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प्रोपेगेंडा, बिकी हुई खबरें, मीडियाः एक अदृश्य सत्ता

प्रोपेगेंडा, बिकी हुई खबरें, मीडियाः एक अदृश्य सत्ता

Posted by Reyaz-ul-haque on 2/15/2010 10:10:00 PM

हमारे समय में चेतना की धार को कुंद करने वाले शब्दों को उसके सही और वास्तविक मायनों में व्याख्यायित करने वाले प्रख्यात पत्रकार जॉन पिल्गर ने यह व्याख्यान(यहां एक वीडियो भी है) शिकागो में पिछली जुलाई में दिया था। इस व्याख्यान में वे विस्तार से बताते हैं कि कैसे प्रोपेगेण्डा हमारे जीवन की दिशा को प्रबलता से प्रभावित कर रहा है। इतना ही नहीं प्रोपेगेण्डा आज एक अद्रृश्य सत्ता का भी प्रतिनिधित्व करता है। अनिल का अनुवाद.इसे हमारे समय में बिकी हुई खबरों पर चली बहस के संदर्भ में पढ़िए और सोचिए कि हमारे देश में इसका प्रतिरोध कितना नाकाफी और वैचारिक रूप से कितना अधूरा है.

इस बातचीत का शीर्षक है आज़ादी; अगली बार, जो कि मेरी पुस्तक का भी शीर्षक है और यह पुस्तक पत्रकारिता का भेष धर कर किए जाने वाले दुष्प्रचार अभियान अर्थात प्रोपेगेंडा की असलियत तथा इससे रोकथाम के बारे में है। अतः मैने सोचा कि आज मुझे पत्रकारिता के बारे में, पत्रकारिता द्वारा युद्ध के बारे में, प्रोपेगेंडा और चुप्पी तथा इस चुप्पी को तोड़ने के बारे में बात करनी चाहिए। जनसंपर्क के तथाकथित जनक एडवर्ड बर्न्स ने एक अदृश्य सरकार के बारे में लिखा है जो हमारे देश में शासन करने वाली वास्तविक सत्ता होती है. वे पत्रकारिता, मीडिया को संबोधित कर रहे थे। यह क़रीब अस्सी साल पहले की बात है, जबकि कार्पोरेट पत्रकारिता की खोज हुए ज्यादा लंबा समय नहीं हुआ था। यह एक इतिहास है जिसके बारे में कुछ पत्रकार बताते हैं या जानते हैं और इसकी शुरुआत कार्पोरेट विज्ञापन के उद्‍भव से हुई। जब कुछ निगमों ने प्रेस का अधिग्रहण करना शुरू कर दिया तो कुछ लोग जिसे "पेशेवर पत्रकारिता" कहते हैं, उसकी खोज हुई। बडे़ विज्ञापनदाताओं को आकर्षित करने के लिए नए कारपोरेट प्रेस को सर्वमान्य, स्थापित सत्ताओं का स्तंभ- वस्तुनिष्ठ, निष्पक्ष तथा संतुलित दिखना था। पत्रकारिता का पहला स्कूल खोला गया और पेशेवर पत्रकारों के बीच उदारवादी निरपेक्षता के मिथकशास्त्रों की घुट्टियां पिलाई जाने लगीं। अभिव्यक्‍ति की आज़ादी के अधिकार को नई मीडिया तथा बडे़ निगमों के साथ जोड़ दिया गया और यह सब, जैसा कि राबर्ट मैक्चेसनी ने कहा है कि 'पूरी तरह से बकवास' है।  

जनता जो चीज़ नहीं जानती थी वह यह कि पेशेवर होने के लिए पत्रकारों को यह आश्वासन देना होता है कि जो समाचार और दृष्टिकोण वह देंगे वह आधिकारिक स्त्रोतों से ही संचालित और निर्देशित होंगे और यह आज भी नहीं बदला है। आप किसी भी दिन का न्यूयार्क टाईम्स उठाइए और राजनीतिक खबरों- विदेशी और घरेलू दोनों, के स्रोतों की जाँच करिए, आप पाएंगें कि वे सरकारों तथा अन्य स्थापित स्रोतों से ही निर्देशित हैं। पेशेवर पत्रकारिता का यही मूलभूत सार है। मैं यह नहीं कह रहा हूं कि स्वतंत्र पत्रकारिता इससे कोई अलग थी या इसे छोड़ दिया जाए लेकिन फिर भी यह इससे बेहतर अपवाद थी। इराक पर आक्रमण में न्यूयार्क टाईम्स की जुडिथ मिलर ने जो भूमिका निभाई उसके बारे में सोचिए। हाँ, उसके काम का पर्दाफ़ाश हो गया लेकिन यह सिर्फ़ झूठ आधारित आक्रमण को प्रोत्साहित करने में शक्तिशाली भूमिका निभाने के बाद ही हो सका। फिर भी मिलर द्वारा आधिकारिक स्रोतों तथा निहित क्षुद्र स्वार्थों का रट्टा लगाना न्यूयार्क टाइम्स के कई अन्य प्रसिद्ध रिपोर्टरों, जैसे प्रतिष्ठित रिपोर्टर डब्ल्यू एच लारेंस जिसने अगस्त 1945 में हिरोशिमा पर गिराए गए अणुबमों के वास्तविक प्रभावों को कवर करने में मदद की थी, से कोई अलग नहीं था। 'हिरोशिमा की बर्बादी में रेडियोएक्टिविटी नहीं'  इस रिपोर्ट का शीर्षक था और यह झूठ थी।

गौर कीजिए कि कैसे इस अदृश्य सरकार की शक्ति बढ़ती गई। 1983 में प्रमुख वैश्विक मीडिया के मालिक/धारक पचास निगमें थीं जिसमें से अधिकतर अमरीकी थे। 2002 में घट कर सिर्फ़ नौ निगम रह गए। आज तकरीबन पाँच ही हैं। रूपर्ट मर्डोक का अनुमान है कि अगले कुछ सालों में मात्र तीन मीडिया खिलाड़ी ही शेष बचे रहेंगे और उसकी कंपनी उनमें से एक होगी। सत्ता का यह केंद्रीकरण संयुक्त राज्य में शायद उसी तरह नहीं है। बीबीसी ने घोषणा की है कि वह अपने प्रसारण को संयुक्त राज्य में फैला रही है क्योंकि उसका मानना है कि अमरीकन मौलिक, वस्तुनिष्ठ तथा निरपेक्ष पत्रकारिता चाहते हैं जिसके लिए बीबीसी प्रसिद्ध है। उन्होंने बीबीसी अमरीका प्रारंभ किया है। आपने विज्ञापन देखा ही होगा।

