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खंडूरी क्या भा.ज.पा. को जिता पाएँगे? लेखक : हरीश चन्द्र चंदोला :: अंक: 03 || 15 सितंबर से 30 सितंबर 2011:: वर्ष :: 35 :October 1, 2011 पर प्रकाशित

खंडूरी क्या भा.ज.पा. को जिता पाएँगे?

खंडूरी क्या भा.ज.पा. को जिता पाएँगे?

b-c-khanduri-1भाजपा ने चुनाव की मंझदार में नावें बदल दीं। अब विधान सभा चुनाव में इतना कम समय बचा है कि किसी भी मुख्यमंत्री के लिये अपने काम अथवा नीतियों द्वारा अपनी पार्टी को जिताना आसान नहीं होगा। दो महीने बाद आचार संहिता लागू हो जायेगी। यह सही है कि अवकाश प्राप्त मेजर जनरल मुवन चंद्र खंडूरी का प्रभाव गढ़वाल में अच्छा है और वे यहाँ कुछ सीट जिताने में समर्थ हो सकते हैं। जब उन्हें दो साल पूर्व मुख्यमंत्री पद से हटाया गया था, तो गढ़वाल में उनके प्रति सहानुभूति बनी थी तथा अनेक लोग क्षुब्ध भी हुए थे। अपने पिछले कार्यकाल में वे भ्रष्टाचार समाप्त करने के बारे में लगातार बोलते रहे थे। अब भी शपथ लेने के बाद वे वही बातें दोहरा रहे हैं। लेकिन उस बुनियाद पर वे अपनी पार्टी को सरकार बनाने लायक सीटें दिलवा पाएँगे, ऐसा नहीं लगता।

उनके पूर्ववर्ती रमेश पोखरियाल 'निशंक' पर भ्रष्टाचार के कई आरोप लगे, खास तौर पर कुंभ मेले के लिए बढ़ा-चढ़ा कर ठेके देने व अंधाधुँध खर्च करने, स्टर्डिया केमिकल्स को कारखाने के लिये दी गई भूमि पर रिहायशी भवन बनाने की अनुमति देने तथा निजी जल-विद्युत कंपनियों को नदियों पर बिजली बनाने की अनुमति देने के। इतने सारे आरोपों के कारण भाजपा के नेतृत्व को लगा कि पाँच महीने बाद होने वाले चुनावों में उसकी नैया डूब जाएगी। सवाल है कि क्या खंडूरी पार्टी की छवि को चुनाव तक सुधार पाएँगे ? नये मंत्रिमंडल में पिछले सभी मंत्री ले लिए गए हैं। इनमें से कइयों पर गंभीर आरोप हैं। उनका भार क्या खंडूरी उठा पाएँगे ?

हमारे प्रदेश में राजनैतिक दलों ने मुख्यमंत्री चुनने का एक अलोकतांत्रिक तरीका अपना लिया है। यहाँ विधायकों को मुख्यमंत्री चुनने का अवसर नहीं दिया जाता। वर्ष 2000 में जब प्रदेश की पहली अन्तरिम सरकार बनी थी तो भाजपा शीर्ष नेतृत्व ने बिना विधायकों से पूछे नित्यानंद स्वामी को मुख्यमंत्री बना दिया था। साल भर के भीतर जब पता चला कि स्वामीजी सरकार चलाने में समर्थ नहीं हैं तो एक बार बिना विधायकों से पूछे भगत सिंह कोश्यारी को मुख्यमंत्री बना दिया गया। 2002 के पहले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस चुनाव जीती तो उसके आलाकमान ने भी अपने विधायकों को मुख्यमंत्री नहीं चुनने दिया और नारायण दत्त तिवारी को उस पद पर बैठा दिया। उसके बाद, 2007 के चुनावों में जीतने पर भाजपा नेतृत्व ने बिना विधायकों से पूछे ऊपर से भुवन चंद्र खंडूरी को थोप दिया। फिर राज्य से लोकसभा की सभी सीटें हारने के बाद उन्हें हटा कर रमेश पोखरियाल 'निशकं ' को मुख्यमत्रीं बना दिया गया। इस अलोकतांत्रिक प्रथा से राज्य का कोई भला नहीं होने वाला है। इससे कुछ विधायक हमेशा अप्रसन्न रहते हैं।

इस बीच एक नये दल का उदय हुआ है। अवकाशप्राप्त लेफ्टीनेंट जनरल तेजपालसिंह रावत जैसे कांग्रेस के सांसद तथा भाजपा में मंत्री रह चुके नेता एक तीसरे मोर्चे के रूप में चुनाव लड़ने तैयार हो रहे हैं। सम्भव है कि खंडूरी के मुख्यमंत्री बनने से उनमें से कुछ भाजपा के साथ रह जायें।  अभी चनुाव के लिये उम्मीदवार चुनने में थोडा़ समय है। इस बार पहाड़ से सीटें कम हो गई हैं। इसमें धुमाकोट सीट, जहाँ से खंडूरी अभी विधायक हैं, का पास की सीट में विलय कर दिया गया है। इससे सवाल उठता है कि आने वाले चुनाव में मुख्यमंत्री कहाँ से लड़ेगें ? कुछ का मानना है कि वे श्रीनगर से खड़े होगें। वे जहाँ से भी लड़ें उनकी विजय तय मानी जा रही है। सवाल औरों का है। कौन कहाँ से लड़ेगा, तय नहीं है। यह तय कर पार्टियों को टिकट देने हैं। उसके बाद ही आकलन लगाया जा सकेगा कि उनमें कौन तथा कितने स्थान जीतेगें यह संभव है कि कुछ स्थानों पर असंतुष्ट अपनी ही पार्टी के प्रत्याशियों के विरोध में लड़ें।

भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी का कहना है कि रमेश पोखरियाल 'निशंक' को भ्रष्टाचार के आरोपों के कारण नहीं हटाया गया। तो क्यों हटाया गया, यह उन्होंने स्पष्ट नहीं किया। यद्यपि सब जगह खुलेआम कहा जा रहा है कि पोखरियाल को हटाए जाने का यही मुख्य कारण है। यदि यह सही है तो क्या उनके स्थान पर आनेवाले खंडूरी भ्रष्टाचार के संचित भार से पार्टी को मुक्त कर पाएँगे ?

सभी जानते हैं कि चुनाव का अधिकतर खर्चा भ्रष्टाचार के द्वारा ही आता है। खंडूरी जी वह खर्च कहाँ से जुटायेंगे ?

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