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Sunday, May 6, 2012

सुलगते दिमागों की उड़ान को चाहिए दिशा

http://news.bhadas4media.com/index.php/yeduniya/1325-2012-05-06-13-47-41

[LARGE][LINK=/index.php/yeduniya/1325-2012-05-06-13-47-41]सुलगते दिमागों की उड़ान को चाहिए दिशा     [/LINK] [/LARGE]
Written by डा. सुभाष राय Category: [LINK=/index.php/yeduniya]सियासत-ताकत-राजकाज-देश-प्रदेश-दुनिया-समाज-सरोकार[/LINK] Published on 06 May 2012 [LINK=/index.php/component/mailto/?tmpl=component&template=youmagazine&link=5d1c91151fafca2e22ced4359273a9edaa9ad799][IMG]/templates/youmagazine/images/system/emailButton.png[/IMG][/LINK] [LINK=/index.php/yeduniya/1325-2012-05-06-13-47-41?tmpl=component&print=1&layout=default&page=][IMG]/templates/youmagazine/images/system/printButton.png[/IMG][/LINK]
जलालुद्दीन रूमी की अपनी उड़ान थी। ..मैं जरूर उड़ूँगा/ मेरा जन्म संभावनाओं के साथ हुआ है/ मेरा जन्म अच्छाई और भरोसे के साथ हुआ है/ मेरा जन्म विचारों और सपनों के साथ हुआ है/ मेरा जन्म महानता के साथ हुआ है/ मेरा जन्म आत्मविश्वास के साथ हुआ है/ मेरा जन्म पंखों के साथ हुआ है/ इसलिए, मैं रेंगने के लिए नहीं बना हूं/ मेरे पास पंख हैं, मैं उड़ूँगा/ मैं उड़ूँगा, और उड़ूँगा।...और रूमी अपने पंखों पर सवार रहते थे। सूफी कवियों में उनका नाम बहुत सम्मान के साथ लिया जाता है। अब्दुल कलाम को रूमी बहुत पसंद हैं, उनकी रचनाएं भी। कलाम की भी अपनी उड़ान रही है। उनके भीतर अब भी उड़ान है। कभी राकेट की, मिसाइल की, उपग्रहों की उड़ान थी, अब देश के भविष्य चिंतन की उड़ान है।

वे बच्चों के बीच खुद को बहुत सहज महसूस करते हैं। कहीं भी क्लास लगा देते हैं। बहुत सारी बातें बताते हैं। मसलन माँ को खुश रखना, पिता को बेईमान मत होने देना, पेड़ लगाना, ज्ञान हासिल करना, ज्ञान के अलावा कुछ नहीं है, असाधारण बनना, भीड़ की कोई पहचान नहीं होती है, पहचान होती है किसी आइंसटीन की, किसी ग्राहम बेल की, किसी एडिसन की, किसी रामानुजम की, इसलिए अपनी पहचान बनाओ और सोचो तुम उड़ान भर सकते हो, ऊंचाइयाँ छू सकते हो, अंतरिक्ष के पार जा सकते हो। बच्चों को ऐसा बताते हुए उन्हें रूमी बहुत याद आते हैं। रूमी की पूरी कविता उन्होंने एक शपथ की तरह इस्तेमाल की है, अब भी कर रहे हैं। बच्चों से बातचीत के बाद, अपनी बातें कहने के बाद वे इस कविता से उन्हें शपथ दिलाते हैं। कहते हैं, साथ-साथ दुहराओ। बच्चे दुहराते हैं। अपने गुजरे सात सालों में उन्होंने डेढ़ करोड़ से ज्यादा बच्चों को यह शपथ दिलायी है..मैं उड़ूँगा, जरूर उड़ूँगा।

13वीं शताब्दी में कोई परसियन कवि जिस उड़ान की बात कर रहा था, वह 21वीं सदी में कलाम के काम आ रही है, एक हजार साल बाद की पीढ़ी के काम आ रही है, यह सोच कर हैरत होती है। रूमी को सारी दुनिया उनकी रूबाइयों, गजलों और उनके दार्शनिक गद्य के लिए जानती है। एक जगह वे लिखते हैं, मैं मिट्टी की तरह मरा और पौधे की तरह उगा, पौधे की तरह मरा और जानवर की तरह पैदा हुआ, जानवर की तरह मरा और आदमी बन कर आया। मरने से क्या डरना, मैं आदमी की तरह मरूंगा और फरिश्ते की तरह जन्मूगा। हर मृत्यु एक नयी ऊंचाई देती जायेगी मुझे। जब मैं फरिश्ते की तरह मरूंगा तो कोई कल्पना नहीं कर सकता, किस तरह सामने आऊंगा। शायद समूची ईश्वरीय संभावनाओं के साथ। सूफी प्रेम को जीवन की बड़ी उपलब्धि मानते आये हैं। रूमी भी मानते थे। तुम बाहर क्या खोज रहे हो, बाहर क्या पाना है, भीतर देखो, सब कुछ वहां है। वो जो तुम्हारे भीतर है, उससे प्रेम करना सीखो।

