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Wednesday, May 8, 2013

चिटफंड कंपनियों के गोरखधंधे को लेकर संसद में खामोशी क्यों?

 चिटफंड कंपनियों के गोरखधंधे को लेकर संसद में खामोशी क्यों?


एक्सकैलिबर स्टीवेंस विश्वास​


(कृपया इस एक्सकलुसिव स्टोरी पर बाईलाइन जरुर लगायें)


सड़कों से लेकर संसद तक देशभर में हंगामा खूब बरपा है। भ्रष्टाचार के खिलाफ समझिये कि क्रांति कभी भी होने वाली है, ऐसा माहौल है और दसों दिशाओं में मानसून आने से पहले से घोटालों की घन घटाएं उमड़ घुमड़ रही हैं। कोयला ब्लाक से लेकर किसिम किसिम घोटालों की चर्चा से दिन प्रतिदिन संसदीय कार्यवाही ठप हो रही है। राजकाज ठप है। सिर्फ वित्तीय विधेयकों के पास करने की सम्मति है। रोज रोज अभूतपूर्व हंगामा। इस परिदृश्य में यह कम हैरतअंगेज ​​नहीं है कि देशभर में करोड़ों लोगों की जमा पूंजी हड़पने वाली चिटफंड कंपनियों के गोरखधंधे को लेकर कोई स्थगन प्रस्ताव, ध्यानाकर्षण प्रस्ताव की खबरें नहीं आ रही हैं। प्रश्नकाल और शून्यकाल में भी सन्नाटा पसरा है। क्या वजह हो सकती है इसकी? कोई राज्य बचा नहीं है इस गोरख धंधे से। बंगाल में सौ से बड़ी कंपनियां हैं तो सैकड़ों छोटी कंपनियां। दूसरे राज्यों में इस तंत्र की भी जमकर खुलासा होने लगा है। फिर भी खामोशी?


वित्तमंत्री की पत्नी नलिनी को शारदा समूह से ४२ करोड़ के भुगतान का मामला सामने आया। सेबी और राष्ट्रपति को पटाने की कोशिस में चालीस करोड़ खर्च हुए। केंद्रीय एजंसियां चुपचाप हैं। अकेले बंगला में कम से कम पंद्रह लोगों ने आत्महत्या कर ली हैं। हत्याएं तक हो रही हैं। माओवादियों, आतंकवादियों, अलगाव वादियों, राष्ट्रद्रोहियों, अल्फा, जिहादियों,कोयला माफिया से लेकर मुंबई के अंडर वर्ल्ड तक के इस धंधे से तार जुड़े होने का खुलासा हो रहा है। महज आर्थिक अपराध का मामला तो है नहीं यह। या किसी एक राज्य के कानून व्यवस्था का मामला भी नहीं है , जो संसद में उठाया ही नहीं जासकता। राष्ट्रीय सुरक्षा, प्रतिरक्षा, आंतरिक सुरक्षा, एकता और अखंडता से जुड़ा मसला हो गया यह। नागरिक और मानवाधिकारों का खुल्ला उल्लंघन हो रहा है और फिर भी बात बेबात पर हंगामा बरपाने वाले हमारे जनप्रतिनिधि खामोश हैं। क्यों?


दरअसल बात खुलेगी तो खुलती चली जायेगी। भेद खुलेंगे तो सबकी बोलती बंद हो जायेगी, ऐसा मामला है यह। उत्तरप्रदेश में अस्सी के दशक से चिटफंड साम्राज्य का बोलबाला है। सामाजिक बदलाव और सोशल इंजीनीयरिंग के पीछे वहां चिटफंड हैं। उत्तरभारत से लेकर दक्षिण भारत तक में चिटफंड कंपनियां राजनेताओं , बाहुबलियों और धनपशुओं के लिए स्विस बैंक का काम कर रही हैं। बेहिसाब संपत्ति और आयकर संपत्तिकर घोटाला, प्रोमोटर राज के पीछे यह चिटफंड कारोबार है।सहारा इंडिया, लालिमा फाइनेंस, कुबेर, जेवीजी, राप्ती, सोप्ती, अनिल, चंदू, गुडिया, हरियाली जैसे ऐसे कुछ नाम है जिन्होंने लोगो के शरीर से पैसे के रूप में उनका खून निकाला है। इन कंपनियों ने बड़ा बनने के लिए लाखों निवेशकों को इस बात के लिए तैयार किया कि वह उन पर विश्वास करें और उनके यहाँ उस विश्वास के साथ अपने जीवन की जमा पूंजी रख दे जो उन्होंने खाता खोलने के लिए कंपनी पर दिखाया था| लेकिन शायद उन लाखों निवेशकों को ये पता नहीं था कि वह अपने पैसे ऐसे लोगो के हाथ में दे रहे है जो कभी वापस नहीं आयेंगे। उनके पैसे को यही कम्पनियां अलग-अलग स्कीमों में लगाकर पैसे की तरह उन्हें भी जीवन भर घुमाती रहेंगी।  


