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Wednesday, April 18, 2012

एक कविता से उठी बहस

एक कविता से उठी बहस


Wednesday, 18 April 2012 10:32

पुष्परंजन 
जनसत्ता 18 अप्रैल, 2012: एक बार फिर गुंटर ग्रास ने साबित किया है कि साहित्य में सत्ता को हिलाने की ताकत होती है। उपन्यासकार, कवि, नाटककार, ग्राफिक डिजाइनर, शिल्पी और साथ में नोबेल पुरस्कार!  चौरासी साल की उम्र में गुंटर ग्रास ने इतना सब कुछ हासिल किया है। इस महीने जर्मन दैनिक 'ज्युड डॉयचे साइटुग' में छपी उनकी उनहत्तर पंक्तियों वाली कविता 'वास गेजाख्ट वेर्डेन मुस' यानी 'जो बात कही जानी चाहिए' से इजराइल खफा है। 
ग्रास ने अपनी कविता में इजराइल को विश्व शांति के लिए खतरा बताया है, और शंका व्यक्त की है कि नाभिकीय हथियारों से लैस यह देश ईरान का नाश कर सकता है। इजराइल के कारण तीसरा विश्वयुद्ध छिड़ सकता है। गुस्से से भरे इजराइल के गृहमंत्री इली जीशाई ने गुंटर ग्रास को अवांछित व्यक्ति घोषित करते हुए अपने यहां आने पर रोक लगा दी है। गृहमंत्री जीशाई ने ग्रास के बारे में कहा कि यह व्यक्ति हिटलर की नाजी सेना 'वाफेन-एसएस' का सैनिक रह चुका है, ऐसे यहूदी-विरोधी लेखक और कवि से और क्या उम्मीद की जा सकती है! 
गुंटर ग्रास के पास इस कविता के लिए यह समय चुनने की वजह है। ग्रास का कहना है कि मैंने यह कविता जर्मनी द्वारा इजराइल को परमाणु पनडुब्बी बेचे जाने के बाद लिखी है। गृहमंत्री इली जीशाई शास पार्टी के नेता हैं, और इजराइल के उपप्रधानमंत्री भी। इजराइल में शास पार्टी धार्मिक आस्था के मामले में कट्टर कही जाती है। प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की गठबंधन सरकार में जीशाई समेत शास पार्टी के चार मंत्री हैं। ग्रास के विरुद्ध वैचारिक युद्ध छेड़ने में शास पार्टी सबसे आगे है। तभी वामपंथ में विश्वास करने वाला इजराइली अखबार 'हर्त्ज' लिखता है कि गृहमंत्री जीशाई फालतू में तूल दे रहे हैं। इस दैनिक का आकलन कुछ हद तक सही लगता है। क्योंकि अगले साल वहां चुनाव है, और शास पार्टी अपना झंडा और डंडा ऊंचा रखना चाहती है। 
ग्रास के विरुद्ध शब्दभेदी बाण छोड़ने में बेंजामिन नेतन्याहू भी पीछे नहीं हैं। उन्होंने विदेश मंत्री एवीग्डोर लिबरमन को इटली के प्रधानमंत्री मारियो मोंटी के पास भेजा और ग्रास को दिया नोबेल पुरस्कार छीनने की मांग की। बेंजामिन ने पश्चिम के बुद्धिजीवियों को कोसते हुए यह कहने में कोताही नहीं की कि उन पर एक बार फिर यहूदियों का नाश करने की सनक सवार है। इजराइल में इन्हीं दिनों पेसाच महोत्सव मनाने की परंपरा है। कुछ यहूदी संगठन आरोप लगा रहे हैं कि ग्रास ने इस महोत्सव को भी ध्यान में रखा था। ऐसे अवसर पर दंगाई मानसिकता के कुछ यहूदी-विरोधी ईसाई यह हवा उड़ाने से नहीं चूकते कि हिंसक अनुष्ठानों के जरिए इजराइली पेसाच महोत्सव मनाते हैं।  
