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Tuesday, June 16, 2015

रूपकुंड ट्रेक

रूपकुंड ट्रेक
कलुआ विनायक से भागुआवासा के बीच का बरफ से ढका ट्रेक...
सीधी ढलान वाला , रात की बरफ्बारी के बाद लौटते वक्त ये रास्ता बहुत फिसलनदार हो गया था. पैर फिसला तो बर्फीले ढाल पर लुडकते हुए सैकड़ों फीट पर चट्टानों से टकराना ही नियती था..
इन रास्तों पर चलने के लिए जूतों के नीचे क्रेम्पोन लगाने होते है. क्रेम्पोन में लोहे की कीलों नीचे की तरफ होती है और जूते के नीचे लगाए जाते है ! कीलें चलते वक्त बरफ में गढ़ जाती हैं और फिसलने नहीं देती .
व्यावसायिक ट्रेक कराने वाले ये अपने क्लाइंट के लिए ऐसी व्यवस्था करते हैं की बरफ पड़े तो वो ट्रेकेर्स को क्रेम्पोन दे दें..
हम तीनो साथियों के पास क्रेम्पोन नहीं थे..., वापस भी आना था तो क्रेम्पोन ज़रूरी थे. वहाँ , हम में से एक साथी आते वक्त ही बहुत परेशान हुआ था तथा बार बार फिसल रहा था...पहली शाम की बरफ बारी के बाद तो मामला और भी ज्यादा खतरनाक था. 
क्रेम्पोन लेने ही थे.. भगुवा वासा में किराए पर क्रेम्पोन लेने की ढून्ढ की तो पता चला की दो सेट क्रेम्पोन ही उपलब्ध हैं. वो भी दो घंटे के लिए और पांच सौ रूपये प्रति क्रेम्पोन के हिसाब से. सवाल किराए का नहीं उपलब्धता का था. तय किया गया की लेने ही हैं तो ले लिए जाएँ ... एक क्रेम्पोन तो फिसलने वाले साथी को दिया गया.. दूसरे क्रेम्पोन के लिए लड़ाई हो इससे पहले ही मैंने डिक्लियर कर दिया की मैं बिना क्रेम्पोन के ही चलूँगा. 
आगे हाल-ए-किस्सा ये है की बाकी दोनों साथी क्रेम्पोन पहन कर चके और मैं बिना क्रेम्पोन के ही ....
अति विश्वास के साथ चला की आज तक क्रेम्पोन नहीं पहने हैं, जरुरत महसूस नहीं की तो आज भी चल लूंगा.

पर थोड़ी ही देर में विश्वास की हवा निकल गयी. क्रेम्पोन पहने साथी आगे निकल गए थे. .., जितना चल चुका उससे.वापस लौट नहीं सकता था.. और वापिस लौटने में भी तो वही खतरा था.. धीरे धीरे चलते हुए आगे आया..बास एक लाठी थी जिसको बरफ में गाड़ते गाड़ते चला. एक एक कदम पर अपने ध्यान केन्द्रित कर.... दो तीन बार फिसला भी.....! डर लग रहा था की फिसला तो क्या होगा... आसपास कोई नहीं था जो सूचना दे की कोई यहाँ फिसला है या फंसा है...... सहायता चाहिए...! डर इतना था की फोटो खींचना भी भूल गया....! (जान पर जो बन आई थी) डेढ़ दोई किलोमीटर चलने के बाद जब कोहरे के बीच कलुवा विनायक की झलक मिली तो जान में जान आयी...!
इस ट्रेक में वो दो किलोमीटर का पैच चलना सबसे कठिन था ...वैसा ही जैसा हमने सिन-ला ( जोलिंग कोंग) दर्रा पार करते वक्त महसूस किया था..१ उस वक्त सब साथी साथ थे कुछ होता तो पता चलता और सहायता की गुंजायश थी...., यहाँ पर मैं बिल्कुल अकेला था...., डर स्वाभाविक था..., 
पर ट्रेकिंग का विधान है की वो ही हिस्सा याद रहता है जो सबसे ज्यादा कष्टकारी या डराने वाला होता है..., इस ट्रेक में ये हिस्सा यादगार हिस्सा था. इस बार का रूपकुंड ट्रेक इस वजह से भी यादगार बना है...
इस हिस्से पर मैंने 1986 और 1988 में भी यात्रा की थी तब ये बरफ से नहीं ढका था.....तब ये बहुत सरल लगा था...बस सांस की तकलीफ हुई थी...., इस बार सांस की तकलीफ महसूस नहीं की क्यों की इतना खतरा था और सिर्फ चलने पर ही इतना ध्यान देना था की सांस की तकलीफ हुई भी होगी तो महसूस नहीं हुई.... 
पुनश्च: खतरनाक रास्ता पार करने के बाद पस्त थे , जैसे ही जान आयी एक साथी, जो ज्यादा परेशान था बोला....बरफ ना होती तो रास्ता ज्यादा खतरनाक ना होता! इसबार तो ठीक से कुछ दिखा भी नहीं, क्यों ना सितम्बर में फिर आयें..., मैंने उसके चहरे पर आश्चर्य से देखा ..फिर मुस्करा कर उससे कहा...पक्का ..!



रूपकुंड ट्रेकिंग से वापसी...!
बर्फ़बारी के बीच ट्रेकिंग नया अनुभव...! भगुवा वासा की -7 डिग्री सेल्सियस तक की ठंडी की रात... और बिना क्रेमपोंन के बरफ में चलने का हिला देने वाला अनुभव इसी यात्रा के लिए सुरक्षित था.
इस बार भी बहुत सीखा...! बहुत तरह के लोगों से मिले...! जिंदगी जीने के तरीके जाने...! ज्यादा बेहतर इंसान कैसे बन सकते हैं....इस बार भी मुझे सिखाया ग्रामीणों ने...!
और अपने बारे में तो जाना ही..! अपनी सीमाओं का भी भान हुआ...! मन को मनाना पड़ा की भाई तेरी ही नहीं चलेगी .तन भी कोई अदद चीज़ है....! सिर्फ दवाओं से ही काम नहीं चलेगा ....
फोटोज और अनुभव साझा ज़रूर करूंगा...., ज़रा दम और दमा काबू में तो आये.......!!!

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