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Sunday, July 21, 2013

लौट के बुद्धू घर को आए (3)

लौट के बुद्धू घर को आए (3)


जगमोहन फुटेला


चैनल ऑन डिमांड का मतलब है-आप किसी भी पार्टी से चुनाव लड़ रहे हो और आप को अगर किसी चैनल की ज़रूरत है तो आओ हम तुम्हारी शर्तों पे तुम्हारी जय जयकार करेंगे. बस अपने एरिया में प्रीत से या पीट के केबल पे चैनल तुम चलवाना. ऐसे में परहेज़ चैनल को किसी से नहीं होगा. आप की पार्टी कोई हो, आप का चरित्र कैसा भी हो. चैनल अपने चरित्र को चलचित्र बना देगा तो देखो या दिखाओ कुछ भी. सुविधा शुल्क होने से होने को होगा ये भी कि गुड़गांव में आप मदद कांग्रेस की करो, सोहना में भाजपा की, पटौदी में इनेलो की और नूह में किसी और की.

 

यही वजह हो सकती है कि चैनल ड्राई रन पे भी आ चुका है मगर डिस्ट्रीब्यूशन और मार्केटिंग के लिए किसी को भी रखा नहीं गया है. कंपनी को पता है कि चैनल चलवाना कैसे है और माल कटेगा कहां से. ऐसी किसी व्यवस्था में चूंकि किसी संपादक या (डील के लिए) बाहरी आदमी की कोई गुंजायश नहीं होती सो विनोद मेहता, फुटेला या किसी संजय द्विवेदी की कोई ज़रूरत नहीं होती. खांड और उस के लिए भांडगिरी के धंधे में किसी पत्रकार की अहमियत किसी झुनझुने से अधिक नहीं होती. उस की तरह बजने को तैयार कोई पत्रकार तो होगा भी कौन?

 

लेकिन किरन है न! वो घर की है. बहन है वो डा. कादियान के दामाद की. उस के साथ एक अच्छी बात ये है कि वो पत्रकार नहीं है. उसे कहीं और नौकरी भी नहीं करनी. सो छवि, चरित्र की चिंता क्या? पत्रकार जैसे भी हैं उसने विनोद मेहता का, मेरा और संजय द्विवेदी का चेहरा दिखा कर भर्ती कर लिए हैं. इवेल्युएशन का डर दिखा कर वो रिपोर्टर से गाड़ी चलवा रही है, एंकर से घी के डिब्बों पे स्टीकर चिपकवा रही है और अपनी तरह की मार्केटिंग भी वो कराएगी घी, पनीर भी लौंच हो जाने के बाद फ्री हो जाने वाली अपनी डेयरी की टीम से.

 

इस बीच उस ने जुगाड़ कर लिया है कि किसी पत्रकार के भीतर कभी कोई ग़ैरत जागे भी तो वो भागे न. अपाइंटमेंट लैटर कोई है नहीं. होगा भी तो उस में तीन महीने में जाने और एक महीने में निकालने की शर्त होगी. तनख्वाह वैसे भी करीब एक महीने बाद मिलनी है तो कीमत उस एक महीने की भी वसूल हो ही जानी है. कैंटीन ऊपर है, सेक्योरिटी आगे भी, पीछे भी. सीसीटीवी भी चप्पे चप्पे पे है ही और बाहर जाने से पहले ऊँगली भी हाज़िरी मशीन पे लगानी ही है. सो कोई जाएगा भी कहां? जाने की परमीशन तो किसी को उन के कमरे से बाहर भी नहीं है. इजाज़त तो अपने कमरे से बाहर निकल के किसी को फोन करने तक की भी नहीं है. इसकी भी वजह है.

 

लैंडमार्क की इस बिल्डिंग में रोते, पीटते, बिलखते रोज़ बीसियों लोग आते हैं. वे जिन को घर का सपना बेच कर पैसे ले लिए हैं. लेकिन घर नहीं दिया है. लड़ झगड़ के चेक भी मिला है तो वो बाउंस हो गया है. ऐसे लोग जैसे ही बिल्डिंग में घुसते हैं तो कंपनी की एक फौज उन को घेर के किसी न किसी केबिन में ले जाती है. कंपनी नहीं चाहती कि मीडिया में तो अपने भी लोगों को पता चले. गाड़ी, ड्राइवर के बिना शूट जैसे फरमान इसी लिए हैं कि बंदे बिजी नहीं, बाहर भी रहें. बेईमानी के धंधे में बचाने और छुपाने को हमेशा बहुत कुछ रहता है. इस लिए मीडिया के बंदे नीचे तहखाने में जाएंगे. कंपनी उन का डबवाली या उपहार कांड कर के मानेगी.

