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Wednesday, July 17, 2013

हिंदू राष्ट्रवादी सेक्युलर!

हिंदू राष्ट्रवादी सेक्युलर!

Tuesday, 16 July 2013 10:05

गणपत तेली  
जनसत्ता 16 जुलाई, 2013: भारतीय जनता पार्टी के नेता और गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी अभी अपने एक असंवेदनशील बयान के लिए विवाद में हैं। समाचार एजेंसी रायटर को दिए एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा कि उन्हें 2002 के दंगों को लेकर कोई अपराधबोध या पछतावा नहीं है।

दुख जरूर है, दुख तो अगर कुत्ते का बच्चा कार के नीचे आ जाता है तो भी होता है, चाहे कार खुद चला रहे हों या कोई और। उन्होंने कहा कि दंगों के दौरान जितनी बुद्धि उन्हें भगवान ने दी थी, उसके अनुसार उन्होंने सही काम किया। यह विरोधाभासी बयान भी उन्होंने दिया कि वे अपने आप को एक हिंदू राष्ट्रवादी मानते हैं, लेकिन वे सेक्युलर हैं। सेक्युलर का मतलब उनके लिए 'इंडिया फर्स्ट' है। 
इस बयान को लेकर विभिन्न पार्टियों और आम नागरिकों ने कड़ी प्रतिक्रिया जताते हुए इसे एक असंवेदनशील और बेशर्मी भरा बयान करार दिया और मोदी से माफी की मांग की। मगर भाजपा ने रक्षात्मक होते हुए साक्षात्कार को ठीक से पढ़ने की नसीहत दी। इन आलोचनाओं का ही असर था कि मोदी ने बाद में क्षतिपूर्ति के लिए 'जीव मात्र पर दया' जैसे जुमले इस्तेमाल किए। 
असल में, मोदी का ऐसे बयान देना कोई नई बात नहीं है। इस आशय के बयान वे और संघ परिवार के कई नेता देते रहे हैं। बात यह है कि कुछ महीने पहले तक नरेंद्र मोदी सिर्फ गुजरात के नेता हुआ करते थे और क्षेत्रीय समाचार-पत्रों में ही उनके बयान प्रमुखता से छपते थे। उन अखबारों में ये बयान 'महान विचारों' की महिमा पाते थे। गौरतलब है कि दंगों के दौरान भी गुजरात के समाचार-पत्रों का चरित्र सांप्रदायिक और मोदी समर्थक रहा था। ताजा साक्षात्कार का समाचार भी क्षेत्रीय अखबारों में हर बार की तरह ही प्रकाशित हुआ। उनके लिए असामान्य कुछ भी नहीं था। 
कुछ अखबारों के लिए 'कुत्ते' शब्द का प्रयोग खटकने वाला था, क्योंकि 'हमारी संस्कृति' में कुत्ता सम्मान का प्रतीक नहीं माना जाता है। इसलिए उनकी सलाह रही कि 'वे अगर ऐसा नहीं करते, तो ज्यादा बेहतर होता', 'उसकी जगह वे कोई दूसरा शब्द काम में ले सकते थे।' इन अखबारों के पाठक भी उन खबरों के अनुकूल होते हैं, इसलिए कोई असहज स्थिति नहीं आती है। बल्कि ये मोदीनुकूल अखबार पाठकों का कॉमन सेंस भी वैसा ही तैयार करते हैं। इसका एक दिलचस्प उदाहरण उस वक्त सामने आया जब उत्तराखंड में पंद्रह हजार लोगों को बचा लेने के समाचार से मोदी मजाक के पात्र बने हुए थे। उस समय भी कुछ ऐसे लोग थे, जो सेना से खफा थे कि अगर मोदी एक दिन में इतने लोगों को निकाल लेते हैं तो फिर सेना क्यों नहीं निकाल पा रही है! 
यह सर्वविदित है कि नरेंद्र मोदी अपनी छवि सुधारने के लिए एप्को वर्ल्डवाइड नामक एक कंपनी को महीने के लाखों रुपए देते हैं। लेकिन अब वह प्रबंधन काम आता नहीं दिख रहा है। वे कई समाचार चैनलों पर दंगों के बारे में पूछे गए सवालों के जवाब नहीं दे पाए और मजबूर होकर साक्षात्कार बीच में छोड़ दिया। मोदी के भाषण संघ परिवार की खास लफ्फाजी वाली शैली के होते हैं। अटल बिहारी वाजपेयी से लेकर प्रवीण तोगड़िया तक में यह शैली देखी जा सकती है, जिसमें स्वर का उतार-चढ़ाव, बलाघात आदि के जरिए प्रभाव पैदा कर कमजोर वस्तु को मजबूत शिल्प में असरदार बनाने की कोशिश की जाती है। लेकिन सवाल-जवाब के मामले में यह शैली काम नहीं आती, इसलिए अक्सर मोदी फंस जाते हैं। 
गुजरात में 2002 में हुए दंगों के बारे में कई मानवाधिकार कार्यकर्ताओं, संगठनों और पत्रकारों ने अपनी रिपोर्ट में यह स्पष्ट किया कि दंगों के दौरान दंगाइयों को खुली छूट दी गई थी और मुसलमानों को कई दिनों तक उत्पीड़न के लिए छोड़ दिया गया। 
महिलाओं और बच्चों के साथ नृशंस अत्याचार किए गए। दंगाइयों को रोका नहीं गया था। ऐसे कई वीडियो फुटेज हैं, जिनमें पुलिस निष्क्रिय खड़ी है और दंगाई आगे बढ़ रहे हैं। लेकिन मोदी आजकल इसके जवाब में एसआइटी के 'क्लीन चिट' रूपी प्रमाण-पत्र दिखाते फिर रहे हैं। 
अगर मोदी की सीधी भूमिका को विवादास्पद मान भी लें तो गुजरात के 2002 के दंगों के बारे में इतना तो निर्विवाद है कि सरकार कानून और व्यवस्था देने में विफल रही, अपने नागरिकों को सुरक्षा नहीं दे पाई थी। उस समय भारतीय जनता पार्टी के ही प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने इसे शर्मनाक बताते हुए यहां तक कहा था कि 'जल्दी ही मैं विदेश जाने वाला हूं, लोग गुजरात के बारे में पूछेंगे तो मैं क्या जवाब दूंगा, क्या मुंह दिखाऊंगा।' 
गुजरात में उस समय एक महीने से ज्यादा समय तक हिंसक वारदातें होती रही थीं। शाह आलम कैंप के शरणार्थियों ने प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से शिकायत की थी कि पुलिस ने उनके साथ दुश्मनों जैसा व्यवहार किया है और राज्य सरकार की ओर से उन्हें पर्याप्त राहत नहीं मिल रही है। राज्य में जनसंहार जैसी हालत हो गई थी और पिछले दस सालों में सरकार की तरफ से पुनर्वास के कोई मुकम्मल प्रयास नहीं किए गए। कुछ अपवादों को छोड़ कर अपराधियों को सजा भी नहीं दी गई। 