बीबीसी 1922 में, अमरीका में कार्पोरेट प्रेस के शुरु होने के थोडा़ पहले, शुरू हुआ। इसके संस्थापक जॉन रीथ थे जिनका मानना था कि निष्पक्षता और वस्तुनिष्ठता पेशेवर होने के मूलभूत सार हैं। उसी साल ब्रिटिश हुकूमत को घेर लिया गया था। श्रमिक संगठनों ने आम हड़ताल का आह्वान किया था तथा टोरियों को डर हो गया कि क्रांति होने जा रही है। तब नवीन बीबीसी उनके बचाव में आया। उच्च गोपनीयता में लार्ड रीथ ने टोरी प्रधानमंत्री स्टानले बाल्डविन के लिए यूनियन विरोधी भाषण लिखा और जब तक हड़ताल ख़त्म नहीं हो गई, लेबर नेताओं को अपना पक्ष रखने की अनुमति देने से इनकार करते हुए उन भाषणों को राष्ट्र के नाम प्रसारित करते रहे।

अतः एक मिसाल कायम की गई। निष्पक्षता एक निश्चित सिद्धांत था: एक ऐसा सिद्धांत जिसे स्थापित सत्ता को ख़तरा महसूस होते ही बर्खास्त कर दिया गया। और यह सिद्धांत तब से संभाल कर रखा लिया गया है।

बीबीसी समाचार में सामान्यतः दो शब्द 'भूल' (मिस्टेक) और 'मूर्खतापूर्ण ग़लती' (ब्लंडर) प्रमुखता से इस्तेमाल किए जाते हैं। वह भी 'असफल' के साथ जो कम से कम यह दिखाता है कि अगर सुरक्षाविहीन इराक पर जानबूझकर, सुनियोजित, बिना भड़काए, गैरकानूनी आक्रमण सफल हो जाता तो वह बिल्कुल सही होता। जब भी मैं इन शब्दों को सुनता हूं तो न सोचे जा सकने वाले को भी सामान्य करने के बारे में एडवर्ड हरमन के अद्भुत लेख की याद आ जाती है। जिसके लिए मीडिया घिसी पिटी उक्‍तियों का प्रयोग करता है तथा सोची तक न जा सकने वाली बात को सामान्य बनाने का काम करता है। युद्ध के विनाश को, विशाल आबादी की यातनाओं को, आक्रमण से क्षत विक्षत बच्चों को, उन सब को जिसे मैने देखा है।

शीत युद्ध के दौरान रूसी पत्रकारों के अमरीका भ्रमण पर मेरी अपनी एक पसंदीदा रिपोर्ट है। भ्रमण के अंतिम दिनों में उनके मेजबान ने अपनी शेखी बघारने के लिए उनसे कुछ पूछा था। "मैं आपको बताता हूं", प्रवक्‍ता ने कहा,"कि सभी अखबारों को पढ़कर तथा रोज़-ब-रोज़ टेलीविजन देखते हुए हमें यह जानकर आश्‍चर्य हुआ कि सभी बडे़ मुद्दों पर लगभग सभी की राय एक जैसी हैं। अपने देश में इन समाचारों को पाने के लिए हम गुलागों में पत्रकार भेजते हैं, हम उनकी उंगलियों के नाख़ून तक जाँचते हैं। यहां आपको वो कुछ नहीं करना पड़ेगा। इसका भेद क्या है?"     

गोपनीय क्या है? यह सवाल अक्सर ही समाचार कक्षों, मीडिया अध्ययन के संस्थानों, पत्र पत्रिकाओं में पूछा जाता है। और इस सवाल का जवाब लाखों लोगों की जिंदगी के लिए बेहद महत्वपूर्ण होता है। पिछले साल 24 अगस्त को न्यूयार्क टाइम्स ने अपने संपादकीय में घोषणा की कि "आज जो हम जानते हैं अगर पहले जानते होते तो व्यापक सार्वजनिक विरोध से इराक पर आक्रमण को रोक दिया जाता"। इस परिप्रेक्ष्य में इस आश्चर्यजनक प्रतिपादन का कहना था कि पत्रकारों ने अपना काम न करके, बुश एवं उसके गैंग के झूठ को किसी तरह चुनौती देने तथा उसे उजागर करने के बदले में उसे स्वीकार करते हुए, प्रसारित करते हुए तथा उसकी हाँ मे हाँ मिलाकर जनता को धोखा दिया है, छला है। टाईम्स ने जो नहीं कहा वह यह कि उसके पास ही वह समाचार पत्र है और बाकी की मीडिया ने अगर झूठ उजागर किया होता तो आज लाखों लोग जिंदा होते। अभी कई वरिष्ठ स्थापित पत्रकारों का भी यही मानना है। उनमें से कुछ -- इस बारे में वे मुझसे बोलते हैं-- मात्र कुछ ही सार्वजनिक तौर पर कुछ बोल सकेंगे।

विडंबना की बात है कि जब मैने सर्वसत्तावादी समाजों की रिपोर्टिंग की तब मैने यह समझना शुरू किया  कि तथाकथित स्वतंत्र समाजों में सेंसरशिप कैसे काम करती है। 1970 के दशक में मैं चेकोस्लोवाकिया पर गुप्त ढंग से फ़िल्म बना रहा था, तब वहां स्तालिनवादी तानाशाही थी। मैने विद्रोही समूह चार्टर 77 के सदस्यों का साक्षात्कार लिया जिसमें उपन्यासकार ज्देनर उरबनेक भी थे। उन्होंने मुझे बताया कि "एक परिप्रेक्ष्य में, तानाशाही में भी हम, आप पश्‍चिमी लोगों से ज्यादा भाग्यशाली हैं। हम समाचार पत्रों में जो कुछ भी पढ़ते हैं और टेलीविजन पर जो कुछ भी देखते हैं उसमें किसी पर भी विश्‍वास नहीं करते, क्यूंकि हम उसके प्रोपेगेंडा के पीछे देखने तथा पंक्‍तियों के बीच पढ़ना सीख गए हैं। और आपके जैसे ही हम यह जानते हैं कि वास्तविक सच हमेशा दबा दिया जाता है"।

