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Monday, June 11, 2012

पूर्वोत्तर के खिलाफ केंद्र की साजिश ? विनोद रिंगानिया

http://raviwar.com/news/714_north-east-neso-and-government-binod-raingani.shtml

बहस

 

पूर्वोत्तर के खिलाफ केंद्र की साजिश ?

विनोद रिंगानिया


पिछले दिनों पूर्वोत्तर के सातों राज्यों के कुछ छात्र संगठनों के फेडरेशन नार्थ ईस्ट स्टूडेंट्स आर्गेनाइजेशन (नेसो) ने अपनी इस मांग को लेकर आंदोलन शुरू किया है कि पूर्वोत्तर क्षेत्र के सभी राज्यों को संविधान के अंतर्गत विशेष दर्जा दिया जाना चाहिए. नेसो के गुवाहाटी में हुए प्रदर्शन के समय कही गई बातों से यही समझ में आया कि यह संगठन विशेष दर्जे के माध्यम से पूर्वोत्तर के राज्यों में भूमि और प्राकृतिक संसाधनों पर यहां के स्थानीय निवासियों का अधिकार सुनिश्चित करना चाहता है.

नेसो


विशेष राज्य का दर्जा संविधान में अनहोनी बात नहीं है. हमारे संविधान में इस समय जम्मू-कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा प्राप्त है. इस विशेष अधिकार के तहत अन्य विशेषाधिकारों के अलावा यह व्यवस्था भी है कि जम्मू-कश्मीर में भूमि का हस्तांतरण राज्य के बाहर के व्यक्ति को करना संभव नहीं है. इसी तरह नगलैंड को भी कई विशेष अधिकार प्राप्त हैं, जिनके तहत वहां के प्राकृतिक संसाधनों पर केंद्र सरकार का नहीं बल्कि राज्य सरकार का अधिकार है. साथ ही अन्य बहुत से प्रावधान हैं-जिनमें यह उल्लेखनीय है कि नगा समुदाय के पारंपरिक कानून-कायदों में केंद्र के किसी कानून के माध्यम से हस्तक्षेप करने की इजाजत नहीं है. 

पूर्वोत्तर राज्यों के लिए छठी अनुसूची की भी विशेष व्यवस्था है (इसे पूर्वोत्तर के बाहर सिर्फ दार्जिलिंग में लागू किया गया है), जिसके तहत किसी क्षेत्र विशेष का प्रशासन एक निर्वाचित परिषद को सौंप दिया जाता हैऔर यह निर्वाचित परिषद अपने अधिकार प्राप्त विषयों में स्वायत्त होती है. छठी अनुसूची के अंतर्गत इस समय असम में बोड़ो क्षेत्रीय स्वायत्त जिले, कार्बी आंग्लोंग स्वायत्त जिला और डिमा हासाउ जिले में इस तरह के स्वायत्त शासन की व्यवस्था है. मूलत: यह व्यवस्था किसी जनजातीय बहुल क्षेत्र को स्वायत्तशासन की सुविधा उपलब्ध कराने के लिए शुरू की गई है.

पूरे असम को विशेष दर्जा दिए जाने की मांग हाल ही में अल्फा के वार्तापंथी गुट ने भी केंद्र सरकार को सौंपे अपने मांगपत्र में उठाई है. इस मांगपत्र में असम को जम्मू-कश्मीर की तरह विशेष राज्य का दर्जा दिए जाने की मांग की गई है. लगता है असम में "विशेष दर्जा' शब्दों के प्रति विशेष आकर्षण है, जिसके कारण हम समय-समय पर इस तरह की मांग को उठते हुए देखते हैं. लेकिन हाल में इस आकर्षण में वृद्धि का प्रमुख कारण यह भी है कि असम में स्थानीय (गैर जनजातीय) लोगों के हाथ से जमीनें निकलकर बाहर के राज्यों से आए लोगों के हाथों में चली जा रही हैं-ऐसा एक डर व्यापक रूप से फैल गया है. विशेष दर्जे की मांग उठाने वाले जानते हैं कि यदि यह मांग मान ली गई तो असम में कोई भी स्थानीय व्यक्ति गैर-स्थानीय व्यक्ति को अपनी जमीन हस्तांतरित नहीं कर पाएगा. अभी सिर्फ जनजातीय लोगों के लिए यह प्रावधान है कि वे गैर जनजातीय लोगों को भूमि हस्तांतरित नहीं कर सकते.

अल्फा और नेसो द्वारा विशेष दर्जे की मांग उठाने से पहले ही अखिल असम छात्र संघ (आसू) ने अपने 1985 के समझौते में केंद्र सरकार से यह वादा प्राप्त कर लिया था कि "असमिया' समुदाय की अलग पहचान, संस्कृति (आदि) की सुरक्षा के लिए संविधान में विशेष प्रावधान किए जाएंगे. ये प्रावधान क्या होंगे इस पर 1985 का असम समझौता मौन है, यानी इस पर आगे बातचीत की गुंजाइश है. इन प्रावधानों में भूमि को स्थानीय लोगों के हाथ निकलने से बचाना, असमिया समुदाय के लिए निर्वाचित विधायिका में आरक्षण की व्यवस्था आदि भी शामिल हो सकते हैं. लेकिन इस मुद्दे पर सबसे बड़ी विडंबना यह है कि "असमिया' कौन है, आज तक यह निर्णय नहीं हो पाया. 