तो इस वक्त कांग्रेस शासित असम और महाराष्ट्र, वाम शासित त्रिपुरा, राजग शासित बिहार और झारखंड, तृणमूल शासित बंगाल में यह मामला तांडव का आकार ले चुका है। पूर्वोत्तर में सारी गतिविधियां चिटफंड आधारित है। सत्तादलों के मंत्री , सांसद से लेकर आम कार्यकर्ता चांदी काटते ​​रहे हैं।अराजनीति भी चिटफंड के दम पर।राजनीति से दूर दूर तक जिनका रिश्ता नहीं है, चिटफंट के वरदहस्त से वे संसद तक पहुंच गये। कोई आरोप लगायेगा तो किस पर लगायेगा?


यह किसी मनमोहन सिंह,बंसल. चिदंबरम या अश्विनीकुमार को अकेले घेरने का मामला नहीं है। घेराव हुआ तो रथी महारथी तमाम घिर जायेंगे।


बंगाल में स्वयं मुख्यमंत्री अब आरोपों के घेरे में हैं। तो पिछली सरकार से लेकर केंद्र सरकार और केंद्रीय एजंसियों की मिलीभगत भी सामने आ रही है। हाईकोर्ट में सीबीआई जांच के लिए चार चार मामले लंबित हैं।इनमें से एक मामले में पूर्व मुख्यमंत्री और पूर्व वित्तमंत्री को सीबीआई जांच के दायरे में लाने की मांग की गयी है।​कलकत्ता हाईकोर्ट ने करोड़ों रुपये के शारदा चिटफंड घोटाले की जांच केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) से कराने की मांग संबंधी जनहित याचिकाओं की सुनवाई लत रही है।पैसला जल्द ही आ जायेगा।मुख्य न्यायाधीश अरण मिश्रा और न्यायमूर्ति जयमाल्यो बागची की खंडपीठ जनहित याचिकाओं पर सुनवाई कर रही है। अदालत ने इन बातों पर गौर किया कि सीबीआई जांच कराने के लिए चार याचिकाएं दायर की गई हैं और अदालत के पूर्व निर्देशानुसार पश्चिम बंगाल सरकार ने पहली याचिका के संबंध में अपना शपथपत्र पेश कर दिया है।अदालत ने राज्य सरकार से इस बीच मामले की सीबीआई जांच कराए जाने की मांग करने वाली अन्य तीन याचिकाओं में उठाई गई बातों पर एक पूरक शपथपत्र पेश करने का निर्देश दिया है। राज्य सरकार के वकील अशोक बनर्जी ने कहा कि हालांकि सभी याचिकाओं के लिए राज्य का एक ही रुख रहेगा लेकिन वह सभी याचिकाओं का अध्ययन करेगी और जरूरत पड़ने पर एक पूरक शपथ पत्र जमा करेगी। राज्य से  अदालत में पेश किए गए शपथ पत्र की प्रतियां सभी याचिकाकर्ताओं को भी मुहैया कराने को कहा गया है।  


गौरतलब है कि सीबीआई टीम गुवाहाटी पहुंच चुकी है और त्रिपुरा सरकार ने भी सीबीआई जांच के लिए आवेदन किया हुआ है। पूरे त्रिपुरा में चिटपंड कंपनियों के खिलाफ गिरफ्तारी, तलाशी और जब्ती अभियान चल रहा है। ऐसा अभियान बिहार में भी शुरु हो चुका है। हालांकि नीतीश कुमार ने अभीतक सीबीआई जांच की मांग नहीं की है। ममता बनर्जी , माणिक सरकार और तरुण गोगोई मुखर हैं. लेकिन नीतीश कुमार और नवीन पटनायक समेत बाकी राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने चुप्पी साध ली है। ममता बनर्जी ने सीबीआई जांच  के खिलाफ केंद्र का तख्ता तक पलट देने की धमकी दी है।दूसरी ओर, चिटफंड घोटाले को लेकर वामदलों और तृणमूल कांग्रेस में जारी वाक्युद्ध के बीच बुद्धदेव भट्टाचार्य ने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पर 'झूठ' फैलाकर इस प्रकरण में उनका नाम घसीटने का प्रयास करने का आरोप लगाया और कहा कि केवल सीबीआई जांच से सच सामने आ सकता है।भट्टाचार्य ने आश्चर्य जताते हुए कहा, 'मैं दस साल तक मुख्यमंत्री था। अगर कोई मेरे साथ केाई तस्वीर खींच ले तो इसमें कोई बड़ी बात नहीं है। इसका यह मतलब नहीं कि मैंने उस व्यक्ति से धन लिया है। क्या हमने इन कंपनियों की किसी शाखा की अध्यक्षता के लिए अपनी पार्टी के नेताओं को चिटफंड फर्मों में डाला है?' उन्होंने कहा कि बड़े बड़े भाषण देने के बजाय सीबीआई जांच होने दीजिए। सीबीआई जांच ही इस मामले में सच सामने ला सकती है।