वंदना शिवा इसे 'दोयम दर्जे का ज्ञान' कहती हैं। महान आयरिश कारीगर क्लाड कोकबर्न ठीक ही
कहते हैं जब वो लिखते हैं कि "जब तक आधिकारिक तौर पर इनकार नहीं किया जाता तब तक कुछ भी नहीं मानना चाहिए"।
                  
एक बहुत पुरानी उक्‍ति है कि युद्ध में 'सच' सबसे पहले घायल होता है। नहीं ऐसा नहीं है। पत्रकारिता सबसे पहले दुर्घटनाग्रस्त होती है। जब वियतनाम युद्ध समाप्त हो गया तब 'इनकांऊटर' पत्रिका ने युद्ध को कवर करने वाले प्रसिद्ध संवाददाता राबर्ट इलीगंट का एक आलेख छापा था। "आधुनिक इतिहास में पहली बार हुआ है कि, उन्होंने लिखा, "युद्ध के परिणाम का निर्धारण लडा़ई के मैदान में नहीं बल्कि मुद्रित पन्नों पर, और सबसे ऊपर टेलीविजन के पर्दे पर हुआ"। उन्होंने युद्ध में पराजय के लिए उन पत्रकारों को जिम्मेदार ठहराया जिन्होंने अपनी रिपोर्टिंग में युद्ध का विरोध किया। राबर्ट इलीगंट का दृष्टिकोण वाशिंगटन के लिए 'महाज्ञान की प्राप्ति' था और अभी भी है। इराक में, पेंटागन ने गडे़ हुए पत्रकारों को खोज निकाला क्योंकि उसका मानना था कि आलोचनात्मक रिपोर्टिंग ने वियतनाम में उसे हराया था।  

बिल्कुल विपरीत ही सच था। सैगन में, युवा रिपोर्टर के रूप में मेरे पहले दिन प्रमुख समाचार पत्रों तथा टेलीविजन कंपनियों के महकमे में मुझे बुलाया गया। वहां मैने पाया कि दीवार में बोर्ड टँगे हुए थे जिनमें कुछ वीभत्स तस्वीरें लगी हैं। इनमें से अधिकतर वियतनामियों के शरीर थे और कुछ में अमरीकी सैनिक किसी का अंडकोष या कान उमेंठ रहे हैं। एक दफ्तर में एक आदमी की तस्वीर थी जिसे यातना दी जा रही है। यातना देने वाले आदमी के ऊपर गुब्बारेनुमा कोष्ठक में लिखा था "वह तुम्हें प्रेस से बात करना सिखायेगा"। इनमें से एक भी तस्वीरें कभी भी प्रकाशित नहीं हुईं। मैने पूछा क्यों? तो मुझे बताया गया कि जनता इन्हें कभी स्वीकार नहीं करेगी। और उन्हें प्रकाशित करना वस्तुनिष्ठ या निष्पक्ष नहीं होगा। पहले पहल तो मैनें इस सतही तर्क को स्वीकार कर लिया। मैं खुद भी जर्मनी और जापान के बीच अच्छे युद्ध की कहानियों के बीच पला बढा़ था, कि एक नैतिक स्नान से एंग्लों अमरीकी दुनिया को सभी पापों से मुक्‍ति मिल गई थी। लेकिन वियतनाम में जब मैं लंबे समय तक रुका तो मैंने महसूस किया कि हमारे अत्याचार कोई अलग नहीं थे, यह कोई सन्मार्ग से विचलन नहीं था बल्कि युद्ध अपने आप में एक अत्याचार था। यह एक बडी़ बात थी, और यह बिरले (कदाचित) ही समाचार बन पाया। हलांकि सेना की रणनीति तथा उसके प्रभावों के बारे में कुछ बढि़या पत्रकारों ने सवाल किया था। लेकिन 'आक्रमण' शब्द का प्रयोग कभी नहीं किया गया। नीरस शब्द 'शामिल होना" (इन्वाल्वड) प्रयोग में किया गया। अमरीका वियतनाम में घिर (फंस गया) है। अपने उद्‍देश्यों में सुस्पष्ट, एक भयानक दैत्य, जो एशिया के दलदल में फ़ंस गया है, का गल्प निरंतर दोहराया गया। यह डेनियल इल्सबर्ग तथा सेमूर हर्ष जैसे सीटी फूंककर चेतावनी देने वालों पर छोड़ दिया गया था, जिन्होंने माय लाय नरसंहार को गर्त में पहुंचाया, कि वे घर लौटकर विध्वंसक सच के बारे में बताएं। वियतनाम में 16 मार्च 1968 को जिस दिन माय लाय नरसंहार हुआ था, उस दिन 649 रिपोर्टर मौजूद थे और उनमें से किसी एक ने भी इसकी रिपोर्टिंग नहीं की।