यह पहला अवसर नहीं है जब इजराइल ने किसी बुद्धिजीवी पर पाबंदी लगाई हो। यह भी जरूरी नहीं कि कोई यहूदी है, और इजराइल का आलोचक है तो उसे बख्श दिया जाए। राजनीति विज्ञानी नार्मन फिंकेस्टाइन यहूदी हैं और इजराइल की नीतियों की जमकर आलोचना करते हैं। दो साल पहले उन्हें दस वर्षों के लिए देश से निकाल दिया गया। इन दिनों नार्मन अमेरिकी विश्वविद्यालय में राजनीति की दीक्षा दे रहे हैं। अमेरिका में ही रह रहे नोम चोम्स्की जैसे वामपंथी लेखक और भाषाविद को अपने यहूदी होने पर उतना गर्व नहीं है। नोम चोम्स्की की आलोचना नहीं झेल पाने वाले इजराइल ने दो साल पहले उन पर रोक लगा दी थी। 
सन 2010 में ही आयरलैंड की नोबेल पुरस्कार विजेता मारियाड मैग्वार सिर्फ फिलस्तीनियों से मिलने गर्इं, तो इजराइल ने उन्हें वीजा के बावजूद सीमा पार करने नहीं दिया। 'द एंड आॅफ जुडिजम' के लेखक डॉ हाजो जी मेयर, ब्रिटिश लेबर पार्टी के सांसद रिचर्ड बर्डेन, यूरोपीय संसद की सदस्य लुइसा मोर्गातिनी समेत कोई दर्जन भर शख्सियतें और संगठन इजराइल में प्रतिबंधित हैं। 
सवाल यह है कि क्या ग्रास ने सचमुच लेखकीय लक्ष्मण रेखा पार की है? इस प्रश्न पर पूरा यूरोपीय-अमेरिकी समाज दो भागों में बंटा हुआ है। जर्मनी में ग्रास की आलोचना जारी है। जर्मन विदेश मंत्री गीजो वेस्टरवेले ने पिछले हफ्ते एक लेख में अपना विचार दिया कि इजराइल और ईरान को जिस तरह से ग्रास ने बराबरी का दर्जा दिया है, वह बौद्धिक नहीं, बेतुका है। ईरान परमाणु निगरानी में पूरा सहयोग नहीं कर रहा है। जर्मन विदेश मंत्री वेस्टरवेले ने कहा कि ईरान को नागरिक नाभिकीय ऊर्जा के इस्तेमाल का अधिकार है, पर वह परमाणु हथियार नहीं बना सकता। जर्मन विदेश मंत्री ने ग्रास पर तंज करते हुए टिप्पणी की 'जो परमाणु हथियार से पैदा होने वाले खतरे को नकारता है, वह सचाई को पीठ दिखा रहा है।'
इक्यासी साल के जर्मन लेखक रॉल्फ होखहूथ ने ग्रास के ही अंदाज में लिखा, 'तुम वहीं के वहीं रह गए जो तुम इच्छा से थे/ नाजी एसएस/ जिसने साठ साल तक यह बात छिपाई।' होखहूथ ने लिखा कि मुझे इस बात पर शर्म आती है कि ग्रास इजराइल को जर्मन पनडुब्बी खरीदने से रोकना चाहते थे। क्या गुंटर ग्रास को यह नहीं दिखता कि नाजियों की तरह ईरान ने भी यहूदी नस्ल को नेस्तनाबूद करने की धमकी दे रखी है? 

