Follow palashbiswaskl on Twitter

PalahBiswas On Unique Identity No1.mpg

Unique Identity Number2

Please send the LINK to your Addresslist and send me every update, event, development,documents and FEEDBACK . just mail to palashbiswaskl@gmail.com

Website templates

Zia clarifies his timing of declaration of independence

What Mujib Said

Jyoti Basu is dead

Dr.BR Ambedkar

Memories of Another day

Memories of Another day
While my Parents Pulin babu and Basanti Devi were living

Monday, February 20, 2012

विरासत से द्रोह

Sunday, 19 February 2012 12:18
http://www.jansatta.com/index.php/component/content/article/11957-2012-02-19-06-50-22

तरुण विजय 
जनसत्ता 19 फरवरी, 2012: ईरान से पारसी कितनी सदी पहले निकले होंगे? गूगल कर लीजिए। पर वे अपने देव, अपनी पूजा, अपने रहन-सहन को छोड़ कर गुजरात में संजान के तट पर आने को मजबूर हुए। क्यों? क्योंकि ईरान पर अरब हमला होने के बाद जो चलन, आस्था और तलवार का जोर चला उसमें या तो हम जैसे बन जाओ या चले जाओ ही दो विकल्प रहते थे। 
मालदीव में सब हिंदू और बौद्ध थे, यह बात वहां के ही संग्रहालय के क्यूरेटर बताते हैं। जब मजहब बदला तो मूर्तियां संग्रहालय में आ गर्इं। और जब वहां पिछले दिनों कट््टरपंथी ताकतों की मिलीभगत से तख्ता पलट हुआ, जिसे हमारे उत्साही दिल्ली वालों ने मालदीव का वसंत भी कहने की कोशिश की, अरब वसंत की तर्ज पर, तो वहां इस संग्रहालय में रखी वे बेचारी मूर्तियां भी नष्ट कर दी गर्इं। लोगों की आस्था छीन ली, उनके मंदिर भी छीन लिए, उनको भी बाहर कर दिया और फिर उनकी कुछ निशानियां थीं, मूर्तियां वगैरह, वे भी तोड़ दीं। 
वैसे यह सब किसी बाहर से आए व्यापारियों का नहीं था। किसी विदेशी आक्रमणकारी की भी कोई निशानी नहीं थी कि हमें कहना पड़ता कि जैसे हिंदुस्तानियों ने विदेशियों के भी स्मारक और उनकी वस्तुएं सहेज कर रखी हैं, वैसे तुम भी रखो। ये तमाम संग्रहीत की गई वस्तुएं मालदीव के उन लोगों की थीं, जो वर्तमान नागरिकों के प्रपितामह, याकि पूर्वज थे, उन्हीं के रक्त और उनको जन्म देने वाले। वे मूर्तिपूजक थे, वे राम और बुद्ध के उपासक थे, वे सर्व धर्म समभाव वाले दर्शन को मानने वाले थे। अहिंसक और काषाय वस्त्रधारी संत और भिक्षुओं की संपदा वाले थे। उनके साथ कब, किसने क्या बर्ताव किया, यह बात भी छोड़ दी जाए। लेकिन कुछ तो रिश्ता होता है अपने माता-पिता, पूर्वजों के साथ। उस रिश्ते पर तो खुदा भी हावी नहीं हो सकता। सब कुछ बदल दो। मां कैसे बदलोगे? सीधी-सी बात है। 
जिन्होंने बामियान में बुद्ध की प्रस्तर मूर्ति को बम लगा कर तोड़ दिया, उन्होंने किसकी कीर्ति गाथा लिखी? बुद्ध का कुछ नहीं बिगड़ा। किसी बुद्ध भिक्षु ने बंदूक उठा कर प्रतिशोध की भी कसम नहीं खाई। किसी अन्य बौद्ध देश ने बामियान के उन कायर तालिबानों पर सैनिक कार्रवाई की भी धमकी नहीं दी। वे इतने बहादुर हैं कि पत्थरों से बदला लेते हैं। बामियान के बुद्ध अब तालिबानों की वहशियत के स्थायी स्मृति चिह्न हैं। बुद्ध मुस्कुरा रहे हैं। 
विरासत और पूर्वज तो भाई निर्विवाद और साझे होते हैं। कश्मीर में खुद शेख अब्दुल्ला ने अपनी जीवनी 'आतिशे-चिनार' में दो-तीन पीढ़ी पुराने अपने कौल पूर्वजों का जिक्र किया। आज भी कश्मीरी मुसलिम कौल, भट््ट, रैना जैसे जातिसूचक अंतिम नाम लगाते हैं। पर क्या कभी उनके मन में अपनी प्राचीन विरासत, परंपरा, पूर्व, रस्में, गीत, कहानियां, दर्द और खुशियों के साझेपन की हूक उठती है? 