दरअसल जब असम समझौते पर हस्ताक्षर किए गए थे तब तक असम में जनजातीय स्वर इतना ऊंचा और मजबूत नहीं हो पाया था कि आसू नेतृत्व उसकी परवाह करता और "असमिया' शब्द की जगह कोई ऐसा शब्द व्यवहार करता जिसमें असम के सभी मूल समुदाय शामिल हो जाते. अब समस्या यह हो गई है कि असम के जनजातीय समुदायों को अलग रखकर अलग पहचान और संस्कृति की रक्षा के प्रावधान करना एक राजनीतिक मजाक ही हो सकता है. और जनजातीय समुदाय अपने आपको असमिया कहे जाने से सख्त परहेज करते हैं.

हाल ही में एक टीवी कार्यक्रम के दौरान नेसो के सचिव प्रधान गुंजुम हैदर से हुई बातचीत में उन्होंने पूर्वोत्तर के लोगों की व्यथा का जिक्र करते हुए बताया कि इतने भारी जनविरोध और दुरुपयोग के स्पष्ट प्रमाणों के बावजूद सशस्त्र बल विशेषाधिकार अधिनियम (अफस्पा) को नहीं हटाया जा रहा है, जबकि माओवादी हिंसा वाले राज्यों में यह कानून लागू नहीं है. इसके अलावा बाहरी राज्यों में पूर्वोत्तर के लोगों को अपमानजनक नामों से पुकारे जाने या उन्हें नेपाली या चीनी नागरिक समझने पर भी उन्होंने क्षोभ व्यक्त किया. उनके पास शिकायतों की लंबी फेहरिश्त थी और कहना था कि या तो आप इन समस्याओं का समाधान करें या फिर हमें अपना शासन खुद चलाने दें. "विशेष दर्जा' से उनका यही तात्पर्य था कि इसमें राज्य सरकार के पास इतने अधिकार आ जाएंगे कि वह अपनी समस्याओं का समाधान स्वयं खोज लेगी.

लगता है आने वाले दिनों में "विशेष राज्य का दर्जा' का मुद्दा जोर पकड़ेगा, क्योंकि इस मांग के पीछे असम के ताकतवर आसू जैसे छात्र संगठन का भी जोर है. यदि ऐसा होता है तो एक बार फिर "केंद्र का पक्षपात', "पूर्वोत्तर की अनदेखी' जैसे नारे हवा में उछलेंगे. इससे पूर्वोत्तर की युवा पीढ़ी में फिर से यह भावना मजबूत होगी कि भारत राष्ट्र में हमारा दर्जा समान नहीं है, हमारे साथ भेदभाव की नीति अपनाई जाती है. इसका दूरगामी और घातक प्रभाव युवा मस्तिष्क पर पड़ता है, जो राष्ट्र की एकता की दृष्टि से एक खतरनाक बात है.

हमेशा केंद्र को कोसने वाले पूर्वोत्तर के छात्र संगठनों से जब यह पूछा जाता है कि आप जितनी ऊर्जा के साथ केंद्र सरकार का विरोध करते हैं, उतनी ताकत राज्य सरकारों पर दबाव बनाने के लिए क्यों इस्तेमाल नहीं करते. जबकि देखा जाता है कि पूर्वोत्तर में बड़े ही लचर ढंग से सरकारी कामकाज चलता है. केंद्र से आने वाली राशि का बहुत बड़ा हिस्सा बिना इस्तेमाल के वापस लौट जाता है. केंद्र सरकार की ओर से सभी मंत्रालयों के योजनागत व्यय का दस फीसदी हिस्सा सिर्फ पूर्वोत्तर पर खर्च करने का प्रावधान है, लेकिन इसका भी बड़ा हिस्सा बिना खर्च हुए सिर्फ कोष में जमा हो रहा है. इस आरोप पर छात्र संगठनों के नेता दावा करते हैं कि उन्होंने अपनी-अपनी राज्य सरकारों को बख्श नहीं दिया है बल्कि उनके विरुद्ध भी आंदोलन चलता रहता है.

एक हद तक यह सही है कि पूर्वोत्तर के छात्र संगठन राज्य सरकारों के प्रशंसक नहीं हैं और उनकी आलोचना में मुखर देखे जाते हैं. लेकिन उनकी ओर से की जाने वाली राज्य सरकार और केंद्र सरकार की आलोचना में एक बुनियादी फर्क यह है कि जहां राज्य सरकार की खामियों को लचर राजकाज (गवर्नेंस) के रूप में देखा जाता है, वहीं केंद्र सरकार के प्रति शिकायतों को पूर्वोत्तर के प्रति भेदभाव, पक्षपात, एक क्षेत्र विशेष को वंचित रखने की साजिश के रूप में देखा जाता है. 

जब केंद्र सरकार की बात आती है तो यह देखने से परहेज किया जाता है कि पूर्वोत्तर को लेकर केंद्र के दायित्व पूरे नहीं हो रहे हैं तो उसका कारण प्रशासनिक अधिकारियों पर नियंत्रण न होना, सरकारी फैसलों को लागू करने में देरी और गंभीरता की कमी, भ्रष्टाचार, अधिकारियों द्वारा जिम्मेवारी को पूरा न किया जाना, लालफीताशाही जैसी वैसी ही समस्याएं हो सकती हैं जैसी राज्य स्तर पर हैं. स्थिति को गवर्नेंस की कमी के नजरिए से नहीं देखकर राजनीतिक साजिश के रूप में देखा जाता है. इस नजरिए के कारण एक पूरी पीढ़ी अपने आपको वंचित, शोषित की दृष्टि से देखने की मानसिकता के साथ बड़ी हुई है. जैसा कि ऊपर कह चुके हैं, यह दूरगामी दृष्टि से खतरनाक है.

11.06.2012, 01.58 (GMT+05:30) पर प्रकाशित

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