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Tuesday, May 7, 2013

आइला...चीनी सेना वापस गयी...

आइला...चीनी सेना वापस गयी...


जानिए पंजाराम पप्पू ने क्या किया खास

चीनी नेता घबरा गए और अपने जासूसों को कहा कि भाई पता करो ये कौन सा बम है जो एटम बम से भी बड़ा है और जिसके दम पे राधाकृष्णन इतनी डींगे मार रहे हैं. चीनी जासूस ढूंढ-ढूंढ के मर गए. कुछ पता नहीं चला, फिर चीनी नेताओं का भय बढ़ता ही गया कि भाई ये बड़ा ही सीक्रेट बम...

संजय जोठे

अभी अभी चीन की सेना भारत की जमीन पर पांच तम्बू ठोकने के बाद और हफ्तेभर तक चाऊमीन खाने के बाद तम्बू उखाड़ के वापस रवाना हो गयी है. तब एक वाजिब सा सवाल पैदा हो रहा है कि आखिर ऐसा क्या हो गया कि ड्रेगन वापस जा रहा है? कौनसी डील हुई या कौनसी बात से ड्रेगन डर गया है? इसी तरह की हालत साठ के दशक में बनी थी. तब भी हमारे बतोलेबाज नेताओं ने एक गज़ब की कूटनीति से उसे सुलझाया गया था.

china-army

पिछली बार जब चीनी सेना दबंगई करने के बाद पीछे हटी थी तब हरिशंकर परसाई ने एक "गंभीर खुलासा" किया था कि चीनी सेना क्यों 'डर' गयी थी उस समय. उन्होंने लिखा था कि सर्वेपल्ली राधाकृष्णन ने दिल्ली में एक भाषण दिया था जिसमे उन्होंने कहा भारतीय संस्कृति एक आध्यात्मिक संस्कृति है ... हम अध्यात्म के सहारे जीते हैं... कोई एटम बम हमें डरा नहीं सकता (उस समय चीन ने परमाणु बम बना लिया था).. हमारे पास "धर्म" की शक्ति है जिसका कोई मुकाबला नहीं कर सकता... परसाई जी आगे लिखते हैं, इस "धर्म" की बात सुनकर चीनी नेता घबरा गए और अपने जासूसों को कहा कि भाई पता करो ये कौनसा बम है जो एटम बम से भी बड़ा है और जिसके दम पे राधाकृष्णन इतनी डींगे मार रहे हैं ... चीनी जासूस ढूंढ-ढूंढके मर गए... कुछ पता नहीं चला... फिर चीनी नेताओं का भय बढ़ता ही गया कि भाई ये बड़ा ही सीक्रेट बम है... किसी को कोई खबर नहीं मिल पा रही , हो ना हो ये बड़ा खतरनाक हथियार है... इसीलिये उन्होंने चीनी सेना को पीछे हटा लिया.

अब ये कूटनीति एक खानदानी राज बन चुकी है. हर बार जब भी हिमालय पार से कोई चुनौती आती है तो उससे उसी तरह निपटा जाता है. भले ही हमारी दो चार हज़ार वर्गमील ज़मीन चली जाए, पर हमारे नेता हमारी "इज्जत" को बचाने में हमेशा सफल रहते है. और अब इस कूटनीति का इस्तेमाल मुख्य सत्ताधारी पार्टी के 'स्टेंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर' का अभिन्न अंग बन चुका है. होना भी चाहिए, अरे भाई पूर्वजों के सौंपे हुए गुर का सम्मान करना हमारा कर्तव्य जो है. और हमारे कर्तव्यपरायण खानदानी नेता इस बात से भला कैसे पीछे हट सकते हैं? अब ये तो हुई इतिहास की बात. अभी फिर से ड्रेगन ने दहाड़ मारी और पांच पाच तम्बू ठोक के हमारी जमीन पर बैठ गया.

अब हमारी सरकार बेचारी खुद को बचाए या देश को बचाए? बहुत हील हुज्जत के बाद बात करने को दोनों मुल्क तैयार हुए. अब चीन एक बार जब बात करने को तैयार हुआ तो मतलब कि शास्त्रार्थ शुरू. और हम तो ठहरे विरासत में मिली तर्क की तलवार चमकाने वाले खिलाड़ी. हमसे कौन जीतेगा? तो बच्चू ड्रेगन आ ही गया बतोलेबाजी के पहाड़ के नीचे. फिर वो ही होना था जो पहले हुआ था. लेकिन इस बार हमारे नेता ने दूसरी लल्लनटॉप चाल चली. वो चाल पहली चाल से भी ज्यादा मारू थी. पहले वाले नेता ने तो धर्म नाम के बम का भय फैलाया था. आज के नेता ने तो और लम्बी छोडी, और ये पता ही नहीं लगने दिया की वो बम से डरा रहा है या पनडुब्बी से डरा रहा है या व्यापार बंद होने की धमकी दे रहा है. अपनी बतोलेबाजी के जाल में ऐसा उलझाया ड्रेगन को कि ड्रेगन सोच में पड़ गया.