इसके बावजूद अगर वहां की चुनी हुई सरकार का मुखिया आज यह कहे कि 'बिल्कुल सही काम' किया और उसका कोई 'पछतावा' नहीं है, तो यह बेशर्मी से भरी असंवेदनशीलता और अमानवीयता है। यहां तक कि जर्मनी ने भी फासीवादी अत्याचारों के लिए फ्रैंकफर्ट-आॅश्विट्स मुकदमों में कई अपराधियों को सजाएं दी थीं। 
इससे भी आगे मोदी ने कहा कि 2002 की घटनाओं पर उन्हें दुख हुआ और दुख तो पिल्ले के कार के नीचे आ जाने का भी होता है, लेकिन पिल्ले के कार के नीचे आ जाने और 2002 की घटनाओं की कोई तुलना नहीं की जा सकती है। पिल्ले का कार के नीचे आ जाना एक दुर्घटना होगी, लेकिन 2002 की घटनाएं सुनियोजित तरीके से अंजाम दी गई थीं। इशरतजहां हत्याकांड दुर्घटना नहीं थी। गुजरात दंगों के दौरान मानवाधिकार संगठनों द्वारा जारी की गई विभिन्न तथ्यान्वेषी रिपोर्टों में यह स्पष्ट था कि वे दंगे सुनियोजित थे। गुजरात के वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों- आरबी श्रीकुमार और संजीव भट्ट के बयानों के बाद यह भी पता चला कि कई मंत्री और वरिष्ठ अधिकारी उन षड्यंत्रों में शामिल थे। सोहराबुद्दीन, तुलसी प्रजापति और इशरतजहां फर्जी मुठभेड़ की चार्जशीट से यह भी स्पष्ट हुआ कि उक्त सभी घटनाएं दुर्घटनाएं नहीं, बल्कि बड़े स्तर के नेताओं और अधिकारियों द्वारा सुनियोजित तरीके से अंजाम दी गई घटनाएं थीं। पिल्ले के दुर्घटना में शिकार होने का उदाहरण देकर मोदी ने न केवल अपनी असंवेदनशीलता का परिचय दिया, बल्कि दंगा पीड़ितों का मजाक उड़ाया है। 
भारतीय जनता पार्टी और संघ परिवार के अन्य हलकों में सेक्युलर शब्द को काफी विचलित और चिढ़ पैदा करने वाला माना जाता है। उसका सीधा कारण यह है कि सेक्युलरवाद की मूल धारणा धर्म और राजनीति का अलगाव है। यूरोप में इस धारणा द्वारा पोप और गिरजाघरों को राजनीतिक क्षेत्र से अलग कर दिया था। मतलब यह कि अब धर्म और राजनीति अलग-अलग हैं। भारत में यह उसी रूप में तो लागू नहीं हुआ, लेकिन इसका यह आशय लिया गया कि राज्य किसी एक धर्म को प्रश्रय नहीं देगा। सेक्युलरवाद की यह धारणा भारतीय जनता पार्टी की धर्म आधारित राजनीति के मूल मकसद पर चोट करती है। 
भाजपा सिर्फ हिंदुओं की राजनीति करती है और सेक्युलरवाद इसकी इजाजत नहीं देता। लेकिन आधुनिक राज्यों के लिए सेक्युलरवाद इतना अहम सिद्धांत है कि उसे लांघ पाना आसान नहीं है। दूसरी बात यह भी है कि हमारे यहां सेक्युलरवाद का प्रतिपक्ष सांप्रदायिक/ फासीवादी है, जिसका लांछन कोई व्यक्ति या दल खुद पर नहीं लगने देना चाहता। इसलिए भारतीय जनता पार्टी ने कोई रास्ता न देख कर एक नायाब तरीका निकाला और कहना शुरू किया कि हम ही असली सेक्युलर हैं, हमारे अलावा सभी छद्म धर्मनिरपेक्ष हैं। 
