यहाँ तक कि अगर कोई नौसिखिया मज़दूर या बाल मज़दूर (बाल मज़दूरी अनैतिक और ग़ैरक़ानूनी है) भी है, तो भी उसे कुछ न कुछ पैसा ज़रूर मिलता है, लेकिन आपको कई मीडिया संस्थानों में ऐसे पत्रकार मिल जायेंगे, जो इंटर्नशिप के नाम पर छह-छह महीने से फ्री में काम कर रहे हैं। कई चैनलों ने तो यह फैशन ही बना लिया है कि फ्री के इंटर्न रखो और अपने बाकी कानूनी-ग़ैरकानूनी धंधों के सुरक्षा-कवच के तौर पर एक चलताऊ किस्म का चैनल चलाते रहो।

कई चैनलों की समूची फंक्शनिंग इल्लीगल है। ये कर्मचारियों का पीएफ और टीडीएस काटते तो हैं, लेकिन सम्बंधित विभागों में जमा नहीं कराते। पूरा गोलमाल है और इन्हें कोई कुछ करता भी नहीं, क्योंकि ये मीडिया हाउस जो चलाते हैं! इनसे कौन पंगा लेगा?

एक तरफ़ सरकारी मीडिया है, दूसरी तरफ़ पूँजीपतियों का मीडिया। आम पत्रकार के लिये कोई रास्ता नहीं। आगे कुआँपीछे खाई। ज़ाहिर है, जैसे इस देश में हर जगह "आम आदमी" का शोषण है, वैसे ही हमारे मीडिया में "आम पत्रकार" की दुर्गति है।

-हालात ऐसे हैं कि हर पत्रकार अपनी जगह बचाने में जुटा है। भले ही इसके लिये किसी साथी पत्रकार की बलि क्यों न देनी पड़े। जनजागरण में मीडिया की ज़बर्दस्त भूमिका है और कभी-कभी लगता है कि आज की तारीख़ में इससे ज़्यादा पॉवरफुल कोई और नहीं। मीडिया चाहे तो देश के हुक्मरानों को घुटनों के बल ला खड़ा करे। पूरे देश का मीडिया एकजुट हो जाये, तो देश के हालात आज के आज बदल सकते हैं, लेकिन सच्चाई यह है कि मीडिया एक गंदे धंधे में तब्दील होता जा रहा है।

ज़रा सोचिए, हम जो अपने लिये आवाज़ नहीं उठा सकते, वे दूसरों के लिये क्या कर सकते हैं? क्या नपुंसक मीडियाकर्मी इस देश को पुरुषार्थी बनाने के लिये संघर्ष करेंगे?देश के नागरिकों को न सिर्फ़ सियासत की सफ़ाई के लिये लामबंद होना हैबल्कि मीडिया की सफ़ाई के लिये भी आवाज़ उठाना होगा। क्या आप इसके लिये तैयार हैं?


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