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Sunday, May 13, 2012

सत्यमेव जयते में किसकी जय, किसका भय

सत्यमेव जयते में किसकी जय, किसका भय


कन्या भ्रूण हत्या का मसला भी बाजार में कैश किया जा सकता है. अल्ट्रासाउण्ड मशीनों की मार्केटिंग से जितना मुनाफा कम्पनियों ने कमाया होगा, उससे कहीं ज्यादा आमिर खान के इस कार्यक्रम के प्रचार और प्रस्तुति से इसके प्रायोजक भी कमा लें...

कृति 

आमिर खान के 'सत्यमेव जयते' सीरियल का कई दिनों से टीवी पर प्रोमो देखकर ऐसा तो लग रहा था कि आमिर कुछ अलग करेंगे . 6 मई सुबह इंतजार खत्म हुआ. आमिर अपना प्रोडक्शन लेकर आए. जाहिर है मुद्दा कुछ ऐसा था जिसने दिल को छू लिया. प्रस्तुति भी बहुत सधी हुयी थी. चेहरे बेहद आम और हममें और आपमें से एक था. 

टीवी चैनलों पर आ रहे सीरियलों की चकाचौंध शादीविवाह की प्रतिगामी रस्मों, सास-बहू की फूहड़ प्रस्तुति के बीच यह कार्यक्रम थोड़ा राहत देने वाला था. मुद्दा भी कुछ ऐसा था जिसे देख सुन कर दिल में इतनी नफरत गुस्सा और विवशता भर जाती है कि जी करता है कि कुछ ऐसा करें कि इस पूरे सिस्टम के पूरे ताने बाने को नोच कर रेशा-रेशा कर दें. 

cartoon-satish

खैर, आइये आमिर के सीरियल पर बात करते हैं. आमिर ने अपने पहले सीरियल के लिए जिस मुद्दे को चुना, जाहिर है वह दिल को छूने वाला था. कई बार दिल भर आया और आंख से आंसू भी निकले. वहां बैठे दर्शकों की आंखों में भी आंसू आ गए. कई बार आमिर भी अपनी आंख के किनारे पोछते नजर आए. कैमरे ने अपना काम बखूबी किया. आंखों में भरे हुए आंसू, अविरल बहते हुए आंसू , रुमाल में समाते आंसू इन सभी ने हमारी आंखों को बकायदा नम किया. 

आमिर जिन चेहरों को लेकर आए वह बहुत ही सामान्य थे. और उनकी दिल हिला देने वाली दास्तान ने रोंगटे खड़े कर दिये. एक बार फिर नफरत तीखी हो गयी कि कैसे सड़े हुए समाज में रहते हैं हम. और अन्त में एक औपचारिक हल भी प्रस्तुत किया. लेकिन यह मुद्दा कोई नया नहीं है. यह भारतीय समाज की एक कड़वी हकीकत है और इसके खिलाफ बहुत से सरकारी और गैरसरकारी औपचारिक अभियान चल भी रहे हैं. अतः आमिर खान का यह अभियान कोई नया नहीं है. न ही यह मसला सिर्फ जागरूकता का है. 

यह हमारे समाज का एक माइन्डसेट है जिसकी जड़ें इस समाज के पितृसत्तात्मक ढांचे और सम्पत्ति सम्बन्धों में इनबिल्ट है. तो इस मुद्दे को अगर उठाना है तो इस पितृसत्तात्मक ढांचे व सम्पत्ति सम्बन्धों को बदलने की बात करनी होगी. पितृसता को नष्ट करने की बात करने की जुर्रत तो बड़े-बड़े नारीवादी संगठन भी नहीं करते. फिर तो आमिर खान तो इस व्यवस्था का एक बड़ा प्रहरी है. जिसकी इस व्यवस्था पर बड़ी आस्था है और उन्हें इस देश की न्यायपालिका से बहुत उम्मीदें हैं. जबकि ज्यादातर न्यायाधीशों की महिला विरोधी, सवर्ण एवं सामन्ती मानसिकता जगजाहिर है.