यह वही प्रेम है जो कबीर की रचनाओं में और गुंफित तथा सघन होकर आता है। जब हरि था तब मैं नहीं, अब मैं है, हरि नाहिं, प्रेम गली अति सांकरी, जा मे दो न समाहिं या कबिरा यह घर प्रेम का खाला का घर नाहि, सीस उतारे भुई धरे तब पैठे घर मांहि। यह ढाई आखर बहुत खास है। अधिकांश भक्त कवियों में यह प्रेम किसी न किसी रूप में दिखायी पड़ता है। इस प्रेम के लिए भारी कीमत चुकानी पड़ती है लेकिन यही मनुष्य को मनुष्य होने का बोध कराता है। इस बोध से ही पैदा होती है मनुष्य से जुडऩे, उसकी कठिनाई, उसकी पीड़ा को महसूसने की शक्ति, मनुष्यविरोधी कार्रवाइयों के खिलाफ जूझने की शक्ति। कौन नहीं जानता कबीर किस तरह हमेशा बाहर की दुनिया से, उसके पाखंड और छद्म से लड़ते रहे, धूर्तो को ललकारते रहे, सहज जीवन स्वीकार करने की सलाह देते रहे।

कलाम जानते हैं कि आने वाले वक्त के बच्चों को इस प्रेम की जरूरत है। उनमें आग तो है, उनके पास सुलगते हुए दिमाग तो हैं, उनके पास कुछ नया रचने वाली चिंनगारियां तो हैं, उनमें जोश भी है पर इस ताकत को दिशा चाहिए। आग लोहे को पिघलाकर उसे मशीन के रूप में भी ढाल सकती है और बस्ती को, जंगल को जला कर राख भी कर सकती है। बच्चों में आग है यह मौजूदा वक्त के लिए प्रासंगिक है पर उसका केवल रचनात्मक इस्तेमाल हो, वे अपनी दिशा पहचानें, भटकें नहीं, यह उससे भी ज्यादा जरूरी है। उनमें उड़ान हो पर किसके लिए? समाज के लिए, देश के लिए और उससे भी ऊपर सारी दुनिया के लिए। उनकी उड़ान का मकसद आत्म केंद्रित नहीं होना चाहिए। यह तो स्वार्थ होगा। यही भटकाव की दिशा में फेंक देता है। यही पद, पैसा और अपने लाभ के चिंतन की ओर मोड़ देता है। सब जानते हैं, देश में कितना भ्रष्टाचार है, सब चिंतित भी है। यह तो बहती गंगा है। नयी पीढिय़ाँ आती हैं और उसमें हाथ धोने लगती हैं। आजादी के बाद कम से कम चार पीढिय़ाँ आ चुकी हैं लेकिन देश की हालत सुधरने के बजाय बिगड़ती ही गयी है। अन्ना को जिस तरह समूचे देश से समर्थन मिला, उससे समझा जा सकता है कि लोगों में भ्रष्टाचार को लेकर कितना गुस्सा है।

लेकिन न उम्मीद छोडऩी चाहिए, न सपने। उम्मीदें ही बदलाव की दिशा में सक्रिय करती हैं, सपने उस प्रक्रिया को तेज करते हैं। कलाम चाहते हैं कि बच्चे सपने देखें, अपनी ऊर्जा का उन सपनों की उड़ान तक पहुंचने में इस्तेमाल करें। कलाम ही नहीं और लोग भी ऐसा चाहते हैं, ऐसा सोचते हैं। केवल इस तरह सोचने वालों की संख्या जितनी बढ़ेगी, देश को सकारात्मक दिशा में ले जाने वाली ऊर्जा की लहरें उतनी ही तेज होंगी। इससे तुरंत कोई बड़ा परिवर्तन होता हुआ भले न दिखे पर भीतर कहीं गहरे, तलहटी में सामाजिक अंतक्रिया सघन से सघनतर होती जायेगी। बेशक आज के बच्चों का इसमें बड़ा योगदान होना चाहिए, वे तैयार भी हैं। कौन नहीं चाहेगा, कलाम के सपने सच हों। कौन नहीं चाहेगा, हमारा देश दुनिया में अग्रणी देश बने। केवल आर्थिक स्तर पर ही नहीं, सामाजिक स्तर पर भी, सांस्कृतिक स्तर पर भी, चिंतन, दर्शन, कला और साहित्य के स्तर पर भी। समाज को संपन्नता भी[IMG]/images/stories/food/srai901.jpg[/IMG] चाहिए, संस्कार भी और संवेदना भी। केवल अर्थ निरर्थक है और आज के समाज में अधिकाधिक संख्या में लोग इसी अर्थ-दर्शन के प्रभाव में हैं। बच्चे भी इससे मुक्त नहीं हैं। इसी कारण समाज कई स्तरों पर विभाजित हो गया है। जाति, धर्म, धन के स्तर पर बंटवारे की लकीरें गहरी हुई हैं। यह विषमता भी संवेदन और प्रेम से ही खत्म हो सकती है। इसमें हमारी मदद रूमी कर सकते हैं, कबीर कर सकते हैं और कलाम भी।

[B]लेखक डा. सुभाष राय वरिष्ठ पत्रकार हैं. इनसे संपर्क 09455081894 के जरिए किया जा सकता है.[/B]

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