वियतनाम और इराक दोनों जगह, सुविचारित नीतियों तथा तौर तरीकों से नरसंहारों को अंजाम दिया गया। वियतनाम में, लाखों लोगों की जबरन बेदखली तथा निर्बाध गोलाबारी क्षेत्र (फ़्री फायर जोन) का निर्माण करके तथा इराक में अमरीकी दबाव के तहत 1990 से ही मध्ययुगीन नाकेबंदी के द्वारा, संयुक्‍त राष्ट्र बाल कोष के अनुसार, पांच साल से कम के करीब पाँच लाख बच्चों को मार दिया गया। वियतनाम और इराक दोनों जगह नागरिकों के खिलाफ़ सुनियोजित परीक्षण के बतौर प्रतिबंधित औजारों का इस्तेमाल किया गया। एजेंट औरेंज ने वियतनाम में अनुवांशिकी और पर्यावर्णीय व्यवस्था को बदल दिया। फौज ने इसे आपरेशन 'हेड्स' कहा। कांग्रेस को जब यह पता चला इसका नाम बदल कर दोस्ताना आपरेशन रैंच हैंड्स रख दिया गया और कुछ भी नहीं बदला। यही ज्यादा ध्यान देने की बात है कि इराक युद्ध में कांग्रेस ने कैसी प्रतिक्रिया जाहिर किया है। डेमोक्रेटों ने इसे थोडा़ धिक्कारा, इसे दुबारा ब्रांड बनाया और इसका विस्तार किया। वियतनाम युद्ध पर बनने वाली हालीवुड की फिल्में पत्रकारिता का ही एक विस्तार थीं। सोचे तक न जा सकने वाले का सामान्यीकरण। हां, कुछ फ़िल्में फौज की रणनीति के बारे में आलोचनात्मक रुख लिए हुए थीं लेकिन वे सभी, आक्रमणकारियों की चिंताओं पर अपने आप को केंद्रित करने के लिए सावधान थीं। इनमें से कुछ शुरुआती कुछ फिल्में अब क्लासिक का दर्जा पा चुकी हैं, इनमें से सबसे पहली है 'डीरहंटर', जिसका संदेश था कि अमरीका पीडित हुआ है, अमरीका को मार पडी़ है, अमरीकन लड़कों ने प्राच्य बर्बरताओं के खिलाफ अपना बेहतरीन कौशल दिखाया है। इसका संदेश सबसे ज्यादा घातक है क्योंकि डीरहंटर बहुत कुशलतापूर्वक बनाई तथा अभिनीत की गई है। मुझे कहना चाहिए कि यही एक मात्र ऐसी फिल्म है जिसके विरोध में मैं जोर से चीख़ने के लिए मजबूर हो गया। ओलीवर स्टोन की फिल्म प्लाटून को युद्धविरोधी माना जाता है, और इसमें बतौर मानव वियतनामियों की झलकियां दिखाई हैं लेकिन इसने भी अंततः इसी बात को प्रोत्साहित किया कि अमरीकी आक्रमणकारी 'शिकार' बने।

इस आलेख को लिखते बैठते वक्‍त मैने ग्रीन बैरेट्स का जिक्र करने के बारे में नही सोचा था। जब तक कि अगले दिन मैने पढा़ कि जान वायन अब तक सबसे प्रभावी फिल्म बनी हुई है। ग्रीन बैरेट्स अभिनीत फिल्म जान वायन मैने मोंटगोमरी अलबामा में 1968 के एक शनिवार की रात में देखा था। (उस वक्‍त मैं वहां के तत्कालीन कुख्यात गवर्नर जनरल जार्ज वैलेस का साक्षात्कार लेने गया था।) मैं अभी अभी वियतनाम से लौटा था और मुझे विश्वास ही नहीं हो रहा था कि यह इतनी वाहियात फिल्म है। अतः मैं जोर जोर से हंसने लगा, और हंसता ही गया, हंसता ही गया। और तब तक जब तक कि मेरे चारों ओर के ठंड वातावरण ने मुझे जकड़ नहीं लिया। मेरे सहयोगी, जो दक्षिण में एक उन्मुक्‍त घुमक्कड़ थे, ने कहा "चलो यहां के इस नरक से बाहर निकलें और यहां से ऐसे भागें जैसे नरक से"।

होटल लौटने के रास्ते भर हमारा पीछा किया गया। लेकिन मुझे इसमें संदेह है कि हमारा पीछा करने वाले लोग यह जानते होंगे कि उनके हीरो जान वायन ने झूठ बोला था इसलिए उसने द्वितीय विश्‍वयुद्ध की लडा़ई में भाग नहीं लिया था। और फिर वायन के छद्‍म रोल मॉडल ने  हजारों अमरीकियों को, जार्ज बुश और डिक चेनी के प्रसिद्ध अपवादों को छोड़कर, मौत के मुँह में धकेल दिया।    

पिछले साल, साहित्य का नोबेल पुरस्कार स्वीकार करते हुए नाटककार हेराल्ड पिंटर नें ऐतिहासिक वक्‍तव्य दिया। उन्होंने पूछा "क्यों", मैं उन्हें उदृधत करता हूं, "स्तालिनकालीन रूस में व्यवस्थित बर्बरताएं, व्यापक अत्याचार, स्वतंत्र विचारों का निर्मम दमन पश्चिम में सभी  लोगों को अच्छी तरह ज्ञात हो सका जबकि अमरीकी राज्य के अपराध मुश्किल से सतही तौर पर तरह दर्ज हुए हैं और अभी तक प्रमाणित नहीं हो सके हैं। और अभी भी पूरी दुनिया में अनगिनत मनुष्यों की भयावह मौत तथा यातना निरंकुश अमरीकी सत्ता के ही कारण हो रही है। 'लेकिन, पिंटर कहते हैं, आप इसे नहीं जानते। यह कभी घटित ही नहीं हुआ। कभी कुछ नही हुआ। यहां तक कि जब सब कुछ हो रहा था तब भी कुछ घटित नहीं हुआ। यह मायने ही नहीं रखता। इसका कोई मतलब नहीं है"। पिंटर के शब्द और ज्यादा आवेगमयी थे। बीबीसी ने ब्रिटेन के सबसे चर्चित नाटककार के इस भाषण को नज़रअंदाज कर दिया।  

मैने कंबोडिया के बारे में कई वृतचित्रों का निर्माण किया है। इनमें से पहली इयर ज़ीरो: द साइलेंट डेथ आफ कंबोडिया थी। इसमें अमरीकी बमबारी के बारे में विस्तार से बताया गया है जो पोल पोट के उदय का प्रमुख कारक थी। निक्सन और किसिंजर ने जो शुरु किया पोल पोट ने उसका अंत किया। सीआईए की रपटों तक में इस बारे में कोई संदेह नहीं है। इयर ज़ीरो को मैने सार्वजनिक प्रसारण सेवा के लिए प्रस्तावित किया गया था और वाशिंगटन लाया था। सार्वजनिक प्रसारण सेवा के जिन अधिकारियों ने इसे देखा वे भौंचक्के रह गए। वे आपस में कुछ फुसफुसाए। उन्होंने मुझे बाहर इंतज़ार करने को कहा। अंततः उनमें से एक प्रकट हुआ और कहा "जान हम आपके फिल्म की तारीफ़ करते हैं। लेकिन संयुक्‍त राज्य ने पोल पोट के लिए मार्ग प्रशस्त किया यह सुनकर हम हैरान हैं" मैने कहा "आपको साक्ष्यों पर कोई आपत्ति है?" और मैने सीआईए के कई दस्तावेजों को उदृधत किया। "अरे, नहीं" उसने जबाव दिया। "लेकिन हमने इसे पत्रकारों की निर्णायक समिति के आगे पेश करने को सोचा है"।

