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Wednesday, April 18, 2012

विषमतापूर्ण समाज में विविधतापूर्ण शिक्षा : बेवकूफी या साजिश!

http://www.news.bhadas4media.com/index.php/yeduniya/1179-2012-04-18-10-10-06

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Written by दीपक "विद्रोही" Category: [LINK=/index.php/yeduniya]सियासत-ताकत-राजकाज-देश-प्रदेश-दुनिया-समाज-सरोकार[/LINK] Published on 18 April 2012 [LINK=/index.php/component/mailto/?tmpl=component&template=youmagazine&link=ee783af0d47bd57abaf1017504d387d37f3d60b6][IMG]/templates/youmagazine/images/system/emailButton.png[/IMG][/LINK] [LINK=/index.php/yeduniya/1179-2012-04-18-10-10-06?tmpl=component&print=1&layout=default&page=][IMG]/templates/youmagazine/images/system/printButton.png[/IMG][/LINK]
भारतीय समाज में धर्म, जाति, लिंग पर आधारित घोर विषमताएं हैं, जो भारतीय समाज के विकास के साथ-साथ यहॉ के सामाजिक वातावरण में अत्यंत गहराई से स्थापित होते चली गई। इन विषमताओं के कारण भारत में एक बड़े समुदाय को शिक्षा से वंचित रखा गया। इस वंचित समुदाय में दलित, आदिवासी एवं महिलाए शामिल हैं। भारत में बिट्रिश साम्राज्यवाद द्वारा यहॉ के दलाल शासक वर्गों को सत्ता का हस्तांतरण करने के बाद इस दलाल शासक वर्ग ने संविधान के माध्यम से कुछ सुधारवादी कार्यक्रम लागू करके जाति के आधार पर शोषित एवं पीड़ित "जिन्हे अछुत कहा जाता था" ऐसे वर्णों के लिए आरक्षण की व्यवस्था की है। आरक्षण की व्यवस्था लागू करने से निश्चित ही ऐसे समुदाय जो सदियों से ब्राम्हणवादी व्यवस्था के नीचे दबे थे, इन समुदायों में शिक्षा प्राप्त करने को लेकर न केवल उत्साह और आत्मविश्‍वास पैदा हुआ बल्कि इस बड़े समुदाय के एक छोटे से हिस्से को आर्थिक एवं सामाजिक विकास के अवसर भी मिले। परंतु इस घोर विषमतापूर्ण समाज में सत्ता हस्तांतरण के बाद शिक्षा के क्षैत्र में जो सुधारवादी कार्यक्रम लागू किये गये वह पर्याप्त नहीं थे। यदि यह कार्यक्रम पर्याप्त होते तो शासक वर्ग द्वारा 10 वर्ष में सभी को शिक्षा प्रदान करने के जो लुभावने वायदे किये गये थे वह वास्तविकता के धरातल पर खरे उतरते।

शिक्षा के क्षैत्र में जो पिछड़ापन दलितों, आदिवासियों एवं महिलाओं का आज भी कायम है वह सिद्ध करता है कि इन समुदाय को शिक्षा प्रदान करने के लिए पूरी गंभीरता से प्रयास नहीं किये गये, जिसके पीछे एक बड़ा कारण यह था कि एक वर्गीय समाज में यदि मेहनतकश मजदूर वर्ग शिक्षित हो जाये तो सस्ते श्रमिकों का अकाल पड़ जायेगा एवं श्रम की लूट मुश्किल हो जायेगी। वहीं दूसरी ओर इस व्यवस्था में शिक्षा पाकर जिन लोगों ने नौकरीयॉ या अन्य रोजगार पा भी लिये हैं, वह केवल उनके आर्थिक विकास में सहायक सिद्ध हुआ है। ये शिक्षा व्यवस्था लोगों की रूढ़ीवादी सोच को खत्म करने में असफल सिद्ध हुई है। इस शिक्षा व्यवस्था से शिक्षित लोग सामाजिक गैरबराबरी, छुआछुत, लिंग भेद आदि के खिलाफ संघर्ष न कर उसे सांस्कृतिक धरोहर के रूप में सहज कर रखने का पुरजोर प्रयास कर रहे हैं।

