अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कॉर्बन-डाइ-आक्साइड और अन्य ग्रीनहाउस गैसें उत्सर्जित करने के मामले में अपनी साख सुधारने के लिए जलविद्युत की ओर खासा ध्यान दे रहा है। ऊर्जा की कमी ही भारत की विकास दर को तेजी से बढ़ाने में सबसे बढ़ी रुकावट रही है। एक अनुमान के अनुसार, पिछले दो दशक में भारत की ऊर्जा की आवश्यकता साढ़े तीन सौ प्रतिशत बढ़ी है। इसका मतलब यह है कि भारत को ऊर्जा उत्पादन की अपनी वर्तमान क्षमता से तीन गुना अधिक ऊर्जा पैदा करने की जरूरत है। सवाल है यह कहां से पूरी होगी? जबकि यह आवश्यकता यहीं पर स्थिर नहीं है बल्कि लगातार बढ़ती जा रही है।
खैर, अंतरराष्ट्रीय दबाव में भारत का जोर अभी कॉर्बन उत्सर्जन कम कर अधिकतम ऊर्जा प्राप्त कर लेने में है और इसके लिए जलविद्युत परियोजनाएं ही मुफीद हैं। यही 'राष्ट्रहित' में है। नीतियों के स्तर पर यह कितना त्रासद है कि हमारा 'राष्ट्र-हित' जनता के हित से मेल नहीं खाता जबकि कॉरपोरेट के हित 'राष्ट्र-हितों' से एकदम मिलते हैं। ऐसा लगता है जैसे कॉरपोरेट-हित ही राष्ट्र-हित है और इसके लिए जन-हितों की कुरबानी एक व्यवस्थागत सत्य। इसलिए नदियों के जलागम में बसे समाजों के जबर्दस्त प्रतिरोध का दमन करते हुए सरकारें देश भर की नदियों को बांध-बांध कर बांध परियोजनाएं बनाती जा रही हैं।
लेकिन कॉर्बन उत्सर्जन मामले में ये जलविद्युत परियोजनाएं चाहे पर्यावरण-पक्षधर दिखती हों, मगर अनुभव और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हुए कई सर्वेक्षण बताते हैं कि किस तरह इन बांध परियोजनाओं ने मानवीय त्रासदियों को तो जन्म दिया ही है, प्रकृति के साथ भी बहुत खिलवाड़ किया है। इससे मानव सभ्यता के इतिहास में अहम रही कई नदियों के जलागम, पर्यावरण और जैव-विविधता पर गहरा असर पड़ा है। इन नदियों के किनारे बसे इन्हीं पर निर्भर समाज अस्तित्व के संकट में घिर गए हैं। विश्व बांध आयोग की एक रिपोर्ट कहती है कि बांध जरूर कुछ 'वास्तविक लाभ' देते हैं, लेकिन समग्रता में इन बांधों के नकारात्मक प्रभाव ज्यादा हैं जो कि नदी के स्वरूप, पर्यावरण और लोगों के जीवन को बुरी प्रभावित करते हैं। इसीलिए बड़े बांधों के खिलाफ दुनिया भर में आंदोलन उभरे हैं। भारत में भी यह प्रतिरोध व्यापक है। खासकर पूरे हिमालय में जनता इन बांधों के खिलाफ आंदोलित है। प्रतिरोध की तीक्ष्णता के आधार पर अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग तीव्रता से दमनचक्र जारी है। फिर भी इन आंदोलनों का खात्मा करना संभव नहीं हो पाया है।
बांध परियोजनाओं को अतिशय महत्त्व मिलने की दूसरी बड़ी वजह है बेहिसाब मुनाफा। इसके लिए पहाड़ी समाज की अनदेखी कर सरकारें और कंपनियां बांधों को लेकर इतनी लालायित हैं। ऊर्जा की मांग असीम है और पूर्ति सीमित। मांग और पूर्ति के सिद्धांत के अनुसार इसका मूल्य अधिक है। और यह स्थिति स्थायी है। ऐसा कभी नहीं होने जा रहा कि बिजली की पूर्ति ज्यादा हो जाए और मांग कम रहे। यानी बिजली उद्योग में निवेश बाजार की स्थितियों के अनुरूप, बिना किसी जोखिम के मुनाफे का सौदा है। यही वजह है कि कंपनियां इसमें निवेश को लालायित हैं और सरकारें उन्हें भरपूर मदद पहुंचा रही हैं।
भारत में शुरुआती दौर में बनी बांध परियोजनाओं का उद््देश्य सिर्फ विद्युत उत्पादन नहीं था। ये बहु-उद््देश्यीय नदी घाटी परियोजनाएं थीं। इनका मकसद नदी के समग्र जलागम को बाढ़ से बचाव, सिंचाई, मत्स्य पालन और जल पर्यटन आदि के लिए विकसित करना हुआ करता था। विद्युत उत्पादन इसका महज एक हिस्सा था।
मगर पिछली शताब्दी के आखिरी दशक में, उदारीकरण के बाद से जिस तरह सभी क्षेत्रों में जनकल्याण की जगह मुनाफाखोरी ने ले ली है, वही प्रवृत्ति बांधों के मामले में भी दिखती है। विद्युत उत्पादन ही बांध परियोजनाओं का एकमात्र मकसद हो गया है। बिना सरोकारों के, सिर्फ मुनाफाखोरी के लिए बन रही ये परियोजनाएं पर्यावरण संबंधी मानकों की घोर अनदेखी करती हैं, निर्माण-कार्य में गुणवत्ता की शर्तों का पालन नहीं किया जाता और सुरक्षा संबंधी तकाजों के प्रति लापरवाही बरती जाती है। इसके चलते कम जोखिम वाली मझोली और छोटे आकार की बांध परियोजनाएं भी खतरनाक हो गई हैं। क्योंकि सरकार और विपक्ष, दोनों की ओर से इन परियोजनाओं को जैसा प्रश्रय मिला हुआ है उससे इस संदर्भ में किसी भी जांच और कार्रवाई का कोई सवाल ही नहीं उठता।
बारहवीं पंचवर्षीय योजना (2012-2017) के दौरान भारत ने अपनी ऊर्जा क्षमता में एक लाख मेगावाट का अतिरिक्त इजाफा करने का लक्ष्य रखा है। यह पर्यावरण-सम्मत दृष्टि से बिल्कुल असंभव है। और एक मेगावॉट सरीखी छोटी परियोजनाएं तो इस लक्ष्य को पाने में नगण्य भूमिकाएं ही अदा करेंगी। तो सरकारों का जोर स्वाभाविक ही मझोली और बड़ी परियोजनाओं पर होना तय है। ऐसे में मझोली परियोजनाएं तो बनेंगी ही, साथ अतीत की चीज मान ली गई बड़ी बांध परियोजनाओं की फिर से भयंकर शुरुआत होगी। और अगर ऊर्जा उत्पादन के इस लक्ष्य को भारत को किसी भी कीमत पर पा लेना है तो इसका मतलब है कि पर्यावरणीय तकाजों को ताक पर रख, प्रभावित समाजों के प्रतिरोध का बर्बर दमन करते हुए ढेर सारी परियोजनाओं को मंजूरी देनी होगी, तेजी से उनका क्रियान्वयन करना होगा। भारत का विकास-रथ जिस ओर बढ़ रहा है, उसमें पर्यावरण की तबाही और बर्बर दमन अकल्पनीय नहीं है।
No comments:
Post a Comment