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Monday, December 16, 2013

कारपोरेट अश्वमेध अभियान में सर्वत्र स्त्री ही निशाने पर है और नस्ली भेदभाव,जाति व्यवस्था और लिंग वैषम्य का समीकरण एकाकार! स्त्री न सिर्फ सबसे संवेदनशील है, न केवल सबसे सक्रिय है, वह सबसे ज्यादा प्रतिबद्ध,सबसे ज्यादा सामाजिक और सबसे ज्यादा जुझारु है! पलाश विश्वास

कारपोरेट अश्वमेध अभियान में सर्वत्र स्त्री ही निशाने पर है और नस्ली भेदभाव,जाति व्यवस्था और लिंग वैषम्य का समीकरण एकाकार!

स्त्री न सिर्फ सबसे संवेदनशील है, न केवल सबसे सक्रिय है, वह सबसे ज्यादा प्रतिबद्ध,सबसे ज्यादा सामाजिक और सबसे ज्यादा जुझारु है!


पलाश विश्वास

Sudha Raje shared Soumitra Roy's photo.

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जब समाज, व्‍यवस्‍था और तंत्र रेप के मामलों को शहरी-ग्रामीण, दलित-सवर्ण, हिंदू-मुस्‍लिम, चरित्र-चाल चलन, राजनीति, वोट बैंक जैसे अलग-अलग चश्‍मे से देखने लगता है तो ऐसे भयावह आंकड़े सामने आते हैं।


24 Ghanta

আইন বদলেছে, সমাজ বদলেছে কি? এক বছর পরও প্রতিদিন মেয়ের কান্না শুনতে পান নির্ভয়ার বাবা

http://zeenews.india.com/bengali/nation/nirbhaya-s-father-after-one-year_18591.html


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हर स्त्री में गोर्की की मां कहीं न कहीं होती है जो कभी न कभी अभिव्यक्त होती है। लेकिन हर पुरुष में आदिविद्रोही नहीं होता।इसके उलट मिजाज से,चरित्र से अत्याधुनिक हो ने के बावजूद ज्यादातर पुरुष सामंती स्वभाव के होते हैं। स्त्री के विरुद्ध ही यह सामंती चरित्र का विस्फोट होता है।इसी दुर्बलता को स्त्री नरकद्वार जैसे लोकप्रिय मुहावरों से गौरवान्वित किया गया है।


आज फिर पुरुषतंत्र स्त्री उत्पीड़न के विरुद्ध फर्जी प्रतिवाद का जश्न मना रहा है। जबकि हमारी जेहन में गुवाहाटी की सड़क पर दिनदहाड़े नंगी कर दी गयी आदिवासी लड़की के लिए न्याय की आवाज बुलंद हो रही है।हमारी आंखों में इंफल की उन नग्न माताओं का प्रदर्शन आज भी जिंदा है,जो सैन्य शक्ति क बलात्कार की चुनौती दे रही हैं तबस लगातार। भारतीय लोक गणराज्य में फिलवक्त कोई स्त्री कहीं भी सुरक्षित नहीं है। हमने ऐसा मुक्त बाजार चुना है कि पुरुषतंत्र की नंगी तलवारे हर पल स्त्री के वजूद को कतरा कतरा काट रहा है।


निर्मम राष्ट्र, मुक्त बाजार और लंपट समाज में फिरभी लेकिन स्त्री न सिर्फ सबसे संवेदनशील है, न केवल सबसे सक्रिय है, वह सबसे ज्यादा प्रतिबद्ध,सबसे ज्यादा सामाजिक और सबसे ज्यादा जुझारु है। अब भी।इस पर विद्वत जनों को आपत्ति हो सकती है और असहमति भी हो सकती है। लेकिन यह मेरी राय है जिसे मैं आपसे साझा कर रहा हूं। कोलकाता में अनुवादक सुशील गुप्ता के निधन पर बतौर श्रद्धांजलि।


इस बारे में सोचता रहा तो हमारे जीवन में महत्वपूर्ण तमाम भूमिकाओं की याद आ गयीं। सुशील जी को श्रद्धांजलि के बहाने मैंने उनकी चर्चा करने का फैसला किया क्योंकि उनकी चर्चा फिर कभी कर पाउं या नहीं जानता।बिना कुछ लिखे अगर अंत आ गया या अपने दोस्त जगमोहन फुटेला की तरह निष्क्रिय हो गया तो हमारी कृतज्ञता अभिव्यक्त होने से रह जायेगी।




  1. सुशील गुप्ता : CHAUTHI DUNIYA : चौथी दुनिया

  2. www.chauthiduniya.com/tag/सुशील-गुप्ता

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  4. अनुवाद से जगती उम्मीदें. हिंदी में अनुवाद की हालत बेहद ख़राब है. जो अनुवाद हो भी रहे हैं, वे बहुधा स्तरीय नहीं होते हैं. अनुवाद इस तरह से किए जाते हैं कि मूल लेखन की आत्मा कराह उठती है. हिंदी के लेखकों में अनुवाद को लेकर बहुत उत्साह भी नहीं ...

  5. सुशील गुप्ता - अनुभूति

  6. www.anubhuti-hindi.org/chhandmukt/s/.../index.htm

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  8. सुशील गुप्ता. जन्मः १ जनवरी १९४६, कोलकाता में। प्रकाशित कृतियाँ कविता संग्रह- अक्स-दर-अक्स, शब्द साक्षी हैं, आग से गुज़रते हुए अनुवाद- ८० बांग्ला उपन्यासों का। अन्य ४५ से अधिक वृत्त-चित्रों का दूरदर्शन के लिए निर्माण पुरस्कार/सम्मानः ...



