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Monday, February 6, 2012

क्‍या उपनिषद वो आईना है,‍ जिसमें हम खुद को देख सकें?

क्‍या उपनिषद वो आईना है,‍ जिसमें हम खुद को देख सकें?



क्‍या उपनिषद वो आईना है,‍ जिसमें हम खुद को देख सकें?

7 FEBRUARY 2012 4 COMMENTS
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♦ डॉ चंद्रप्रकाश द्विवेदी

चाणक्‍य के बाद डॉ चंद्रप्रकाश द्विवेदी एक बहुत ही जरूरी रचना लेकर आ रहे हैं, उपनिषद गंगा। चाणक्‍य और उपनिषद के बीच उनके दो लोकप्रिय काम रहे हैं, मृत्‍युंजय और पिंजर। उपनिषद का ताल्‍लुक धर्म से नहीं है, जीवन दृष्टि और जीवन से जुड़े विज्ञान है। सूक्तियों में संजोया हुआ उपनिषद कहानियों के माध्‍यम से आपके सामने होगा और इसका श्रेय डॉ चंद्रप्रकाश द्विवेदी के साथ ही इस पूरी परियोजना के संरक्षक चिन्‍मय मिशन को जाता है। अगले महीने की 11 तारीख से दूरदर्शन सुबह दस बजे से इसका प्रसारण करेगा। इसे हम चाहें, तो दूरदर्शन की वापसी के संदर्भ में देख सकते हैं। उपनिषद शायद विमर्श से अधिक समझी जाने वाली चीज है, लेकिन अगर कुछ भी बहसतलब है, तो पाठकों से गुजारिश होगी कि वे अपनी बात रखें। यहां हम डॉक्‍ट साब की इस पूरी परियोजना के बारे में एक संक्षिप्‍त टिप्‍पणी प्रकाशित कर रहे हैं : मॉडरेटर

पनिषद गंगा – सिर्फ एक धारावाहिक नहीं भारतीय सभ्यता और दर्शन के विकास की पहचान है! यह श्रव्‍य-दृश्‍य माध्‍यम में भारतीय चिंतन प्रवाह की झलक है।

भारत सिर्फ एक भौगोलिक इकाई नहीं है, सिर्फ एक सभ्यता नहीं, भारत एक विचार का नाम है। भारत नाम है एक जीवन दर्शन का, जहां जीवन कला भी है और विज्ञान भी।

यह वह विज्ञान है, दर्शन है, जो जड़ चेतन में, मनुष्य में, मनुष्य और उसके संसार में, संसार और जो उनके परे है, जो सृष्टि के प्रत्येक कण में एक सूत्र, एक चेतना को देखता है, जिसे भारतीय दर्शन की वैज्ञानिक आत्मा कहते हैं।

क्या है वह, जिसे जान लेने से कुछ भी जानना शेष नहीं रह जाता। क्या वह सिर्फ किसी ऋषि किसी चिंतक की कल्पना है या प्राचीन ऋषियों, चिंतकों, सामाजिक वैज्ञानिकों का ज्ञान का अभ्‍यास, अनुसंधान और क्या है यह आत्म दर्शन? आत्मा का विज्ञान?

क्या है वह चिरंतन सत्य, वह विज्ञान जिसके आधार पर भारत में जीवन की कला और विज्ञान विकसित हुआ?

क्या है जीवन का वह सत्य जो कालातीत है, सार्वभौमिक है, चिरंतन और हर युग में प्रासंगिक है?

इसी सत्य की व्याख्या है वेदांत या उपनिषद। उपनिषद – जीव, जगत और जो जगत से परे है का विज्ञान। और उसकी अनुभूति जीवन की कला है।

जीवन की उस कला को प्राचीन ऋषियों ने अनुभव किया। अनेक चिंतकों ने उसे अलग-अलग प्रकार से परिभाषित किया, उद्घाटित किया। बेहतर समाज और बेहतर मनुष्य जाति के लिए बार-बार उसकी घोषणा हुई। कभी वह जनक थे, कभी याज्ञवल्क्य, कभी शंकराचार्य, कभी सायणाचार्य, कभी माधवाचार्य, कभी दाराशिकोह तो कभी स्वामी चिन्मय।

काल का प्रवाह बहता रहा। ज्ञान का प्रवाह बहता रहा। समाज बदलता रहा। भूगोल बदलता रहा। इतिहास बदलता रहा। साहित्य बदलता रहा। शब्द बदलते रहे, अर्थ बदलते रहे। नहीं बदला तो सत्य पर उस पर कई आवरण पड़ते रहे।