वर्तमान शिक्षा व्यवस्था द्वारा हिन्दुस्तान का दलाल शासक वर्ग नव-उपनिवेशिक गुलामी को कायम रखकर अमेरिकी हितों की रक्षा कर रहा है। इस शिक्षा व्यवस्था के माध्यम से विद्यार्थियों को जो कुछ भी परोसा जा रहा है उससे केवल वह मध्यम वर्गीय विचारों से ही अभिप्रेरित हो रहे हैं। जो केवल बड़े पेकैज और स्वयं को उच्च वर्ग में स्थापित करने के सपने देखते हैं। यह शिक्षा तंत्र की असफलता है कि एक ओर तकनीक का विकास हो रहा है दूसरी ओर वैज्ञानिक चेतना संकुचित होती जा रही है। जिसके पिछे प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से भारतीय समाज में व्याप्त गैरबराबरी एवं ब्राम्हण वर्ण की श्रेष्ठता पर आधारित सामाजिक सोच जिम्मेदार है। जो परलोक का भय व धर्म की अफीम पिलाकर जनता को मूलभूत सवालों से गुमराह करती है।

भारत एक बहुराष्ट्रीय देश है, जो उपनिवेशिक काल के दौरान कई रियासतों को अपने अंदर समाहित करके निर्माण किया गया तथा जो सत्ता हस्तांतरण के बाद एक राष्ट्र के रूप में स्थापित हुआ। इसलिए भारतीय समाज में भोगौलिक, प्राकृतिक, भाषाई एवं सांस्कृतिक विविधताएं है इस विविधतापूर्ण समाज में शिक्षा की एकरूपता या एक ही समान पाठ्यक्रम से विद्यार्थियों का विकास संभव नहीं है। आज हमारे पाठ्यक्रमों में अधिकतर अध्याय बहुसंख्यक समुदाय के हितों एवं भावनाओं को ध्यान में रखकर बनाये जा रहे है। इसका सबसे सामान्य उदाहरण दिवाली, गाय आदि से संबंधित अध्याय का पाठ्यक्रम में शामिल किया जाना है। जो इस राष्ट्र की धर्मनिरपेक्षता को ठेंगा दिखा रहे है। सारे देष का पाठ्यक्रम देश की विविधता को ध्यान में रखकर ही तैयार किया जाना चाहिए। वर्तमान समय में पाठ्यक्रम या शिक्षा ज्ञान की जुगाली करने का माध्यम मात्र ही है। जो कि वैज्ञानिक चेतना में बाधक है। विविधतापूर्ण शिक्षा के अभाव के कारण समाज में गैरबराबरी की खाई को नहीं पाटा जा सकता और इसी कारण आज एक उत्तर भारतीय व्यक्ति दक्षिण या पूर्वोत्तर राज्यों की संस्कृति के बारे में ज्ञान प्राप्त नहीं कर पाता है। वहीं दूसरी ओर दक्षिण या पूर्वोत्तर का व्यक्ति देश के अन्य भाग की सांस्कृतिक पहलू को नहीं समझ पाता है। इसलिए ऐसे पाठ्यक्रमों का विकास किया जाना चाहिए जो विद्यार्थियों को अपनी मातृ भाषा के माध्यम से दूसरी भाषा एवं सांस्कृतिक विविधता की जानकारी प्रदान कर सके।

क्षेत्रीय भाषाई सांस्कृतिक विविधता के साथ-साथ भारत के विस्तार के प्रभाव में जो क्षेत्र है जहा लंबे समय से भारत की विस्तारवादी रूख के कारण इन क्षेत्रों में जनविद्रोह उभर रहे हैं, जिसे तेजी से कुचला जा रहा है। भारतीय राजसत्ता जिस शिक्षा व्यवस्था की पैरोकार है उसमें राष्ट्रवाद घुट्टी के रूप में पिलाया जाता है जो आदिवासियों, कश्‍मीरियों एवं पूर्वोत्तर का दमन करने में अपनी भूमिका अदा करते हैं। जब तक भारतीय समाज में विविधतापूर्ण शिक्षा के लिए नीतियां तैयार कर उन्हे अमल नहीं किया जाता तब तक इस विषमतापूर्ण समाज में मानवाधिकारों, महिलाओं, अल्पसंख्यक समुदायों, भाषाई व बोली के आधार पर अल्पसंख्यकों की सुरक्षा को सुनिश्चित नहीं किया जा सकता।

[B]लेखक दीपक "विद्रोही" क्रांतिकारी नौजवान भारत सभा के राज्‍य संयोजक हैं. [/B]

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