अब यह शब्द "पत्रकार न्यायाधीश" जॉर्ज ऑरवेल द्वारा शायद खोज लिया गया है। वास्तव में उन्होंने तीन में से एक पत्रकार को खोजने का प्रबंध कर लिया गया जिसे पोल पोट द्वारा कंबोडिया निमंत्रित किया गया था। और निश्चित तौर पर उसने इस फिल्म को अपना ठेंगा दिखा दिया होगा। सार्वजनिक प्रसारण सेवा से मुझे फिर दुबारा कभी कुछ सुनने को नहीं मिला। इयर ज़ीरो को तकरीबन साठ देशों में प्रसारित किया गया और यह दुनिया भर में देखी जाने वाली डाक्यूमेंट्री में से एक है। संयुक्‍त राज्य में इसे कभी नहीं दिखाया गया। कंबोडिया पर बनाई गई मेरी पाँच फिल्मों में से, एक को न्यूयार्क सार्वजनिक प्रसारण केंद्र के एक स्टेशन डब्ल्यू नेट  पर दिखाया गया। मुझे लगता है कि इसे भोर में दिखाया गया था। इस एक मात्र प्रदर्शन के आधार पर, जबकि अधिकांश लोग सो रहे थे, इसे एक पुरस्कार दे दिया गया। क्या अद्भुत विडंबना है। यह एक पुरस्कार की पात्रता थी, श्रोताओं की नहीं।

मेरा मानना है कि हेराल्ड पिंटर का विद्रोही सच था कि उन्होंने फ़ासीवाद और साम्र्याजवाद के बीच संबंध बनाया तथा इतिहास के लिए लडा़ई को व्याख्यायित किया जिसकी रिपोर्ट शायद कभी दर्ज़ नहीं की गई। मीडिया युग की यह एक व्यापक चुप्पी है। और प्रोपेगेंडा का यही गुप्‍त उद‍‍गम स्थल है, एक विस्तृत फलक का प्रोपेगेंडा जिससे मैं हमेशा अचंभित हो जाता हूं कि कई अमरीकन उससे कहीं ज्यादा इसे जानते और समझते हैं जितना वे करते हैं। हम एक व्यवस्था के बारे में बात कर रहे हैं, निश्चित तौर पर किसी व्यक्‍ति के बारे में नहीं। और फिर भी अधिकांश लोग यही सोचते हैं कि समस्या जॉर्ज बुश और और उसका गैंग है। और हां, बुश और उसके गैंग सबसे प्रमुख हैं,  लेकिन इसके पहले जो कुछ हो चुका है ये लोग उसकी चरम सीमा से ज्यादा कुछ नहीं हैं। मेरे जीवन काल में,  रिपब्लिकनों की तुलना में उदार डेमोक्रेटों द्वारा ज्यादा युद्ध शुरू किए गये हैं। इस सच को नज़रअंदाज़ करना इस बात की गारंटी है कि प्रोपेगेंडा तंत्र तथा युद्ध निर्माण करने वाली व्यवस्था जारी रहेगी। हमारे यहां डेमोक्रेटिक पार्टी की शाखा है जो ब्रिटेन में दस सालों से सरकार चला रही है। ब्लेयर, जो घोषित तौर पर उदारपंथी है, ने ब्रिटेन को आधुनिक युग के किसी भी प्रधानमंत्री से कई बार ज्यादा, युद्ध में झोंका है। हां उसका वर्तमान साझीदार जार्ज बुश है लेकिन बीसवीं सदी के अंत का सबसे हिंसक राष्ट्रपति क्लिंटन उसकी पहली पसंद था। ब्लेयर का उत्तराधिकारी गार्डन ब्राउन भी क्लिंटन और बुश का भक्‍त है। एक दिन ब्राउन ने कहा कि "ब्रिटेन को ब्रिटिश साम्राज्य के लिए माफी मांगने के दिन अब लद गए। हमें उत्सव मनाना चाहिए"।

ब्लेयर और क्लिंटन की ही तरह ब्राउन भी उदारवादी सच को मानता है कि इतिहास के लिए युद्ध को जीता जा चुका है; कि ब्रिटिश साम्राज्य की अधीनता में भारत में अकाल, भुखमरी से लाखों लोग जो मारे गए हैं उसे भुला दिया जाना चाहिए। जैसे अमरीकी साम्राज्य में जो लाखों लोग मारे जा रहे हैं, उन्हें भुला दिया जाएगा। और ब्लेयर  जैसे उसका उत्तराधिकारी भी आश्वस्त है कि पेशेवर पत्रकारिता उसके पक्ष में है, अधिकतर पत्रकार ऐसे विचारधारा के प्रतिनिधिक संरक्षक हैं, इसे मानते हैं, भले इसे वे महसूस करें या न करें, जो अपने आपको गैर विचारधारात्मक कहती है, जो अपने आपको प्राकृतिक तौर पर केंद्रिय तथा जो आधुनिक जीवन का प्रमुख आधार ठहराती है। यह बहुत ही अच्छा है कि अभी भी हम सबसे शक्तिशाली तथा ख़तरनाक विचारधारा को जानते हैं जिसका खुले तौर पर अंत हो चुका है। वह है उदारवाद। मैं उदारवाद के गुणों से इंकार नहीं कर रहा हूं, इससे बहुत दूर हूं। हम सभी उसके लाभार्थी हैं। लेकिन अगर हम उसके खतरों से, खुले तौर पर अंत हो चुकी परियोजनाओं से तथा इसके प्रोपेगेंडा की सभी उपभोक्‍ता शक्‍तियों से इंकार करते हैं तब हम सच्चे लोकतंत्र के अपने अधिकार से इंकार कर रहे हैं। क्योंकि उदरवाद और सच्चा लोकतंत्र (जनवाद) एक ही नहीं हैं। उदारवाद १९वीं शतब्दी में अभिजात्य लोगों के संरक्षण से प्रारंभ हुआ था। और जनवाद कभी भी अभिजात्य लोगों के हाथों में नहीं सौपा जा सकता। इसके लिए हमेशा लडा़ई लडी़ गई है। और संघर्ष किया गया है।

