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Friday, February 17, 2012

‘न उगाही, न गुंडई’ का नारा और भाजपा के मंच पर मुजरिम!

'न उगाही, न गुंडई' का नारा और भाजपा के मंच पर मुजरिम!


Saturday, 18 February 2012 10:52

अंबरीश कुमार 
लखनऊ, 18 फरवरी। शुचिता और स्वराज की अलख जगाने वाली भाजपा का इस बार नारा है- न उगाही, न गुंडई ..हम देंगे साफ सुथरी सरकार। मगर गुरुवार की रात जब भाजपा के शीर्ष नेता लालकृष्ण आडवानी लखनऊ में भाजपा के समर्थन में सभा करने आए, तो मंच पर टंडन परिवार की तीन पीढ़ियों के साथ हत्या के तीन मुजरिम भी थे। यह देख पार्टी का एक खेमा नाराज भी हुआ। मंच पर और बगल में दूसरे नेताओं के साथ अभय सेठ, अशोक मिश्र और नरेश सोनकर भी थे। इन पर हत्या जैसे अपराध के आरोप लग चुके हैं। पार्टी सूत्रों ने यह जानकारी दी। 
इस बारे में भाजपा प्रवक्ता ह्रदय नारायण दीक्षित से पूछने पर उनका जवाब था- सेठ के बारे में सुना था कोई मुकदमा चल रहा था पर इस बारे में बहुत जानकारी नहीं है। बहरहाल, लखनऊ में इससे पार्टी का चाल चरित्र और चेहरा जरूर सामने आ जाता है। पार्टी कांग्रेस के वंशवाद पर लगातार हमले कर रही है और गुरुवार को जब गडकरी कांग्रेस को मां-बेटे की पार्टी बता रहे थे, तभी नीचे बैठे संघ के एक पुराने कार्यकर्ता की टिप्पणी थी-यहां टंडनजी की तीन पीढ़ियां मंच पर विराजमान है। लालजी टंडन के तीन पुत्र  आशुतोष टंडन, सुबोध टंडन और अमित टंडन के साथ पोता वंश टंडन की मौजूदगी किस वंशवाद की तरफ इशारा कर रही है, यह गडकरी नहीं समझ पाएंगे।
यह एक बानगी है लखनऊ में भाजपा की मौजूदा राजनीति को समझने के लिए। पार्टी की बड़ी चुनौती अपनी तीन सीटों को बचाने की है। यह अटल बिहारी वाजपेयी का गढ़ है और रोचक तथ्य यह है कि चुनाव आयोग को भेजी गई सूची में आज भी वाजपेयी पार्टी के स्टार प्रचारक हैं। पार्टी पिछले ढाई दशक से वाजपेयी के सहारे लखनऊ में अपना झंडा उठाए हुए है और आज जब वाजपेयी वाजपेयी चल फिर भी नहीं पा रहे, तो भी वे स्टार प्रचारक हैं।  
अब वाजपेयी की राजनीतिक विरासत टंडन के हाथ में है, जिसे वे अपनी विरासत में बदलते नजर आ रहे हैं। पिछली बार विधानसभा उप चुनाव में भाजपा उम्मीदवार अमित पुरी इसी वजह से हरा दिए गए और इस बार लालजी टंडन के बेटे गोपाल टंडन मैदान में हैं। 

सभी का यह मानना है कि यह चुनाव गोपाल टंडन नहीं बल्कि खुद लालजी लड़ रहे हैं। पुत्र मोह में फंसे लालजी पार्टी के नाराज नेताओं और कार्यकर्ताओं को मनाने में जुटे हैं। दूसरी तरफ बसपा से भी तार जोड़ा गया है ताकि उधर से ही कोई मदद मिल जाए। अपने लंबे राजनीतिक जीवन में टंडन के रिश्ते सत्ता के साथ हमेशा मधुर रहे हैं। मायावती उन्हें राखी बांधती थीं, तो आंदोलन के दौरान प्रदर्शन करने गए टंडन को मुलायम सिंह रसगुल्ला खिला कर वापस भेजते।
मगर अब लालजी टंडन को पुत्र और पार्टी दोनों की साख बचानी है। इसके साथ ही कलराज मिश्र का चुनाव भी है। कलराज की राजनीतिक प्रतिष्ठा दांव पर तो है ही पर इसमें टंडन की भूमिका भी मानी जाती है। इन चुनाव में भितरघात भी हो रहा है और हर हथकंडे अपनाए जा रहे हैं। तभी जो मिला उसे साथ लिया जाए की तर्ज पर आडवाणी के साथ मंच पर उन लोगों को भी जगह दी जा रही है, जिनके खिलाफ पार्टी ने अपना नया नारा गढ़ा है। 
लखनऊ विश्वविद्यालय छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष रमेश श्रीवास्तव जो कांग्रेस के उम्मीदवार हैं, उनके समर्थन में दर्जनों छात्र नेता जुटे हैं, जिससे शहरी वोटों वाली भाजपा को भी चुनौती मिल रही है। इसी तरह दो और सीटों पर शहरी वोटों के बंटवारे के कारण समाजवादी पार्टी को भी काफी उम्मीद नजर आ रही है और मुकाबला तिकोना होता नजर आ रहा है। 
शुक्रवार को समाजवादी पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष अखिलेश यादव ने लखनऊ में कई जगह दौरा किया और सभाएं कीं। पार्टी प्रवक्ता राजेंद्र चौधरी ने कहा-लखनऊ में सपा को इस बार ज्यादा फायदा होने जा रहा है, क्योंकि यहां पर हमारा संघर्ष भी ज्यादा हुआ है। ऐसे में भाजपा के लिए इस बार रास्ता बहुत आसान नजर नहीं आता।

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