यहां तक कि भारतीय जनता पार्टी ने अपनी नफरत की राजनीति के लिए सेक्युलरवाद को सिर के बल खड़ा करते हुए समान नागरिक संहिता की मांग को इससे जोड़ दिया। जबकि सेक्युलरवाद का एक उद्देश्य यह भी है कि धार्मिक आधार पर अल्पसंख्यकों के नागरिक अधिकार सुरक्षित रहें। हालांकि भाजपा ने समान नागरिक संहिता के आधार पर अगड़ों-पिछड़ों, अमीरों-गरीबों, अल्पसंख्यकों-बहुसंख्यकों सभी को एक घाट का पानी पिलाने की मंशा पाली थी। 
खैर, यह फिर भी भाजपा द्वारा की गई सेक्युलरवाद की एक विकृत व्याख्या थी, लेकिन मोदी ने जनता को बेवकूफ बनाने की दिशा में इससे भी आगे बढ़ते हुए कहा कि मेरे लिए सेक्युलरवाद का मतलब है 'इंडिया फर्स्ट'। अब बताइए, सेक्युलरवाद की यह कौन-सी परिभाषा हुई! सेक्युलरवाद के मूल धर्म और राज्य-राजनीति के पार्थक्य का 'इंडिया फर्स्ट' से क्या संबंध है! दरअसल, यह भावुक अंधराष्ट्रवाद को संबोधित करने की एक कोशिश है, सेक्युलरवाद का इससे कोई मतलब नहीं है। 
यहां उन लोगों के बारे में कुछ कहा जाना ठीक रहेगा, जो यह सोच कर मोदीमय हो रहे हैं कि मोदी का राष्ट्रीय राजनीति में उभार पिछड़ी जातियों के लिए मददगार होगा। यहां पर यह जान लेना आवश्यक है कि मोदी की चाबी राष्ट्रीय स्वयंसेवक नामक घोर जातिवादी संगठन के हाथ में है, जिसके सर-संघचालक नामक मुखिया कोई गैर-ब्राह्मण नहीं हुआ है। यह वही संघ परिवार है, जिसने तथाकथित निचली जातियों का शोषण और इस्तेमाल किया। ये वही मोदी हैं, जिन्होंने आदिवासियों का हिंदूकरण कराया और 2002 के दंगों में उनसे अल्पसंख्यकों पर अत्याचार करवाए। अब जिस तरह सरकार के आदेश पालन के बावजूद फर्जी मुठभेड़ में पुलिस अधिकारी ही जेल गए हैं, उसी तरह जब कभी इन मामलों की न्यायिक जांच होगी तो संघ परिवार के उच्च वर्णीय नेता-कार्यकर्ता बच जाएंगे और वे आदिवासी ही फंसेंगे। 
बहरहाल, राष्ट्रीय राजनीति में तथाकथित कदम रखने के बाद अपने पहले ही साक्षात्कार से मोदी विवादों में आ गए हैं। इससे भाजपा द्वारा खुद को अल्पसंख्यकों की हिमायती पार्टी के रूप में पेश करने की कोशिशों की पोल खुल गई और प्रति माह लाखों रुपए देकर मोदी की अपनी छवि सुधारने की कोशिशें भी नाकाम हुई।

 

 

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