ये जो वार्ता हुई चीन और हमारे नेता के बीच वो दुनिया के सामरिक और कूटनीतिक इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में लिखी जायेगी (बेशक वो स्वर्ण प्लेट और स्याही भी मेड इन चाइना ही होगी ). और सैन्य विज्ञान के छात्र इसकी केस स्टडी पढेंगे. हमारे एक कूटनीतिक विशेषज्ञ सरदार सिरफोड़ सिंह ने इस कूटनीति का नाम रखा है 'पप्पूनियन स्ट्रेटजी'.

अब ये 'पप्पूनियन स्ट्रेटजी' कैसे काम करती है और उसका हमारे नेता ने कैसे उपयोग किया वो आप तब तक नहीं समझ सकते जब तक कि हम उन दोनों के बीच हुई बात का ब्योरा आपके सामने नहीं रख देते. तो मित्रो दिल थाम के नीचे लिखे ब्योरे को पढ़िए. आप खुद समझ जायेंगे ये 'पप्पूनियन स्ट्रेटजी' कैसे काम करती है. ये ब्योरा युद्ध के खतरे के मद्देनजर चीन के राष्ट्रपति छिंग पुंग और भारत के एक उभरते हुए खानदानी नेता श्री पंजाराम पप्पू के बीच एक गुप्त वार्ता के बारे में है. उसी के नतीजे में चीनी सेना को पीछे हटना पडा है. वो वार्ता आपके लिए प्रस्तुत है:

छिंग पुंग- तुम हमारा कुछ नहीं बिगाड़ सकते हमारे पास सैकड़ो एटम बम है... तुम्हारे पास कौन सा बम है?

पंजाराम पप्पू (बाहें चढाते हुए) - मुझसे नहीं पूछिए... ये आप अपने आप से पूछिए कि हिन्दुस्तान के पास क्या है… एक एक हिन्दुस्तानी के मन में शक्ति छुपी हुई है... उस शक्ति को पहचानने की जरूरत है...  मेरा भारत महान...

छिंग पुंग - आप क्या कर सकते हैं ?

पंजाराम पप्पू- मुझसे मत पूछिए ... ये भी आप अपने आप से पूछिए की हम क्या कर सकते हैं असली शक्ति मन में होती है... मेरे देश की धरती सोना उगले... उगले हीर रांझा...

छिंग पुंग - हीर रांझा नहीं हीरे मोती...

पंजाराम पप्पू - हाँ हाँ पता है... ये आप अपने आप को समझाइये ...

छिंग पुंग - ऐसे नहीं मानोगे... ये देखो हमारे एटम बम का फोटू

पंजाराम पप्पू (फोटू फाड़ते हुए) - हमारे पास इससे बड़ा बम है.

छिंग पुंग - वो क्या है जी?

पंजाराम पप्पू- वो आप अपने आप से पूछिए...  मैं नहीं बता सकता...  आपको मुझसे ऐसे सवालों की उम्मीद नहीं करनी चाहिए.

छिंग पुंग - लगता है आपका बम भी आपके पीएम की तरह फुस्सी है.

पंजाराम पप्पू - कोई भी एक आदमी से उम्मीद मत रखिये... एक आदमी या एक बम कुछ नहीं कर सकता...

छिंग पुंग - वो ही तो हम भी कह रहे हैं आपसे.

पंजाराम पप्पू - आप मुझसे मत कहिये... अपने आप से कहिये... यहाँ एक आदमी कुछ नहीं कर सकता ... एक हाथ कुछ नहीं कर सकता… सबको मिल जुलकर कुछ करना होता है... एकता में शक्ति है ... इंसान चाहे तो क्या नहीं कर सकता.

छिंग पुंग - वो तो सब ठीक है लेकिन आपके देश में कोई भी आदमी कुछ नहीं करता...  तुम्हारा ये देश चलता कैसे है भाई?

पंजाराम पप्पू - ये आप मुझसे मत पूछिए... अपने आप से पूछिए... ये देश है वीर जवानो का अलबेलों का मस्तानो का... होए ..होए …. अपने मन में झांकिए की हिन्दुस्तान की असली ताकत कहा छुपी है...

छिंग पुंग - अरे तो मेरे बाप ... बता दे ना कहा छुपी है?

पंजाराम पप्पू - आप मुझसे मत पूछिए .... अपने मन में झाँक के देखिये... अपनी अंतरात्मा से पूछिए... जय जवान… जय किसान...

छिंग पुंग - अरे भैया अगर ये सब मुझे अपनी अंतरात्मा से ही पूछना है तो तू यहाँ बात करने के लिए क्यों आया है?

पंजाराम पप्पू- ये भी आप अपने आप से पूछिए अपने मन में झांकिए... अपनी अंतरात्मा में झांकिए... सारे जहां से अच्छा हिन्दोसिता हमारा... हिन्दू मुस्लिम भाई भाई... जय हिन्द...

छिंग पुंग - मेरे बाप... मुझे माफ़ कर दे. ये मैं कहाँ फस गया... मैं हार मानता हु और अपनी सेना वापस बुलाता हूँ...

आइला... और इस तरह चीनी सेना वापस चली गयी... जय हो...

sanjay-jotheसंजय जोठे इंदौर में कार्यरत हैं.

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