बांग्ला से हिंदी में अनुवाद के लिए कभी राजकमल चौधरी जैसे लेखक हुआ करते थे, चौरंगी का अनुवाद मूल रचना से कहीं ज्यादा बेहतर है।ऐसा मेरा मानना है।बांग्ला और हिंदी दोनों के जानकार दिवंगत कवि शलभ श्रीराम सिंह भी ऐसा मानते रहे हैं। लेकिन अब कोई बड़ा लेखक कोलकाता में यह कर्म नहीं कर रहा है।


पिछले दो दशकों में दिवंगत मुनमुन सरकार ने बेहद महत्वपूर्ण  अनुवाद किये तो उन्हींके साथ अनुवाद लगातार करती रहीं सुशील गुप्ता। मुनमुन के अवसान के बाद नीलम शर्मा अंशु ने भी बांग्ला से हिंदी में महत्वपूर्ण अनुवाद किये।


संजोग से तीनों स्त्रियां हैं। तीनों को विभिन्न कारणों से जानता रहा हूं। यही नहीं,हिंदी से बांग्ला में महत्वपूर्ण अनुवाद भी एक स्त्री निरंतर कर रही हैं,भाषा बंधन के लिए सोमा।अल्पसंख्यक उत्पीड़न की तस्वीरें प्रस्तुत करने वाली तसलिमा नसरीन से भारतीय पाठकों का निरंतर संवाद इन्हीं तीन अनुवादकों की वजह से संभव हुआ है।


स्त्री विमर्श में कोलकाता की ही प्रभा खेतान का अभूतपूर्व योगदान का स्मरण किये बिना यह प्रसंग पूरा नहीं होता। प्रभा जी न केवल बड़ी लेखिका थीं ,स्थापित उद्यमी भी थीं वे। जून 1995 में जब सविता को ओपन हर्ट सर्जरी करवानी पड़ी,तब बिना किसी मुलाकात औपचारिक परिचय के उन्होंने हमारी मदद सबसे पहले की थी। इस हिदायत के साथ कि हम कहीं उनकी मदद का जिक्र न करें।प्रभा जी का लेखन तो अद्भुत है ही, उनके व्यक्तित्व के इस पक्ष को हम भुला नहीं सकते।



दरअसल,इरोम शर्मिला,सोनी सोरी तो क्या अभी हमारी मुलाकात अरुंधति राय से भी नहीं हुई है। लेकिन हम उन्हें संपूर्ण भारत और बहुसंख्य भारतीयों की आवाज मानते हैं।


जहां तक मेरा सवाल है, महाश्वेता दी से मुलाकात नहीं होती तो शायद मैं अब तक कविता,कहानी और उपन्यास ही लिख रहा होता।हालांकि परिवर्तन उपरांत वर्षों से मेरा उनसे कोई संवाद नहीं है,लेकिन  अब भी मैं उनके परिवार का सदस्य हूं।


मेरे परिवार की स्त्रियों के अलावा स्कूल से लेकर विश्वविद्यालय में जिन स्त्रियों ने मेरा चरित्र निर्माण किया है,मुझे दृष्टि के साथ साथ बिना शर्त एकतरफा प्यार और समर्थन दिया है,उन सभी को याद करतेहुए यह आलेख।


मेरी मां, ताई,चाची, बुआ,दादी,नानी,मेरी बहनों के अलावा मेरे गांव की तमाम माताओं और बहनों के साथ साथ दिनेशपुर की छत्तीस कालोनियों की तमाम स्त्रियों का मेरे विकास में भारी योगदान है।


मैडम ख्रीष्टी ने पहली बार मुझे स्कूल से बांधा। दिनेशपुर हाई स्कूल में पहलीबार किसी युवा स्त्री जीवविज्ञान शिक्षक गीता पांडेय ने मेरे कैशोर्य को दिशा देने में भूमिका निभाई।


तो नैनीताल डीएसबी की तमाम अध्यापिकाओं ने संकाय और विषयों के आर पार जो एक शरणार्थी अछूत को अपनाया,उसे मैं भुला नहीं सकता।


हिंदी की उमा भट्ट,नीरजा टंडन,अंग्रेजी की श्रीमती अनिल बिष्ट,श्रीमती मधुलिका दीक्षित, श्रीमती नीलू कुमार,समाज शास्त्र की श्रीमती प्रेमा तिवारी और दीपा खुलबे से लेकर भौतिकी शास्त्र की श्रीमती कविता पांडेय तक ने हमेशा हमारा साहस बढ़ाया।


इलाहाबाद में 100 लूकर गंज के किराये के शेखर जोशी के किराये को डेरे पर इजा ने प्रतुल,बंटी और संजू के साथ मुझे जिसतरह परिवार का सदस्य बना लिया,वह मैं कभी नहीं भूल सकता।


मेरी पत्नी सविता अर्थ शास्त्र से एमए हैं। उन्होंने अपनी जिंदगी मेरी जिंदगी में जैसे खपा दी,वह कोई स्त्री ही कर सकती है। अपनी महत्वांकाक्षाओं को उन्होंने तिलांजलि दे दी क्योंकि मेरी कोई महत्वाकांक्षा नहीं है।बरेली में उनकी पक्की नौकरी थी,छोड़कर जनसत्ता में हमारी नौकरी के लिए चली आयी। मैंने जब भी जनसत्ता छोड़नेका मन बनाया या मुझे कोई ललचाने वाला प्रस्ताव मिला उसने हमेशा यही कहा कि हमें इफरात पैसे नहीं चाहिए। हम अब भी जनसत्ता में बने हुए हैं तो उसकी जिद की वजह से ही।उन्होंने हमें कोई दूसरा विकल्प चुनने का मौका ही नहीं दिया।


हम कोलकाता में बिल्कुल नये थे और उनकी ओपन हर्ट सर्जरी डा. देवी शेट्टी के हाथों हो गयी।डा. शेट्टी ने एक पैसा नहीं लिया।डा.चोरारिया जो सविता के डाक्टर थे,उन्होंने भी अपनी फीस नहीं ली।तब इंडियन एक्सप्रेस समूह के तमाम पत्रकार गैर पत्रकार हमारे साथ खड़े थे।


सविता के दिल में ट्यूमर था और कोलकाता में यह इसतरह का पहला आपरेशन था।


डा.शेट्टी ने आंधी पानी के बीच सविता के दिल का हाल जानने के बाद तुरंत आपरेशन के लिए त्तकाल डोनरों को बुलाने के लिए कहा तो हमारे मोहल्ले के तमाम लोग अस्पताल पहुंच गये उस भयानक मौसम में तीस किमी दूर।


सविता फिर वह मोहल्ला छोड़ने को तैयार नही ंहुई।अन्यत्र सोदपुर के आसपास सस्ती जमीन तब इफरात थी।लेकिन उन लोगों को छोड़कर कहीं और बसने का उसने सोचा तक नहीं।हाल यह है कि हमारे मोहल्ले के सारे निजी घर बहुमंजिली इमारतों में तब्दील हो गयी। एक एक फ्लैट पचास पचास लाख का।कहीं एक इंच जमीन भी खाली नहीं। हम जहां थे,वहीं बने रहे।


सविता को दो साल बाद रिटायर होने की उतनी चिंता नहीं है ,जितनी कि अपना मोहल्ला और वे सारे पड़ोसियों को छोड़ने की चिंता है। जिनका कर्ज साधने के लिए खुद अस्वस्थ होने के बावजूद किसीभी मरीज को लेकर वह अस्पताल पहुंचती है सबसे पहले। किसी की मौत हो जाये तो अस्पाताल से पार्थिव शरीर लेकर श्मसान भी पहुंच जाती।


इस लिहाज से मैं पूरीतरह असामाजिक हूं और आस पास के सारे सामाजिक सांस्कृतिक कार्यक्रमों में उसकी उपस्थिति अनिवार्य है।वह जाति धर्म और भाषा के बंधन में नहीं है।


बामसेफ की सीमाओं पर अंबेडकरी आंदोलन की विसंगतियों और फतवेबाजी से सख्त ऐतराज होने के बावजूद उसने हर कदम पर हमारा साथ निभाया।


हमारे घर में धर्म,जाति,रंग और भाषा की कोई दीवार नहीं है,तो यह हमारी दादी से लेकर सविता तक सारी स्त्रियों का ही करिश्मा है।


जाति उन्मूलन का एजंडा हो या फिर भेदभाव मिटाकर समामाजिक न्याय और समता की स्थापना का लक्ष्य पुरुष वर्चस्व को तोड़े बिना हम एक कदम भी नहीं बढ़ सकते।


सारी विषमता की जड़ है पुरुषतांत्रिक धर्म व्यवस्था और कारपोरेट अर्थव्यवस्था में धर्मोन्मादी राष्ट्रवाद निरंतर इस दुश्चक्र को जटिल से जटिल बना रहा है।


इस स्त्री को मैं पिछले तीस साल से जानता हूं।उसका मानस और मिजाज समझने में तीस साल लग गये।अभी पूरी तरह नहीं समझ सका।

दरअसल हम लोग स्त्री को उसकी देह के पार कभी समझने की कोशिश नहीं करते।सर्वोच्च प्राथमिकता देह दखल की होती है। अब मुक्त बाजार में देह भी उपभोक्ता बाजार है।


अब स्त्री कहीं भी अकेली है। निपट अकेली।


उनमें से हरकिसी का मानस कमोबेश सविता का जैसा ही होगा, मुझे पक्का यकीन है।


स्त्री चूंकि खुद को कुर्बान करके सबके लिए सोचती है,इसीलिए परिवार,सामाज और देश का वजूद कायम है।


हमने तमाम आदिवासी इलाकों में और पूरे हिमालयी दुनिया में हमेशा पाया है कि हर स्त्री प्रकृति और पर्वावरण के संरक्षण में प्रतिनियत सक्रिय है।


गर हम समझते हैं कि सुंदरता,देहगंध और लिंग वैषम्य के कारण ही स्त्री पर अत्याचार हते हैं,तो सिरे से हम गलत हैं।


उत्तर आधुनिक समाज में उच्च शिक्षा और उच्च तकनीक से लैस स्त्री जन्मजात दक्षता,प्रबंधन कुशलता और नेतृत्व,समर्पण और प्रतिबद्धता से पुरुष वर्चस्व तोड़ने लगी हैं,नगरों,महानगरों पेशावर जीवन में और कार्यस्थलों में स्त्री विरोधी हिंसा का कारण यह है तो सबसे बड़ा कारण यह है कि लोक और जमीन से सबसे ज्यादा जुड़ाव है स्त्री का।


प्राकृ्तिक संसाधनों पर कब्जा स्त्री दमन के बिना असंभव है।


इसीलिए कारपोरेट अश्वमेध अभियान में सर्वत्र स्त्री ही निशाने पर है और नस्ली भेदभाव,जाति व्यवस्था और लिंग वैषम्य का समीकरण एकाकार है।


इस युद्ध को अंततः स्त्री के नेतृत्व से ही जीता जा सकता है।अन्यथा असंभव है यह प्रतिरोध।


मैं भारतीय साहित्य में आशापूर्णा देवी,इंदिरा गोस्वामी, कुर्तउल एल हैदर,महाश्वेता देवी,तसलिमा नसरीन, कृष्णा सोबती, मैत्रैयी पुष्पा से लेकर अद्यतन नयी लेखिकाओं और रचनाकारों का आभारी हूं कि उन्होंने बंद समाज के दरवाजे खोलने के लिए,खिड़कियां खोलने के लिए सबसे ज्यादा संघर्ष किया।


मैं मायावती और ममता बनर्जी का समर्थक नहीं हूं,लेकिन राजनीति में जिस संघर्षयात्रा के मार्फत उनकी अग्निदीक्षा हुई,उस संघर्ष को मेरा सलाम।


इसी तरह भारतीय राजनीति और लोकतांत्रिक व्यवस्था में बिना प्रतिनिधित्व के तृणमूल स्तर से लेकर राष्ट्रीय राजनीति में महिलाओं की ईमानदार सक्रियता को भी सलाम।


उनके बिना भारतीय लोकतंत्र निरर्थक हो जाता।


राजनीति को जो भी मानवीय चेहरा है वह उसका स्त्री मुख ही है,यह कहने में मुझे कोई हिचक नहीं है यह जानते हुए कि बाजार की तरह राजनीति में भी स्त्री का इस्तेमाल का तंत्र बेहद निरंकुश है।


ऐसा कार्यस्थलों पर भी है।परिवार और समाज में भी है।स्त्री सशक्तीकरण के साथ साथ यह संकट दिनोंदिन गहराता जा रहा है।स्त्री पर बढ़ते अत्याचारों के पीछे सबसे बड़ा कारण भी यही है।


युद्ध,गृहयुद्ध,दंगा,दमन और सैन्यतंत्र में,रंगबिरंगे सलवा जुड़ुम में नपुंसक पुरुष वर्चस्व के निशाने पर भी है वही स्त्री देह।


तमाम माध्यमों में और तमाम विधाओं में, पवित्र ग्रंथों तक में और यहां तक कि लोक में भी स्त्री आखेट के आख्यान ही केंद्रीय थीम सांग है।इन सारी सीमाओं को तोड़कर स्त्री का विकास लगातार हो रहा है ,यह मनुष्यता और सभ्यता के टिके रहने का रहस्य है।


भारतीय फिल्मों में मुख्यधारा की मदर इंडिया और मेघे ढाका तारा व पथेर पांचाली जैसी क्लासिक कला फिल्मों से  लेकर तमाम समांतर कला फिल्मों में और यहां तक कि कथित मसाला फिल्मों में स्त्री की इस संघर्षयात्रा का फिल्मांकन भारतीय लेखन से ज्यादा ईमानदारी से हुआ है।


एक शबाना आजमी को देख लीजिये और अकाल दिवंगत स्मिता पाटील को याद कर लीजिये,इतने विविधता पूर्ण भूमिकाओं की चुनौती निभाने वाले कलाकार दूसरे हों तो बतायें।


भूमि सुधार और जल जंगल जमीन नागरिकता और आजीविका की लड़ाई में नेतृत्वकारी ताकत तो फिर वही स्त्री।किस किसके नाम गिनाऊं।आप उन चेहरों को बखूब जानते हैं।


मैं शरत चंद्र के वर्ण वर्चस्वी साहित्य को कतई साहित्य नही मानता अगर उसमें इतनी मजबूती से स्त्री का पक्ष नहीं रखा होता।


सामाजिक सरोकार के लिए अगर प्रेमचंद हमारे ईश्वर हैं तो शरत महज स्त्री पक्ष और बंद समाज की नरकयंत्रणाओं को उकेरने के लिए हमारे नमस्य हैं।


हम उपभोक्ता मुक्त बाजार में स्त्री के संघर्ष और उसके निरंतर विजय अभियान का भी स्वागत करते हैं और स्त्री को ही देश,समाज और परिवार,मातृभाषा और लोक बचाने वाली सबसे बड़ी शक्ति मानते हैं।


हमने मणिपुर की स्त्रियों का संघर्ष देखा है,हमने पहाड़ों में स्त्रियों के संघर्ष को जिया है।हम चिपको माता गौरादेवी की संताने हैं और उत्तराखंड की तमाम आंदोलनकारी महिलाएं हमारे परिवार में शामिल हैं।हमने खनिज क्षेत्रों में स्त्री का महासंग्राम देखा है।


हमने झारखंड आंदोलन में अगुआ असंख्य महिलाओं को देखा है,हमने गोरखालैंड की मांग लेकर सड़कों पर उतरती महिलाओं को भी देखा है।


नेपाल,श्रीलंका,पाकिस्तान,म्यांमार,बांग्लादेश में मानवाधिकार हनन के विरुद्ध स्त्री शक्ति का महाविस्फोट भी हमने देखा है।


बांग्लादेश मुक्तियुद्ध में माताओं और बहनों की कुर्बानी सबसे ज्यादा है।आज भी बांग्लादेश में लोकतंत्र बहाली आंदोलन की बागडोर स्त्री हाथों में है।


भारत के मुकाबले बांग्लादेश को मातृतांत्रिक देश भी कहें तो अतिशयोक्ति नहीं है।


शरणार्थी परिवार के होने के कारण तमाम तरह की शरणार्थी स्त्रियों के जीवन संग्राम में हमारी हिस्सेदारी रही है।विभाजन की त्रासदी से मानवता को उबारने वाली वे स्त्रियां ही तो हैं जो तमस से लेकर आधा गांव तक, मंटो और इलियस की कहानियों तक, बांग्ला और हिंदी फिल्मों के फ्रेमों में उपस्थित है।


उमा भट्ट,गीता गैरोला, बसंती पाठक,कमला पंत, कृष्णा अधिकारी,नंदिनी जोशी, शीला रजवार से लेकर मुजफ्फरनगर रामपुर तिराहा और महतोष की पीड़ित महिलाएं भी हमारे परिजन हैं।


बामसेफ में वर्षों काम करते हुए हमने देश भर की बहुजन महिलाओं को एक एक जिले और कस्बे में देखा है, मंगला थोराट, गीता पाटिल, शिवानी विश्वास,सुनीता राठौर, मैडम पाटिल,विभा ताई जैसी असंख्य महिलाओं की प्रतिबद्धता देखी है।


सावित्री बाई फूले और रमाबाई अंबेडकर, रानी दुर्गावती,झासी की रानी,रानी रासमणि,कैप्टेन लक्ष्मी सहगल,प्रीतिलता,मातंगिनी हाजरा, इंदिरा गांधी जैसी महिलाओं के बिना भारतीय इतिहास अधूरा है।


तेलंगना में ,तेभागा में, नक्सल से लेकर माओवदी आंदोलन के मोर्चे पर स्त्री प्रतिबद्धता का कोई जवाब किसी के पास नहीं है।


भारतीय प्रशासनिक सेवा, पुलिस सेवा और कारपोरेट प्रबंधन में भी स्त्री ने पुरुषों के मुकाबले ज्यादा महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है। किसी भी अस्पताल चले जाइये, बतौर चिकित्सक स्त्री ज्यादा संवेदनशील और ज्यादा सक्रिय,ज्यादा आत्मीय मिलेगी।ऐसा हमने बार बार देखा है।


वामपंथी आंदोलन में रेणुका चक्रवर्ती,इलिना सेन से लेकर गीता दी, वृंदा कारत और सुभाषिणी अली हमारे लिए हमेशा प्रेरणा बनी रही हैं।


इन स्त्रियों को वंचित समुदायों के प्रतिनिधित्व के साथ नेतृत्व में लाने में सिरे से नाकामी को भारत में वामपंथी आंदोलन के अवसान की मुख्य वजह भी मानते हैं हम।


यह हमारा नजरिया है कि आदिवासी और स्त्री के नेतृत्व के बिना न समाज बदलेगा और न देश। आदिवासियों के बारे में हमने लगातार लिखा है। स्त्री के बारे में अभी तक इस तरह नहीं लिखा है जो आज लिख रहा हूं भारतीय मृत्यु उपत्यका में मुक्तिकामी जनता केहितं के मद्देनजर।


चर्चा: निर्भया कांड के बाद कितना बदला है समाज?

स्मिता शर्मा | आईबीएन-7 | Dec 16, 2013 at 09:17pm | Updated Dec 16, 2013 at 10:05pm


देश निर्भया की शहादत को एक साल बाद भी भूला नहीं है। गैंगरेप कांड की पहली बरसी पर निर्भया को श्रद्धांजलि देने के लिए महिलाएं, पुरुष, छात्र-छात्राएं सब सड़कों पर उतरे। दिल्ली के जंतर-मंतर पर जमा होकर लोगों ने बहादुर बेटी को याद किया। यहां सिटिजन आर्टिस्ट ग्रुप ने नुक्कड़ नाटक के जरिए देश की बहादुर बेटी को याद किया। निर्भया के परिवार ने भी श्रद्धांजलि सभा का आयोजन कर बहादुर बेटी को याद किया। इस प्रर्थना सभा में लोगों ने निर्भया की आत्मा की शांति की कामना तो की ही भविष्य में इस तरह की घटनाओं पर रोक लगाने के लिए सरकार से हर संभव प्रयास करने की अपील की।

जहां एक ओर हजारों लोग देश की बेटी को याद कर रहे थे तो वहीं दिल्ली के पीतमपुरा इलाके में स्कूली बच्चों ने अपने तरीके से देश की बेटी को श्रद्धांजलि दी। तकरीबन 25 स्कूलों के छात्र और छात्राओं ने जमा होकर अपने तरीके से देश की बेटी को याद किया। हालांकि दिल्ली की छात्राओं और महिलाओं का कहना है की आज भी उन्हें घर से अकेले निकलने मे डर लगता है।

जाहिर है निर्भया कांड के बाद महिलाओं के खिलाफ यौन अपराधों पर एक कड़ा कानून बना। लेकिन इस कानून के बनने के बाद भी बलात्कार जैसी घटनाएं नहीं थम रही हैं। हालांकि इस बीच कई मामलों में पीड़ित महिलाएं और लड़कियां खुलकर सामने आए। उसी का नतीजा है कि कई बड़े चेहरे या तो सलाखों के पीछे हैं या उनके खिलाफ आवाज बुलंद हुई है। लेकिन इन वारदातों पर लगाम लगाने के लिए समाज का नजरिया भी बदलने की जरूरत है।

जाहिर है बलात्कार जैसे अपराध रुक नहीं रहे लेकिन निर्भया कांड के बाद महिलाओं के रुख में बदलाव साफ दिख रहा है। अब वो यौन शोषण बर्दाश्त करने वाली नहीं हैं। आईबीएन7 के खास कार्यक्रम एजेंडा में इसी मुद्दे पर मुद्दे पर चर्चा में शामिल थे स्टॉप एसिड अटैक कैंपेन की प्रज्ञा सिंह, दिल्ली से सांसद और पूर्व आईपीएस अजय कुमार, ब्रेकथ्रू की सोनाली खान, एपवा की सचिव कविता कृष्णन और एडवोकेट के के मनन। (वीडियो देखें)



A year after Dec 16 gangrape: Fear, anger persist as Delhi remains unsafe for women

Shivani Vig : New Delhi, Mon Dec 16 2013, 15:51 hrs

Indian ExpressA year later, a sense of anger blended with fear still persist with the hope that things would improve. (PTI Photo)


The December 16 gang rape, which has come to be known in India and across the globe as 'Delhi gangrape', has not only left its deep mark on the city but has also created a fear psychosis in women about their safety.

On that fateful night last year, a 23-year-old paramedical student was gangraped and brutally assaulted by six men on a moving bus. She was stripped naked, gangraped, attacked with an iron rod and thrown out of the moving bus on a deserted street in the winter night. She succumbed to injuries later, triggering outrage, anger and protests across the nation.

A year later, a sense of anger blended with fear and memories of the public outcry and protests still persist with the hope that things would improve. But there are some questions that still linger: Have we learnt any lesson from the past failures? Has anything changed since that fateful night?

"I doubt" says Sonel Ahluwalia, an IT professional. The 28-year-old is still haunted by the memories of December 16 and its aftermath and feels no drastic change has taken place so far. "Except for the fact that people have now become more vocal about crime against women, nothing has changed on the ground level when it comes to the safety of women...We still feel unsafe going out alone, more vulnerable," says Sonel, who still thinks twice before stepping out of home alone after 8 pm despite staying in Delhi NCR from past six years.

"People are unable to come out of that psyche that they can fall prey to assailants anytime of the day. It is because such incidents are being reported every day. Such is the fear that even today my cousin is coming to pick me at 9 pm so that he can accompany me till Delhi Airport," she says.



स्त्री अस्मिता के प्रति आस्तिक भाव


हृदयनारायण दीक्षित

धर्माचार्य


सौजन्य सहारा समय

भारत का मन आहत है. यौन शोषण की खबरें हर तरफ छाई हुई हैं. राज समाज के नियामक भी आरोपी हैं. घटनाओं का विश्लेषण डरावना है.

राजव्यवस्था निशाने पर है. कानून सख्त हो रहे हैं. आरोपी जेल जा रहे हैं. न्यायालय सजा सुना रहे हैं; पर कानूनी सख्ती का कोई प्रभाव नहीं दिखता. मूलभूत प्रश्न यह है कि क्या स्त्री के प्रति उपभोक्ता सामग्री जैसी दृष्टि हमारे संविधान तंत्र की ही विफलता है? क्या स्त्री अस्मिता को सरकारों ने ही उपभोक्ता वस्तु बनाया है?

हम सभ्य समाज के लोग इस नई जीवन दृष्टि के लिए जिम्मेदार क्यों नहीं हैं? उत्पादन के साधन, चिंतन और दर्शन सहित अनेक तत्वों से मिलकर संस्कृति और सभ्यता का विकास होता है. हमारी संस्कृति और सभ्यता पूर्वजों के सचेत या अचेत कर्मो का ही परिणाम है. आधुनिकता ने इसमें बहुत कुछ जोड़ा है और ढेर सारा छोड़ा भी है. छोड़ने की जल्दबाजी में अनेक उदात्त मूल्य भी छूट गए हैं और आधुनिक हो जाने की हड़बड़ी में हमने मानवीय अस्मिता-गरिमा को भी बाजारू बनाया है.

कलाएं सौंदर्यबोध में उगती हैं और समाज को सौंदर्यबोध से आच्छादित भी करती हैं. सुंदर की भारतीय दृष्टि सत्य और शिव भी है. मनुष्य सुंदरतम कृति है प्रकृति की. प्राचीन साहित्य में अनेक कथाएं हैं. इन कथाओं में स्त्री या पुरुष द्वारा भोग के निमंत्रण हैं. लेकिन मर्यादा के बंधन के कारण ऐसे निमंत्रण ठुकराए गए हैं. ऋग्वेद का यम-यमी सूक्त सबसे प्राचीन है. यमी ने प्रणय निवेदन किया, यम ने मर्यादा बताई. यमी ने कहा यहां और कोई नहीं. आओ हमारे साथ सुख भोगो. यम ने कहा देवता देख रहे हैं. यह प्रस्ताव अनुचित है.

स्त्री-पुरुष मिलन पर विवाह की मर्यादा है. भारतीय कानून कहता है कि दोनों वयस्क सहमति के आधार पर मिल सकते हैं. 'सहमति' बड़ा आकर्षक शब्द है लेकिन इसके भीतर असहमति की अनेक परतें हैं. कामकाजी महिला अपने वरिष्ठ अधिकारी की तमाम बातों पर 'जी सर' कहती हैं. आधुनिकता 'आप बहुत सुंदर हैं' का वाक्य प्रयोग लाई है. शिष्ट महिलाएं इसके उत्तर में प्राय: 'धन्यवाद' कहती हैं. अनेक पुरुष इसे सहमति की शुरुआत मानते हैं. सामान्य शिष्ट मुस्कराहट भी जब-तब सहमति की श्रेणी में मान ली जाती है.

मेरी आंखों देखी घटना है. उत्तर प्रदेश की राजधानी के एक प्रतिष्ठित पार्क में एक युवक-युवती वार्ता में मस्त थे. पुलिस ने डांटा- रात में क्या कर रहे हो, घर जाओ. पढ़ी-लिखी युवती ने सिपाही को ही डांट दिया- हम दोनों बालिग हैं, हमारी बात में बाधा डालने वाले तुम कौन होते हो. सिपाही खिसिया गया. युवक ने इस डांट को युवती की 'सहमति' मान लिया. उसने अश्लील हरकतें बढ़ाई. युवती चिल्लाई. वही पुलिस वाला देर में आया.

'सहमति' कोई सोचा-समझा सुविचारित अनुबंध नहीं होता. सहमति दिखाई पड़ती है, लेकिन शिष्ट असहमति नहीं. शालीन असहमति को भी सहमति का ही एक भाग मान लेने वाले भी कम नहीं. असल बात है पुरुष या स्त्री को उपभोक्ता सामग्री समझने वाली जीवनदृष्टि. लड़कियों को मॉडल कहा जाता है. इस माडल का मतलब क्या है! फैशन परेड में उन्हें विशेष अंदाज में प्रस्तुत होने और चलने को कहा जाता है. कह सकते हैं कि इस कार्य में उनकी सहमति है. लेकिन वे सामग्री की तरह इस्तेमाल होती हैं.

देह उपभोक्ता सामग्री नहीं है. स्त्री सुप्रतिष्ठित अस्मिता है. अस्मिता के प्रति आस्तिक भाव चाहिए. आस्तिकता आस्था नहीं होती. आस्तिकता का अर्थ है अस्तित्व के प्रति अनुगृहपूर्ण स्वीकार भाव. हमारी आधुनिक जीवनशैली में स्त्री अस्मिता के प्रति आस्तिकता नहीं है. आस्तिकता की भावभूमि में ही वह मां, बहन, पुत्री और अंतत: देवी जानी गई है. यह समझ पुरातन पंथ नहीं सनातन प्रज्ञा है. स्त्री-पुरुष का मिलन प्रकृति की सृजन शक्ति का भाग है.

सृजन कर्म भोग या उपभोग नहीं होता, प्रीतिपूर्ण समर्पण में ही सृजन खिलता है. सृजन कभी अराजक नहीं होता. स्त्री-पुरुष संबंधों को अराजक नहीं बनाया जा सकता. लेकिन स्त्री या पुरुष को उपभोक्ता सामग्री समझने की दृष्टि के कारण ही अराजकता है. अस्मिता स्वीकारने की मर्यादित दृष्टि जरूरी है.


  1. तेजपाल- स्त्री सिर्फ सेक्स नहीं, अस्तित्व भी

  2. आईबीएन-7-01-12-2013

  3. तरुण तेजपाल को जिस तरह की प्रेस कवरेज मिली है उसने कई सवालों को जन्म दिया है। सवाल, क्या ये बहस सिर्फ महिला उत्पीड़न और कामकाजी महिलाओं के अधिकारों तक ही सीमित है? क्या मुद्दा बस इतना भर है कि दफ्तरों में काम करने वाली ...

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  6. अरविंद कुमार सेन

  7. Jansatta-20-11-2013

  8. अमूल डेयरी ने इनमें से एक भी काम नहीं किया है, इसके बावजूद देश की स्त्रियों के आर्थिक सशक्तीकरण में अमूल का नाम भारतीय महिला बैंक से पहले लिखा जाएगा। असल में अमूल ने अशिक्षित ग्रामीण महिलाओं के कौशल को बेहतर तरीके से ...

  9. स्त्री विरोधी हिंसा के दिन लद चुके

  10. नवभारत टाइम्स-05-12-2013

  11. महिलाओं के विरुद्ध हिंसा एक विश्वव्यापी समस्या है। यह ऐसी महामारी है जिससे कोई भी क्षेत्र या देश अछूता नहीं है। पिछले दिनों हमने दिल्ली, स्टुबेदविले और ओहायो जैसी न जाने कितनी दुखद घटनाएं देखी हैं। अखबारों में लगातार ...

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  13. रश्मि सिंह को स्त्री शक्ति सम्मान

  14. Webdunia Hindi-29-11-2013

  15. उन्हें अपने अंतरराष्ट्रीय ख्याति मॉडल, स्त्री शक्ति जेंडर रिसोर्स सेंटर प्रोग्राम दिल्ली के लिए जाना जाता है। दिल्ली में सामाजिक सुविधा संगम, मिशन कनवर्जेंस प्रोग्राम की संस्थापक निदेशक के तौर पर उन्होंने इस कार्यक्रम को बहुत ...

  16. कितने बढ़े स्त्री के कदम

  17. Dainiktribune-01-12-2013

  18. बीसवीं सदी महिलाओं की है, ऐसा गांधी जी ने कहा था। उन्होंने आह्वान किया था कि महिलाओं को उस अंधेरे से निकालो जहां वे वर्षों से पड़ी हैं। जब स्त्री शिक्षा आंदोलन शुरू हुआ तो उसमें महिलाओं की कम भागीदारी देखकर गांधी जी ...

  19. दिल्ली में दिए गए स्त्री शक्ति सम्मान

  20. Webdunia Hindi-01-12-2013

  21. सामाजिक न्याय और सशक्तिकरण मंत्री कुमारी शैलजा के घर के प्रांगण में आयोजित इस अवसर पर 'दयावती मोदी स्त्री शक्ति सम्मान' रश्मि सिंह को दिया गया और स्त्री शक्ति विज्ञान सम्मान अखिल भारतीय आयुर्वेद संस्थान की डॉ. जया त्यागी को ...

  22. ग्रह-नक्षत्र और महिलाओं का व्यवहार

  23. Rajasthan Patrika-24-11-2013

  24. ग्रहों और राशियों को भी स्त्री और पुरूष वगोंü में बांटा गया है। मेष, मिथुन, सिंह, तुला, धनु और कुंभ को पुरूष राशि और वृष, कर्क, कन्या, वृश्चिक, मकर और मीन राशियों को स्त्री राशि कहा गया है। इसी प्रकार चंद्रमा और शुR जहां स्त्री स्वभाव ग्रह ...

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  26. स्त्रियों के व्यवहार पर बुद्ध ने यह कहा...

  27. अमर उजाला-14 घंटे पहलेसाझा करें

  28. जो स्त्री परिवार के अन्य सदस्यों के साथ सद्व्यवहार करती है, उसे मातृसमा कहा गया है। जो सभी से प्रिय भाई के समान व्यवहार करती है, वह भगिनीसमा कहलाती है। बुद्ध के वचनों से सुजाता लज्जित हो गई उसका अभिमान को दूर कर दिया।

  1. तेजपाल कांड के सबक

  2. खबरें l Deutsche Welle-12-12-2013

  3. स्त्री के विरुद्ध नफरत और हिंसा के सारे आयाम सामने हैं. निर्भया मामला हो या मुंबई का मामला या तेजपाल कांड. 'पशु' झुग्गी झोपड़ियों और गंदे नालों के किनारों से ही नहीं निकलते, वे ड्राइवर क्लीनर मवाली ही नहीं होते वे सत्ता ...

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  5. अभी हजारों मील का फासला बाकी है

  6. प्रभात खबर-21 घंटे पहले

  7. कुल मिला कर सत्ता, संतति और संपत्ति तीनों में जब तक स्त्री का बराबर का हक नहीं होगा, तब तक ठोस बदलाव नहीं होगा. महिलाएं जब तक पराश्रित रहेंगी, वो चाहे किसी भी तरीके से हो, तब तक बदलाव संभव नहीं. आज बड़े पैमाने पर महिलाएं नौकरी ...

  8. *
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  10. 16 दिसंबर के बाद महिलाओं के लिए कितना बदला देश?

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  12. दुख की बात है कि इस दुर्भावना के शिकार हम सभी हो गये हैं, चाहे वह इस मामले का अभियुक्त (अब सजायाफ्ता) अक्षय ठाकुर या मुकेश सिंह हों, जो किसी स्त्री को सिर्फ और सिर्फ भोग की वस्तु मानते हैं या फिर हममें से कोई भी, जिसकी ...

  13. टीवी सीरियल्स में झलकती है समाज की दुविधा

  14. नवभारत टाइम्स-15-12-2013साझा करें

  15. स्त्री के हाथों स्त्री इतनी बेपर्दा और बेइज्जत शायद ही कभी हुई हो। महिलाओं की स्थिति हमारे समाज में बेशक अभी उतनी सम्मानजनक नहीं है लेकिन नारी द्वारा नारी का ऐसा भद्दा प्रस्तुतीकरण पहले कभी देखने को नहीं मिला। फिर भी ...


  1. 'लिव इन रिलेशन' में सुरक्षा का सवाल

  2. अमर उजाला-12-12-2013साझा करें

  3. यह कटु सत्य है कि यदि एक निश्चित समय से ज्यादा समय तक एक साथ रहने वालेस्त्री-पुरुषों के रिश्ते को कानूनी मान्यता मिल सके, तो इससे उनके बच्चों के कानूनी अधिकार भी तय किए जा सकते हैं। देखा जाए, तो हमारे देश में 'लिव इन रिलेशन' ...

  • गे सेक्स अननैचरल है तो ब्रह्मचर्य क्या है?

  • Ajmernama-1 घंटे पहले

  • लेकिन मेरे भाई, अगर स्त्री-पुरुष में सेक्स ही नैचरल है और जो यह नहीं करता, वह अननैचरल और मानसिक तौर पर बीमार है तो फिर ये सारे ब्रह्मचारी क्या हैं ? वे लोग जो सेक्स से ही दूर रहते हैं (या दूर रहने का ढोंग करते हैं), उन्हें तो हमारा ...


  • मुझे संभालकर रखिए

    नवभारत टाइम्स-14-12-2013साझा करें

    मैंने अपने क्रोध को रचनात्मकता में तब्दील किया है। मेरी कहानियां, सामंती सोच वाले समाज से मेरा रचनात्मक प्रतिशोध हैं। मेरा व्यक्तिगत मत है कि स्त्री की अधिकांश क्रिया, प्रतिक्रिया होती है। स्त्री या तो रक्षात्मक रहती ...

    1. *
    2. नेता का डर, पब्लिक का डर

    3. अमर उजाला-14 घंटे पहले

    4. हालांकि अपनी इस मौखिक आशंका पर चारों तरफ से हुई थुक्का-फजीहत से दुखी होकर बाद में उन्होंने स्त्री विमर्श के पैरोकारों से माफी मांग ली। हम पब्लिक का डर दूसरी तरह का है। वह ऐसा कि मतदान के बाद घोषित नतीजों में जीतने वाला ...

    5. *
    6. ये हैं महिलाओं के हक

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    8. सिर्फ उसी रिश्ते को लिव-इन रिलेशनशिप माना जा सकता है, जिसमें स्त्री और पुरुष विवाह किए बिना पति-पत्नी की तरह रहते हैं। इसके लिए जरूरी है कि दोनों बालिग और शादी योग्य हों। यदि दोनों में से कोई एक या दोनों पहले से शादीशुदा ...

    9. देश बदला, कानून बदला लड़ाई जारी है...

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