युद्ध विरोधी गठबंधन, युनाइटेड फ़ार पीस एंड जस्टिस की एक वरिष्ठ अधिकारी ने अभी हाल में ही कहा, और मैं उन्हें उदृधत कर रहा हूं, कि "डेमोक्रेटिक यथार्थ की राजनीति का प्रयोग कर रहे हैं।" उनका उदारवादी ऐतिहासिक यथार्थ वियतनाम था। उन्होंने कहा कि राष्ट्रपति जानसन ने वियतनाम से सैन्य दलों की वापसी तभी शुरू किया जबकि डेमोक्रेटिक कांग्रेस ने युद्ध के ख़िलाफ़ मतदान प्रारंभ किया। जो हुआ यह नहीं था। वियतनाम से चार साल के लंबे समय के बाद सैनिकों का हटना शुरू हुआ। और इस दौरान संयुक्‍त राज्य ने वियतनाम, कम्बोडिया और लाओस में पिछले कई वर्षों में मारे गए लोगों से कहीं  ज्यादा लोगों को बमों से मार गिराया। और यही सब इराक में भी हो रहा है। पिछले वर्षों में बमबारी दुगुनी हो गई है। और अभी तक इसकी रिपोर्ट कहीं नहीं आई है। और इस बमबारी की शुरुआत किसने की? क्लिंटन ने इसे शुरू किया। १९९० के दशक के दौरान क्लिंटन ने इराक के उन इलाकों पर बमों की बरसात की जिसे शिष्ट/नरम शब्दों में उडा़न रहित क्षेत्र (फ़्री फायर ज़ोन) कहा जाता था। इसी काल में उसने इराक की मध्ययुगीन नाकेबंदी की जिसे 'आर्थिक प्रतिबंध' कहा गया, जिसमें, मैने पहले भी जिक्र किया है कि पाँच लाख बच्चों की दर्ज मौतों के अलावा लाखों लोगों को मार दिया गया। इनमें से किसी एक भी नरसंहार के बारे में तथाकथित मुख्यधारा की मीडिया में लगभग कुछ नहीं बताया गया  है। पिछले साल जॉन हापकिंस सार्वजनिक स्वास्थ्य विद्यापीठ नें अपने एक अध्ययन में बताया है कि इराक पर आक्रमण के बाद से छः लाख पचपन हज़ार इराकियों की मौत आक्रमण के प्रत्यक्ष परिणामों के कारण हुई हैं। आधिकारिक दस्तावेज बताते हैं कि ब्लेयर सरकार इन आंकडों के बारे में जानती थी कि ये विश्वसनीय हैं। इस  रिपोर्ट के लेखक लेस राबर्ट ने कहा कि ये आंकडें फ़ोर्डम विश्‍वविद्यालय द्वारा कराए गए रुवांडा नरसंहार के बारे में कराए गए अध्ययन के आंकडों के बराबर हैं। रॉबर्ट के दिल दहला देने वाले रहस्योद्‍घाटन पर मीडिया  मौन बनी रही। एक पूरी पीढी़ की संगठित हत्या के बारे में क्या कुछ अच्छा हो सकता है, हेराल्ड पिंटर के शब्दों में कहें तो "कुछ हुआ ही नहीं। यह कोई मामला नहीं है"।

अपने आप को वामपंथी कहने वाले कई लोगों ने बुश के अफगानिस्तान पर आक्रमण का समर्थन किया। इस तथ्य को नजर अंदाज कर दिया गया कि सीआईए ने ओसामा बिन लादेन का समर्थन किया था। क्लिंटन प्रशासन ने तालिबानियों को गुप्‍त तरीके से प्रोत्साहित किया था, यहां तक कि उन्हें सीआईए में उच्च स्तरीय समझाइश दी गई थी, यह सब संयुक्‍त राज्य में सामान्यतः अनजान बना हुआ है। अफगानिस्तान में एक तेल पाइपलाईन के निर्माण में बडी़ तेल कंपनी यूनोकल के साथ तालिबानियों ने गुप्‍त भगीदारी की थी। और क्लिंटन प्रशासन के एक अधिकारी से कहा गया कि "महिलाओं के साथ तालिबानी दुर्व्यवहार कर रहे हैं" तो उसने कहा कि "हम ऐसे में भी उनके साथ रह रहे हैं"। इसके स्पष्ट प्रमाण हैं कि बुश ने तालिबान पर हमला करने का जो निर्णय लिया वह ९/११ का परिणाम नहीं था। बल्कि यह दो महीने पहले जुलाई २००१ में ही तय हो चुका था। सार्वजनिक तौर पर यह सब संयुक्‍त राज्य में सामान्यतः लोगों की जानकारी में नहीं है। जैसे अफ़गानिस्तान में मारे गए नागरिकों की गणना के बारे में लोगों को कुछ मालूम नहीं है। मेरी जानकारी में, मुख्यधारा मे सिर्फ़ एक रिपोर्टर, लंदन में गार्डियन के जोनाथन स्टील ने अफगानिस्तान में नागरिकों की मौत की जाँच किया है और उनका अनुमान है कि २०००० नागरिक मारे गए हैं और यह तीन  साल पहले की बात है।

फिलिस्तीन की चिरस्थायी त्रासदी, तथाकथित वाम की गहरी चुप्पियों तथा आज्ञानुकूलिता की बडी़ भूमिका के कारण जारी है। हमास को लगातार इजरायल के विध्वंस के लिए तैयार तलवार के रूप में व्याख्यायित किया जा रहा है। आप द न्यूयार्क टाइम्स, एशोसिएट प्रेस, बोस्टन ग्लोब को ही लीजिए। वे सभी इस उक्‍ति को स्तरीय घोषणा के बतौर इस्तेमाल करते हैं। और जबकि यह ग़लत है। हमास ने दस साल के लिए युद्ध विराम की घोषणा की है जिसकी रिपोर्टिंग लगभग नहीं की गई है। इससे भी महत्वपूर्ण यह है कि हमास में पिछले वर्षों में एक ऐतिहासिक विचारधारात्मक परिवर्तन (शिफ़्टिंग) हुआ है जो, जिसे इजराइल का यथार्थ कहते हैं उसे  मान्यता प्रदान करता है, लगभग अज्ञात है। और फिलिस्तीन के विध्वंस के लिए इजरायल जैसी तलवार है
वह अकथनीय ही है।

