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Saturday, June 16, 2012

अगर अख़बार के पन्नो और फेसबुक से राजनीति चलती तो कलाम राष्ट्रपति, सचिन प्रधानमंत्री होते

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अगर अख़बार के पन्नो और फेसबुक से राजनीति चलती तो कलाम राष्ट्रपति, सचिन प्रधानमंत्री होते

अगर अख़बार के पन्नो और फेसबुक से राजनीति चलती तो कलाम राष्ट्रपति, सचिन प्रधानमंत्री होते

By  | June 16, 2012 at 4:00 pm | No comments | बहस

विद्या भूषण रावत

कांग्रेस ने राष्ट्रपति पद के लिए प्रणब मुख़र्जी की उम्मीदवारी पर अपनी मोहर लगा कर एक सही कार्य किया है क्योकि बहुत वर्षो बाद राष्ट्रपति पद पर एक राजनैतिक व्यक्ति वैठेगा जो पूरी जिन्दगी राजनीति करने के बाद वहाँ जा रहा होगा. प्रणब दा एक प्रतिभासम्पन्न व्यक्ति हैं और राजनीति पर उनकी पकड़ होने के कारण वो आज की परिस्थियों में एक सभ्य राष्ट्रपति साबित होंगे. मुझे यह समझ नहीं आ रहा कि राष्ट्रपति पद के लिए किसी भी गैर राजनातिक व्यक्ति के नाम का इतना शोर क्यों? क्या यह इसलिए कि भ्रष्ट व्यवसायी और बॉलीवुड के बादशाह लोग अब राष्ट्रपति भवन में भी घुसना चाहते हैं ताकि वहाँ बड़ी बड़ी पार्टिया कर सकें?
प्रणब का विरोध कर ममता ने अपने दकियानूसी होने का सबूत दे दिया. कांग्रेस ने ममता की मांग को अस्वीकार कर ठीक कार्य किया क्योंकि क्षेत्रीय राजनैतिक दलों को व्यक्तिगत भावना से ऊपर उठकर अब राष्ट्रीय भूमिका में आने के लिए ईमानदारी से काम करना पड़ेगा. राज्यों को अधिक अधिकार मिलने चाहिए और इसमें कोई दो राय नहीं कि उनका विकास भी होना चाहिए लेकिन मुख्यमंत्रियों को अपने आप को महान दानदाता दिखाने के बजाये रोजगार के नए अवसर पैदा करने होंगे और राज्यों के सर्वांगीण विकास की बात करनी होगी. साड़ी, टीवी, कंप्यूटर, कम्बल आदि बांटकर हम थोड़े समय के लिए पुरानी राजशाही की याद तो दिला सकते हैं लेकिन यह लोगो को उनके अधिकार नहीं दिला पायेगी और ना ही उनका विकास कर पायेगी. हकीकत यह है की अधिकांश राज्यों की हालत ख़राब है क्योंकि उन्होंने सांकेतिक कार्य ही किया है ताकि मुख्यमंत्रियों की बादशाहत कायम रखी जा सके.
मुलायम यह जानते हैं के उत्तर प्रदेश में अखिलेश के लिए केंद्र के साथ सहयोग कर एक स्थाई सरकार देना आवश्यक है. ममता कांग्रेस को बार- बार हिला कर बहुत प्राप्त नहीं कर पाएंगी और शायद उनका आखिरी दांव बहुत गलत पड़ गया है. बंगाली अस्मिता के सवाल पर वो प्रणब बाबु का विरोध कर क्या प्राप्त करेंगी? उम्मीद है वामपंथी अपनी ऐतिहासिक भूल से कुछ सीखते हुए इस वक़्त दादा को राष्ट्रपति भवन भेजकर बंगाली राष्ट्रवाद पर अपना कब्ज़ा बरक़रार रखेंगे. अभी तक की रिपोर्टे ये बता रही हैं कि दादा के लिए बहुत बड़ी चुनौती नहीं है. कलाम का हौव्वा खड़ा कर ममता कौन से गेम खेल रही हैं समझ नहीं आया. अगर अख़बार के पन्नो और फेसबुक से राजनीति चलती तो कलाम देश के सर्वमान्य और सब कुछ होते और उनको मदद करने के लिए लोग सचिन से आरती उतारकर देश को बचाने के लिए कहते लेकिन देश की राजीनीति सड़कों से होनी है और अभी इन्टरनेट युग के बावजूद लड़ाई सड़कों पर ही होनी है और वहाँ के समीकरण दूसरे होते हैं. यह तो बहुत अच्छे है नहीं तो हमारे योदधा लोग तो सचिन को प्रधानमंत्री, आमिर को निति मंत्री, मुकेश अम्बानी को वित्त मंत्री और कलाम को हमेशा के लिए राष्ट्रपति बना देते… क्या करें देश के लोग ऐसा नहीं चाहते और इसके लिए एक व्यवस्था की, जिसे हमारे मीडिया वाले कितना भी ध्वस्त करने की सोचें और कितना ही बेकार बताएं, उसकी हकीकत है और उस पर चलना पड़ेगा.
उम्मीद है एक राजनैतिक व्यक्ति के राष्ट्रपति भवन पहुँचने से सरकारी सोच में भी बदलाव आएगा. हम यह भी उम्मीद करते हैं कि वित्त मंत्री भी एक राजनैतिक व्यक्ति होगा ताकि योजना भवन के ३५ लाख के शौचालय में बैठने वाले विशेषज्ञ देश की गरीबों की तबाही का अर्थशास्त्र न लिख सकें और सरकार जनोन्मुखी योजनायें बनायें.

विद्या भूषण रावत, लेखक स्वतंत्र पत्रकार व मानवाधिकार कार्यकर्ता हैं।

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