गौरतलब है कि  शारदा चिटफंड घोटाला मामले में लेफ्ट फ्रंट का एक प्रतिनिधिमंडल सीबीआई जांच का दबाव बनाने की खातिर राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को 9 मई को ज्ञापन सौंपेगा।


इतना महत्वपूर्ण मामला है तो इन दलों के सांसद संसद में क्यों खामोश हैं? क्यों चुप है अपने अपने राज्य में जनता के बीच कुरुक्षेत्र का मैदान बनाने वाले कांग्रेसी, वामपंथी, तृणमूलिये, भाजपाई और दूसरे पाक साफ दलों के सांसद?

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​मुंबई में सरकार और पुलिस तक में चिटफंडिये हैं। कोयलांचलों में चिटफंड का अबाध कारोबार है। महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, उड़ीसा, बिहार, झारखंड, उत्तरप्रदेश,असम, झारखंड से लेकर बंगाल तक सत्ता का सारा यंत्र तंत्र तार तार हो रहा है।खुलासा होने लगा तो खाल किसी की नहीं बचने वाली।


उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में मकड़ी के जाल की तरह फैले इन चिट फंड कंपनियों पर फिलहाल दोनों राज्यों की सरकारों का कोई ध्यान नहीं है। शिवराज के राज में बड़ा स्कैम्प हुआ, हाईकोर्ट ने संज्ञान लिया| आज सीबीआई जाँच तक बात पहुंची लेकिन उत्तर प्रदेश में अभी भी बड़े से लेकर छोटे कई ऐसे धन्धेबाज़ है जो आम जनता का रोजाना थोड़ा-थोड़ा खून चूस रहे हैं पर सरकार इस पर कुछ नहीं कर रही।भारत में चिटफंड कंपनियों की बयार दक्षिण से बही थी लेकिन उत्तर आते-आते ये लोगो की भावनाओं से खेलने वाली और उनके जीवन भर की कमाई को गायब करने वाली बन गई। मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश दो ऐसे राज्य है जहाँ की जनसँख्या ऐसे कामों के लिए मुफीद मानी जाती रही है।  


मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के ग्वालियर बेंच के जज न्यायाधीश एस के गंगेले और न्यायधीश ब्रिज किशोर दुबे की खंडपीठ ने याची धर्मवीर सिंह और अन्य बनाम भारत सरकार और राज्य की याचिका 3332, 2010 पर सुनवाई करते हुए कहा कि राज्य और सरकार याचिकाकर्ताओं के हितों को सुनिश्चित करें। धर्मवीर सिंह और अन्य की याचिका पर सुनवाई करते हुए हाई कोर्ट की ग्वालियर बेंच ने कहा कि जनता के हितों की रक्षा करना राज्य सरकारों का काम है। सरकारे इस मुद्दे पर कोई ध्यान नहीं दे रही जिसकी वजह से निवेशको का हित प्रभावी हो रहा है।


हाईकोर्ट ने मध्य प्रदेश निष्पक्षो के हितों का संरक्षण अधिनियम 2000 सेक्शन 58B (5&5A) & 58C आफ आरबीआई एक्ट, 1934 और सेक्शन 4,5, और 6 ईनामी चिट और पैसे स्कीम धारा 1978 के तहत कंपनी के संचालकों के खिलाफ सेक्शन 3 (1 ) , 3 (2 ) 3 (4 ) और 6 के तहत करवाई की जाएँ। हाईकोर्ट ने राज्य सरकार की कड़ी आलोचना करते हुए कहा कि सरकार ऐसी कंपनियों पर कोई भी कार्रवाई नहीं कर रही है बल्कि प्रदेश और देश में मकड़े के जाल की तरह फैली इन बोगस और फ्राड कंपनियों की संरक्षक बनी हुई है। हाईकोर्ट ने इस प्रकरण की जांच के लिए सीबीआई जांच के आदेश दिए है। साथ ही राज्य सरकार को भी इस मामले में कठघरे में खडा करते हुए मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के खिलाफ भी तीखी टिप्पणी की।


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