फिलिस्तीन की रिपोर्टिंग पर ग्लास्गो विश्‍वविद्यालय द्वारा आंखें खोल देने वाले अध्ययन किए गई हैं। उन्होंने ब्रिटेन में टी।वी। समाचार देखने वाले युवाओं का साक्षात्कार लिया। ९० प्रतिशत से ज्यादा लोगों का सोचना था कि फिलिस्तीनी अवैधानिक ढंग से बसे हुए हैं। डैनी स्चेक्टर के प्रसिद्ध मुहावरे के अनुसार "वे ज्यादा देखते हैं, बहुत कम वे जानते हैं"।

वर्तमान में सबसे भयानक चुप्पी परमाणु शस्त्रों तथा शीत युद्ध की वापसी पर है। रूसी स्पष्टतः समझते हैं कि पूर्वी यूरोप में तथाकथित अमरीकी सुरक्षा ढाल उन्हें नष्ट करने तथा नीचा दिखाने के लिए बनाई गई है। फिर  भी यहां पहले पन्नों में यही होता है कि पुतिन एक नया शीत युद्ध प्रारंभ कर रहे हैं। और पूरी तरह से विकसित नई अमरीकी परमाणु व्यवस्था, जिसे भरोसेमंद शस्त्रों की बदली (रेलिएबल वीपन्स रिप्लेसमेंट) कहते  हैं, जो लंबे समय से स्थगित महत्वाकांक्षा -- कृत्रिम युद्ध तथा परमाणु युद्ध के बीच की दूरियों को पाटने के लिए, बनाई (डिजाईन) गई है उसके बारे में चुप्पी है।

इस बीच ईरान को निशाना बनाया जा रहा है, जिसमें मीडिया लगभग वही भूमिका निभा रही है जैसी कि इराक पर आक्रमण के पूर्व निभा रही थी। और देखिए कि डेमोक्रेटों के लिए, बराक ओबामा कैसे विदेशी संबंधों के आयोग, वाशिंगटन पर राज्य करने के लिए पुराने उदारवादियों के लिए प्रोपेगेंडा रचने वाले प्रमुख अंग, का स्वर बन गया है। ओबामा लिखता है कि वह सैनिकों की वापसी चाहता है, "हम लंबे समय से प्रतिवादी इरान और सीरिया के खिलाफ़ सैन्य शक्‍ति द्वारा आक्रमण नहीं करेंगे।" उदारवादी ओबामा से यह सुनिए, "पिछली शताब्दी में महान खतरों के क्षण में हमारे नेताओं ने दिखाया कि अमरीका ने अपने कार्यों तथा उदाहरणों द्वारा  दुनिया का नेतृत्व किया तथा उँचा उठाया, कि हम लाखों लोगों की चहेती आज़ादी के लिए, उनके क्षेत्र की सीमाओं से आगे जाकर लडे़ और उनके पक्ष में खडे़ हुए।"

प्रोपोगेडा की यही गांठ है, अगर आप चाहते हैं तो आपको बहका सके, जिसमें उसने हर अमरीकी के जीवन को और हमारे जैसे कईयों को, जो अमरीकी नहीं हैं, लपेटा है। दक्षिण से वाम तक, धर्मनिरपेक्ष से ईश्वर को पूजने वाले तक बहुत कम लोग जो जानते हैं वह यह कि संयुक्‍त राज्य के प्रशासन ने पचासों सरकारों को उखाड़ फेंका है। और उनमें से अधिकतर लोकतांत्रिक थीं। इस प्रकिया में तीस देशों पर आक्रमण तथा बमबारी की गई जिसमें अनगिनत जानें गईं। बुश का प्रहार बहुत खुला हुआ है, और यह निर्णायक है, लेकिन जिस क्षण हम डेमोक्रेटों से लाखों लोगों द्वारा चहेती आज़ादी के लिए लड़ने तथा उनके पक्ष में खडे़ होने की बकवाद तथा उनके  कुटिल आह्वान को स्वीकार करते हैं, इतिहास की लडा़ई में हार जाते हैं, और हम खुद भी मौन रह जाते हैं।

    
तो हमें क्या करना चाहिए? जब कभी मैं सभाओं में मैं जाता हूं अक्सर यह सवाल पूछा जाता है, और अपने आप में मजेदार बात ये कि इस सम्मेलन जैसी ज्यादा जानकारी वाली सभाओं में भी यही सवाल पूछा  जाता है। मेरा अपना अनुभव है कि तथाकथित तीसरे देशों की जनता शायद ही  इस तरह के प्रश्न पूछती है क्योंकि वे जानते हैं कि क्या करना है। और कुछ अपनी स्वतंत्रता तथा अपने जीवन का मूल्य चुकाते है। लेकिन वे जानते हैं कि  क्या करना चाहिए। यह एक ऐसा प्रश्‍न है कि कई डेमोक्रेटिक वामपंथियों को  इसका अभी भी जवाब देना है।

अभी भी वास्वविक स्वतंत्र सूचनाएं सभी के लिए प्रमुख शक्‍ति बनी हुई है। और मेरा मानना है कि हमें इस विश्‍वास कि मीडिया जनता की आवाज़ है, जनता के  लिए बोलती है, के जाल में नहीं फंसना चाहिए। यह स्तालिनवादी चेकोस्लोवाकिया में सच नहीं था और  संयु‍क्‍त राज्य में यह सच नहीं है।