आजादी के बाद प्राचीन परंपराएं शिथिल हुईं। नव जागरण के मंत्र और आंदोलनों में भारतीय शाश्वत मूल्यों, आस्थाओं, धारणाओं, अवधारणाओं, विश्वासों का स्वर भौतिक विकास की होड़ में कुछ मद्धिम हुआ, और उसी के साथ वह विज्ञान और कला जो भारतीय जीवन का आधार थी, जिसके कारण भारत, भारत था, कुछ धूमिल सी होने लगी।

प्राचीन ऋषियों का सारा चिंतन, पाठ्यक्रम, विद्यालयों, महाविद्यालयों से बाहर हो गया और वह आध्यात्मिकता की गठरी में बांध, जीवन और समाज के हाशिये पर फेंक दिया गया। कतिपय आलोचकों ने उसे जीवन के लिए अप्रासंगिक भी घोषित कर दिया।

चिन्मय मिशन ज्ञान की, आध्यात्म विज्ञान की, जीवन के नित्य अनुसंधान की उस शाखा को अपने प्रयासों से सिंचित करता रहा है ताकि दुर्लभ ज्ञान की यह परंपरा अविरत बहती रहे।

विडंबना है कि आम जीवन में ज्ञान अब अवांछनीय शब्द है, वर्जनीय और निंदनीय शब्द है। ज्ञान यानी वह उपदेश जो लोग सुनना नहीं चाहते। पर क्या सदियों का, हजारों सालों का मनुष्यता का अनुभव और अनुसंधान, सच को जानने की जिज्ञासा और उसके लिए निरंतर प्रयास निंदनीय और अनचाहा हो सकता है?

अतीत और वर्तमान की दूरी ने प्राचीन शब्दों के अर्थ बदल दिये हैं।

किताबों की जगह अब लैपटॉप ले रहे हैं। शिक्षकों का स्थान अब टेलीविजन ले रहा है। पांडुलिपियां लुप्त हो रही है या नष्ट हो रही हैं। ऐसे में चिन्मय मिशन ने ज्ञान के इस प्रवाह को इलेक्ट्रोनिक माध्यमों में ढालने का संकल्प किया ताकि उपनिषदों का घोष नयी पीढ़ी तक पहुंच सके।

पर इसमें एक समस्या थी। उपनिषदों के गूढ़ तत्वों को कहानियों में कैसे ढाला जाए ताकि उन्हें समझने में आसानी हो और साथ-साथ वे मनोरंजक भी हो सकें।

खोज और पड़ताल शुरू हुई। चिन्मय मिशन के आचार्य और सिनेमा और टेलीविजन से जुड़े लोगों ने अध्ययन प्रारंभ किया और कुछ समय के मनोमंथन के बाद पाया कि यदि उपनिषद की अवधारणाओं (Concept) को प्राचीन या नवीन कहानियों के माध्यम से कहा जाए, तो वह रोचक होगा। फिर ऐसी कहानियों की खोज हुई, जिससे अवधारणाएं और चिंतन व्‍यक्‍त हो। परिणामस्वरूप वैदिक समाज से लेकर पौराणिक समाज की कहानियां उपनिषद गंगा में सम्मिलित हुईं। वैदिक, पौराणिक, ऐतिहासिक आख्यान से लेकर चरित्रों और चरित्र कथाओं ने तत्व, चिंतन गूढ़ और रहस्य लगने वाले विचारों को रूप, आकार और शरीर प्रदान किया। इस तरह आत्मा (उपनिषद) और शरीर एक हुए और आकार लिया उपनिषद गंगा ने।

गंगा क्यों?

ह इसलिए कि गंगा के तट पर उस ज्ञान का निरंतर विकास हुआ और गंगा उसकी साक्षी रही… सदा से। वैदिक चिंतन को गंगा से अलग करना क्या संभव है?

उपनिषदों में अभिव्यक्त समाज की आशा, अभिलाषा और विचारों से अवगत होने के पहले हम जान लें कि वास्तव में उपनिषद शब्द का अर्थ क्या है?