डेनमार्क के लेखक क्नूद रोमर कहते हैं कि ग्रास ने इजराइल को भावी नरसंहार के लिए जिम्मेदार ठहराने की गलत कोशिश की है। ऐसा लगता है मानो यह साहित्यकार ईरान का भोंपू हो। अमेरिकी लेखक डेनियल गोल्डहैगन ने भी ग्रास को नाजी अतीत को नकारने वाला साहित्यकार बताया है।   गोल्डहैगन ने कहा कि ग्रास अपने समय के पिटे-पिटाए पूर्वग्रहों और रूपकों का इस्तेमाल अपनी कविता में करते हैं। 
लेकिन ईरान के लेखकों और राजनेताओं के लिए ग्रास का त्रास, इजराइल समर्थकों पर हल्ला बोल के काम आ रहा है। ईरान के संस्कृति उपमंत्री जवाद शामगदरी ने ग्रास को इसके लिए शाबासी दी है। उन्हें लिखे पत्र में कहा, 'कोई शक नहीं कि आपकी यह कविता पश्चिम के सोए विवेक को फिर से जगाने में मदद करेगी।' 
पिछले गुरुवार तक कोई पैंतीस सौ फेसबुक गुंटर ग्रास के लिए समर्पित थे। क्लाउस स्टीफेन श्लांगेल जर्मनी के माने हुए ब्लॉगबाज हैं। क्लाउस ने बाकायदा 'सपोर्ट गुंटर ग्रास' नाम से अभियान छेड़ रखा है। इस बार जर्मनी में ईस्टर गुंटर ग्रास के लिए शायद मनाया गया था। अक्सर ईस्टर के अवसर पर जर्मनी में शांति रैलियां निकलती हैं। इस बार जर्मन शांति आंदोलन के स्वर, उनके बैनर, पोस्टरों को देख कर लगता था, गोया वे गुंटर ग्रास के समर्थन में सड़क पर हों। 
'ईस्टर मार्च' के संस्थापकों में से एक, आंद्रेयास बूरो ने बयान दिया कि ग्रास ने अपनी कविता के माध्यम से ईरान विवाद के शांतिपूर्ण समाधान को कार्यसूची में लाने का काम किया है। यू ट्यूब पर 'इजराइल आई लव यू, बट डोंट अटैक ईरान' से मशहूर हुए म्युनिख के संगीतकार मोरिज एगर्ट ने कहा कि ग्रास की छवि का सत्यानाश करने पर कुछ बुद्धिजीवी जिस तरह तुल गए हैं, उसे लेकर मुझे मानसिक कष्ट होता है। 
साफ दिख रहा है कि ग्रास को लेकर साहित्य, संगीत, शिल्प, पेंटिंग, नाटक और दूसरी विधाओं के कलाकार और साहित्यकार बंट गए हैं। यह देख कर लगता है कि ग्रास ने सचमुच एक वैचारिक युद्ध की शुरुआत कर दी है। निश्चित रूप से इसका कारण ईरान है। 
ग्रास ने 2006 में जब अपने अतीत की चर्चा की और स्वीकार किया कि द्वितीय विश्वयुद्ध में वे हिटलर की सेना में काम कर चुके थे, तो यूरोप का साहित्य जगत स्तब्ध रह गया था। इस पर जमकर राजनीति हुई। उस दौर में गुंटर ग्रास की सर्वश्रेष्ठ कृति 'द टीन ड्रम' जिस पर 1999 में उन्हें नोबेल पुरस्कार मिल चुका था, उसके दोहरे चेहरे पर सवाल खड़ा हो गया। 
'द टीन ड्रम' में द्वितीय विश्वयुद्ध के दौर में एक ऐसे बौने बच्चे के चरित्र को ग्रास ने उकेरा था, जो हिटलर की तानाशाही के कारण विकसित नहीं हो पाया था। 'द टीन ड्रम' का वह वामन बच्चा सबको सजग करता है कि सावधान नाजी अब आने ही वाले हैं। ग्रास को जब 1999 में नोबेल पुरस्कार देने की घोषणा हुई तो जर्मनी और पोलैंड का साहित्य जगत सीना चौड़ा किए फिर रहा था। गुंटर ग्रास 16 अक्टूबर 1927 को बंदरगाह शहर गेदांस्क में पैदा हुए थे। तब गेदांस्क जर्मनी का हिस्सा हुआ करता था। वक्त बदला और गेदांस्क पोलैंड की भौगोलिक परिधि में आ गया। 
गुंटर ग्रास गेदांस्क से जर्मनी के शहर बेहलेनडोर्फ में आकर बस गए। लेकिन पोलैंड फिर भी गुंटर ग्रास को गेदांस्क का मानद नागरिक मानता रहा। 1999 में नोबेल पुरस्कार के बाद ग्रास का कद आसमान छूने लगा था। स्वतंत्र पोलैंड के प्रथम राष्ट्रपति लेख बाउएन्सा (जिन्हें भारत में लेख वालेसा कहते हैं) ने इच्छा व्यक्त की थी कि काश, मैं कभी गुंटर ग्रास से हाथ मिला पाता। सात साल बाद, 2006 में यही गुंटर ग्रास लेख बाउएन्सा के लिए घृणा के प्रतीक हो गए। वजह उस समय प्रकाशित ग्रास की पुस्तक 'बाइम होयटन देयर स्वीबेल' थी, जिसका अर्थ प्याज छीलना होता है। इस पुस्तक में ग्रास ने अपने अतीत की परतें खोलते हुए मान लिया था कि वे हिटलर की सशस्त्र सेना 'एसएस' में थे। लेख बाउएन्सा ने तब कहा था, 'अच्छा हुआ कि इस व्यक्ति से मैंने हाथ नहीं मिलाया था। कभी मिलाऊंगा भी नहीं!'  
1990 से पहले पोलैंड और जर्मनी के बीच द्वितीय विश्वयुद्ध के घावों लेकर तनाव ताजा होता रहा है। पोलैंड के आउत्सविज में हिटलर के समय का सबसे बड़ा नाजी शिविर आज संग्रहालय के रूप में है। 'आउत्सविज' का नाजी शिविर हिटलर और जर्मनी के अत्याचारों का हौलनाक सबूत है। आज पोलैंड एक बार फिर ग्रास के उस 'टीन के ड्रम' को बजा रहा है। लेकिन 2006 के हालात में, और अब के हालात में काफी अंतर है। अमेरिका समेत पश्चिम में साहित्य का ध्रुवीकरण इस तरह से हो सकता है, और उसमें इस कदर कूटनीति घुस जाएगी, ऐसी स्थिति बहुत कम देखने को मिलती है। सवाल यह है कि ग्रास पर पूर्वी और दक्षिण एशिया में बहस क्यों नहीं हो रही है?

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