भंवरी देवी के केस में जज का घटिया महिला विरोधी बयान क्या कोई भूल सकता है? खुद आमिर के सीरियल में एक वकील, जो एक महिला का केस लड़ रहे थे, ने उस जज का कथन बताया कि 'कुल दीपक' की चाह किसे नहीं होती. ऐसी सामन्ती और महिला विरोधी सोच वाली न्यायपालिका से हम क्या उम्मीद कर सकते हैं?

हम अच्छी तरह से जानते हैं कि बाजार हर चीज से मुनाफा कमाने के फिराक में रहता है और आमिर इस बाजार के ब्राण्ड एम्बेसडर हैं. किसी भी वैल्यू को बाजार में कैसे कैश कराना है वह अच्छी तरह जानते हैं. आमिर यह जानते हैं कि अपने प्रोडक्ट की मार्केटिंग कैसे की जाए. ऐसे में कन्या भ्रूण हत्या का मसला भी बाजार में कैश किया जा सकता है. अल्ट्रासाउण्ड मशीनों की मार्केटिंग से जितना मुनाफा कम्पनियों ने कमाया होगा और उससे कहीं ज्यादा आमिर खान के इस कार्यक्रम के प्रचार और प्रस्तुति से इसके प्रायोजक भी शायद कमा लें.

इसमें आमिर के प्रति एपिसोड तीन करोड़ भी शामिल है. निश्चित रूप से आमिर की वजह से कार्यक्रम एवं चैनल की टीआरपी भी बहुत बढ़ेगी. रिलायंस एवं एयरटेल जैसे कारपोरेट घरानों के इस मानवीय चेहरे के पीछे कितनी अमानवीयता है इसकी कल्पना भी आम लोग नहीं कर सकते.  ऐसे में बाजार की इस चकाचैंध से बजबजाती दुनिया में हम कितनी भी अच्छी बात क्यों न करें वह वैसी ही होगी जैसे महेन्द्र मिहोनवी ने अपनी एक कविता में कही है- सत्यमेव जयते का नारा लिखा हुआ हर थाने में, जैसे कोई इत्र की शीशी रखी हुयी पैखाने में.

इस तरह इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि मुद्दा क्या है. फर्क इससे पड़ता है कि इसे कौन, कैसे, किस फ्रेमवर्क में और किस नीयत से उठा रहा है. अभी यह देखना है कि आने वाले वक्त में  आमिर जनता की नब्ज को छूने वाले और कौन-कौन से मुद्दे उठाते हैं. या यूं कहें कि और किन मुद्दों की बाजार में बोली लगाते हैं. क्या वह सरोगेसी के मुद्दे को भी छुएंगे? कुछ दिन पूर्व ही आमिर ने अपना बच्चा सरोगेसी से हासिल किया है. 

क्या किसी महिला के मातृत्व और स्वास्थ्य एवं भावनाओं से खिलवाड़ का हक उन्हें केवल इसीलिए मिल जाता है कि उनके पास अथाह पैसा है? जबकि बच्चे पर हक तो उसे पैदा करने वाली मां का ही होता है. बच्चे की चाहत तो किसी अनाथ बच्चे को गोद लेकर भी पूरी की जा सकती थी. जबकि सरोगसी की अवधारणा पितृसत्ता को ही पोषित करती है और एक महिला की मजबूरी का निर्मम फायदा उठाती है.

पिछले दस पन्द्रह सालों में दुनिया के तेजी से बदलते हालात ने मध्य वर्ग के एक हिस्से में व्यवस्था विरोधी रुझान पैदा किया है. तभी से मध्य वर्ग के इस हिस्से के व्यवस्था विरोधी रुझान को बांधने या सीमित करने के प्रयास भी तेज हो गए हैं. इसमें जाने अनजाने बहुत से एनजीओ, राजनीतिक-सामाजिक आन्दोलन व हमारी साहित्यिक बिरादरी का एक हिस्सा भी लगा हुआ है. आमिर के इस प्रोग्राम को भी हम इसी व्यापक प्रयास के एक हिस्से के रूप में देख सकते हैं जहां मध्यवर्ग के इस हिस्से की व्यवस्था परिवर्तन की आकांक्षा को महज एसएमएस और चिट्ठी पत्री तक सीमित कर देने की एक सचेत/अचेत साजिश चल रही है.

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