अपने पूरे जीवन भर मैं एक पत्रकार ही रहा हूं। मैं नहीं जानता कि जनता की चेतना कभी भी इतना तेजी से बढी़ थी जितना कि आज बढ़ रही है। हलांकि इसका आकार तथा इसकी दिशा बहुत स्पष्ट नहीं है। क्योंकि,  पहला तो, लोगों में राजनीतिक विकल्पों के बारे में गहरा संदेह है और दूसरा कि डेमोक्रेटिक पार्टी चुनाव में भाग लेने वाले वामपंथियों को पथभ्रष्‍ट करने तथा उन्हें आपस में विभाजित करने में सफल हो गई है। फिर भी जनता की बढ़ती आलोचनात्मक जागरुकता ज्यादा महत्वपूर्ण है जबकि आप देख सकते हैं लोग बडे़ पैमाने पर सिद्धांतविहीनता, जीवन जीने के सर्वोत्तम रास्ते के मिथकशास्त्र, को अपना रहे हैं तथा वर्तमान में डर से विनिर्मित स्थितियों में जी रहे हैं।

पिछले साल, न्यूयार्क टाइम्स अपने संपादकीय में स्पष्‍ट/साफ़ ढंग से सामने क्यों आया? इसलिए नहीं कि  यह बुश के युद्ध का विरोध करता है -- ईरान के कवरेज को देखिए। वह संपादकीय एक बमुश्किल स्वीकृति थी कि जनता मीडिया की प्रछन्न भूमिका को समझना शुरू कर रही है तथा लोग "पंक्‍तियों के बीच" पढ़ना  सीख रहे हैं।

अगर ईरान पर आक्रमण किया तो प्रतिक्रिया तथा उथल पुथल का अनुमान नहीं लगाया जा सकता। राष्ट्रीय सुरक्षा तथा घरेलू सुरक्षा के लिए राष्ट्रपति को मिले दिशानिर्देश, बुश का आपातकाल में  ही सरकार को सभी पहलुओं की शक्‍ति देते हैं। यह असंभव नहीं है कि संविधान को ही बर्खास्त कर दिया जाए -- सैकडों हज़ारों तथाकथित आतंकवादियों तथा दुश्मनों का मुकाबला करने तथा उनकी धर पकड़ करने वाले कानूनों को पहले ही किताबों में बंद कर दिया गया है। मुझ लगता है कि जनता इन खतरों को समझ रही  है, जिन्होंने ९/११ के बाद लंबा रास्ता तय किया है तथा सद्दाम हुसैन तथा अलकायदा के बीच रिश्तों के प्रोपेगेंडा के बाद तो एक बहुत लंबा रास्ता तय किया है। इसलिए इन्होंने पिछले साल नवंबर में डेमोक्रेट्स लोगों को सिर्फ धोखा खाने के लिए वोट दिया। लेकिन उन्हें सच चाहिए और पत्रकार को सच का एजेंट होना चाहिए,  सत्ता का दरबारी नहीं।

मेरा मानना है कि पांचवा स्तंभ संभव है, जनआंदोलन के सहयोगी कारपोरेट मीडिया को खंड खंड करेंगे, जवाब देंगे तथा रास्ता दिखाएंगे। प्रत्येक विश्‍वविद्यालयों में, मीडिया अध्ययन के हरेक कॉलेजों में, हर समाचार कक्षों  में, पत्रकारिता के शिक्षकों, खुद पत्रकारों को वाहियात वस्तुनिष्ठता के नाम पर जारी खून ख़राबे के दौर में अपनी निभाई जा रही भूमिका के बारे में प्रश्‍न करने की ज़रूरत है। खुद मीडिया में इस तरह का आंदोलन एक  पेरोस्त्रोइका (खुलापन) का अग्रदूत होगा जिसके बारे में हम कुछ नहीं जानते। यह सब संभव है। चुप्पियां तोडी़ जा सकती हैं।

ब्रिटेन के "राष्ट्रीय पत्रकार संघ (नेशनल यूनियन आफ  जर्नलिस्ट) ने एक जबर्दस्त विद्रोह लाया है और इजरायल  का बहिष्कार करने का आह्वान किया है। मीडियालेन्स डाट ऑर्ग नामक वेबसाइट ने अकेले बीबीसी को जिम्मेदार होने को कहा है। संयुक्‍त राज्य में स्वतंत्र विद्रोही स्पिरिट की वेबसाइटें दुनिया भर में खूब लोकप्रिय हो रही हैं। टाम फीले की इंटरनेशनल क्लीयरिंग हाऊस से लेकर माइक अल्बर्ट की जेडनेट, कांऊटरपंच आनलाइन तथा पियर के बेहतरीन कार्यों तक, मैं सभी का जिक्र कर सकता हूं। इराक पर सबसे बेहतरीन रिपोर्टिंग डार जमैल की साहसी पत्रकारिता है तथा जोय वाइल्डिंग जैसे नागरिक पत्रकार जिन्होंने फलूजा शहर से फलूजा की नाकेबंदी की रिपोर्टिंग की है, वेब पर ही आईं हैं।

वेनेजुएला में, ग्रेग विल्पर्ट की जाँच रिपोर्ट अब ह्‍यूगो शावेज को निशाना बनाने के लिए उग्र प्रोपेगेंडा ज्यादा बन गई है, कोई ग़लती मत कर बैठियेगा, यह वेनेजुएला में बहुमत की अभिव्यक्‍ति की आज़ादी पर  खतरा है। भ्रष्ट आरसीटीवी की ओर से पश्चिम में वेनेजुएला के खिलाफ अभियान के पीछे का झूठ है। बाकी के हम लोगों के लिए यह एक चुनौती है कि इस विध्वंसक/पथभ्रष्‍ट जानकारी की गोपनीयता का भंडाफॊड़  करें तथा इसे साधारण लोगों के बीच में ले जाएं।

यह सब हमें जल्द ही करना होगा। उदारवादी लोकतंत्र अब कार्पोरेट तानाशाही का आकार ग्रहण कर रहा है। यह एक ऐतिहासिक विचलन (शिफ्ट) है तथा मीडिया को इसका मुखौटा बनने की अनुमति बिल्कुल नहीं देनी चाहिए।

बल्कि इसे लोकप्रिय, ज्वलंत मुद्दा बनाकर सीधी कार्यवाही का विषय बनाना चाहिए। महान सचेतक टाम पेन  ने चेतावनी दी थी कि 'अगर अधिकांश लोग सच तथा सच के विचारों से इनकार करने लेगेंगे तो भयंकर  तूफानों का दौर होगा, जिसे वह 'शब्दों का बास्तील' कहते हैं। अभी वही समय है।


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