पिछले दिनों कश्मीर जाने पर देखा कि वहां अनंतनाग की सब दुकानों पर इस्लामाबाद लिखा हुआ है। अनंतनाग प्राचीन और सुंदर नाम है। उसको इस्लामाबाद लिखने से किसकी इज्जत बढ़ रही है? क्या किसी शहर का नाम मजहब के नाम पर रखने से उस आस्था का परचम लहराने लगता है? पाकिस्तान में भी तो एक इस्लामाबाद है? वहां का हाल देख लीजिए। 
हर जगह, जहां भी हम जाएं, हमसे पहले वालों का, चाहे वे हमारे भाई, पिता, माता, ही क्यों न रहे हों, नामो-निशान मिटा देना, यह कहां की तहजीब हुई भाई? इराक, ईरान, सउदी अरब, लेबनान, मिस्र ये सब उस समय थोड़े ही पैदा हुए थे, जब इनकी आस्था बदली? तो उन सबका क्या हुआ, जो उनके पहले भी उसी जमीन पर, सदियों से रहते आए और उनकी भी कोई आस्था रही ही होगी। वे सब उसी तरह मिट गए जैसे कोलंबस के बाद उनका हुआ, जिनको विजेताओं ने रेड इंडियन्स कहा। एक अनुमान के अनुसार चार करोड़ इंडियन्स कोलंबस की खोज के बाद मार डाले गए, और इतनी बर्बर अमानुषिकता के साथ कि वे वृत्तांत पढ़ने भी कठिन होते हैं। हंपी के अवशेष देखने पर उन मंदिरों की अद्भुत कारीगरी और योजना बनाने वालों की विराट दृष्टि की कल्पना कर ही अभिभूत रह जाना पड़ता है। फिर यह भी मन में आता है कि आखिर जिन आक्रमणकारियों ने हंपी को तोड़ने के आदेश दिए होंगे उनका मन कैसा रहा होगा?
सोवियत संघ के स्टालिन से लेकर लंबी छलांग के माओ तक और सिंध से लेकर पोलपोट के कंबोडिया तक यही त्रासदी है। हम जैसे बनो, वरना जाओ। 
यह अतिवाद चाहे किसी भी रंग का हो, किसी भी वर्ग या विचारधारा द्वारा कितनी ही तार्किकता ओढ़ा कर बताया जाता हो, बुरा है, गलत है, अमानवीय है। अच्छा हो कि खत्म हो जाओ, पर प्रतिशोधी अमानवीयता को कोई भी नाम देकर उचित करार देना अपराध है। अतिवाद चलता नहीं। गांधी क्यों आज भारत के सर्वश्रेष्ठ परिचय बने और बाकी उनसे बड़े विद्वान नहीं बन पाए, इसका कोई कारण होगा। जिंदगी खुली किताब के मानिंद जी ली जाए, तो इससे बढ़ कर कोई सुख नहीं। जिन फरिश्तों ने सबको एक सांचे में ढालने की कोशिश की, उनके भी खड़िया के पांव हमने देखे हैं। सांचे में ढालना ही मनुष्यता की परिधि से बाहर जाना है। बस एक बूंद यह कहने की स्वतंत्रता जिंदगी दे जाती है कि जाओ, तुम्हारी बात मुझे नहीं माननी। कहीं कभी यह पढ़ा था, जिसका इस्तेमाल आपातकाल की लोकवाणी पत्रिका के मास्ट हेड पर हम किया करते थे- 'कहो नाखुदा से कि लंगर उठा दे/ मैं तूफान की जिद देखना चाहता हूं।'

No comments: