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Wednesday, June 13, 2012

भ्रष्टाचार भगाने का पाखंड

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भ्रष्टाचार भगाने का पाखंड

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रामलीला मैदान में पहली बार 2010 में इकट्ठा होकर भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई शुरू की गई थी जिसमें से आगे अन्ना का आंदोलन और रामदेव का आंदोलन पैदा हुआरामलीला मैदान में पहली बार 2010 में इकट्ठा होकर भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई शुरू की गई थी जिसमें से आगे अन्ना का आंदोलन और रामदेव का आंदोलन पैदा हुआ
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आज भ्रष्टाचार के विरूद्ध सम्पूर्ण भारत में एक उबाल दिख रहा है। बाबा रामदेव सरीखे अनेक लोग तो समाज शास्त्र न समझने के कारण भ्रष्टाचार विरोध को अपनी सर्वोच्च प्राथमिकता मान कर चल ही रहे हैं किन्तु अन्ना हजारे सरीखा समाजशास्त्री भी भ्रष्टाचार विरोध को ही सर्वोच्च प्राथमिकता मानने लगे तो कहीं न कहीं गंभीर भूल तो हो ही रही है। भ्रष्टाचार कभी अपराध नहीं होता। भ्रष्टाचार व्यक्ति का स्वभाव या चरित्र भी नहीं होता। भ्रष्टाचार व्यक्ति की मजबूरी तथा अव्यवस्था का सम्मिश्रण होता है और जब वह अपराध है ही नहीं तब हमारे संघर्ष का सर्वोच्च केन्द्र भ्रष्टाचार कैसे हो सकता है?

अधिकार तीन प्रकार के होते हैं (1) प्राकृतिक या मूल अधिकार (2) संवैधानिक अधिकार (3) सामाजिक अधिकार। प्राकृतिक अधिकारों पर आक्रमण अपराध होता है, संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन गैर कानूनी होता है तथा सामाजिक अधिकारों की अन्देखी अनैतिक होता है। याद रखना आवष्यक है कि आक्रमण सिर्फ प्राकृतिक अधिकारों का ही संभव है। संवैधानिक अधिकारों पर आक्रमण संभव नहीं। उसका तो उल्लंघन ही संभव है। सामाजिक अधिकारों पर तो न आक्रमण संभव है न उल्लंघन। इनकी तो सिर्फ अन्देखी ही होती है।

संविधान हमें मूल अधिकार देता नहीं। संविधान तो हमें मूल अधिकारों की सुरक्षा की गारंटी मात्र देता है। संविधान तो हमें सिर्फ नागरिक अधिकार ही देता है। स्वाभाविक है कि भ्रष्टाचार सिर्फ वहीं संभव है जहॉं हमारे संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन हो। भ्रष्टाचार की परिभाषा ही यह होती है कि हमें संवैधानिक अधिकार प्रदान करने के लिये नियुक्त अधिकारी यदि अपने दायित्व पूरे करने में गड़बड़ करें तभी वह भ्रष्टाचार होगा अन्यथा नहीं। यदि कोई व्यक्ति अधिकार प्राप्त नहीं है तथा वह कोई बाधा पहुंचाता है तो वह भ्रष्टाचार न होकर अपराध हो जायेगा। इसका अर्थ यह हुआ कि किसी अधिकार प्राप्त व्यक्ति द्वारा ही भ्रष्टाचार करना संभव है, अन्यथा नहीं।

जब भारत स्वतंत्र हुआ तब राजनीति में भ्रष्टाचार भी कम था और राजनीति में भ्रष्ट व्यक्ति भी बहुत कम थे। समाज में भी भ्रष्टाचार न के बराबर था। प्रश्न उठता है कि भ्रष्टाचार बढ़ा क्यों? यह भी एक महत्वपूर्ण प्रश्न है कि भ्रष्टाचार कम क्यों नहीं हो रहा? क्या प्रयत्न कम हुए? या भ्रष्टाचार दूर करने वालों की नीयत ही ठीक नहीं थी? मेरे विचार में न प्रयत्न कम हुए न प्रारंभ में नीयत खराब थी। वास्तव में व्यवस्था करने वालों की नीतियां गलत थीं। उन्होंने भ्रष्टाचार और अपराध को एक कर दिया। उन्होंने भ्रष्टाचार की उत्पत्ति को रोकने की कोई कोशिश कभी नहीं की। परिणाम स्वरूप ये जितना भ्रष्टाचार रोक पाते थे उससे कई गुना ज्यादा भ्रष्टाचार पैदा हो जाता था। एक टंकी में चार इंच के पाइप से पानी भरा जाये और दो इंच निकाला जाये तो टंकी का जल स्तर कभी कम नहीं हो सकता जब तक उसमें गिरने वाले पानी की मात्रा निकलने वाले पानी से कम न हो। अन्ना जी की टीम जिस भ्रष्टाचार की रोक थाम के लिये दो इंच के पाइप को बढ़ाकर साढ़े तीन करने की बात कर रहे हैं वह समस्या का समाधान नहीं है क्योंकि टंकी में पानी लगातार चार इंच के हिसाब से गिर रहा है। भ्रष्टाचार यदि कम होता है तो शासन पक्ष की समस्याएं घटेंगी परन्तु उससे समाज को कोई विशेष लाभ नहीं होगा।

पहले तो यह तय करना है कि भ्रष्टाचार राजनैतिक समस्या है या सामाजिक। मेरे विचार से राजनेताओं ने बहुत चालाकी से इसे सामाजिक समस्या बना दिया है जबकि यह समस्या कहीं से भी सामाजिक समस्या नहीं। सरकारी कर्मचारी को जनता कभी नियुक्त नहीं करती। जनता तो केवल विधायिका का ही चुनाव करती है और विधायिका द्वारा किसी प्रक्रिया के अन्तर्गत कर्मचारी नियुक्त होते हैं। कल्पना करिये कि एक मालिक का मुनीम हमें अनाज कम तौल कर देता है तो क्या हम उस मुनीम से विवाद कर सकते हैं जिसकी न हमने नियुक्ति की है न उस पर हमारा अनुशासन है। हमने एक करोड़ रूपया क को सुरक्षित रखने को दिया। क ने वह रूपया ख को दिया। क्या हम ख से कोई विवाद कर सकते हैं? हमारे राजनीतिज्ञ चाहते हैं कि समाज सरकारी कर्मचारियों के भ्रष्टाचार से निपटे। ज्यादा दुखद तो यह है कि क ने बीच में भ्रष्टाचार करके वह रूपया ख को दिया है। ऐसी स्थिति में ख से विवाद करना हमारी भूल है और क की चालाकी। अन्ना जी या रामदेव जी ख से विवाद में उलझे हैं जबकि इस भ्रष्टाचार में हम कोई पक्ष नहीं है।

एक झूठ और समाज में फैलाया गया है कि घूस देने वाला भी भ्रष्टाचार का दोषी है। वेद प्रताप वैदिक जी बहुत जोर शोर से यह बात कहते हैं। अन्ना जी भी यदा कदा यह कह देते हैं। मेरे विचार में भ्रष्टाचार वही होता है जिसमें एक पक्ष किसी कानूनी शक्ति प्राप्त व्यक्ति का हो। घूस लेने वाला अधिकार सम्पन्न है। यदि वह अधिकार सम्पन्न नहीं होता तो उक्त लेनदेन भ्रष्टाचार न होकर चाहे ठगी होता या कोई अन्य किन्तु भ्रष्टाचार नहीं होता। घूस देने वाले के पास कोई विशेष शक्ति नहीं है इसलिये घूस देने वाला अनैतिक तक ही हो सकता है किन्तु भ्रष्टाचार नहीं। पचास वर्ष पूर्व वर्षों विचार मंथन के बाद रामानुजगंज शहर में प्रस्ताव पारित हुआ था कि राजनेताओं का भ्रष्टाचार तीन नम्बर अर्थात् अपराध माना जायेगा और शासकीय कर्मचारियों का दो नम्बर अर्थात् गैर कानूनी। सम्पूर्ण देश में यह प्रस्ताव विवाद का विषय बना। आज भी विवादास्पद ही है किन्तु मैं आश्वस्त हूं कि हमारा पक्ष तर्क संगत है। अन्ना जी लोकपाल के नाम पर जो परिश्रम कर रहे हैं उसका कोई गंभीर परिवर्तन कारी परिणाम न आया है न आयेगा क्योंकि भ्रष्टाचार गलत नीतियों का परिणाम है, कारण नहीं। जब तक नीतियॉं ठीक नहीं होतीं तब तक परिणाम में कोई उल्लेखनीय बदलाव संभव नहीं। साथ ही जब तक नीयत ठीक नहीं होगी तब तक नीतियां ठीक नहीं होंगी। नीयत राजनेताओं की ठीक होगी नहीं। अतः एक ही मार्ग बचता है कि उनके अधिकार कम हों उनका समाज में हस्तक्षेप कम हो।

भ्रष्टाचार का घटना बढ़ना एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है और समाज को राजनेताओं की गुलामी से मुक्त कराना बिल्कुल अलग प्रक्रिया है। छोड़िये बार बार यह कहना कि नेता भ्रष्ट हैं। भारत का हर बच्चा बच्चा जानता है कि राजनीति भ्रष्टाचार की पहचान बन गई है। आप कहें तब भी और न कहें तब भी। आप तो यह सच बात उठाइये कि राजनेताओं की नीयत खराब है। इन लोगों ने भारतीय संविधान को बंधक बना लिया है। ये लोग संविधान के साथ मनमाना खिलवाड़ कर रहे हैं। अब हम अपने संविधान को इनके चंगुल से मुक्त करावें। संविधान मुक्ति हमारे जीवन मरण का प्रश्न है। संविधान हमारी सम्पति है और हम उसके लिये अन्तिम दम तक लड़ेंगे।

पूरा देश जानता है कि भारत की सरकारी मशीनरी आकंठ भ्रष्टाचार में डूबी हुई है। हमारी राजनैतिक व्यवस्था उसी भ्रष्ट व्यवस्था को नये नये अधिकार देकर उन्हें भ्रष्टाचार के अवसर प्रदान करती है। संसद प्रतिवर्ष दस बीस ऐसे कानून बनाती ही है जो वर्तमान सरकारी मशीनरी को और ज्यादा पावर फूल बनाती है। जब पूरी पुलिस भ्रष्ट है तो फिर उसी पुलिस को बाल विवाह या बाल यौन शोषण रोकने का अधिकार देने की जल्दी क्यों? क्या इस तरह वर्तमान भ्रष्ट व्यवस्था को और भ्रष्ट होने का अवसर नहीं मिलेगा? पहले यह तय करिये कि पहले भ्रष्टाचार पर नियंत्रण जरूरी है या बाल विवाह पर। यदि आप सिगरेट रोकने का कानून बनाना ज्यादा जरूरी मानते हैं तो स्पष्ट है कि भ्रष्टाचार नियंत्रण आपका नाटक है और ऐसे नाटक में आप समाज को उलझा कर रखना चाहते हैं। हमने कभी भ्रष्टाचार रोकने की पहल नहीं की क्योंकि भ्रष्टाचार नियंत्रण वर्तमान राजनैतिक व्यवस्था का नाटक ही है तो भले ही रामदेव जी आदि हजारों लोग उसमें लगें लेकिन मैं उस नाटक के आनंद से दूर रहॅूं तो ठीक। अन्ना जी को भी समझना चाहिये कि लोकपाल का आंदोलन वर्तमान राजनैतिक व्यवस्था में सुधार तक ही सीमित है, व्यवस्था परिवर्तन की दिशा इसमें कहीं नहीं है। आप यदि लोकपाल में ही उलझे रहे तो व्यवस्था परिवर्तन की लड़ाई कौन लड़ेगा? भ्रष्टाचार के विरूद्ध लड़ने वाले देश में हजारों हैं किन्तु व्यवस्था परिवर्तन को समझने योग्य तो देश में गिने चुने ही लोग हैं और ऐसे लोगों में भी आगे आने वाले तो आप ही दिखते हैं।

मुझे पचास वर्ष हो गये यह समझाते कि सरकारी कर्मचारियों का भ्रष्टाचार कानूनी अपराध है और राजनेताओं का भ्रष्टाचार सामाजिक अपराध है। वास्तव में तो प्रधानमंत्री भी हमारा प्रत्यक्ष प्रतिनिधित्व नहीं करते। हमारा प्रत्यक्ष प्रतिनिधित्व तो संसद ही करती है। यदि उसमें भ्रष्टाचार है या भ्रष्टाचारियों से साठ गांठ है तो भ्रष्टाचार से लड़ाई की शुरूआत सिर्फ संसद तक सीमित होनी चाहिये क्योंकि वे हमारे द्वारा नियुक्त हैं। ये लोग चालाकी से इस लड़ाई को कभी सरकार की तरफ धकेल देते हैं तो कभी सरकारी कर्मचारियों की तरफ। हम भी इनके बहकावे में आकर अपनी ताकत उधर लगाना शुरू कर देते हैं। ऐसा बिल्कुल ठीक नहीं। भ्रष्टाचार के विरूद्ध काम करते रहिये किन्तु ध्यान रहे कि भ्रष्टाचार नियंत्रण हमारा लक्ष्य नहीं। हमारा लक्ष्य है राजनैतिक व्यवस्था परिवर्तन और हम लगातार उस दिशा में बढ़ने का प्रयास करें।

महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि हर आदमी की क्षमता एक समान तो है नहीं जो सब लोग व्यवस्था परिवर्तन की दिशा में लग जायें। ऐसी हालत में किसकी क्या भूमिका हो यह विचारणीय है। मेरे विचार में वर्तमान समय में कुल ग्यारह ही समस्याएं महत्वपूर्ण हैं। (1) चोरी, डकैती, लूट (2) बलात्कार (3) मिलावट कमतौल (4) जालसाजी धोखाधड़ी (5) हिंसा, आतंक, बल प्रयोग (6) भ्रष्टाचार (7) चरित्रपतन (8) साम्प्रदायिकता (9) जातीय कटुता (10) आर्थिक असमानता (11) श्रम शोषण। इन समस्याओं में से प्रथम पांच भारतीय संवैधानिक व्यवस्था की कम सक्रियता के कारण बढ़ी हैं तो अन्तिम 6 भारतीय संवैधानिक व्यवस्था की अति सक्रियता के कारण।

इसके समाधान का प्रथम चरण यह ही हो सकता है कि समाज प्रथम पांच के लिये राज्य को अधिकाधिक सक्रिय होने का दबाव डाले तथा अन्तिम 6 पर राज्य को दूर होने हेतु प्रेरित करे। राज्य अन्तिम 6 की दिशा में अधिक सक्रियता बढ़ाना चाहता है। इसके लिये यह सामाजिक संस्थाओं, कलाकारों, साहित्यकारों को आर्थिक सहायता दे देकर ऐसे मुद्दे प्राथमिक स्तर पर चर्चा में बनाये रखना चाहता है। आमिर खान के सत्यमेव जयते के किसी संदेश में प्राथमिक पांच का कोई जिक्र नहीं। यह तो बाद की 6 से भी बाहर के विषय बहस में ला रही है जो प्राथमिकता क्रम में ग्यारह से भी बाहर है। अन्ना जी जो भ्रष्टाचार का मुद्दा सर्वोच्च प्राथमिक बना रहे हैं वह भी अन्तिम 6 में शामिल है जो राज्य की अति सक्रियता का परिणाम है। हम सबका कर्तव्य है कि हम अपना लक्ष्य निर्धारित करें और उसके लिये राज्य और समाज की भूमिकाएं स्पष्ट करें तभी समाधान का मार्ग निकल सकेगा।

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