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Monday, July 16, 2012

Fwd: [UTTARAKHAND] मित्रो ! आज हरियाली का प्रतीक "हरेला " है | "...



---------- Forwarded message ----------
From: Prayag Pande <notification+kr4marbae4mn@facebookmail.com>
Date: 2012/7/16
Subject: [UTTARAKHAND] मित्रो ! आज हरियाली का प्रतीक "हरेला " है | "...
To: UTTARAKHAND <garhwals@groups.facebook.com>


मित्रो ! आज हरियाली का प्रतीक "हरेला " है | "...
Prayag Pande 12:48pm Jul 16
मित्रो ! आज हरियाली का प्रतीक "हरेला " है | " हरेले " की आप सब को शुभ कामनाएं | देश और दुनियां के ताकतवर लोग प्रकृति प्रदत्त संसाधनों को निचोड़ लेने के बाद पिछले तीन - चार दशकों से पर्यावरण को बचाने के लिए संचार माध्यमों में गला फाड़ कर चिल्ला रहे हैं | जबकि आदि - अनादि काल से पर्यावरण संरक्षण हमारी परम्परा और लोक संस्कृति का अटूट हिस्सा रहा है | पहाड़ के लोग आदि - अनादि काल से पर्यावरण के संरक्षण के लिए " हरेला " पर्व मनाते चले आ रहे हैं | यह पर्व पहाड़ के लोगों की पर्यावरण के प्रति संवेदनशीलता का अनुकरणीय उदाहरण है |
मित्रो ! महंगाई की मार का असर हमारे रोजमर्रा के जीवन के साथ तीज - त्यौहार और लोक पर्वों पर भी पड़ा है | महंगाई ने लोक पर्वों और त्योहारों की रौनक फीकी कर दी है | लिहाज " हरेले " के इस सुअवसर पर महंगाई की मार से रोजमर्रा के जीवन में पेश आ रही परेशानियों को व्यक्त करता एक बहुत पुराना लोक गीत आपके लिए ढूढ कर लाया हूँ | सो लीजिये इस कालजयी लोक गीत का लुत्फ़ उठाईये ------

तिलुवा बौज्यू घागरी चिथड़ी , कन देखना आगडी भिदडी |
खाना - खाना कौंड़ी का यो खाजा , हाई म्यार तिलु कै को दिछ खाना |
न यो कुड़ी पिसवै की कुटुकी , चावल बिना अधियाणी खटकी |
साग पात का यो छन हाला , लूण खाना जिबड़ी पड़ छाला |
न यो कुड़ी घीये की छो रत्ती , कसिक रैंछ पौडों की यां पत्ती |
पचां छटटा घरूं छ चा पाणी , तै पर नाती टपुक सु चीनी |
धों धिनाली का यो छन हाला , हाय मेरा घर छन दिनै यो राता |
दुनियां में अन्याई है गई , लडाई में दुसमन रै गई |
सुन कीड़ी यो रथै की वाता , भला दिन फिर लालो विधाता |
साग पात का ढेर देखली , धों धिनाली की गाड बगली |
वी में कीड़ी तू ग्वाता लगाली ||

भावर्थ :
ओ तिलुवा के पिताजी , देखो यह लहंगा चीथड़े हो गया है , देखना यह फटी अंगिया |
खाने को यह भुनी कौणी रह गई , मेरे तिलुवा को कौन खाना देगा |
इस घर में मुट्ठी भर भी आटा नहीं , पतीली में पानी उबल रहा है , पर चावल नहीं हैं |
साग सब्जी के वैसे ही हाल है , नमक से खाते - खाते जीभ में छाले पड़ गए हैं |
इस घर में तो रत्ती भर भी घी नहीं है , अतिथियों को कैसे निभाऊ |
पाचवें - छठे दिन चाय बनाने के लिए पानी गर्म करती हूँ , पर घर में चखने भर को चीनी नहीं है |
वैसा ही हाल दूध - दही का है , हाय , मेरे घर तो दिन होते ही रात पड़ गई |
संसार में अन्याय बढ़ गया है , लडाई - झगड़ों में लोग एक - दुसरे के शत्रु बन गए हैं |
ओ कीड़ी , तुम मतलब की यह बात सुनो , विधाता हमारे अच्छे दिन फिर लौटा देगा |
तुम साग - सब्जी के ढेर देखोगी इस घर में , दूध - दही की नदियाँ बहेंगी ,
और कीड़ी तुम उसमें गोते लगाओगी ||

(कुमांऊँ का लोक साहित्य )

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