उप–नि–षद का अर्थ है – आओ मेरे पास बैठो। जैसे ही दो व्यक्ति पास आते हैं और किसी जिज्ञासा को लेकर बात करते हैं – उपनिषद की रचना प्रारंभ हो जाती है।

इसलिए उपनिषदों में जीवन के मूलभूत प्रश्नों को लेकर प्राचीन समाज की जिज्ञासा, प्रश्न और उत्तर है। वे प्रश्न जो आज भी हमारे सामने या तो वैसे ही हैं या और अधिक कठिन हो गये हैं।

दूसरे शब्दों में उपनिषद आईना है, जिसमें हम अपनी तस्वीर देख सकते हैं।

पर इसके पहले कि हम आपको उस समाज या आपके समाज की यात्रा पर ले जाते, हमारे लिए यह आवश्यक था कि उस भारतीय समाज की, उनकी जीवन व्यवस्था की, जीवन से उनकी अपेक्षाओं की प्रारंभिक जानकारी दें ताकि हमें उनके प्रश्नों में हमारे उत्तर ढूंढने में आसानी हो।

चूंकि भारतीय समाज का प्रस्थान बिंदु ही वैदिक वांगमय है इसलिए हमने – शाहजहां और मुमताज महल के सबसे बड़े बेटे और औरंगजेब के बड़े भाई दारा शिकोह के साथ यह यात्रा प्रारंभ की।

और यहीं से प्रारंभ होती है हमारी और आपकी यात्रा … गंगा के प्रवाह सी … उपनिषदों की।

इस यात्रा के प्रारंभ और समापन में चार वर्ष लगे। पहले लगा कि उपनिषदों के तत्व चिंतन पर धारावाहिक बनाना मुश्किल है, संभव ही नहीं है।

पर पूज्य तेजोमयानंद जी यह स्वीकार करने को तैयार न थे। उन्होंने उत्साह बढ़ाया। धन जुटाने का आश्‍वासन दिया।

लेखकीय दल में से कुछ ने उपनिषदों का उपहास किया। संन्यासियों का मजाक उड़ाया। उनके प्रयास की खिल्ली उड़ायी। उन्हें उपनिषद नये सिरे से समझाने का दावा तक ठोंक दिया।

लिखने का दावा करने वाले भाग खड़े हुए। कौन पढ़ेगा? कौन देखेगा? न सास न बहू, न हास्य न प्रहसन, न फूहडपन। कोई भविष्य नहीं ऐसे धारावाहिक का। बंद कर दो! बंद हो जाना चाहिए! आदि आदि।

लड़ाइयां हुईं, झगड़े हुए, पर उपनिषदों के आचार्य शांत रह सब देखते रहे। अपमान भी सहा, पर अपने संकल्प के हटे नहीं।

हजारों घंटों का अभ्यास, एक-एक शब्द की जांच पड़ताल, एक-एक संदर्भ को टटोलना, बार-बार देखना, संस्कृत के उच्चारण को बार-बार ध्वनि मुद्रित करना। बार-बार लिखना। लिखने वाले थक गये। भाग जाने का विचार आया, छोड़ देने का विचार आया। बन रहे धारावाहिक को बीच में ही रोक देने की सलाह दी गयी। पर मिशन अपने विचार पर अड़ा रहा। एक-एक प्रकरण पर दिनों दिन बहस, विमर्श। तेरह तेरह प्रकरण लिखे गये और शूट हुए और इस प्रकार चार सालों में बने 52 प्रकरण।

फिर शुरू हुई उसके प्रसारण की प्रक्रिया और लंबी प्रतीक्षा के बाद अब वह भारतीय और विश्व दर्शक के सामने है।

उपनिषद गंगा में अनेक विषयों और जीवन के अनछुए पहलुओं पर चर्चा है, जो इससे पहले सिर्फ पुस्तकों तक या कुछ व्यक्तियों तक सीमित रही है। आज वह सार्वजनीन है।

(डॉ चंद्रप्रकाश द्विवेदी। भारत के इतिहास में दिलचस्‍पी लेने वाले अकेले निर्देशक। चाणक्‍य से शुरुआत। जी इंटरटेनमेंट के डायरेक्‍टर रहे। पिंजर जैसी महत्‍वपूर्ण कृति पर चर्चित फिल्‍म बनायी, जिसे नेशनल अवॉर्ड मिला। काशीनाथ सिंह की रचना काशी का अस्‍सी पर मोहल्‍ला अस्‍सी नाम की फिल्‍म भी उन्‍होंने बनायी है, जो इसी साल रीलीज होने वाली है। उनसे आप मोहल्‍ला लाइव के जरिये संपर्क कर सकते हैं।)

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