धीरज चतुर्वेदी, छतरपुर (म.प्र.)। पन्ना जिले के गांव राजापुर में आज भी चंद बोरे अनाज के बदले बच्चों को गिरवी रख दिया जाता है। इस गांव में कई बच्चे बेगार करते नजर आते हैं। यह वही गांव है, जहां राहुल गांधी ने पांच साल पहले आदिवासी लल्लीबाई के घर भोजन कर भरोसा दिलाया था कि रोटी खाने के बदले नमक का कर्ज अदा करेंगे। अब केंद्र सरकार के बुंदेलखंड पैकेज के आबंटन पर सवाल उठने लगे हैं। सरकारी योजनाओं की असलियत दिखाती पन्ना जिले के राजापुर की कहानी आज भी गुलामी की दास्तां बयां करती है। देवेंद्रनगर तहसील मुख्यालय से महज लगभग पांच किलोमीटर दूर ग्राम राजापुर में आदिवासियों की बहुलता है। बुंदेलखंड मे आज भी दलित और आदिवासी अपनी रिहाइश नहीं बना सकते। इनकी बस्तियां अलग होती हैं। गांव के सचिव धन सिंह के अनुसार 2600 आबादी वाली पंचायत में आदिवासियों की अधिकता है। जिनकी जीविका का साधन मजदूरी है। उनका दावा है कि मनरेगा के तहत यहां मजदूरों को काम की कमी नहीं है। गांव की शुक्कनबाई के पति गिरधारी गौड़ का कहना है कि उसने अपने 13 साल के बेटे राजकुमार को छह बोरे अनाज के बदले एक साल के लिए गिरवी रख दिया है। शुक्कनबाई के पांच बच्चे हैं। मजदूरी न मिलने से दो बच्चे शहर चले गए। घर में भुखमरी से बेहाल इस मां ने अपने कलेजे के टुकडेÞ को जिला सतना के ग्राम अतरोरा में दौलत पटेल के घर गिरवी रख दिया है। इसी गांव का एक और बालक मंगल (पिता शक्ति गौड़) को भी छह क्विंटल अनाज के बदले गिरवी रखा हुआ है। गांव के ही बेटू चौधरी ने बताया कि उनके गांव सहित अन्य आदिवासी इलाकों में बच्चों को गिरवी रख कर अनाज लेने का चलन है। पिछले साल उसने इलाके के ऐसे 26 बच्चों की खोज की थी जो अनाज के बदले बड़े लोगों के घर में मजदूरी कर रहे हैं। चौधरी ने यह समस्या तत्कालीन कलक्टर केसी जैन को बताई थी, पर प्रशासन खामोश रहा। गिरवी रखे जाने वाले बच्चे शोषण का शिकार होते है। मासूम बच्चों से हर तरह के काम कराए जाते हैं। गांव की शकुतंला अहिरवार का कहना है कि अति गरीब को 30 और गरीबी रेखा के कार्डधारकों को 20 किलो अनाज प्रतिमाह मिलता है। दलित और आदिवासी समाज में सदस्य अधिक होने के कारण इतने अनाज में भरपाई नहीं हो पाती है। इसलिए इस पूरे क्षेत्र में अनाज के बदले बच्चों गिरवी रखने का चलन है। शंकुतला के अनुसार यह इलाका बेहद पिछड़ा है। काम के अभाव में अधिकांश दलित और आदिवासी परिवार शहर पलायन कर जाते हैं। घर में केवल वृद्ध और बच्चों को छोड़ दिया जाता है। बच्चे भी इसी तरह बेगार में झोंक दिए जाते हैं। इस गांव में स्कूल है। रजिस्टर भी बच्चों के दाखिले से भरे हैं, लेकिन मजदूरी करने वाले बच्चों के नसीब में पढ़ाई नहीं है। गांव राजापुर पांच साल पहले अचानक सुर्खियों में तब आया था जब राहुल गांधी बुंदेलखंड के दौरे पर थे। इस गांव की लल्लीबाई के घर राहुल बाकी पेज 8 पर उङ्मल्ल३्र४ी ३ङ्म स्रँी ८ उङ्मल्ल३्र४ी ३ङ्म स्रँी ८ उङ्मल्ल३्र४ी ३ङ्म स्रँी ८ गांधी ने खाना खाकर रात बिताई थी। इस परिवार के लोग बताते हैं कि राहुल गांधी ने भरोसा दिया था कि इनकी मदद के लिए पहल करेंगे। विडंबना है कि जिस कमरे में राहुल ने रात बिताई थी आज वह जमींदोज हो चुका है। लल्लीबाई का परिवार आज भी भुखमरी का दंश झेल रहा है। राहुल के बुंदेलखंड दौरे के बाद ही उनकी पहल पर केंद्र सरकार ने बुंदेलखंड पैकेज के रूप में भारी भरकम राशि आबंटित की थी। उद्देश्य था कि यह पैकेज बुंदेलखंड की गरीबी दूर करने के लिए वरदान साबित होगा। मगर रारापुर की किस्मत नहीं बदली। |
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