 

ग्राउंड फ्लोर के नीचे बेसमेंट दो हैं. सब से नीचे वाली में डेयरी का सामान और डेयरी के बंदे बैठते हैं. पहली बेसमेंट में स्टूडियो और न्यूज़ रूम बन रहा है. बेसमेंट में किसी तरह की कोई गतिविधि नहीं हो सकने की कानूनी बंदिश के बावजूद. फायर ब्रिगेड डिपार्टमेंट से कोई परमीशन नहीं है. न लेबर डिपार्टमेंट को इतने बंदों की भर्ती की कोई जानकारी. सरकार अपने ससुर की है. परमीशन की परवाह किसे है. सौ पचास लोग हमेशा इस गुफा में होंगे. ख़ुदा न खास्ता अगर कभी आग लगी तो भागने का रास्ता बहुत संकरा और सिर्फ एक दिशा में है. निचली वाली बेसमेंट वालों का ऊपरी बेसमेंट की आग से बच के निकल सकने का तो कोई चांस ही नहीं है. बिल्डिंग के दाईं ओर का रास्ता स्टूडियो की साउंड प्रूफिंग के चक्कर में स्थाई रूप से बंद कर दिया गया है. ज़रूरत किसी आगज़नी के अंदेशे से इन जिंदगियों को बचाने की भी है. बेसमेंट में कोई बंदे नहीं बिठा सकता. मैं सब को सलाह दूंगा कि हरियाणा के चीफ सेक्रेटरी का मेल बॉक्स (cs@hry.nic.in) ऐसे अनुरोधों से भर दो. फिर भी कुछ न हुआ तो हाईकोर्ट की शरण में मैं जाऊंगा.

 

पंजाबी के महान लोककवि सुरजीत पातर का एक मशहूर गीत है- कुझ किहा ते हनेरा जरेगा नहीं, चुप रिहा ते शमादान की कैणगे (मेरे कुछ कहने से अंधेरा रौशन नहीं हो जाएगा, चुप रहा तो दिये क्या कहेंगे). पत्रकारिता के नाम ये सब भांडगिरी होती देखने के बाद मेरे (या किसी के भी) पास क्या विकल्प हो सकते थे. लाखों रूपये का पैकेज मगर मेरे दिल, दिमाग और मेरी रूह पर पेपरवेट नहीं हो सका. कुछ आभारी मैं यशवंत का भी हूं. पता नहीं किस पीनक, प्यार या अधिकार से उस ने मुझे मेल भेज कर इस कंपनी से विदा हो जाने की बददुआ दी थी. मगर उस फ़कीर की वो बददुआ, दुआ बन के काम आ गई और आज मैं कम से कम उन लोगों से माफ़ी मांग सकने की हालत में तो हूं जो मेरी वजह से अपनी अपनी नौकरियां छोड़ के आए या आ रहे थे. मैं स्वीकार करता हूं कि मुझ से लैंडमार्क वालों की नीयत समझने में गलती हुई है. लेकिन इस भूल ने भी मेरे सामने सीखने को बहुत कुछ छोड़ा है. मैं जानना चाहूंगा कि_


- क्या किसी को भी किसी एक चुनाव, एक पार्टी या किसी एक नेता के लिए चैनल चलाने का हक़ है?

- क्या किसी भी चैनल का संपादक कोई ऐसा व्यक्ति हो सकता है जिस ने अपने जीवन में वेज बोर्ड के हिसाब से वेतन न देने वाले किसी भी मीडिया संस्थान में कम से कम पांच साल नौकरी न की हो?

- क्या किसी भी चैनल में काम करने वाले पत्रकार को कम से कम छ: महीने की सुरक्षा की गारंटी नहीं होनी चाहिए?..या कम से कम इतना कि उस पे तीन महीने का नोटिस लाज़िम होगा तो तीन ही महीने का कंपनी पे भी हो.

 

जहां तक लैंडमार्क की बात है तो उस को तो ये भी बताना ही पड़ेगा एक दिन कि विनोद मेहता के चार महीने से 'खबरें अभी तक' पे दिख रहे होने के बावजूद वे मिनिस्ट्री के रिकार्ड में वे इन के संपादक कैसे चलते रहे? बेसमेंट से कमर्शियल एक्टिविटी कैसे चल रही है और बिना किसी नियुक्ति पत्र के अगर एक दिन भी किसी से काम उन्होंने कराया है तो वो बंधुआ मज़दूरी नहीं तो और क्या है?

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